महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
71-
उसने फिर पूछा-“बैरम खां कब मरेंगे?”
“चार वर्ष बाद।”
“क्या मुझे बादशाह से वही दर्जा मिलेगा जो बैरम खां को हासिल है?”
“हुजूर सिपहसालार बनेगें, अच्छे दिन देखेंगे और अगर सँभल कर चलेंगे तो इस कुण्डली वाले प्रतापी पुरुष की छत्रछाया में बड़ा सुख भोगेंगे लेकिन जान पडता है, अन्नदाता वह सुख भोग नही पाएँगे ।”
अब्दुल्ला वेग फिर उलझन में पड़ा।उसने तुलसी से हिन्दी में कहा-“नजूमी, अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी हो तो ऐसी बातें मुहँ से न निकालो।”
“में क्या करूँ जमादार जी, प्रदत का समय इनके अनुकूल नही है। अपने दम्भ के कारण यह ऊँचे दिन देखकर गिरेंगे और सम्राट की ओर से इन्हें प्राण- दण्ड भी दिया जाएगा।”
अदहम खां ने अब्दुल्ला से पूछा- “यह क्या कह रहा है?”
अब्दुल्ला ने सँभलकर, उत्तर दिया-“हुजूर इसका कहना है कि सरकार
बादशाह को कभी नाखुश न करें। आपको जो कुछ भी हासिल होगा वह बादशाह आलम की मेहरबानी से ही हासिल होगा।”
कुण्डली देखते-देखते एकाएक तुलसी बोले- “राजों सम्राटों में भी ऐसी जन्मकुण्डली किसी विरले पुरुष की ही होती है, सूबेदार जी यह सम्राटों का सम्राट होगा लेकिन पैदल चलने में इसके समान कोई दूसरा आदमी नहीं हो सकता। जब यह किसी पर दयालु होगा तो उसे निहाल कर देगा लेकिन क्रोध आते पर इसकी क्रूरता को देखकर स्वयं यमराज भी सिहर उठेंगे। यह परम धार्मिक और परम विलासी होगा।”
अदहम खा हंसा, बोला- “दीनपरस्त यह चाहे हो या न हो मगर नफरस- परस्त तो यकीनन है। आफताव खां यह काफिर नजूमी तुम्हे यकीनन खुश कर रहा होगा क्योंकि तुम भी तो थोड़ी देर पहले यही सब कह रहे थे।”
आफताव खां बोले- “यकीनन यह जवान अपने फन में माहिर है। इसकी पेशानी देखकर मैं यह सोचता हूँ कि यह नजूमी भी अकबर शाह की तरह ही दुनिया में कुछ कर गुजरने के लिए ही आया है। एक दिन सारी दुनिया इसके कदम चूमेंगी और एक मानी में यह अकबर शाह से ज्यादा बड़ी सल्तनत का मालिक बनेगा।”
अदहम खां की त्योरियाँ चढ़ गईं। घृणा भरी दृष्टि से तुलसी की ओर देख कर उसने आफताव खां से कहा-“आफताव मियां, जरा यह तो बतलाइए कि इस नजूमी का सर अपने धड़ पर और कितनी देर कायम रहेगा?”
“यह काफिर जल्द मरते के लिए पैदा नही हुआ है खां साहव, इसे कोई नही मार सकता।”
अदहम खां को चुभ गया, लाल आँखें निकालकर बोला- “अब्दुल्ला बेग, इस नजूमी को बाहर ले जाओ और इसकी गर्दन काटकर मेरे आगे पेश करो।”
लेकिन उसी समय एक दासी आई, उसने कहा- “हुजूर आलिया ने हुजूर फैज गंजूर को याद फर्माया है।”
अदहम खां के माथे पर बल पड़ा, पूछा-“ऐसा क्या काम आ पड़ा?”
