Wednesday, 24 May 2023

77

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
77-

सीढ़ियाँ उतरते हुए एक बलिण्ठ और तेजस्वी श्याम वर्ण का युवक जोराखन साहु की बात पूरी होते ही बोला-“अरे हम तो आप हीं तुम्हारे पास आ रहे हैं। हमारे विनौते आए कि नही?”
“देखो, अब माल आया है।चार दिनों से रोज निराश ही लौट जाते थे हम।अबकी तो ऐसा कहना पड़ा है कि कोई चीज ही नहीं मिल रही है।” 
सीढ़ियाँ उतरते हुए ही राजा भगत की आँखें तुलसीदास की आँखों से जा मिलीं थीं।दोनों व्यक्ति मानों एक दूसरे की ओर खिंच रहे थे और दोनों ही एक-दूसरे के लिए चुम्बक भी बन गए थे।पास आकर राजा ने तुलसीदास को झुककर प्रणाम किया। तब तक साहु जी बोल पड़े -“अरे भगत जी, यह  ब्रह्मचारी जी हमसे साधू का स्थान पूछ रहे थे। (तुलसीदास से) महाराज, बैसे ये हैं तो गिरिस्त और चार पैसे वाले भी हैं।सौ-पचास गायें हैं, खेती है। ससुराल का माल भी इन्हीं को मिला है। बाकी हैं यह साधू ही।”
राजा की सरल आँखों में आँखें डालकर तुलसीदास ने प्रसन्न मुद्रा में कहा- “इनकी आँखों में राम झलक रहे हैं।मैं तो देखते ही पहचान गया।”
अपनी प्रशंसा से अति संकुचित होकर राजा भगत हाथ जोड़कर बोले-“मैं तो महाराज साधू संतों का सेवक हूँ।आइए, मेरी कुटिया में अपनी चरन धूल डालिए।”
तुलसीदास एक पग आगे बढ़ा कर फिर मुडे़ और साहु जी से राम-राम की।
साहु जी अपने कत्थे रंगे दांतों की बत्तीसी दिखाकर बोले- “हें हें, मैं तो
आपको अपने यहाँ ही ठहरा लेता पर आपने साधू का स्थान पूछा।”
भगत ने सीढ़ी चढ़ते हुए कहा-“ठीक है, ठीक है, बातों में कौड़ी थोड़े ही खर्च होती है साहु जी। मीठी बातों का दान दे देते हो, यही क्या कम है।” 
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भगत ने तुलसी से पूछा-“कहाँ से पधारना हुआ महाराज?”
“कई वर्षो से तीर्थाटन पर था भाई,पहले काशी में रहा और इस समय सोरों से आ रहा हूँ। बीच में अयोध्या सूकर खेत आदि के भी दर्शन किए।”
“चित्रकूट जाने के लिए इधर आना हुआ है?”
“हाँ , चित्रकूट के दर्शन का प्रलोभन तो है ही, पर विशेष रूप से मैं अपनी जन्म भूमि के दर्शन करने आया हूँ।”
“आपकी जनमभूमी कहाँ है महाराज?”
“यहीं, विक्रमपुर गाँव में ”

राजा भगत चलते-चलते थम गए और चकित दृष्टि से देखकर कहा-“ यहाँ है” 
“हाँ भाई, पर जन्मते ही यह स्थान मुझसे छूट गया था।”
“आपके पिता का क्या नाम था महाराज?”
“पंडित आत्माराम”
“अरे तो आप ही हैं जो अभुक्त मूल नक्षत्र से जन्मे रहे?”
“आपने ठीक पहचाना।”
“तब तो तुम हमारे भैया हो। हमसे एक दिन बड़े। हम अहिर हैं नाम है राजा। जी आपसे चार दिन बड़े बकरीदी भैया हैं। जुलाहे हैं। दस करधे चलते हैं और दर्जी का काम भी करते हैं। पुराने लोग सब बताते रहे, अब कोई नहीं रहा। पुराना विक्रमपुर गाँव तो हमारे तुम्हारे जनम के बखत ही उजड़ गया था। कुछ बरस हुए वो पुरानी बस्ती भी जमना जी की बाढ़ में बह गई।”
“जाने दो राजा, मेरी जन्मभूमि के पुण्य स्वरूप तुम तो हो।”
“अरे हम तो सतंन की चरनधूल हैं। बाकी भगवान ने तुम्हें यहाँ खूब भेज दिया। पहले हमारे गाँव में ब्राह्मनों के कई घर थे। अब सब इधर-उधर चले गए। ऐसा जी होता है भैया कि एक बार यह बस्ती फिर से बस जाय।”

