महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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“नही बेटा, भाग्य का चमत्कार केवल लौकिक स्तर पर ही नहीं दिखलाई देता। मेरी धारणा है कि आपके समान परम भाग्यशाली व्यक्ति जगत में कदाचित ही कोई हो। जो सिद्धि किसीको नहीं मिलती वह आपके लिए सहज सुलभ होगी। अभी आपने अपने जीवन में देखा ही क्या है।खैर, इस सम्बन्ध में हम लोग फिर कभी बातें करेंगे। आपके द्वारा मारुति मन्दिर की स्थापना का विचार अत्यन्त सराहनीय है।आप चिन्ता न करें, सब प्रबन्ध हो जाएगा।”
पाठक जी के द्वारा हनुमान जी की प्रतिष्ठापना का भार उठाने पर उत्सव सचमुच ही बड़ी धूमघाम से हुआ। अनेक कंगलों ने भोजन पाया, अनेक ब्राह्मणों को बहुत सी दक्षिणा मिली, ब्रह्मभोज हुआ, तुलसीदास का प्रवचन भी हुआ।उस दिन उनकी प्रवचन कला ने अपने सहज उल्लास में ऐसा चमत्कार प्रकट किया कि चित्रकूट, बाँदा आदि के बड़े बड़े सेठ साहुकार और पण्डित उनकी प्रशंसा करने लगे। पाठक जी बेहद प्रसन्न थे। साँयकाल के समय जब वे जाने लगे तो तुलसीदास ने कहा-“आपने तो अभी तक भोजन भी नहीं किया। पहले प्रसाद ग्रहण कर लीजिए तब जाइएगा।”
पाठक जी मुस्कराकर बोले- “मेरे कई यजमानों ने मुझसे यहाँ पर एक हाट बाजार और बस्ती बसाने की बात कही है।बस्ती फिर से बस जाए तो कभी भोजन करने भी आ जाऊँगा। अभी जल्दी क्या है।” इस बात की आड़ में छिपी पाठक जी की बात को तुलसीदास समझ न पाए। उन्होने फिर आग्रह किया- “मुझे अपार कष्ट होगा।”
“बेटा, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रसँग को यहीं तक रहने दें। मैं एक और प्रार्थना भी करना चाहता हूँ।”
“आप मेरे पिता समान है, कृपया मुझे लज्जित करनेवाले शब्दों का प्रयोग न करें।”
पाठक जी हँसे, तुलसीदास की पीठ पर हाथ रखकर उन्होंने कहा- "अच्छा मैं तुम्हारी ही बात रखूँगा। तुमसे मुझे यह कहना है कि मेरे गाँव में श्रीमद्- वाल्मीकीय रामायण बाँचो।”
“आपकी आज्ञा का निश्चय ही पालन करूँगा। आप जब भी मुझे आज्ञा देंगे, मैं आ जाऊँगा।”
संकटमोचन महावीर की स्थापना के उपरांत शीघ्र ही पुराने विक्रमपुर के पास एक नया बाजार बनने लगा। राजा बहुत प्रसन्न थे। अपने उत्साह में वे अपना बहुत सा समय नये बनते हुए बाजार में ही बिताने लगे।विधवा राजकुँवरी ने अब प्रायः नित्य ही दोपहर के बाद तुलसी दास की कुटी में आना आरम्भ कर दिया। वह अपने लिए भी एक मकान बनवा रही थी। वह आकर तुलसीदास के चरणों में अपना मस्तक झुकाती और फिर उनके कक्ष से अलग रसोई घर की आड़ में बैठ जाया करती थी। तुलसीदास के ध्यान में इससे व्याघात पड़ने लगा।सिया-राम का बिम्ब उनके ध्यान पट से मिट मिट जाता था।राजकुँवरी के सुन्दर सलोने श्याम-मुख की छवि उनकी आँखों में बार बार आने लगी। आँखों में राजकुँवरी और कानों में राम राम की गूँज उनके मन में परस्पर विरोधी तरंगे उठाने लगीं।तुलसीदास इससे त्रस्त हो गए। वे किसी स्त्री के ध्यान में अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहते थे। भक्तिरस और यौवन की तृष्णा उनके मन में फिर उथल पुथल मचाने लगी। एक रात स्वप्न में उन्होंने देखा कि वह माला जप रहें हैं और मोहिनीबाई राजकुँवरी का हाथ पकड़े मुस्कराती हुई आती है। माला थम जाती है, मोह आँखों में चंचल गति करता है। मोहिनी कहती है-“इसे तुम्हें सौंपती हूँ।” तुलसी एक बार चाहत भरी नजरों से उन्हें देखते हैं। दोनों सुन्दरियाँ मुस्करा रहीं हैं। वे मूर्तिमान प्रलोभन बनी हुई उन्हें ताक रहीं हैं। तभी न जाने कहा से चम्मो सहुवाइन भी वहाँ पहुँच गई। वह भी भैंगी आँखों में अपनी चाहत का सत निचोड़कर उन्हें देख रही है।रूप-कुरूप से बँधे एक ही लालच को सामने देखकर तुलसी के मन का सौन्दर्य-बोध बिखर जाता है। शरीर हिल उठता है। आँखें खुल जातीं हैं। तुलसी “राम' कहते हुए उठ बैठते है। कुछ पल बैठे रहतें हैं फिर आँखें भर आतीं हैं। करुण स्वर में आप ही आप कह उठते है- “बजरंगबली, मैंने ऐसा क्या पाप किया है जो यह विघ्न-बाधाँए अभी तक मेरा पीछा नहीं छोड़तीं?”
