Wednesday, 31 May 2023

82

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
82-

तुलसीदास उसे देखकर बोले-“बैठने आई हैं? बैठिए, मैं यहाँ से जाता हूँ।” कहकर तुलसीदास कुटी का पूरा द्वार खोल- कर बाहर निकलने लगे।राजकुँवरी ने गिड़गिड़ाकर पूछा-“आप कहाँ जाते हैं?”
“जहाँ मेरे भक्तिभाव को आपके काम-प्रलोभन न सता सकें। आप धनी हैं, धन से सब कुछ खरीद सकती हैं।आपकी इच्छाओं का पालन करने वाले अनेक पुरुष आपको मिल जाएँगें। कृपाकर मुझे शांतिपूर्वक राम-चरणों मे लीन होने दीजिए।” सारी बातें एक साँस में कहकर तुलसीदास ने फिर अपनी कुटी के द्वार बन्द कर लिए।
राजकुँवरी तुलसीदास के क्रोध से आतंकित हो गई। बन्द कुटी के द्वार को वह कुछ क्षणों तक स्तब्ध खड़ी देखती रही। उसकी दो दासियाँ भी पीछे खड़ी थी। एक ने मुँह बनाकर कहा- अजी कुँवरी जू, छोड़िए न इस साधू का मोह, इसे अपनी सुन्दरताई पर घमण्ड है। बड़ी भक्ति छाँटता है। अरे हम इससे अच्छा सुन्दर साधू आपके लिए खोज कर ले आवेगीं। किसी दिन यह निगोड़ा अगर जोर से आपको डाँट देगा तो किरकिरी हो जायगी।” राजकुँवरी की आँखें कटोरियों जैसी भरी हुईं थीं और तुलसीदास अपनी कुटी में पिंजरबद्ध सिंह की भांति चक्कर लगा रहे थे।
तीसरे पहर राजा भगत आए। कुटी का द्वार खटखटाया। जब उत्तर न मिला तो पुकारा-“भैया”
“हाँ राजा, आए।”-  तन्द्रा में लेटे हुए तुलसीदास ने राजा की आवाज सुन- कर तुरन्त उत्तर दिया और उठकर कुटी का द्वार खोला।
“आज क्या बात है भइया कि दिन में सो गए? तबीयत तो ठीक है?”
“हाँ, तन ठीक पर मन बहुत अस्वस्थ है। आज तुम कहाँ चले गए थे, दिन में एक बार भी नही दिखलाई दिए?” 
“उस पार चला गया था। पाठक महाराज का बुलावा आया तो मैं घाट पर ही खड़ा था। सुनते ही नाव से चला गया। इसी से भेंट न हो पाई। अबके सोमवार से तुम्हारी कथा वहाँ होगी भइया। बड़े महाराज ने बड़ा प्रबन्ध किया है।”
“अब कहीं नहीं जाऊँगा, राजा।”
“क्यों ?”
“नारी के आकर्षण से दूर रहना चाहता हूँ। पाठक जी मुझे गृहस्थी के बन्धन में बाँधना चाहते हैं। मैं नहीं बधूँगा, नहीं बधूँगा।”
राजा भगत शांतभाव से उनका चेहरा देखते रहे। जब वह चुप हो गए और कुछ देर तक वैसे ही टहलते रहे तो राजा ने कहा-“तन की अपनी कुछ चाहें होती है भइया। भूखा अगर परोसी हुई थाली छोड़कर जायगा तो भूख के मारे कहीं न कहीं मुँह मारेगा ही।”
“इसी बात की तो परीक्षा लेना चाहता हूँ।राम कृपा से मैं उस आकर्षण से मुक्त रहूँगा जिससे सारा संसार बधँता है।” तुलसी के स्वर में अहंकार बोल रहा था। यह उत्तर वह केवल सामने खड़े राजा भगत ही को नही वरन‌ अपनी मन बसी दुर्बलता को भी दे रहे थे।राजा भगत कुछ देर चुप रहे, फिर कहा- “तुम्हारे ही दम पर तब मैं यह घर बसाने के काम में कूदा। बड़े महाराज ने लोगों को समझा  बुझाकर यहाँ पूजी लगवाई। उनके बुलावे पर तुम कथा बाँचने भी न जाओगे तो भला बताओ, हम कही मुँह दिखाने जोग रह जायंगे?”
