Friday, 19 May 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
72-

ब्राह्मन पण्डित, रूपवान, मीठा, भला, कोई ऐब नहीं। बाकी ऐबों का ऐब यही लग गया है कि उस भली खत्रानी के रूप का दीवाना हो गया है। वहाँ भी कोई उत्पात नहीं करता, बस बैठा-बैठा या तो गाता है, या हंसता, है, या रोता है। घर वालों की हँसी होती है। वह औरत बिचारी आप आठों पहर रो-रोकर घुली जाती है। नन्हेमल परदेस गए हैं। लोगों को क्रोध भी आता है, दया भी आती है। क्या करें, कुछ समझ में नही आता। उसके साथी छोड़कर चले गए और यहाँ के लोग मुसीबत में पड़े हैं।” 
सुनकर तुलसीदास अत्यन्त गम्भीर हो गए। वह व्यक्ति कहने लगा- “आप उसे जल्दी से जल्दी यहाँ से ले जाइए। आठ आठ, दस दस दिन न खाता है, न पीता है। सास बिचारी दया के मारे बहू के हाथों परोसी पत्तल भिजवाती रही, पर अब बहू बाहर नहीं आती। हठ करती है कि जो मुझे नाहक बदनाम करता है उसे खिलानें नहीं जाऊँगी , चाहे मरे चाहे जिये। आज कई दिनों से भूखा पड़ा है।” 
तुलसीदास अब बातें नहीं सुनना चाहते थे।वे नन्ददास के पास पहुँचने के लिए उतावले हो उठे थे, पूछा -“उस ठिकाने तक क्या आप मुझे पहुचा देंगे।” 
“मैं पहुँचा तो जरूर देता महाराज पर नन्हेमल के यहाँ जाना नहीं चाहता। एक असामी के कारण हम लोगों में दो बरस से खीचतान चल रहीहै उनकी गैरहाजिरी में आपको लेकर मेरा वहाँ जाना ठीक नहीं होगा।” 
“खैर कोई बात नही, आप उस जगह का अता पता ही बतलाने की कृपा करें।”
“हाँ -हाँ, सामने चले जाइए। नरम-नरम आधा कोस है। वहीं भरोपुर बाजार है। बस वहाँ पहुँचकर उत्तर की ओर मुड़ जाइएगा। हनुमान जी का मन्दिर पूछ लीजिएगा। बस मन्दिर से लगी जो पगडंडी दिखाई पड़े पूरब की ओर, उसी पर चल पढ़िएगा ,जैसे वह घूमें वैसे आप भी घूमिए। सामने नन्हेमल का घर आ गया। उनका घर सबसे अलग कोनें में है। बस उसी के सामने नीम के पेड़ तले आपकों अपने गुरूभाई मिल जाएगें।” 

