महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
69-
मगर उसका असर बड़ा भयानक हुआा जा रहा है। तनिक बिचारो कि मेरी जान को तो कोई खतरा नही है?”
तुलसीदास ने गणना करके कहा-“जमादार जी, आप लम्बी तान कर सोइए। आपके दोनों दुश्मनों का आज ही तबादला हो जाएगा। मार्ग के अगले पड़ाव तक आपका हाकिम बदल जायगा।”
सुनकर अब्दुल्ला बहुत प्रसन्न हुआ, बोला- “नजूमी, अगर तुम्हारी बात सच निकली तो मैं आज रात में तुमको ओर तुम्हारे साथी को आजाद कर दूँगा और बाकी रास्ते में तुमसे अब बोझा ढोने की बेगार भी नहीं ली जाएगी, लेकिन तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।”
“क्या करना होगा?”
“मैं तुमको अदहम खां के पास लिए चलता हूँ। तुम्हें किसी जुगत से यह बात अदहम खां के मन में बैठानी हो होगी कि उसके यहाँ तलाशी लिवाने में मेरा तनिक भी हाथ नहीं था। अदहम खां बादशाह का दूधभाई है। अब तक मुझसे खूब राजी भी रहा है, आगे भी वह मेरी मदद कर सकता है। मैं उससे बिगाड़ हरगिज नहीं करना चाहता।”
सुनकर तुलसी दास ने सलाह के लिए कैलासनाथ की ओर देखा।कैलास ने आँखों ही में संकेत करके अपनी सहमति प्रदान की। अब्दुल्ला एक मातहत को कुलियों का काफिला आगे बढा़ने का हुकुम देकर उन दोनों के साथ नायव अदहम खां की ओर चल दिया।हरम की शाही बेगमों, रखेलौं, नाचनेवालियों, बाँदियों तथा दूसरे-तीसरे वर्ग तक के ओहदेदारों की स्त्रियों का काफिता एक साथ चलता था। उनकी रक्षा में सेना की दो टुकड़ियाँ चलती थीं।अदहम खां उन्हीं के काफिले के पीछे था।वह उस समय बहुत ही तैश में भरा हुआ था। अब्दुल्ला पर यद्यपि इस समय तक उसके मन में कोई खास शक तो पैदा नहीं हुआ था।उसका अहम अपने सौभाग्य से दीपित आवेश में हर एक को अपने आगे तुच्छ समझ रहा था। अब्दुल्ला तो मातहत होने की वजह से यों भी तु्च्छ ही था।उसको देखते ही वह भड़क पड़ा- “तू अपना काम छोड़ कर यहाँ क्यों आया।”
अब्दुल्ला गिड़गिड़ा कर बोला- “सरकार को मुबारकबाद देने आया हूँ।मुझे तो इस नजूमी ने बतला दिया था कि आप पर खुदा मेहर बान है। जरा भी आँच नहीं आएगी। मैं इसीलिए इनको आपकी खिदमत में ले आया हूँ ,मगर वल्लाह तारीफ है उस हुजूर की दूरदेशी की जो पहले से ही उन आने वाले ख़तरों को भाँप लेती है।कल तक तो हुजूर ने मुझसे कुछ और ही बात कह रखी थी।”
अदहम खां खुशामद से ढीला पड़ा गया, बोला-“अल्लाह का शुक्र है। वही दु्श्मनों को तबाह करता है। नजूमी, यह बतलाओ कि अभी हाल में ही हमने जो काम किया है उसका आखिरी अन्जाम क्या होगा? ”
तुलसी विचार करके बोले-“हुजूर, जिस वस्तु को आप अपने यहाँ से निकाल चुके वह अब आपके पास लौटकर नहीं आयेगी।”
सुनकर अदहम खां की त्योरियाँ कुछ-कुछ चढ़ गईं। मन में इस समय अपनी जीत के नशे में गुलनार बहुत ही प्यारी लग रही थी।वह उसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। इसीलिए तुलसी की बात सुनकर उसका मिजाज बिगड़ने लगा। कैलासनाथ का ध्यान उधर गया। उन्होंने तुरन्त ही हाथ जोड़कर कहा- “हजूर, मेरे साथी अल्लाह ईश्वर के बड़े भगत भी हैं। इनकी बात में आपकी भलाई के सिवा और कुछ नहीं हो सकता।”
अदहम खां के क्रोध के उबाल पर मानों ठंडे पानी का छींटा सा पड़ा।पल भर चुप रहकर उसने फिर पूछा- “वह माल कौन ले जाएगा? ”
तुलसीदास ने विचार कर कहा-“किसी बहुत ऊँचे घराने का आदमी।”
“उसकी औलाद क्या होगी?”
