महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
75-
भगत जी एक अरदास है, राजापुर की कथा अकेले संत जी को ही न सुनाइएगा।”
राजा भगत और बेनीमाधव जी दोनों ही मुस्कराए। भीतर कोठरी में ध्यान- मग्न बाबा पर एक दुष्टि डालकर बेनीमाधव जी ने कहा- “अभी तो सोरों- प्रसँग भी सुनना है।“
उस रात बाबा की पीड़ा कुछ अधिक बढ़ गई थी। पीठ और बाँईं बाँह में कुछ नई गिल्टियां उभर आई थीं। उनका तनाव उन्हे कष्ट दे रहा था। बार बार वे करवट बदलकर कराह उठते थे। रामू दिये के उजाले में उन गिल्टियों पर लेप लगा रहा था। बाबा बोले- “अब हम अधिक दिनों तक इस जर्जर काया में रह नहीं पाएँगे , रामू। इसमे रहने में अब हमें कष्ट हो रहा है, हे राम।”
रामू विचलित हो उठा, कण्ठ भर आया। उससे कहा- “आप इस तरह से हताश होगें गुरुजी तो हमारी कौन गति होगी?”
“हताश नही होता पुत्र, मैं अपना यथार्थ बखान रहा हूँ। मेरे मन की नित्य बढ़ती हुई तरुणाई का साथ अब यह शरीर नही दे पाता।मेरा काम वेग अति मुखर रहा था। ग्राहस्थ जीवन बिताने के बाद फिर से ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ही मेरे लिए अति कठिन चढ़ाई के समान सिद्ध हुआ।काम से सभी राग जागतें हैं और उसी से समस्त विभूतियों का भी उदय होता है। मैंने अपने काम लौह को रामरसायन से सोना बना लिया है। यह सच है, पर शरीर को तो उसके आघात सहने ही पड़ेंगे। (कराह कर) हे राम, बजरंग ! कहाँ हो प्रभु?”
रामू बोला- “मैं वैद्य जी के पास जाऊँ प्रभु जी?”
“क्या करोगे। मेरा वैद्य तो हनुमान बली है। मेरे रोम-रोम में तनाव बढ़ रहा है। ऐसा लगता है कि अभी और गिल्टियाँ निकलेगीं। मैं कल्पना करता था कि ऐसा बन जाऊँ कि मेरे रोम-रोम में राम बस जाएँ। उनके अतिरिक्त और कुछ न सोचूँ , कुछ न कहूँ , कुछ न करूँ, पर लौकिक जीवन में रहकर ऐसा संभव नहीं हो सका। राग-विराग में पड़ते, लड़ते यों तों आयु का बहुत सा भाग नष्ट कर दिया। अब रोयाँ रोयाँ अपने अपको दिये गए बिफल प्रलोभन से कुण्ठित और क्षुब्ध होकर मुझे यों दण्ड दे रहा है। राम राम।”
“प्रभु जी, यों तो मैं आपके मर्म को समझने में समर्थ नहीं हूँ, फिर भी लोक में आपके समान समर्पित जीवन का दूसरा दृष्टान्त नहीं दिखलाई देता। आपके क्रोध, शोक, लोभादि मानवीय विकार भी राम स्वार्थ ही से जागते हैं।मैं स्वयं साक्षी हूँ। फिर आपका यह पछतावा, मुझे क्षमा करे प्रभु, स्वयं आपके अति अन्याय लगता है।मेरा कलेजा जब संघात सह न पाया तो कह दिया।” कहते-कहते रामू का कण्ठ भर आया। उसने उनकी बाहँ पर अपना सिर टिका लिया।
बाबा शांत स्वर में बोले -“अपने संकल्प और कमी को सदा तौलते रहना मेरा धर्म है। इससे साधू को शक्ति मिलती है।छोड़ो इसे, तुम्हे एक विचित्र संयोग सुनाऊँ रामू। जिन दिनो में लंका काण्ड में लक्ष्मण-शक्ति वाला प्रसँग रच रहा था उन दिनों भी मुझे वात पीडा़ ने बहुत सताया था। मैंने अपनी पीड़ित बाँह
