Saturday, 20 May 2023

tc 73

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
73-

तुलसीदास ने एक बार फिर युवती को देखा।वह सचमुच सुन्दरी थी। उसका सौन्दर्य इस समय वेदना से तपकर और भी निखर उठा था। नन्ददास पर एक दृष्टि डालकर उसने तुलसीदास की ओर एक बार गहरी सतेज दृष्टि से देखा पर आँखें झुका लीं। कहा- “पालागन महाराज, क्या आप इनके कोई लगते हैं?”
“हाँ भाई हैं। आप इसे क्षमा करें। दरअसल इसे भक्ति का अचेत उन्माद हुआ है। मेरे भाई को आपके रूप में साक्षात्‌ देवी शक्ति के दर्शन हुए हैं। यह अभी अपनी उपलब्धि को समझ नहीं पाया है। इसे कृपापूर्वक क्षमा कर दें।”
नन्ददास युवती का स्वर कानों में पड़ते ही गाना रोककर उसकी ओर अपलक दृष्टि से देखने लगे थे। उनकी आँखों की पुतलियों में तृप्ति और प्यास दोनों ही झलक रही थी ओर दोनों ही अथाह थी। रूखे गालों पर आनन्द की कांति विराज रही थी। भैया ने कहा कि देवी रूप में दर्शन किए हैं। इस भाव संकेत को लेकर नन्‍ददास सचमुच ही अपनी चितचोर को देवी के रूप मे देखने लगे और फिर स्वयं ही बड़बड़ा उठे- “भैया ने सच कहा, देवी रूप है। मैं तुमसे कुछ नही माँगता भागवान्‌, बस यों ही दर्शन दे दिया करो।”
“दर्शन करने की अभिलाषा है तो मथुरा जाइए, जहाँ भगवान बसते हैं। यहाँ आदमी डरते हैं, उनकी अपनी समझ, अपना मान-सम्मान होता है।” युवती के स्वर में अंगारे भड़क रहे थे। सास ने समझाना चाहा तो और तेज हुई, कहा-“नही अम्मां जी, इतने दिनों से घुटते-घुटते अब मैं पक गई हूँ , या तो ये भोजन करें और यहाँ से जायें, अभी के अभी चले जायें। नही तो मैं सच कहती हूँ , यहीं कटार मार कर आज मैं अपने प्राण तज दूँगी।”
सास जो पीछे पानी का गड़वा लेकर खड़ी थी, घबराकर बोली- “न न बहु, ऐसा गजब न करना। तुम्हीं समझाओ महाराज, हे भगवान, यह तो कोई बड़ी बुरी गिरह-दसा आई है।”
“बुरी हो या भली, पर अम्मा जी, आज या तो यह यहाँ से जाएँगे या फिर मेरी जान ही जाएगी। अब मैं नही सहूँगी। एक नहीं सहूँगीं।”
नन्ददास यह सुनकर थरथर काँपने लगे, उनकी आँखें भर आईं, अश्रुकंपित स्वर में कहा- “मैंने ऐसा क्या अपराध किया है देवी।”
देवी क्रोध में अबोली ही रही। तुलसीदास ने नंददास की बाहँ पकड़ कर उठाते हुए कहा- “जो कुछ अपराध अनजाने में हुआ भी है उसके लिए इस देवी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगो। मैं इसे अभी ही ले जाऊँगा , माई।”
अपनी बांहँ छूडाकर नन्ददास दोनों हाथ जोड़कर और धरती पर अपना सिर झुकाकर बोले- “मैं तुमसे बार बार क्षमा माँगता हूँ। तुम और जो चाहो सो दण्ड मुझे दो पर न तो अपने प्राण दो और न मुझसे जाने को कहो।”
तुलसीदास ने फिर झुककर नन्ददास का हाथ पकड़ लिया और कहा-“उठो नन्ददास, क्या एक भद्र महिला की आत्महत्या का कारण बनोगे? प्रेम क्या इसी का नाम है? फिर इस देवी के साथ मैं भी प्राण दूगाँ।”
