महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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सच बात तो यह है रामू कि साधक को सिद्ध होकर भी तप से नहीं चूकना चाहिए।तीर्थंकर महावीर वर्द्धमान का यह सिद्धान्त सत्य है। रामभद्र परम उदर हैं। निन्दकों की कटु आलोचना से प्रतिपल-प्रतिछिन मन धुलता ही रहता है। एक जगह पर पीड़ा मेरे लिए रत्नावली के समान ही सचेतक बन जाती है, जैसे रत्ना का दाहकर्म करके मानव धर्म से उऋण हुआ था, वैसे ही इस काया के धर्म से उऋण होकर अपने स्वामी की सेवा में जाऊँगा।”
मौका पाते ही तुलसी कथा प्रेमी वेनीमाधव ने बात को फिर अपने रस में बहा देना चाहा।बाबा की बात पूरी होते न होते वेनीमाधव जी बोल उठे- “मैं आपके वैवाहिक जीवन की कथाएँ सुनने को आतुर हो रहा हूँ गुरू जी।“
बाबा मुस्कराए, फिर कहा-“मेरा विवाह राजा ने कराया था। वह कथा भी राजा से ही सुनना। रामू, मेरी जाँघ की गिल्टी बहुत कष्ट दे रही है। लेप लगा दे जरा।”
रामू तुरन्त ही लेप लाने के लिए उठकर गया। राजा बोले -“भैया, तुम्हारी यह गिल्टियाँ हैं तो बलतोड़ फुँसी ही, पर इतने बलतोड़ एक साथ भला कैसे हो सकते है? हमें तो कोई और ही रोग लगता है।”
रामू तब तक कोने मे रखी लेप की कटोरी लेकर आ गया और उनके दाहिने घुटनें के पास झुककर गिल्टी पर लेप लगाने लगा। बाबा बोले- “तुम्हारा अनुमान सही हो सकता है राजा।एक बार सोरों में भी हमें ऐसे ही दो गिल्टियाँ निकली थीं। तब वहाँ लालमणि वैद्य ने इन्हें वात रोग का परिणाम ही बतलाया था। उन्होंने जाने कौन-सा चूर्ण दिया कि दो ही पुड़ियाओं में मुझे चैन पड़ गया।
“तो किसी को सोरों भेजकर लालमणि का पता……”
“अरे वह तो मेरे सामने ही बैकुण्ठवासी हो गए थे। वह बूढ़े थे और बड़े भले थे।”
“तो नन्ददास जी को लेकर आप सीधे सोरों ही गए थे?” बेनीमाधव जी ने पूछा।
“नहीं, पहले मथुरा गया था। बात यह है कि नन्ददास ने अपनी प्रिया की बात टेक सी साध ली कि भईया मुझे मथुरा ले चलो। इस पर हमें भला क्या आपत्ति हो सकती थी।वहीं ले गए।”
राजा बोले- “पागल को साथ लेकर चलना भी अपने आप में बड़ा कठिन तपस्या होती है। एक बार हमको भी एक पागल को लेकर चित्रकूट से तिरवेन्द्रम पुर तक आना पड़ा था।इम उस कष्ट को जानते हैं।”
बाबा बोले- “नही, वैसा कोई विशेष कष्ट नन्ददास ने मुझे नहीं दिया। वे प्रायः गुमसुम ही बने रहते थे।मै जैसा कहता था वैसा वे कर लेते थे। उस स्त्री की फटकार से उनके दीवानेपन को एक करारा झटका लगा था। अजीव स्थिति थी, वे न इधर में थे, न उधर में। खैर, हम लोग मथुरा आ गए। नन्ददास वहाँ आकर मगन हुए। मुझे गोस्वामी गोकुल नाथ जी के यहाँ ले गए।”
रामू बोला- “उस समय उनकी क्या आयु रही होगी प्रभु जी, आप से तो छोटे ही होगें?”
