Thursday, 25 May 2023

78

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
78-

“राम करे, तुम्हारे सुख मे निरन्तर वृद्धि हो, पर मुझे यदि इस प्रलोभन से बाँधने का जतन‌ करोगे राजा, तो विश्वास मानों, मैं यहाँ से ऐसा भागूँगा कि तुम मुझे फिर कभी खोज भी न पाओगे।”
राजा हसँने लगे, कहा-“सूत न कपास कोरियों से लठ्ठमलठ्ठा। अरे भइया, हम तुम्हारा ब्याह अभी थोड़ी ही रचा रहें हैं जो तुम भागने की सोचनें लगे। हमने तुम्हारी कुटी बनाने के लिए एक ऐसी पवित्र जगह चुनी है कि तुम मगन हो जाओगे।चित्रकूट जाते समय राम जी जिस जगह नाव से उतरे थे और जहाँ उन्होंने जानकी मइया तथा लछमन जी के साथ बिसराम किया था वहीं तुम्हारी कुटी छवाऊँगा।”
“हाँ, हमारे गाँव के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से यह बात दोहराते चले आए हैं।”
“राजा, तुम मुझे शीघ्र से शीघ्र उस जगह पर ले चलो।”
“आज नही भैया। आज हम तुम्हारे लिए कुटी बनाने का लग्गा जरूर लगा देगे। दो दिनों में वहाँ सव कुछ तैयार हो जायगा।तेरस से पूनों तक बडी भारी पैंठ लगती है। हमारा विचार हैं कि आजकल में हम आसपास के गाँव में सब जगह यह कहलवा दें कि तेरस से पुनों तक यहाँ कथा बचेंगी। बस उसी दिन तुम्हें वह जगह दिखा ही नहीं देंगे, वहाँ तुम्हे बसा भी देंगे। वहाँ कथा बांचना और आनन्द से ध्यान रमाना।”
ये दो दिन तुलसीदास ने बच्चों जैसी अकुलाहट के साथ बिताए। वह स्थान जहाँ राम जी भाई और सहर्धामिणी के साथ उनकी जन्मभूमि के गाँव में कुछ देर रहे थे और जहाँ अब वे आठों याम रहेंगे, उनके मन की दशा को विरहाकुल बनाने लग।विरह-साम्य से तुलसी के राम-प्रेम ने अन्य यादों को दबा दिया। इस समय राम प्रेम अधिक था।राजा भगत ने सचमुच ही बड़ी सुन्दर प्रचार व्यवस्था की थी।काशी जी से एक बड़े भारी व्यास जी के पधारने की बात दो ही दिनों में दूर-दूर तक पहुँच गई। यह काशी के नाम का महत्व ही था कि पेंठ के दिन हर बार की औसत भीड़ से अधिक लोग विकमपुर आए थे। तीसरे पहर बालू पर, तुलसी दास की नई बनी हुई कुटी के आगे, खासी भीड़ बैठी हुई थी।

तुलसीदास ने अपने प्रवचन का आरम्भ इसी जगह श्रीराम लक्ष्मण और जानकी के पधारने की बात ही से प्रारम्भ किया।भूमि प्रेम जगाते हुए उन्होंने सियाराम-लक्ष्मण के आगमन का शब्दचित्र खींचना आरम्भ किया। तीन लोक के नाथ, सचराचर के स्वामी अपनी ही लीला के वशीभूत होकर, वनवास करने के लिए पधार रहे है। आस-पास के गाँवों मे धूम मच गई है कि कोई दो सलोने राजकुमार आ रहे है। कैसे हैं वे कुमार-

