Wednesday, 17 May 2023

tc 70

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
70-

वह अफीम, भाँग आदि अमल तैयार करने और अपने बूढ़े मालिक को कोरी बातों से ही संतुष्ट करके सुला देने के लिए गाँव में सविनोद प्रख्यात थी। अब्दुल्ला ने तो उसकी यह मनोरंजक ख्याति सुनकर तथा उसका नाक नवशा सिजले देख कर ही भेजा था। मगर नरगिस आलसियों की सरदारिनी भी थी, यह उसे नहीं मालूम था। नरगिस से चूक यह हुई कि उसने मदकची बेग के अमल की मात्रा को कम समझा। आधी रात तक तो उसने मदकची बेग को रिझाने का अच्छा प्रयत्न किया, किन्तु उसके बाद वह सो गई। मदकची बेग का नशा जल्दी ही उचट गया पिनक से होश में आने पर उसने देखा कि नरगिस खुर्राटे भर रही है। उसने जगाकर उसे अफीम घोलने का हुक्म दिया। नींद की मारी नरगिस अनख कर उठी और उसने दो कटोरियों मे चटपट अफीम उंडेली। दुर्भाग्य से कम अफीम वाली कटोरी, जो कि उसने अपने वास्ते घोली थी, बूढें तातारी को दे गई और गहरी वाली खुद पी गई। इसके बाद तो जैसे वह घोड़े बेच कर सो गई और खर्राटे भरने लगी।मदकची वेग थोड़ी देर के बाद ही फिर अपनी पिनक से जाग पड़ा और अपनी अंकशायिनी के खुर्राटों से परेशान होता रहा। 
तातारी हाकिम के गुस्से के कारण उस की उबलन भरी बातों से जानकार होकर अब्दुल्ला समझ गया कि नया हाकिम खासा बौड़म आदमी है। उसे अपने मातहतों पर हुकूमत करना नहीं आता। उसका भय कुछ कुछ कम हुआ। उसने खुशामदाना अन्दाज में झुककर कहा-“हुजूरेआली, यह कम्बख्त हिन्दुस्तानी औरत हुजूर के अमल करने की ताकत को सही तरीके से आँक न सकी। मैं आज ही उसका कत्ल करवा दूँगा।” “नही, नही, वह बेवकूफ भले ही हो मगर सेज पर मौजे-दरिया की तरह , लहराती है। मैं उसको एक मौका और देना चाहता हूँ। तुम उसे सिर्फ इतना ही समझा दो कि मैं बहुत बड़ा हाकिम हूँ और अगर उसने मेरी खिदमत ठीक तरह से नही की तो मैं उसकी बोटी-बोटी नुचवा दूगाँ।”
“जी बहुत अच्छा हुजूर।” 
“उसे इसी वक्‍त जाकर जगा दो।कम्बख्त्त मुझसे जागती भी तो नहीं।” अब्दुल्ला ने उसे भीतर जाकर चुटकियाँ काट-काटकर बाद में तमाचे मार कर जगाने की कोशिश की मगर वह मुर्दों से बाजी लगाकर सो रही थी। अब्दुल्ला को कुछ न सूझा तो तैश में आकर उसकी एक टाँग और हाथ पकड़ कर धम्म से जमीन पर गिरा दिया।तब नरगिस की नींद टूटी। धमाके की आवाज सुनकर मदकची बेग भीतर पहुँच गया और उसे जमीन पर गिरा हुआ देखकर अब्दुल्ला पर नाराज हुआ। अब्दुल्ला ने बात बनाई कहा-“हुजूर इसे मैंने नहीं गिराया बल्कि मौजे-दरिया की तरह यह इतनी जोर से उठी कि आप ही आप उछलकर जमीन पर गिर पड़ी।” नरगिस बड़बड़ाई। उसके चेहरे पर गिड़गिड़ाने का अंदाज था। मदकची बेग ने अब्दुल्ला से पूछा- “यह क्या कह रही है?” 
अब्दुल्ला ने चूँकि नरगिस की बात को स्वयं भी न समझा था इसलिए बात बनाई, हाथ बाँधकर कहा- “हुजूर ये साली, यह कहती है कि इसने आपको उड़न खटोले से सैर कराने के ख्याल से छँलाग लगाई थी, लेकिन मुझे देखते ही शर्म और नफरत के मारे गिर पड़ी।” “ठीक है, ठीक है। उससे कहो कि हमको यों ही खुश किया करे।”अब्दुल्ला ने नरगिस को अमल तैयार करने की आज्ञा दी और हिन्दी में उससे कहा-"इसे गहरा नशा पिला, नहीं तो सबेरा होते ही यह तेरी और मेरी गर्दन उड़वा देगा।”
