महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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गुलनार में भी कोहकाफ की परियों का, ऐसे ही कुछ दूर-दराज का असर अवश्य दीख पड़ता था।नायब सूबेदार करीम खाँ ने उसे लाहौर के बाजार में खरीदा था।अब्दुल्ला वेग का हाकिम नायब सूवेदार अदहम खां था। वह अकबर को दूध पिलाने वाली धाय माहमअनका का पुत्र था। स्वभाव से कुटिल, स्वार्थी और विलासी। आयु में वह अभी सोलह-सत्रह वर्ष से अधिक नहीं था। अकबर का उसके प्रति ममत्व था, यद्यपि वह उसके स्वभाव को पसन्द नहीं करता था। अकवर के संरक्षक बैरम खां ने माहमअनका के इस बेटे को कभी पसन्द नही किया लेकिन वादशाह की सिफारिश से उसने शाही जनानखाने और मालखाने का रक्षक और प्रबन्धक सेना में उसे नायब का पद दे रखा था। करीम खाँ यद्यपि भारतीय पंजाबी मुसलमान था फिर भी बैरम खाँ उसकी स्वामिभक्ति और योग्यता से सन्तुष्ट था। अनेक ईरानी, तूरानी नायबों से अधिक वह उसका विश्वास करता था। बादशाह के दूध भाई अदहम खाँ को किसी हिन्दुस्तानी मुसलमान के आधीन रहकर काम करना बहुत अपमानजनक लगता था, लेकिन इस अपमान से न तो उसकी माँ उसे बचा सकती थी और न स्वयं बादशाह ही। करीम खाँ ने जिस दिन गुलनार को खरीदा था उसी दिन अदहम खाँ की कुदृष्टि उस पर पड़ गई थी। उसने अपने विश्वासपात्र अ्नुचर अब्दुल्ला से कहा कि करीम खां इस दासी का भोग न करने पाए। रात होने से पहले ही गुलनार उसके यहाँ से गायब होकर अदहम खाँ के पास पहुँच जाए।
अब्दुल्ता बेग महत्त्वाकाक्षी था।बादशाह के दूधभाई का महत्त्व जानता था।इसीलिए उसने अभदहम खाँ से भी बड़े हाकिम की खरीदी हुईं बाँदी को उड़ा लाने का दुस्साहस किया। करीम खां की एक दासी युवक और अविवाहित अबदुल्ला वेग पर अनुराग रखती थी। अब्दुल्ला ने उसे अपने प्रेम और अदहम खां के पंजे से बचा लिया। झुरपुटे में गुलनार उड़ा ली गई और 'आदमखोर बाघ ले गया-ले गया' की धूम मच गई। दूसरे ही दिन संयोग से फौज को लाहौर से दिल्ली की ओर कूच करना पडा़। सेना चूकि तेजी से गति कर रही थी इसलिए करीम ख़ां अपनी दासी के संबंध में गहरी खोजबीन न कर पाया। फिर भी पानीपत के करीब पहुँचने तक उसे यह मालूम हो चुका था कि गुलनार को आदमखोर बाघ नही बल्कि अधर्मी अदहम खां उड़ा ले गया है। वह बड़े ही क्रोध में था। उसने अदहम खां के पास तक यह सूचना भेज दी कि वह उसकी आजर- बैजानी दासी को यदि शीघ्र ही लौटाकर उससे क्षमा नहीं मागेगा तो युद्ध समाप्त होते ही वह बैरम खां अतालीकी से निश्चय ही इस बात की शिकायत करेगा।ऐसी हालत में उसे बादशाह का दूधभाई होने के बावजूद जो नतीजा भुगतना पडे़गा।अदहम खां उसे अच्छी तरह से जानता है। पर अहमद खां करीम खां से क्षमा माँगने को किसी भी तरह तैयार न था।