नन्ददास की बहकी आँखें यह धमकियाँ सुनकर इतने दिनों मे पहली बार अपना सधाव पा सकीं। नन्ददास की नवजाग्रत लोक-चेत्तना को यह सारी बाहरी स्थिति अत्यन्त विचित्र लग रही थी। संयत, गम्भीर स्वर में उन्होंने कहा- “तुम सदा सुख से जियो, देवी मैं जाता हूँ ।मेरी चूक क्षमा करो, मेरे भइया मुझे लेने आ गए हैं।” 
नन्ददास अपने बायें हाथ का पंजा धरती पर टेककर उठने का उपक्रम करने लगे।बुढ़िया सास बोली- “भोजन करके जाओ महाराज। मेरे द्वारे से बामन भूखा जायगा तो मेरा मन बहुत दुखेगा।”
तुलसी सुनकर एक क्षण चुप रहे, फिर कहा-“अब भोजन का आग्रह न करें। इसे में एक बार स्नान कराना चाहता हूँ।”
“तब भी भोजन की जरूरत पड़ेगी ही। कई दिनों से खाया नही है इन्होंने, आप भी भूखे जाएँगें।” युवती के स्वर में अब शान्ति और सहजता आ गई थी। उसकी आँखें बातें करते हुए बराबर नीचे झुकी रहीं।
तुलसीदास ने नन्ददास की बाहँ पकड़ कर अपना डग बढ़ाते हुए कहा-“पड़ोस के गाँव में मेरे एक परिचित रहते हैं। वहीं इसके स्नान-भोजन आदि की व्यवस्था हो जाएगी। आओ, नन्ददास भाई। आशिर्वाद दीजिए कि इसे भगवत्‌भक्ति मिले। राम जी सदा आपका कल्याण करें।”
तुलसीदास अपने गुरुभाई की बाहँ कसकर थाम हुए आगे बढ़ गए। नन्ददास की काया तुलसी के सहारे जा रही थी, वह स्वयं कहाँ थे इसका पता न था।कुछ डग चलने के बाद नन्ददास खड़े हो गए। तुलसी उन्हें देखने लगे।नन्‍ददास ने अपनी गर्दन युवती की ओर घुमाई फिर बिना उसे देखे ही पलट पड़े। नजरे जो झुकीं तो फिर झुकीं ही रहीं। तुलसीदास की दृष्टि ही नंददास की संरक्षिका थी।युवती करुण दृष्टि से उन्हें जाते हुए देखती रही। उसके दोनों हाथों में अस्वीकृत भोजन का थाल था और आँखों में प्रायश्चित के आँसू उमड़ आए थे।
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सुनाते हुए बाबा के वर्षों पहले बीते हुए क्षण अपनी अनुभूतियों के अणुओं को बटोर कर स्मृति में इतने समर्पित हो चुके थे कि उनसे उनका मन अब भी गूँज रहा था। वे कुछ क्षण आाखें मूँदें चित्त को सुस्थिर करने के लिए अपने भीतर निमग्न हो गए। भूत से वर्तमान में ध्यान को लाते हुए वे बोले- “भूतकाल के जीवन को देखते हुए मुझे अपनी जवानी में एक अयोध्यावासी संत के मुख से सुनी हुई बात इस समय अचानक ही याद आ गई। हम उन दिनों बहुत दुःखी थे। रामघाट पर एक दिन वे हमसे अपने आप ही कहने लगे- “तुलसीदास, यह कभी न भूलना कि जो देवमूर्ति मन्दिर में प्रतिष्ठित होकर लाखों के द्वारा पूजी जाती है वह पहले शिल्पी के हजारों हथौड़ों की चोटें भी सहती है।”
रामू बोल उठा- “पहले ही क्या प्रभु जी, इन कलिकाल के नराधमों ने आपको अब तक चैन नही लेने दिया।आप पुजते भी जा रहें हैं और हथौड़ों की मार भी सहते जा रहें हैं। ऐसा अनोखा देवता किसी देश ने किसी काल में अब तक नही देखा था।”
वेनीमाघव जी रामू की बात सुनकर गदगद हो गए। रामू की पीठ पर हाथ रखकर वे कुछ कहने ही जा रहे थे कि बाबा मुस्कराकर बोल उठे- “अब वह हथौड़े  ही मुझे फूलों जैसे ही लगते हैं। 
क्रमशः

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