दिन का तीन चौथाई भाग आत्म-संघर्ष में ही बीत गया। सुबह नित्य नियमों में भी स्त्रियाँ उनके कल्पना लोक में बार बार धसँकर उनके मन को अपराघ भावना से जड़ीभूत कर देतीं थीं। राम का ध्यान न सधा तो तड़पकर बजरगबली से प्रार्थना करने लगे-"हे अंजनीकुमार, मेरी बाधाएँ हरो, मैं कुछ नहीं चाहता, केवल राम-चरणों में मेरी प्रीति को स्थिर कर दो। मैं मोहरूपी शक्ति से घायल और मूच्छित हो गया हूँ, मुझे राम-संजीवनी से जिला दो प्रभु। मेरी लाज रखो।”
उस दिन घाट पर प्रवचन करने में भी उनका ध्यान एकाग्र न हो पाया। तुलसीदास अपने भक्तों को जब राम के चरणों में अमल प्रीति रखनें का उपदेश दे रहे थे तब तुलसीदास का मन अपनी ही अपराधी वृत्ति से बौखला उठा। फिर उन्होंने व्याख्यान को बढ़ाने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु उनका मन इस समय तक बहुत बिखर चुका था।अपनी अस्वस्थता का बहाना साधकर उन्होंने उस दिन शीध्र ही अपना प्रवचन समाप्त कर दिया। कुछ भक्तों ने उनके मुख से अस्वस्थता की बात सुनकर उनके उतरे हुए चेहरे पर विशेष ध्यान दिया। तुलसी दास के प्रवचनों पर मुग्घ जनसमुदाय को आज उनकी कथा में रस नहीं मिला था, वे भी ब्रह्मचारी महाराज के स्वास्थ्य के सम्बन्ध में चिन्ता करने लगे।वैद्य को दिखलाने की बात भी कई लोगों ने तुलसी दास से कही, परन्तु वे यह कहकर अपनी कुटी के भीतर चले गए कि राम स्वयं ही मेरा उपचार करेंगे।
सन्नाटा हो गया। तुलसी बन्द कुटी में आसन पर बैठे ध्यानमग्न होकर माला जप रहे हैं। उनके कानों की राम गूँज में टक-टक की आवाज व्याघात डालती है। ध्यान का सिमटा हुआ बिन्दु टक-टक की ध्वनि के साथ फैलने लगता है। उनके चेहरे पर कसाव आ जाता है। वे अपनी पूरी अंतर्शक्ति के साथ इस व्याघात के विरुद्ध मोर्चा बाँधकर जप में एकाग्र हुए। फिर टक-टक' फिर चिड़- चिड़ाहट- टक-टक टक-टक। क्रोध से आँखें खुल गईं। मूदँकर फिर अपने आपको शांत करके ध्यानमग्न होने का प्रयत्न करते हैं पर -टक-टक टक-टक होती ही गई।
तुलसी आसन छोड़कर उठे, द्वार खोला। सामने ही राजकुँवरी की आँखों का प्यासा सागर लहरा रहा था।
क्रमशः
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