“लड़का ” तुलसीदास ने विचार कर फिर कहा- “वह राजा बनेगा।”
“क्या उससे या उसकी वालिदा से मेरी फिर कभी मुलाकात होगी?”
“माँ से कभी नही किन्तु बेटे से होगी….न होती तो अच्छा होता।”
“क्यों”
“लड़ाई के मैदान में या तो वह आपकी हत्या करेगा या आप उसे मारेंगे।”
अदहम खां का तेहा फिर भड़का, आँखें लाल हुईं। वह तुलसी के प्रति कोई कड़ा आदेश देने ही जा रहा था कि अचानक कुछ विचार आते ही गम्भीर हो गया, बोला-“ऐ विरहमन, मुझे तुम्हारी सच्चाई का इम्तहान लेना होगा। तुम मुझे कोई ऐसी बात बतलाओ जो घड़ी आध घड़ी या सूरज ढले से पहले तक होने वाली हो ”
तुलसी ने तुरन्त उत्तर दिया -“थोड़ी ही देर मे सरकार का तबादला दूसरी फौज में हो जाएगा।”
अदहस खां चौंका, फिर उसके चेहरे पर आश्चर्य भरी खुशी झलकी,पूछा- "क्या मेरी तरक्की होगी?”
“जी हाँ।”
“मेरे दुश्मन का क्या अन्जाम होगा?”
“उसका भी तबादला होगा हुजूर, और आज ही होगा।”
“क्या उसकी भी तरक्की होगी?”
“हाँ, अन्नदाता लेकिन वह शीघ्र ही मारा जाएगा।”
अदहम खां के चेहरे पर तुलसी की बात के पूर्वार्ध ने ईर्ष्या की भड़क उठाई और बाद की बात ने सन्तोष की झलक भी। वह दो पल चुप रहा, फिर कहा-“अबदुल्ला, उन ब्रह्मनों को आज शाम तक अपनी निगरानी में रखो।”
शाम को पड़ाव पर पहुँचने तक जमादार अब्दुल्ला को अदहम और करीम खां के तबादले का समाचार मिल चुका था। करीम खां बैरम खां के अंग-रक्षकों में नियुक्त हो गए थे और अदहम खां को सूबेदारी मिली थी।अबदुल्ला का नया हाकिम एक अधेड़ तातारी था जो मदक पीने के लिए खासा बदनाम भी था।अपने ज्योतिषी बन्दी के प्रति अब्दुल्ला की आस्था अब बहुत बढ़ गई थी, इसलिए मुक्त करने से पहले वह तुलसी को अपने नये हाकिम के पास भी ले जाना चाहता था। उसने तुलसी से अपने नये हाकिम के सम्बन्ध में पूछा कि उसके साथ उसकी कैसी निभेगी?
तुलसी ने कहा- “सूर्यास्त के बाद मैं ज्योतिष की गणना नहीं करता। अपने वचन के अनुसार आप मुझे अब मुक्ति प्रदान करें।”
सुनकर अब्दुल्ला को क्रोध आ गया, उसने कहा- “तब फिर तुम्हें भी कल ही आजादी मिलेगी।” दूसरे दिन नये हाकिम ने, जिसे सब लोग पीठ पीछे मदकची वेग के नाम से पुकारते थे, कुलियों के जमादार अब्दुल्ला को सुबह मुँह अँधेरे ही बुलवा भेजा। उसके सामने पहुँचते ही मदकची बेग ने एकाएक भड़ककर कहा- “क्यों बे उल्लू के पठ्ठे, ऐसी बेहूदा औरत कल रात तूने मेरे पास भेजी जो कि सोते में खरार्टे भर भरकर सारी रात मुझें परेशान करती रही।”
अब्दुल्ता जमादार डर के मारे थर थर काँप उठा। उसने गाँव से पकड़ी गई हेमू के रसद व्यवस्थापक की रखैल को मदकची के पास भेजा था।
क्रमशः
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