महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
76-
फिर गिल्टियों भरी बाँह से डंड लगाने लगे, सो गिर गए। मैं जल्दी में हूँ भगत जी, एक गोता मार के बाबा के पास पहुँचना चाहता हूँ।” कहकर रामू तेजी से नीचे उतर गया।
भगत जी वेनीमाधव से बोले -“भैया इतने बड़े ज्ञानी और महात्मा हैं पर कभी कभी बच्चों जैसा हठ करने लगतें हैं।” “क्या कहे?” वैनीमाधव जी बोले-“खेल का दीवाना बच्चा कष्ट को महत्व नहीं देता, भगत जी। ऐसा भिक्षु बनना भी बड़ा कठिन होता है।”
सबेरे स्नान-पूजादि से निवृत्त होकर बाबा अपने अखाड़े के चबूतरे पर बैठतें हैं। वहीं अपने रोग-शोक निवारण के लिए जनता उनके पास आती है। आज उनके न पहुँचने पर तथा ज्वर का हाल सुनकर कुछ लड़के उनके पास पहुँचे। दण्डवत प्रणाम आदि करने के बाद एक लड़के ने पूछा-“कैसी तबीयत है बाबा?” हँसकर बाबा बोले- “अच्छे हैं। आओ, हमसे पंजा लड़ाओगे?”
सब लोग हँस पड़े, एक बोला-“अरे ये मंगलुआ आपसे हार जाएगा बाबा, आपके हजारों बार मना करने पर भी इसने अभी तक गाली बकना नहीं छोड़ा?” पहला युवक मगंल, मित्र की बात सुनकर चिढ़ गया। उसकी ओर आँखें निकालकर देखता हुआ बोला -“कौन उल्लू का पट्टा साला गाली बकता है?”
कोठरी मे उपस्थित सभी लोग फिर हँस पड़े। बाबा हँसते हुए हाथ उठा कर बोले- “अरे भाई, ये गाली मंगल थोड़े बक रहा है। इसका कुसंस्कार बक रहा है।”
मंगल झेंपकर खोपड़ी खुजलाते हुए बोला- “क्या करें बाबा, लाख जतन करतें हैं पर मुँह से निकल ही जाती है साली।”
एकाध लोग हँसने लगे, पर मंगल ने अपसी बात को स्वर में नया जोर देकर
आगे बढ़ाया, बोला--“आपका यह सारा कष्ट उस दुष्ट रवीदत के कारण ही है बाबा जी। वह मणिकणिका पर आपको मारने के लिए बड़ा भारी अनुष्ठान कर रहा है।”
“हाँ बाबा, मंगल ठीक ही कह रहा है। हमनें भी कल सुना था। दस-बीस लोग उसकी पीठ पर हैं, रुपिया खरच कर रहें हैं। पर बाकी लोग उन पर थू-थू कर रहें हैं बाबा।”
बाबा हँसे, कहा - “भैया किसी के करने धरने से कुछ भी सही गलत नहीं होता।मैं तो अपने पापों का दण्ड भोग रहा हूँ।”
मंगल की त्योरिया फिर चढ़ गईं, बोला -“बाबा, जब तुम इन साले दुष्टों की बात लेकर अपने को पापी कहते हो तब मेरे रोएं-रोएं में आग लग जाती है। तुम्हारे विरुद्ध हम तुमसे भी नहीं सुनेंगे, बताए देते हैं।” बाबा हँसकर चुप हो गए। मंगलू गरमाता रहा-“इतने बड़े महात्मा है आप जरा एक सराप मुँह से निकाल देव कि मर ससुरे रवीदत्त भसम हुई जा।काठ के उल्लू के पट्ट।” बाबा बीच में हँसकर बोल उठे-“अरे भाई, उसका बाप काठ का नहीं, हाड़ माँस का था, उल्लू भी नहीं था। वह मेरा सहपाठी था।” मंगल फिर गरमाया, हवा में मुक्का तानते हुए उसने कहा- “आप कहें सही, पर मैं आज उस साले को उठाकर किसी जलती चिता में जरूर फेंक आऊँगा। मुझसे आपका यह कष्ट देखा नहीं जा रहा है।”
बाबा गम्भीर हो गए, बोले- “मंगल जा, व्यायाम कर, मैं इन संत बेनीमाघव जी से कुछ आवश्यक बात करना चाहता हूँ। विश्वास रखो मैं अभी किसी के मारे नही मरूँगा। रविदत्त के साथ कोई खिलवाड़ न करना। उसे अपना मन बहलाने दो, जाओ।”