जलजनयन, जलजानन, जटा है सिर, जौवन-उमंग अंग उदित उदार हूँ ।
 सांवरे-गोरे के बीच भाभिनी सुदामिनी-सी, मुनिपट धार, उर फूलनि के हार हैं।करनि सरासन सिरीमुख, नि्षंण कटि, अति ही अनूप काहू भूप के कुमार हैं।तुलसी विलोकि के तिलोक के तिलक तीनि, रहे नरनारि ज्यों चितेरे चित्रुसार हैं।
राम जी उनके संकोच को द्वर करके उनसे ऐसे प्रेमपूर्वक भेंट कररहे हैं कि मानों अपने सगे सम्बधियों से भेंट कर रहे हों। भगवान और जगदम्बा के दर्शन करके लोग निहाल हो रहे हैं। उसी समय एक तापस वहाँ पर आया। वह सबसे पीछे खड़ा हुआ झपलक दृष्टि से अपने आराध्य देव को देखता रहा। भगवान का ध्यान तापस की ओर गया। उन्होंने बड़े प्रेम से उसको अपने पास बुलाया और उसे हृदय से लगाया।तापस के वेश में तुलसीदास स्वयं अपनी ही कल्पना कर रहे थे। तुलसीदास इस तरह से तन्मय होकर सियाराम के शुभागमन का दर्शन कर रहे थे कि जैसे उनके सामने यह दृश्य प्रत्यक्ष हो और न देख पाने वालो के हित मे वे उसे बखान रहे हों। उस दिन का प्रवचन उन्होंने यह कहकर समाप्त किया कि राम दीन बन्धु हैं। जिसका कोई सहारा नहीं है उसके राम सहाय हैं।
तुलसी के स्वर में इतनी सचाई और वर्णन में इतनी सजीवता थी कि सभा में सम्मोहिनी बँध गई। चार दिन की पेंठ मैं तुलसीदास के प्रवचनों की धूम मच गई। लोगों को यह भी मालूम हो गया कि यह व्यास जी दरअसल इसी गाँव के हैं। वे काशी पढ़ने गए थे। बदरी केदार मान सरोवर के दर्शन करके अब यहीं बसने के विचार से आए हैं।प्रवचन के इन तीन दिनों से आरती में चढ़त भी अच्छी हुई। चाँदी और ताँबे के टके चढ़े और पैंठ के अंतिम दिन तुलसीदास जी की कुटी में अनाज और फल-फूलों का भी अच्छा ढेर लग गया। तुलसीदास संतुष्ट हुए। कुछ लोगों को अपनी ज्योतिष विद्या से भी उन्होंने प्रभावित किया। बस फिर तो धूम मच गई। कोई दिन ऐसा नही जाता था कि बाबा की कुटी में दस-पांच आदमी न आते हों। तुलसीदास अपनी आय के बारे मे तनिक भी चिन्ता नही करते थे। इधर आया और उधर किसी दीन दुःखी को दे दिया। राजा को यह रुचिकर न लगा, एक दिन उसने कहा-“भैया आज से जो कौड़ी टके सेवा में चढ़ें उन्हें तुम अपनी रकम मानकर खरच मत करो।”
“ठीक है, वह राशि तुम्हारी है।”
“मेरी नहीं है भैया, वह मेरी आने वाली भौजी की है।”
तुलसी त्योरियाँ चढ़ा कर बोले-“देखो, राजा, तुम अपने मन से इस प्रकार के विचार निकाल दो। मैं इस माया में नहीं पड़ूँगा।”
राजा हँसे, कहा-“जमना पार एक बड़े पंडित जी रहते हैं, वो भी बड़े भारी जोतसी हैं। आपके पिता से उनका नेह-नाता रहा। वह हमसे कहते थे, रजिया, इस लड़के का ब्याह जरूर होगा।”

तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े और बोले-“राजा, साधु जब हँसी में भी ठग बनने का स्वागँ करता है तो वह तुरंत पकडा़ई में आ जाता है।”
यह सुनकर राजा भी हँस पड़े, फिर कहा- “हँसी मसखरी में हम कभी क‌भी झूठ जरूर बोलते है भैया पर हमारी यह बात भूठी नही है।”
“खैर, हम आज से यहाँ चढ़ने वाला दमड़ी टका अपने हाथ से न छुएंगे। वह तुम्हारा है, तुम्हीं खरच करना। बाकी हमको ब्याह के प्रलोभन मे फँसाने प्रयास मत करो।” 
राजा बोले- “फँसाता तो प्रारब्ध है भैया, जोड़ियाँ पुरवले जनम के संस्कारों से बनती हैं और हमारे दीनबंधु पाठक महाराज कोई ऐसे-बैसे थोड़े ही हैं, एकदम राज जोतसी है, भइया। पक्का घर है।
क्रमशः

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...