“गोस्वामी जी महाराज उस समय नौजवान थे।हमसे आयु में छोटे थे, पर
प्रखर बुद्धि और समर्पित व्यक्तित्वशाली थे। उससे मिलकर बड़ा सुख पाया, लेकिन सर्वाधिक सुख तो भक्तवर सूरदास जी के दर्शन पाकर हुआ था।”
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मन्दिर का एक दालान। पत्थर के एक मेहराबदार दालान में खम्भे से टिके एक छोटी सी गुदड़ी बिछाए सूरदास जी बैठे हैं। उनका इकतारा दाहिने हाथ की ओर पास ही रखा हुआ है। बाईं ओर उनकी लठिया और लौंग-मिश्री की डिबिया रखी है। देह दुबली, मुँह पोपला, हजामत थोड़ी - थोड़ी बढ़ी हुई, बाल सफेद बुर्रक और देह मंजे हुए ताँबें सी दमकती हुई। उनकी आयु लगभग छियासी- सत्तासी वर्ष की होगी।सूरदास अपने उठे हुए दाहिने घुटनें पर हाथ की उँगलियों से धपकियाँ देते हुए किसी भाव में मगन बैठे हुए हैं। उस बड़े दालान और आँगन में कई सेवक-सेविकाएँ काम करते दिखलाई दे रहे हैं। उनकी बातें भी चल रही हैं, परन्तु सूरदास जी सारे वातावरण से अलिप्त हैं। तुलसी और नन्ददास प्रवेश करते हैं।दोनों ही वयोवृद्ध संत-महाकवि के आगे भूमिष्ठ होकर प्रणाम करते हैं।सूरदास सजग होते है, पूछते हैं- “कौन है भैया?”
“मैं हूँ बाबा, रामपुर का नन्ददास।”
“अरे आओ आओ दन्ददास, हमनें सुना था कि तुम द्वारिकापुरी के दर्शन करने गए थे।”
नन्ददास के चेहरे पर एक बार लज्जा की लालिमा झाँकी, फिर सँभलकर उत्तर दिया- “हाँ, विचार तो यही था बाबा, पर श्रीनाथजी बीच रास्ते से घसीट लाए, और मेरे साथ मेरे एक पूज्य, शिष्य और अग्रज गुरू भाई पण्डित तुलसी दास जी शास्त्री भी आपके दर्शन करने के लिए पधारे हैं।”
शास्त्री उपाधि सुनकर सूरदास जी झटपट अदब से बैठ गए और हाथ जोड़कर कहा- “जै माननचोर की, शास्त्री जी महाराज?”
“जै माखनचोर की बाबा ! जै सियाराम ! आप मुझे यों हाथ न जोड़े। मैं आपके बच्चे के समान हूँ।”
“अरे नही भैया, विद्या बड़ी चीज है। अब हमारे गोसाईं गोकुलनाथ जी महाराज को देख लो।आयु देखी जाए तो अभी निरे बालक ही हैं।”
“वे महात्मा और प्रखर प्रतिभाशाली हैं, बड़े बाप के बेटे हैं। मैंने तो बाबा, अपने को पालनेवाली पार्वती अम्मा से आपके पद सीखकर और उन्हें गा गा कर भीख माँगी है मैया मेरी कबहिं बढ़ेगी चोटी।”
सूरदास अपने पोपले मुँह से खिलखिला कर हँस पड़े, फिर कहा-“अरे तुम तो हमारे ही जी की बात कह गए भैया।मैं तरह-तरह से गीत गाकर उस बंसीवाले के द्वारे पर भीख ही माँगता हूँ।मेरा जनम इसी में बीत गया”
नन्ददास बोले-“तुलसी भैया बड़े राम-भक्त और बड़े अच्छे कवि हैं।संस्कृत और व्रज भाषा दोनों ही में कविता करते हैं।”
सूरदास के चेहरे पर आनन्द छा गया, कहा-“भला तब तो हमें कुछ जरूर सुनाओं भैया।”
सूरदास की स्मृति से बाबा गदगद थे, कहने लगे-“मुझे सूरदास जी के श्रीमुख से उनका एक पद सुनने का सौभाग्य भी मिला था। वाह, कैसा रसमय स्वर था उनका।”
(गाकर) अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल। काम-क्रोध को पहिर चोलना कंठ विषय की माल।
गाते हुए बाबा तन्मय हो गए। यद्यपि उनकी आँखें खुली हुई थी, पर यह लगता था कि वह अपने सामने के दृश्य से अलिप्त हैं। राजा भगत ने बेनीमाघव को संकेत किया, दोनों चुपचाप उठे। रामू भी उनके साथ ही साथ उठा किन्तु द्वार पर आकर ठहर गया, कहा-“मैं यहीं रहूँगा।
क्रमशः
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