Saturday, 27 May 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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उसे अपने से दूर रखने का जतन भी किया, यो एक बार झिड़क तक दिया पर सहुवाइन का प्रेम उसकी आखँ की तरह ही ऐंचाताना था।तुलसी जितना ही उससे दूर खिंचते थे वह उतनी ही उनके प्रति बावली होकर पास खिंची चली जाती थी। चम्मो सहुवाइन के समान ही एक राजकुँवरी भी तुलसी के प्रति आकृष्ट हो गई थी। वह भी विधवा थी, अपने मैके में ही रहती थी किन्तु अभी तक किसी पर-पुरुष के लगाव से उसका तन-मन अशुद्ध नहीं हुआ था। देखने में भी बुरी न थी। दो एक बार ऐसा संयोग हुआ कि चम्मो सहुवाइन की उपस्थिति में ही राजकुँवरी भी अपनी भावनाओं का कंचन थाल सँजोए हुए आई। चम्मो के प्रेमपाश से सताया हुआ तुलसी का मन ऐसे मौक़ों पर सहज सुख के साथ राजकुँवरी को देखने लगा और एक दिन तुलसी को यह लगा कि उनका सहज आभास राजकुँवरी के लिए कुछ और अर्थ रखता है और वह अर्थ तुलसी के मन में अनर्थ करता है। नहीं अब प्रपंच में कदापि नहीं पड़ेगा। मोहिनी, राजकुँवरी, ऐंचीतानी अकर्षण विकर्षण, ऊहापोह और उससे मुक्ति पाने के लिए ध्यान योग की कठिन साधना में तुलसी के दिन गुजरने लगे। राजा भगत चम्मो और राजकुँवरी के व्यवहार को ध्यान से देख रहे थे। एक दिन सहुवाइन से उनकी कहा सुनी भी हो गई। राजा ने अन्त में उसे डण्डे मारने की धमकी देकर भगा दिया। इस चीख चिल्लाहट से तुलसी दास का ध्यान भंग हुआ, द्वार खोलकर उन्होंने पूछा- “क्या हुआ रजिया?” राजा भगत ने कहा- “जब तक भौजी घर में न आएंगी तब तक मुझे तुम्हारी इच्छा के लिए ऐसियों से लड़ाई झगड़ें भी मोल लेने पड़ेंगे।” 
तुलसी हँसे, कहा- “भाई, तुम्हारी भौजी तो मुझे इस कुटी में आती दिखलाई नहीं देती और रही चौकीदारी की बात, सो तुमने यह बेकार की चिंता ओढ़ रखी है। नदियाँ पहाड़ को बहा नही सकती, राजा।” 
“हाँ हाँ हाँ, पर धीरे-धीरे उसे काटती जरूर हैं भइया। हम तो कहते हैं कि न हम तुम्हारी चौकीदारी करें न तुम्हें ही खुद अपनी चौकीदारी करनी पड़े। भौजी  आ जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।” तुलसी बोले- “एक ओर तो विलासिनी स्त्रियाँ मुझे तंग करती हैं और दूसरी ओर तुम्हारी यह 'भौजी-भौजी' की रट पीछा नहीं छोड़ती। मैं यहाँ से चला जाऊँगा , राजा।” 
राजा हँसे, बोले- “अब यहाँ से तुम्हारा निकलकर जाना सरल नही है भइया। महाराज ने हमसे कह दिया है कि तुम्हारा ब्याह अवश्य होगा। देखो न, ब्याह की बात जब से उठी है तभी से तुम्हारे पास कितना काम आने लगा है।”
यह सच था कि तुलसी पण्डित को पाठक जी के कारण ही पहले पहल ज्योतिष सम्बन्धी काम मिला।फिर तो बाँदा से लेकर चित्रकूट तक राजे रजवाड़े और साहूकारों मे वे प्रायः बुलाए जाते थे। कथा और प्रवचन आदि के अलावा उनकी ज्योतिष विद्या तथा साहित्य-पॉण्डित्य की ख्याति भी फैली हुई थी। मान के साथ ही साथ धन भी घीरे-घीरे बढ़ने लगा था।आमदनी अच्छी होने लगी थी।वह सारा रुपया-पैसा राजा के पास ही रहता था। उस दिन तुलसीदास राजा की बात को सहसा काट न सके।उनके मन का संघर्ष इस स्थिति पर पहुँच गया था कि वे विवाह का प्रस्ताव को हल्के फुलके ढंग से टाल नही सकते थे। संकटमोचन महावीर जी की स्थापना का आयोजन जोर-शोर से होने लगा। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा और हवन आदि कराने के लिए पण्डित मण्डली का चयन करने की बात उठी। राजा बोले- “तुम हमारे साथ पाठक महाराज के यहाँ चलो।”