दूसरे गुलनार ने उससे यह भी कह दिया था कि वह उसका गर्भ घारण कर चुकी है। अदहम खां के लिए फिर यह सोचना तक असह्य था कि उसकी संतान उसके दुश्मन की दास कहलाए।गुलनार स्वयं भी अब अदहम खां को नहीं छोड़ना चाहती थी।लेकिन अदहम खां को अपनी नौकरी और जान भी प्यारी थी। अपनी नौकरी और जान दोनों की रक्षा करने के लिए अदहम खां ने एक उपाय सोचा। उसने गुलनार का विवाह अब्दुल्ला वेग से कराने की उक्ति सोची। योजना बनी कि कह दिया जाएगा कि रात को यह औरत भाग कर अब्दुल्ला के खेमे में घुस गई और गिड़गिड़ाकर शरण माँगने लगी। कहा कि हेमू बककाल के महलों की दासी हूँ, हाल ही में खरीदी गई थी। अब्दुल्ला ने देखा कि औरत अच्छी है, मुसलमान है, बाप-दादों के इलाके की है और वह चूँकि कुँवारा था इसलिए उसने जब अदहम खां से सारी बात कही तो उसने दोनों का निकाह पढ़वा दिया। अब वह एक तुर्की मुसलमान की ब्याहता बीवी है। उसे कोई नहीं छीन सकता। यह योजना बनाकर अदहम खां ने सोचा था कि कुछ दिनों के बाद मामला जब ठंडा पड़ जाएगा और अगर उसे गुलनार से बेटा हुआ, तो अव्दुल्ला से तलाक दिलवाकर वह उसे अपने पास फिर से ले आएगा।
अदहम खां की इसी युक्ति में नियति ने तुलसी और कैलासनाथ के भाग्य का संयोग भी जोड़ दिया था। तुलसी की भविष्यवाणी सुनकर अब्दुल्ला जमादार अपनी जान बचाने के लिए मन में कुलाबे भिड़ाने लगा। अब्दुल्ला महत्त्वा कांक्षी अवश्य था, जी हुजूर भी था मगर पराया पाप बिना किसी लज्जत के अपने सिर पर मढ़े जाना उसे तनिक भी स्वीकार न था। वह अरदहम खां की सारी चतुराई भाँप गया था। भूठा निकाह पढ़वाकर हाकिम की धरोहर अपने पास रखने के लिए वह हरगिज तैयार नहीं था।मगर वह अदहम खां के सामने इनकार करने का साहस भी नहीं कर सकता था। हिन्दुस्तानी तुर्क अब्दुल्ला भी अपुनी आन और जान बचाने के लिए खालिस तुर्के अदहम खां का दुश्मन बन गया। उसने नायब करीम खां को बतला किया कि अगर वह इसी वक्त सरकारी दौड़ ले आए तो अदहम खां के खेमो से गुलनार बरामद की जा सकती है।
संयोग से प्रदहम खां ने तय की हुई योजना उसी दिन बदल दी। उसके एक साथी तुर्क मोनेम खां की फूफी शहजादे की तातारी बेगम के महल की बाँदी थी। अ्दहम खां ने मोनेम खां की सलाह से गुलनार को शाही डोली पर चुपचाप शाही बादियों के महल्ले में भिजवा दिया था।जब नायब करीम खां सिपाहियों की दौड़ लेकर उसके यहाँ तलाशी लेने आया तो चिड़िया उड़ चुकी थी। अदहम खां ने त्योरियाँ चढ़ा कर करीम खां को सरेआम खूब कहनी पर कहनी सुनाईं।
बेचारे अब्दुल्ला की जान अब सीधी दो चक्कियों के पाटों मे आ गई थी। उसका हाकिम नायब अदहम खां और आलाहाकिम नायब करीम खां दोनों ही उसपर शक कर रहे थे।इसलिए तुलसी की भविष्यवाणी का उस पर तात्कालिक प्रभाव पड़ा था और उसने अपनी दौड़ धूप आरम्भ की थी।
कैलास और तुलसी को एक जगह अलग खड़ा करके तथा उन पर लदे माल को दूसरों पर लदवाने का प्रबन्ध करके अब्दुल्ला उन दोनों को लेकर एक सनन्नाटे की जगह में चला गया। उसने घबराकर कहा-“नजूमी, तुम्हारी बतलाई हुई बात सच निकली।
क्रमशः
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