नरगिस ने फिर मदकची वेग को गहरी घोलकर ऐसी नशीली चितवन से पिलाई कि सुबह पडा़व उठने तक वह जाग ही न पाया। 
सबेरे अब्दुल्ला ने आकर तुलसी से कहा-“बिरहमन फौरन मेरे साथ चलो। सूबेदार साहब ने तुम्हें याद फर्माया है।” तुलसी और कैलासनाथ को लेकर अब्दुल्ला वेग चला। नया सरदार अदहम खां अपने खेमे के अन्दर बैठा हुआ एक मुगल बुजुर्ग से बातें कर रहा था। तुलसी को भीतर बुलवा लिया। कैलासनाथ खेमे से बाहर ही रहे। खेमे मे प्रवेश करते हुए तुलसी को अब्दुल्ला बेग की तरह ही झुककर दोनों हाथों से सलाम करनी पड़ी। अदहम खां ने मुस्कराकर कहा-“बिरहमन तुम होशियार नजूमी हो, हम तुमसे खुश हैं।” 
“तो श्रीमान‌ जी फिर मुझे और मेरे साथियों को मुक्त करे।” 
“हमने तुम्हे एक जायचा देखने के लिए बुलवाया है।” कहकर उसने तख्ती और लिखने की बत्ती मँगवाई।उसके आने पर मुगल बुजुर्ग ने एक राशि-चक्र खींचा। तुलसी को थोड़ी देर मुश्तरी को वृहस्पति और जोहरा को शुक्र के रूप में समझने में लगी। ग्रहों और राशियों के भारतीय नाम समझकर तुलसी कुण्डली विचारने लग गए। कुछ ही पलों में वह प्रसन्‍न होकर बोले- “यह कुण्डली किसी बडे़ ही चमत्कारी पुरुष की लगती है। ऐसे लोग कम देखने में आते हैं। वाह ! यह किसकी ,कुण्डली है, सूबेदार साहब?”
“इससे तुम्हे कोई वास्ता नही । तुम खुद ही बतलाओ कि यह कौन हो सकता है।”
अब्दुल्ला वेग ने अदहम खाँ और मुगल बुजुर्ग को तुलसी की हिन्दी, में कही हुई बात को फारसी भाषा में समझाया। सुनकर मुगल बोला- “इसके कुछ हालात बयान करो।” 
“साहब, यह है तो अभी बालक ही परन्तु अद्भत नक्षत्रधारी है। यह व्यक्ति परम अभागा और परम सौभाग्यवान एक साथ है। इसके जन्म के समय इसके माता-पिता पर बड़ा संकट आया होगा। बचपन में इसे अपने माता-पिता से अनेक वर्षो तक अलग भी रहना पड़ा होगा और इसनें- अपने माता-पिता का राज्य भी छोटी आयु में ही पाया होगा।”
अदहम खां ने पूछा- “इसकी मौत कब होगी?”
तुलसी कुण्डली देखते हुए हँसे, बोले- “जिसके राम रखवारे हो, उसे कोई मार नही सकता।इस बालक नृपति ने अब तक अनेक बार यमदूतों को पछाड़ा होगा। यह राम जी का आदमी है, इस संसार में उन्हीं का काम करने के लिए जन्मा है” तुलसी की बात सुनकर मुगल का चेहरा खिल उठा किन्तु अदहम खां का चेहरा कठोर हो गया।उसने पूछा-“मै कब बादशाह बनूँगा, नजूमी?” 
तुलसी ने विचारकर कहा- “इस जन्म में कदापि नहीं।”
खुशामदी अब्दुल्ला वेग अपनी स्वामी से ऐसी स्पष्ट बात कहने का साहस न कर सका। उसने अनुवाद करते हुए अदहम खां से कहा- “हजरते आली, यह‌ कहता है, हुजूर बादशाह पर हुकूमत करेंगे।” 
अदहम खां को बात सुनकर क्रोध तो न आया किन्तु संतोष भी न हुआ।
क्रमशः

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