महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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बड़ी खेती वाड़ी है। एक राजा इन्हें हाथी भी दे रहे थे पर ये बोले कि आप लोग जब मुझे बुलाते हैं तो अपना हाथी भेज ही देते हैं और बाकी हमारे कोई लड़का तो है नही, एक बिटिया है। सो हम हाथी बाँध के क्या करेगें? बडे भले आदमी है।”
बात आई-गई हो गई। उस दिन से तुलसीदास ने पैसा को छूना भी बंद कर दिया। यों पैसे टके चार दिनों की पैंठ के समय ही चढा़ करते थे। बीच में राजा भगत की मार्फत जमनापार के पाठक महाराज ने दो वर्षफल बनाने का काम भी तुलसीदास के पास भेजा था।ताजिक रमल शास्त्र के कुछ ही जान कार थे। उन वर्षफलों के बनाने की दक्षिणा में उन्हें ग्यारह स्वर्ण॑मुद्राएं मिलीं। तुलसीदास के जीवन में इतती बड़ी कमाई पहली ही बार हुई थी। सोना छूकर प्रसन्न हुए। अशर्फ़ियाँ अपने हाथ में उठाकर उन्होंने प्रसन्न भाव से उन्हें एक हथेली से दूसरी हथेली को दे देने का बार बार खिलवाड़ किया। फिर एका- एक चौंककर राजा से पूछा- “क्यों जी, दो यजमानों के यहाँ से आई होगीं तो पाँच -पाँच मोहरें आईं होगीं, फिर यह एक ऊपर से हमारे पास कैसे आ गई?”
राजा हँसे, बोले- “हम तो समझते रहे भैया कि तुम एकदम भोलानाथ हो, तुम्हारा घ्यान ही नही जाएगा। यह बढ़ोत्तरी की अशर्फी पाठक महाराज ने अपनी तरफ से मिलाके भेंट भेजी है। कहने लगे, बड़े महाराज का नाम लेके, कि उनका लड़का, सो हमारा लड़का। ऐसा बढ़िया काम करके उसने हमें जिजमानों से जस दिलाया तो हम भी उसे इनाम दे रहे हैं।”
तुलसी प्रसन्न हुए, कहा-“रजिया, एक दिन हमें पाठक जी महाराज के पास ले चलो।मैंने अपने पिता को नहीं देखा तो कम से कम अपने पिता के एक मित्र को ही देख लूँ।”
“अरे वह तो आप ही तुमसे मिलना चाहते हैं। कहने लगे कि हमारी रत्ना जो लड़की न होकर लड़का हुईं होती तो मैं उसे तुलसीदास के पास ही सीखने के लिए भेजता। पाठक जी महाराज ने अपनी बिटिया को अपनी सारी विद्या दी है भैया। सब लोग रत्ना-रत्ना कहते हैं उसे । सुना है पूरी पण्डित हुई गई है।”
तुलसीदास ने हँसकर राजा का हाथ पकड़कर हल्के से घसीटते हुए कहा-“तुम हमसे चांईपना न करो रजिया। हम ब्याह के फेर में नहीं पड़ेंगे, नहीं पड़ेंगे बताए देते हैं। मैं कह नही सकता राजा कि इस जगह मेरी कुटी छवाकर तुमने मुझे क्या दे दिया है।जानते हो मैं यहाँ एक पल के लिए भी अकेला नही रहता। बिना जतन किए अति सहज भाव से मुझे सियाराम जी और लखनलाल के दर्शन सुलभ होते रहते हैं। मेरे मन पर यह मैल जम ही नही सकता तुमसे सच कहता हूँ।”
राजा हँसकर बोले-“तुम ऊँची आत्मा हो भइया। बाकी एक बात कहें, तुम्हारे आस-पास अब ऐसी भगतिनें मँडराने लगीं हैं जो साधु-सन्यासियों का ही शिकार खेलतीं हैं।”