तुलसी पण्डित विचारमग्न हो गए, कहा- “हम कथा सुनाने जाएँगे। वह हमारी जीविका है और फिर वे हमारे पिता समान हैं किन्तु मैं तुम्हें चेताए देता हूँ राजा, विवाह के बन्धन में नही बधूँगा, चाहे वे बुरा मानें या भला।”
मन्द-मन्द मुस्कराते हुए राजा ने कहा-“अच्छा यह बात हमने मान ली।सुन्दर देह, मनोहर रूप और सधुक्कड़ी राह में राम जी की दया से रसीली भगतिनों की कमी भी नही है।ऐसे ही रोज वो तुम्हें सताएगीं और तुम यों ही तपा करोगे। राम जी के लिए तपने का तुम्हारा समय यह ससुरियाँ खाया करेंगी। हमारा क्‍या है।”
तुलसीदास की आँखों की तपन मिटी, उनमे स्निग्धता आई, मुस्कराकर पूछा-“क्या तुम्हें मेरे आज तक के संकटों का पता है?”
“अरे हम ही नहीं, सब जानते हैं।तुम्हारा गुन गाते हैं और तुम्हारी सिधाई पर हँसते भी हैं।”
तुलसी को लगा कि उनका भीत्तर-बाहर सब कुछ शीशे की तरह साफ है, वह अपने समाज में सराहे जातें हैं। पिछली रात और सारा दिन सतत्‌ संघर्ष- रत रहने वाले मन को ठंडक पहुँचीं। जनता साक्षी है, मैं सच्चा हूँ-इस विचार के उदय होने से मन जड़ीभूत अपराध-भावना के तनाव से मुक्त हुआ, पर अपनी इस स्थिति पर जग-हँसाई होने की बात उन्हें न सुहाई।बोले- “इसमें हँसने की क्या बात है?” 
“तुम्हारी सिघाई। बुरा न मानना भैया, हम ऐसी वैसियों को अपने से कोस भर दूर पटककर फेंक चुके हैं, और तुम ठहरे देवता मनईं, जैसे तुम इन्हें समझाते हो, उससे तो यह और उमंग में चढ़ती होंगीं।”
तुलसी चुप। राजा जो कुछ कह रहे थे, सब सच था। तुलसी के आगे एक- एक बात स्पष्ट थी।तुलसी ने जब इन स्त्रियों को अनदेखा किया तो उन्होंने जान बूझ कर अपने को दिखलाने का प्रयत्न किया। ये कतराने लगे तो वे और घेरने लगीं। चम्मो के तरीके फूहड़ थे, उसने दो तीन बार तुलसी से मीठी कड़वी झिड़कियाँ पाईं। राजकुँवरी शालीन है, संयत ढंग से घेराव करती है। उसकी शालीनता ने कहीं पर तुलसी के मन को प्रभावित भी किया है। तुलसी के इस मौन को लखकर राजा ने हँसते हुए कहा- “खैर, अब चिन्ता न करो भैया। कथा बाँचने के लिए तुम जब सात आठ रोज उधर रहोगे न, तब हम तुम्हारे इन तपस्या कंटकों को तुम्हारे रस्ते से हटा देंगें।”
सुनकर तुलसी भी हँसे, कहा-“हां, इधर की खाइयाँ पाट दोगे क्योंकि उधर तुमने हमारे लिए कुआँ खोद रखा है।” तुलसीदास अपने भीतरवाला वैचारिक बवण्डर रोक नही पा रहे थे। राम और रमणी दोनो ही मन पर ऐसे छाए हुए थे कि वे अपनी वास्तविक इच्छा को समझने में असमर्थ थे। उनकी बात के उत्तर मे राजा ने मुस्कराकर कहा-“कुआ नही समुद्र कहो समुद्र। रतन और कहाँ मिलेंगे?”

रविवार के दिन तुलसीदास को अपने साथ लिवा जाने के लिए पाठक जी स्वयं आ गए। तुलसीदास भीतर से चिड़चिड़ा गए, पर बाहरी तौर से अपने को संयत रखकर उन्होंने केवल इतना ही कहा-“कल दोपहर में मैं स्वयं ही आपके यहाँ पहुँच जाता। आपने बेकार ही कष्ट किया।”
“एक तो कल डेढ़ पहर तक मुहूर्त अच्छे नही हैं। दूसरे, आज हमारे यहाँ दो ज्योतिषाचार्य आने वाले हैं।
क्रमशः

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