“हुजूर मरियम मकानी ने हुजूर रेवातिया को अभी अपने खेमे में बुलवाया था।वहाँ से तशरीफ लाते ही जनाबे आलिया ने इस कनीज को आपकी खिदमत में भेजा है।”
“अब्दुल्ला वेग इस नजूमी को फिलहाल अपनी नजरबंदी में रक्खो। कल सुबह यहाँ से कूच करने के पेश्तर मैं इसका सर धड़ से जुदा देखना चाहता हूँ। इसके कत्ल का कोई अच्छा सा बहाना भी तुम्हे सोचना होगा।”
अब्दुल्ला ने सिर झुकाकर सूबेदार की आज्ञा सुन ली।आफताब मियाँ फिर हँसे बोले- “आलीजनाब, मैं फिर अर्ज करता हूँ कि इस शख्स को कोई मार नहीं सकता।”
मसनद से उठते हुए नौजवान अर्दहम खां की त्योरियों में फिर बल पड़ा, बोला-“आफताब मिर्जा, आप बुजुर्ग हैं, मुझे चुनौती मत दीजिए।”
आफताब मिर्जा ने फिर उसी बेफिक्री से कहा- “जनाबे आली, अल्लाह से बड़े होने की कोशिश न करें।”
अदहम खां की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। खड़े होकर तलवार म्यान से निकालते हुए तुलसी की तरफ आवेश में झपटा। तुलसी एक पग पीछे हटे लेकिन अदहम खां का शरीर झपटते ही अचानक थरथराया और घड़ाम से गिर पड़ा । वह बेहोश हो गया, उसका मुँह टेढ़ा पड़ने लगा था।उसके बायें अंग पर फालिज गिरा था। बाँदी घबराकर अपनी स्वामिनी के पुत्र को देखने लगी।अब्दुल्ला भी नीचे झुका। आफताब मिर्जा बोले- “अब्दुल्ला, खुदा से बैर मोल न लो। इसे फौरन ही आजाद कर दो। यह काफिर फ़क़ीरों का शाहंशाह है।”
तुलसी और कैलास ही नही वरन उनके आग्रह से ब्रज की यात्री मण्डली भी छोड़ दी गई। अब्दुल्ला ने चलते समय तुलसी के प्रति बडा़ आदर भाव दिखलाया और कहा -“नजूमी, हमारे हक में अपने खुदा से दुआ माँगना। आफताब मिर्जा बहुत बड़े नजूमी हैं। माहम मलका इन्हें बहुत मानती हैं लेकित यह नालायक अदहम खां बड़ा मगरूर और वेवफा है।”
अब्दुल्ला ने मुक्त करते समय तुलसी को चाँदी के बीस दिरहम सिक्के भी नजर किए थे। तुलसी अपने तथा अपने साथियों के मुक्त हो जाने के कारण बड़े ही प्रसन्न थे।छूटते ही वे मेघा भगत की टोह में लगे। उन्हे खोजने में विशेष कठिनाई नहीं हुई।सेना से लगभग पाव कोस अलग हटकर वे बराबर साथ ही साथ चल रहे थे। पास पहुँच कर मेघा भगत के पैर छूकर कहा -“आपकी कृपा से ही यह संकट टला है। अद्॒भुत चमत्कार हुआ। मुझे ऐसा लगता है कि राम जी ने नन्ददास की रक्षा करने के लिए ही मुझे इस अकाल मृत्यु से बचाया है।”
भगत जी हँसे, कहा- “राम जी को तुमसे अभी बड़ी सेवा लेनी है भईया।वे न जाने कितनी विपत्तियों से अभी तुम्हें मुक्ति दिलाएँगे किन्तु अब मैं काशी जाना चाहता हूँ। अब और कहीं नहीं जाऊँगा। चिन्ता की आवश्यकता नहीं। तुम्हें नन्ददास के पास जाना ही है। कैलास- नाथ मेरे रक्षक बनेंगे।”
अब्दुल्ला बेग से पाए हुए रुपये तुलसी ने कैलासनाथ को दे दिए ओर ब्रज की यात्री मंडली से सिहँपुर ग्राम का मार्ग पूछकर वे पीछे की ओर लौटकर चल दिए। तीसरे दिन दोपहर के समय वह सिंहपुर के निकट पहुच गए।
“क्यों भाई इस गाँव में कोई ऐसा परदेशी पड़ा है जिसका मन बावला है” “हॉं हाँ, वह बावला क्या हुआ है महाराज, उसने सारे गाँव को बावला बना दिया आप उसे ढूँढ़ते हुए आए हैं? उसके नातेदार है?”
“हाँ“
“भाई हैं”
“हाँ गुरुभाई। वह इस समय कहाँ होगा?”
प्रौढ़ किसान ने फीकी हँसी हसँकर कहा- “वह हर समय नन्हेमल के घर के आगे ही पड़ा रहता है। उसे ले जाइए महाराज, सारी बस्ती के लोग दु:खी हैं।
क्रमशः
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