से जमकर श्रीराम के सतांप विलाप वाली चौपाइयाँ लिखी थीं। मेरी पीड़ा राम के प्रताप में घुल जाती थी। जितनी देर लिखता उतनी देर बाँह में दरद नही होता था | रामू, सुनाओ तो बेटा वह प्रसँग। राम रसायन ही मेरी वेदना हरेगा।”
रामू गाने लगा-
“उहा राम लछिमर्नाह निहारी।
बोले वचन मनुज अनुसारी॥”
रामू के स्वर के सहारे बाबा के बिम्ब सजग हो रहे थे। मूर्छित लक्ष्मण का सिर अपनी गोद मे रखे हुए श्रीराम विलाप कर रहें हैं। सुग्रीव, अंगद, सुपेण वैद्य, आदि चिन्तामग्न मुद्रा में बैठें हैं।एकाएक हनुमान को पर्वत उठाए आकाश मार्ग से आते हुए देखकर सबके मुखों पर उल्लास चमक उठता है और उन मनोबिम्बों का सारा उल्लास सिमटकर बाबा के चेहरे पर आ जाता है।वे प्रार्थना करने लगतें हैं- “आओ बजरंगी, मेरी बेर भी ऐसे ही राम संजीवनी बूटी लेकर आओ, थाम लो नाथ ! अन्तकाल में कष्ट न दो।”
बाबा फिर आँख मूँदकर घ्यानमग्न हो गए। प्राण गुफा में अखण्ड दिया जल रहा है। लौं में राम-कथा की अनेक झलकियाँ झिलमिलाती हैं फिर दृश्य में स्थिरता आती है। लक्ष्मण और हनुमान-सेवित श्रीसीताराम मन पर तुलसी के सामने हैं। गुफा असँख्य मृदंग वादन से गूँज रही है, राम राम राम…. बाबा समाधिस्थ हो जातें हैं।
ब्रह्मबेला में बाबा ने आवाज़ दी-“रामू”।
रामू शायद तभी सोया था।बाबा ने दूसरी बार पुकारा। रामू चौंक कर जागा। बाबा ने उसे सहारा देकर उठाने को कहा। जब उसने उनका हाथ पकड़ा तो बोला- “आपको तो ज्वर हो रहा है प्रभु जी।”
“हाँ, गिल्टियों के कारण है।”
“आज आप यदि स्नान न करें तो ….”
“जब तक शरीर मे शक्ति है तब तक अपनी चाकरी से चूँकू? चल, उठा मुझे।”
रामू हिचका, बोला- “वैद्य जी मेरे ऊपर चिल्लाएगें।”
“शाही नौकर नहीं हूँ जो हराम की खाऊँ। जब तक शरीर में उठने की शक्ति रहेगी तब तक राम का यह चाकर अपनें कर्त्तव्यों से विमुख न होगा। वैद्य चाहे जो कहें।”
बाबा ने स्नान किया।कसरत भी करनी चाही पर पहली ही डंड लगाने में गिर पड़े। रामू नें उन्हें उठाकर कहा-“अब कोठरी में चलिए प्रभु जी, सेवक की बात इस समय आपको माननी ही पड़ेगी। वहीं बैठकर ध्यान कीजिए।”
बाबा कराहते हुए बोले-“अरे हमने सोचा कि व्यायाम करने से शरीर में रक्त-संचार होगा तो यह गिल्टियाँ दबेगीं। राम जी की इच्छा।”
“धृष्टता क्षमा हो प्रभु जी, पर मैं समझता हूँ कि गिल्टियों को आपके नियमित व्यायाम के कारण ही…..”
“धत्तेरे की रामभगनवा, तू भी शिवचरण वैद्य की तरह से बोलने लगा।अरे तुलसी के वैद्य रघुनाथ जी है यह मूढ़ मतिमन्द चूंकि हठ के सहारे ही रामचरणानुगामी होता रहा है इसीलिए अंधेरे मे चलने के समान इसे एकाध ठोकर बीच-बीच में लग जाती है। उसकी क्या चिंता?”
बाबा को आसन पर बिठाकर रामू फिर घाट पर पड़ी रह गई बाबा की लंगोटी और अंगौछे को धोने तथा एक गोता मारकर जल्दी से लौट आने के लिए लपका। राजा भगत और वेनीमाघव जी उस समय घाट की सीढ़ियाँ उतर रहे थे। रामू पंडित के रामजुहार करने पर राजा ने पूछा “भैया कहाँ है?”
“उन्हे कोठरी मे बिठला के आ रहा हूँ। ज्वर में भी नहाने का आग्रह किया।
क्रमशः
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