राजा भगत के वाक्य के अक्षर गिनकर और मन ही मन में मीन मेख विचार कर तुलसी बोले-“तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी, भाई। बड़े शुभ मुहूर्त में यह बात तुम्हारे मन मे उदय हुई है।”
खेतों के किनारे चलते-चलते राजा भगत थमकर आनंद चकित मुद्रा मेंतुलसीदास को देखने लगे-“बस्ती बसेगी तो तुम्हारे नाम पर ही अबकी उसका नाम रखा जायेगा।तुम्हारा नाम क्या है भैया?”
“मेरा नाम तुलसी है, पर गाँव का नाम राजापुर होगा। तुम इस गाँव की आत्मा के रूप में ही मुझे मिले हो।”
दो-तीन दिनों में राजा तुलसी ऐसे घुल-मिल गए कि मानों अब तक वे साथ ही साथ रहे हो। तुलसी की ज्ञान भक्ति  भरी बातें सुन-सुनकर राजा और उनके कुनबे के लोग बड़े ही प्रभावित हुए। राजा बोले -“अब तो भैया, हम तुम्हे कहीं जाने न देंगे। यही जमना जी के किनारे तुम्हारे लिए कुटिया बना देंगे। मजे से कथा बाँचना और सुख से रहना।”
“अरे, बहते पानी और रमते जोगी को कौन रोक पाया है, भगत ? जन्म- भूमि देखने की लालसा पूरी हो गई, अब चित्रकूट जाऊँगा।”
“चित्रकूट हम तुम्हें ले चलेंगे। चार दिन वहाँ रहना फिर यहीं आ जाना।”
राजा भगत की यह बात सुनकर तुलसी दास चिन्तामग्न मुद्रा में फीकी हँसी हँसकर बोले- “जान पडता है कि मैं जिस स्थिति से बचना चाहता हूँ उसमें फँसे बिना मेरी और कोई गति नहीं। फिर भी यह देखना है राजा कि हममे से कौन जीतता है।”
तुलसीदास की बाद राजा भगत ठीक तरह से समझ न पाए। अचम्भे-भरी दृष्टि से पल-भर उनको देखते रहने के बाद राजा बोले- “मैं ठीक तरह से यह समझ नहीं पाया कि तुम काहे से बचना चाहते हो? साइति घर-गिरस्ती में फँसने का डर तुम्हारे मन में है, है न। ”
“तुमने ठोक सोचा। असल में बात यह है राजा कि जन्मकुडली के अनुसार मेरा विवाह यदि होगा तो मुझे दु.ख सहना पड़ेगा। यह जानकर ही मैं उससे बचना चाहता हूँ। यह जीवन रामचरणानुरागी होकर ही बीत जाय, बस इससे अधिक मैं और कुछ भी नही चाहता।”
सुनकर भगत हँसने लगे, कहा-“साधू के लिए घर-गिरिस्ती का सपना बड़ा डरावना होता है। हम भी ब्याह नही करना चाहते थे भइया। चौदह बरस की उमिर में हम गाँव के कुछ लोगों के साथ चित्रकूट गए थे। वहीं एक साधू की संगत में हमारे मन से बैराग उपजा। यह देखकर हमारे वप्पा और काका ने झटपट हमारा ब्याह कर दिया। पहले तो हम दु:खी भए पर अब ऐसा लगता है कि अच्छा ही हुआ, घरेतिन ने मेरे जप-तप को अपने भगती-भाव से बढ़ाया है। हम दोनों के लिए घर-गिरिस्ती के काम भी भगवान की पूजा के समान ही हैं।” 
क्रमशः

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