तुलसी बोले- “तुम्हारी चालें मुझ पर सफल नही होंगी रजिया।”
राजा बोले- “अरे हमारी होयें चाहे न होयें, पर राम जी जो चाल चलेगें उससे बचना तो तुम्हारे लिए भी कठिन होगा। खैर, ब्याह की बात करने के लिए मैं तुम्हें वहाँ नहीं ले जाऊँगा, पर पंडितों के संबंध में सलाह-सूत लेने के लिए तुम्हे पाठक महाराज से मिलना ही चाहिए।”

तुलसी पण्डित ने राजा भगत की बात मान ली।पाठक जी ने तुलसीदास का बड़ा सत्कार किया। तुलसी पण्डित भी उनके सत्कार से बहुत सुखी हुए।पाठक जी बोले- “आपको देखकर मुझे आपके पिता की याद आ गई। पहली बार जब मैंने आपको कथा सुनाते हुए देखा तो लगा कि पण्डित आत्माराम जी बैठे हैं। तभी तो मैंने भगत से आपके विषय में पूछताछ की थी।” 
तुलसीदास गद्गद होकर बोले- “स्व० पिताजी के सम्बन्ध में कुछ बतलाने वाले आप पहले व्यक्ति हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मैं उन्ही से मिल रहा हूँ।”
“वे मुझसे साल-सवा साल बड़े थे। अभागे थे बेचारे, अन्यथा उनके समान ज्योतिषी इस क्षेत्र में दूसरा कोई न था।अपने यजमानों की जन्म-पत्रिकाएँ आपके पिता से बनवाकर कई पण्डित पण्डितराज बनकर पुज गए और वे बेचारे, राम- राम।”
“मैं भी अभागा ही हूँ। अपने पिता के साथ यहाँ मेरा भी साम्य है, मैं कदा- चित्‌ अधिक ही अभागा हूँ। मेरा जन्म अभुक्तमूल नक्षत्र में हुआ था।” 
तुलसीदास ने इस विचार से कहा कि पाठक जी यह सुनकर उनसे अपनी कन्या का विवाह करने की बात अपने मन से उतार देंगे, किन्तु पाठक जी हँसकर बोले- “आयुष्मन्‌, आपकी कुण्डली मैंने भी बनाई थी। अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्मे बालक की ग्रह-दशा पर विचार करने का लोभ भला कौन ज्योतिषी छोड़ सकता था। मैं समझता हूँ कि इस क्षेत्र के तीन-चार पण्डितों के पास आपका टेवा अवश्य मिल जाएगा।” 
तुलसी बोले- “तब तो आप मेरे सम्बन्ध मे सभी कुछ विचार कर चुके होंगे। मैंने स्वयं अपनी कुण्डली पर कभी विचार नही किया। केवल पार्वती अम्मा के मुख से यह सुना भर था कि मेरे ग्रह-नक्षत्र विचारकर, मुझे मातृ पितृ घाती और महा अभागा जानकर ही पिताजी ने मुझे घर से निकाला था।”
पाठक जी बोले- “आपके जन्म के समय आपके गाँव पर घोर विपत्ति आई हुई थी।आपके पिताजी अपने बहनोई की धोखेबाजी के कारण उस समय अत्यन्त त्रस्त थे, उन्होंने कदाचित्‌ सूक्ष्मरूप से आपकी कुण्डली पर विचार नहीं किया था।”
“आप बड़े है। मेरे पिता के परिचितों में से हैं। मैं आपकी बात काटने की घृष्टता नहीं कर रहा, फिर भी अपने अब तक के जीवन को देखते हुए स्वयं मुझे भी मानना पड़ता है कि मैं महा अभागा हूँ।”
क्रमशः

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