भद्र व्यक्ति के द्वारा बतलाए गए पते पर पहुँचने में तुलसीदास को कठिनाई न हुई। नन्ददास धूल में मुँह गड़ाए कराहते हुए स्वर में कुछ बड़बड़ा रहे थे।तुलसी को अपार पीड़ा हुईं। वह सुन्दर गौरवर्ण कान्तिमय शरीर इस समय धूलभरा म्लान और दुर्बल हो रहा है। शिखा धूल-पसीने से सन-सनकर जटा हो गई है, दाढ़ी भी बढ़ी हुईं है। तुलसीदास उसके पास बैठ गए, सिर पर हाथ फेरकर पुकारा- “नन्ददास” 
अपनी रुदन भरी बड़बड़ाहट में ही नन्ददास ने उत्तर जोड़ दिया- “मर गया नन्‍ददास, अपनी राह लगो। मेरा जी अपने बस में नहीं है बाबा। मैं तो आप ही मरा जा रहा हूँ।” कहकर वैसे ही मुँह गड़ाए हुए रोने लगे।
“इधर देखो नंन्ददास, मैं तुलसी हूँ।” तुलसीदास की बात ने नन्ददास पर इच्छित प्रभाव किया। उनका रोना बड़बड़ाना रुक गया। तुलसीदास उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले-“काशी के बाद यहाँ इस दशा में तुमसे मिलना होगा, इसकी तो मैं कभी कल्पना भी नही कर सकता था।”
सिर उठा, चौंकी कनखियों से देखा, फिर काया में कुछ फुर्ती आई, गर्दन भी तनी, रूखी फीकी आँखों में स्निग्धता आईं, जीवन चमका। होंठो पर ऐसी करुण मुस्कान थी कि देखकर तुलसी दास का हृदय भर आया। नन्ददास अपने आपको सँभालते हुए बोले-“तुम कैसे आ गए भैया?”
“प्रीति डोर में बँधकर।”
नन्ददास की आँखें छलछला उठीं, भरे कण्ठ से कहा-“उसी में बँधकर तो मेरी ऐसी दशा हुई है।”
“कितने दिनो से यहाँ हो?”
प्रश्न सुनकर नन्ददास सामने वाले घर की ओर देखने लगे। द्वार की ओर देखा तो आँखें दोबारा उमड़ी, कांपते स्वर मे कहा- “पता नहीं।”
“तुम्हें क्या कष्ट है?” 
“कुछ नही”
“तुम फिर यहाँ क्यों पड़े हो?” 
“पता नही।” कहते हुए नन्ददास की आँखें सामने द्वार से लगीं रहीं। आँखें भरी तो थी ही और भर उठी। गोरे-मैले गालों पर धारे बह चलीं। तुलसी के कलेजे मे मोहिनी को लेकर अपनी दीवानी टीस याद आई। एक बार तो बीते हुए क्षणों में एक साथ सिमट कर लीन हो गए, परंतु वैसे ही मन के भीतर 'हर-हर' की आवाज सुनी। तुलसी को लगा कि यह स्वर उनके संरक्षक गुरु नरहरि बाबा का है। इस चेतावनी से मन और विकल हुआ, दृष्टि भी चंचल हुई, पर जिघर जाती थी उधर मोहिनी ही मोहिनी दिखलाई देती थी। बिम्ब में मोहिनी और ध्वनि में गुरू स्वर एक दूसरे के पीछे दौड़ते चले। 'हे राम' शब्द बड़ी करुणा से फूटे और आखें मिंच गईं। 
ध्यान में युगल चरण देखने का उपक्रम चला। मोहिनी यहाँ भी घंसने का प्रयत्न करने लगी किन्तु तुलसी अब सचेत और सुस्थिर थे। ध्यान युगल चरणों को ही अपने में लाकर संतोप पाएगा और वह संतोष अन्ततोगत्वा उन्हें मिलने लगा। मन की मुद्रा शान्त हुई। नन्ददास एक विरह भरा पद गाने लगे थे।तुलसी का ध्यान उनके दर्द भरे स्वर से भंग हुआ। वे नन्‍ददास को भावभीनी दृष्टि से देखने लगे। साक्षात‌ वेदनामू्र्ति बने हुए नन्ददास बड़ी तड़प के साथ गा रहे थे।उनकी आँखें मुँदी हुई थीं और चेहरे पर अपार शान्ति विराज रही थी।

तुलसीदास को लगा कि राम को देखने की ऐसी अन्य लगन जो मुझे लग जाय तो फिर बेड़ा ही पार हो जाय। धन्य है नन्ददास की यह प्रीति। धन्य है वह आलंबन जिसके सहारे यह प्रीति बेल चढ़ी।
तुलसी की सराहना की तरंग अभी नीची भी नही हुई थी कि सामने का बन्द द्वार खुला।आधे घूघँट से ढँका एक सुन्दर शालीन मुखड़ा झलका। उसके हाथ में भोजन का थाल है। युवती के पीछे उसकी बुढ़िया सास भी आ रही है।तुलसी समझ गए कि नवयुवती नन्हेमल की तीसरी पत्नी है और नन्ददास की प्रिया है।युवती ने नन्ददास के पास एक और व्यक्ति की बैठे देखा तो ठिठक गई। दोनों हाथ थाली में फँसे थे। वह अपने घूघँट को और गिरा नहीं सकती थी, हाथ केवल उचक कर फिर बेबसी की हालत में आ गए। आँखों की पुतलियों में एक नई ज्योति और चेहरे पर कसाव आया। झिझकते हुए पैर फिर तेजी से आगे बढ़ गए।नन्‍ददास आँखें मूँदे अपने गीत में रमे हुए थे। उन्हें यह होश नहीं था कि उनके सामने उनकी इष्टदेवी आ गई है।
क्रमशः

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