युवकों के चले जाने पर बाबा ने राजा भगत से कहा- “राजा,वेनीमाधव को हमारे राजापुर पहुचने का प्रसँग तुम्ही सुनाना। हमे एकांत दो, पर इसका आशय यह भी नहीं है कि मेरी सेवा चाहने वाला कोई दीन-दुखी मेरे पास आ नहीं पाएगा।”
सब लोग उठने लगे तभी बेनीमाधव जी बोले- “हमने सुना था कि आप कुछ काल तक सोरों में भी रहे थे। फिर वहाँ से आपका कैसे आना हुआ? यह अंश भगत जी कदाचित् न सुना सकेंगे।”
“हाँ , पर वहाँ कोई विशेष प्रसँग नहीं घटा। वैसे सोरो रम्य स्थान है। भरत खण्ड के समीप, सुरसरि के तट पर बसी हुई संस्कार-सम्पन्न पुरी है। फिर हमें वहाँ संगति भी भी मिल गई थी । हम वहाँ कथा बाँचते, अध्यापन करते तथा अपनी साधना में रत रहते थे।केवल एक ही विध्न पड़ा । वहाँ हमारी राम-सेवा का जब थोड़ा -बहुत माहात्म्य फैला तो नन्ददास हमारे राम से अपने श्याम को लड़ाने लगे थे। वे स्वस्थ तो अवश्य हो गए थे पर उनकी श्याम-धुन बढ़ गई थी। उन्होंने बड़ा आन्दोलन मचाकर अपने गाँव का नाम रामपुर से बदलकर श्यामपुर कर दिया। मैंने सोचा कि मेरे सामने रहने से इनकी कृष्ण- भक्ति प्रतिद्वन्द्विता में केवल अखाड़िया बनकर ही रह जाएगी। यह अच्छा न होगा। नन्ददास उच्चकोटि के भावुक पुरुष थे। मैं उन्हें और स्वयं अपने को भी मार्गच्युत नहीं करना चाहता था। तभी एक रात हनुमान स्वामी ने स्वप्न में आदेश दिया कि अपनी जन्मभूमि मे जाकर रह।सो चला आया। पहले अयोध्या गया फिर बाराह क्षेत्र में कुछ दिन उसी स्थान पर बिताए जहाँ नरहरि बाबा की कुटिया थी। मेरे काशी में अध्ययन करते समय बाबा जी के भक्तों ने वहा एक सीताराम जी का मन्दिर भी बनवा दिया था। फिर घूमते- घूमने प्रयाग पहुँचा और वहाँ से राजापुर।वह दिन हमारी आँखो के सामने ऐसा स्पष्ट झलक रहा है जैसे आज अभी ही की बात हो।
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यमुना तट पर एक बड़ी नाव आकर घाट से लगती है।उस पर बैठे हुए यात्री उतरने की हड़बड़ाहट में आ जाते हैं।घाट पर बैठे हुए एक अधेड़ सज्जन अपने दुपट्टे को लहर की तरह हिलाते हुए आगे बढ़कर नाव के मल्लाह से पूछते हैं- “यह नाव कहाँ से आई है भैया”
“प्रयागराज से।”
“अरे हमारा माल लाए हो, जोराखन साहु का?”
“हाँ हां, साह जी, ये बोरियें रग्धूमल बटुकपरसाद के यहाँ से आप ही के…”
“ठीक है, ठीक है।” आश्वस्त भाव से साहु जी ने पलटकर सीढ़ियों के ऊपर खड़े अपने नौकर पलटू को चिल्लाकर मजदूरों को भेजने का आदेश दिया। तभी नाव से उतरकर कुछ क्षणों तक इधर-उधर देखने के बाद तुलसी ने अपने पास ही खड़े हुए साहु जी से पुछा-“यहाँ किसी साधु संत के स्थान या किसी धर्मशाला का पता बतलाएँगे साहु जी?”
“धर्मशाला तो कोई नही”
बाक़ी साधु लोग, सामने से आते दिखाई पड़े।
“अरे भगत जी, यहाँ आओं।”
क्रमशः
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