महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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हमने सोचा कि आप कदाचित् उस समाज में अपने आपको सुखी अनुभव करेगें। यहाँ आसपास के पण्डित समाज से आपका जितना परिचय होता चले उतना ही अच्छा है। आपके पिता का नाम लोग अभी भूले नही हैं।”
तुलसी 'ना’ नही कह सकने थे। यद्यपि उनके मन का ऊहापोह कुछ अधिक बढ़ गया था। वे अपनी ज्योतिष विद्या से भी यह जानते थे कि उनका विवाह होगा किन्तु वे यह चाहते नहीं थे। स्त्री की भूख एक रहस्य बनकर उन्हे लुभा अवश्य रही थी किन्तु राम-भक्त कहलाना और मेघा भगत के समान जनसमाज में श्रद्धा का पात्र बनना ही उन्हें अभीष्ट था। वे अपने भक्ति के उत्साह और काम की भूख के परस्पर-विरोधी वातचक्र में नाच रहे थे और अपने सहज घरातल से उखड़े हुए थे। मानसिक अनिश्चय के कारण तुलसीदास पाठक जी के साथ जाना नहीं चाहते थे किन्तु मना करने का नैतिक साहस भी उनके भीतर न था।
दीनबन्धु पाठक की अवाई का समाचार सुनकर राजा भगत भी आ पहुँचे। बातों के बीच तुलसी उन्हें कनखी से देखते कि मानों सारा षड़यन्त्र उन्हीं का रचा हुआ हो और राजा भगत की यह स्थिति थी कि जब-जब उनकी दृष्टि अपने भैया के मुख पर जाती तब तब वे मुस्कराए बिना नही रह पाते थे। राजा दोनों को घाट तक पहुँचाने आए। नाव पर बैठने से पहले तुलसीदास ने राजा के कान में कहा- “तुमने आखिर मुझे बलिदान का बकरा बना ही दिया न।पर देखना, मैं भी तुम्हारे चक्रव्यूह को भेदकर कैसे बाहर निकलता हूँ।”
राजा भगत मुस्कराए, फिर कहा-“तुम्हारी तुम जानो भैया, बाकी हमने तुम्हारी यह कुटिया वाली जमीन कल बकरीदी भैया से खरीद ली है।”
तुलसीदास का चेहरा आनन्द से खिल उठा, बोले -“यह तुमने बहुत ही अच्छा किया, राजा। मैं परम प्रसन्न हुआ।”
नाव सवारियों से भर चुकी थी और जाने के लिए तैयार खड़ी थी। पाठक जी तुलसीदास की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब कान की बात समाप्त होकर दोनों जोर- जोर से बतियाने लगे तब पाठक जी के कानों में भी उनकी बाते पड़ने लगी थी। सुनकर बोले-“यह जमीन बकरीदी की रही राजा? ”
“हाँ, महाराज। अब उस हिस्से में हमने कई ब्राह्मण पण्डितों को घर बसाने के लिए राजी कर लिया है। ज़मीनें बिक रहीं थीं तो हमने इनके लिए भी ले ली है। आप अच्छा सा महुर्त निकाल देव तो हम इनके घर की नींव भी लगे हाथों डलवा ही दें।”
पाठक जी तुलसी के कन्धे पर स्नेह से हाथ रखकर राजा से बोले-“कल मध्याह्न में सूर्य नारायण जब ठीक तुम्हारे सिर पर आ जायें तब तुम्हीं अपने हाथों इनके घर की नींव पूजा करना। इन्होंने इस गाँव को जिस पुरुष का नाम दिया है, वही इनके घर की नींव रखेगा। मैने ठीक कहा न भैया?”