तुलसीदास खिलखिला कर हँस पड़े और देर तक हँसते रहे, फिर कहा-“रजिया, नदी-नालों में डूब न जाऊँ इसलिए राम जी ने दया करके मुझे बहुत पहले ही समुद्र में डुबाकर फिर उबार लिया था।अब इन लंका की निशाचरियों के घेरे में भी मेरी आत्मा जनकदुलारी के साथ राम के ध्यान में ही रमती है।यह स्त्रियाँ आतीं हैं तो मानों मेरे ध्यान को और अधिक एकाग्र करने के लिए ही आतीं हैं। खैर, अब यह प्रसँग छोड़ो, यह धन तुम्हें सौंप रहा हूँ, पर यह मेरा है। रजिया, इस गाँव में संकटमोचन महावीर जी की स्थापना होगी। जब तक वह स्थापित नही होगें तब तक यहाँ बस्ती भी नहीं बसेगी।” यह सुनकर राजा उल्लास और आनन्द की सजीव मूर्ति बन गए। तुरंत तुलसीदास के पैर छूकर कहा- “भैया, तुम्हारी यह इच्छा बहुत जल्दी पूरी होगी।”
राजापुर पहुँचकर तुलसीदास के जीवन में एक नया मोड़ आ गया था। यहाँ उनका अधिकांश समय अपने ध्यान-योग ही में बीतता था। बाजार के चार दिनों को छोड़कर दोपहर के बाद तुलसीदास की कुटी के द्वार बन्द हो जाते और वे एकांत साधना में रम जाते थे। राजा भगत भोजन करने के बाद रात में बाबा की कुटी के आगे एक पेड़ के नीचे अपनी चटाई डालकर पड़े रहते थे। कुटी का द्वार बंद हो जाने के बाद वे न तो स्वयं ही भीतर जाते और व किसी को भीतर जाने देते थे। कुछ राजा भगत के इस प्रतिबन्ध के कारण और विशेष रूप से तुलसीदास की प्रवचन-कला तथा आकर्षक व्यक्तित्व के कारण आसपास के क्षेत्रों में उनकी महिमा बहुत बढ़ गई थी। स्त्रियाँ भी उनकी कथा सुनने तथा उनसे अपने दुःख-सुख निवेदन करने के लिए आया ही करतीं थीं। हाजीपुर की चम्मो सहुवाइन तुलसीदास शास्त्री पर बेपनाह रीझ उठी थी। वह पहली बार पैंठ में उनका प्रवचन होने पर आई थी। फिर जब-तब आने लगी। उसकी एक आँख ऐचींतानी थी। काया भी भगवान की दया से घी के कुप्पे के समान थी। यो रंग गोरा और चेहरे का नक्शा एक हद तक सुन्दर और आकर्षक भी था। भरी जवानी में चार वर्ष पहले विधवा हो गई पर उछलते अरमानों और पैसे की गर्मी ने उसे कभी वैधव्य अनुभव न करने दिया। अपनी तेलधानी चलाती, खेतों में काम कराती और लोक-व्यवहार के सारे काम, मर्दो की तरह बेफ़िक्र होकर स्वयं ही कर लेती थी। जब से तुलसी पण्डित की तेजवान सूरत और गोरी-चिट्टी कसरती देह पर उसकी डेढ़ आँख गड़ी है तब से सहुवाइन को हाजीपुर में रहना तक अखरता है। पहले तो हफ्ते में एक बार और फिर तो दो-दो, तीन तीर बार वह विक्रमपुर आने लगी। जब आती तब घी, अनाज, तेल आदि कुछ न कुछ साथ लेकर ही आती थी। वह सदा इस जतन में रहती कि जहाँ तक बने तुलसी पण्डित से अकेले में कथा सुने या बातें करे। वह उन्हें ऐसी रसीली दृष्टि से टकटकी बांधकर देखती कि तुलसीदास शास्त्री के मन का सारा रस ही सूख जाता था। कभी कभी मौका पाकर चरण छूने के बहाने उसके हाथ बहककर घुटनों के ऊपर जांघ तक पहुँच जाते और तुलसी को उलझन होने लगती थी। उन्होंने चम्मो सहुवाइन को कई बार इशारों में समझाया।
क्रमशः
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