भैया इतनी देर से पाठक जी के हाथ का स्नेह स्पर्श अपने कंधे पर अनुभव करते-करते उसके सम्मोहन में बँध चुके थे।कुछ अपनी मन भावती भूमि के स्वामी हो जाने के कारण उपजे हुए उल्लास से भी चुप थे। उन्हें पाठक जी की बात का सहसा कोई उत्तर न सूझा, विनीत होकर कहा-“मैं क्या कहूँ, आप जो उचित समझे करें।”
पाठक जी के घर पहुचकर तुलसीदास मानों राजा हो गए। इतना अपनत्व, इतनी आवभगत और सम्मान तुलसी दास को कहीं प्राप्त नहीं हुआ था। पाठक जी गाँवके धनी-धोरियो मे थे । आासपास के गाँवों मे ही नही बल्कि बाँदा से चित्रकूट तक इस पार-उस पार उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। इसलिए जिसकी अगवानी में स्वयं वे उत्साह के मारे थोड़े-थोड़े हुए जा रहे हो उसके लिए पलक पावड़े बिछाने वालों की भला क्या कमी हो सकती थी। तुलसीदास बहुत मगन थे। पाठक जी विधुर थे। उनकी इकलौती संतान चौदह वर्ष की हो चुकी थी। पण्डित जी ने अपनी पुत्री के प्रबल मोहवश अब तक उसका विवाह टालने का प्रयत्न किया किन्तु अब वे ऐसा कर नहीं सकते थे। उन्होंने रत्नावली को आरम्भ से उसी चाव से पढ़ाया था जिस चाव से कोई पुत्र को पढ़ाता है। वे कई वर्षो से किसी ऐसे सुपात्र की खोज में थे, जिसे वे घरजमाई बनाकर अपने पास रख सकें किन्तु उन्हें अपती लड़की के लायक कोई लड़का जंचता नहीं था। जब से विक्रमपुर की पैंठ में उन्होंने तुलसीदास की कथा सुनी थी और उनके संबंध में राजा से जानकारी पाई थी तभी से वे उन्हें अपना जामाता बनाने के लिए लालायित हो चुके थे। इन बीते महीनों में और भी निकट संपर्क में आने के कारण उन्होने तुलसीदास को अपना दामाद बनाने का एक प्रकार से हठ ही ठान लिया था। स्वाभिमानी तुलसी को वे अपने घर मे तो न रख सकेंगे पर यह दूरी भी केवल नदी के दो तटों की ही है। इतनी पास में ऐसा योग्य जमाई मिले तो समझो घर ही में है। उन्होंने तुलसीदास और रत्नावली की जन्म- पत्रिकायें भी मिला रखीं थीं। संयोगवश रत्नावली के एक सुझाव के अनुसार वे उनके मूल नक्षत्र के सम्बंध में भी गहरा विचार कर चुके थे। रत्नावली उक्त कुण्डली के अभागेपन को नकार चुकी थी। वह नहीं जानती थी कि यह उसके भावी पति की जन्मकुण्डली है। उसके मतानुसार
अभुक्त मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में पैदा होने वाला व्यक्ति अलौकिक रूप से भाग्यवान होता है। बड़े बड़े राजे महाराजे और पण्डितगण इनके चरणों में शीश झुकाएगें। इसके बाद नियति ने ऐसे वानक वना दिए कि पाठक जी जब भी अपनी बेटी को देखते तभी उसके दक्षिण भाग की ओर खड़ी तुलसीदास की मूर्ति उनकी कल्पना में उभर आती थी। पाठक जी तुलसी को अपना बेटा बनाने के लिए दीवाने हो गए थे।
वाल्मीकीय रामायण कथा का श्रीगणेश हुआ। तुलसीदास जी का कथा कहने का ढंग ही निराला था। वे पण्डित समाज को अपनी विद्या और जन साधारण को अपने भक्ति रस के चमत्कार से एक सा बाँधते थे।बीच बीच में अपनी रची हुई भाषा की कविताएँ भी पढ़ने लगते तो सभा में समां-सा बँध जाता था। भाषा में चमत्कार, कण्ठ मधुर और सुरीला तथा इन सबके ऊपर सोने मे सुहागे जैसा उनका सुन्दर रूप और बलिष्ठ काया भी देखने वालों पर अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती थी।
क्रमशः
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