महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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यों भी तुलसीदास आज कुछ अधिक उमंग मे थे। अपनी भावुकता में वे यह मानते थे कि पाठक जी को सुनाकर वे मानों अपने पिता को ही रामायण सुना रहे हों। वे अपनी कथावाचन कला का सारा निखार मानों आज ही दर्शा देना चाहते थे। ऐसे तन्मय होकर उन्होंने कथा बाँची कि निर्धारित पाठ पूरा होने पर अपनी वाणी के मौन से वे स्वयं ही सन्नाटे में भर गए।
पाठक जी के प्रचार और प्रभाववश दूर दूर के लोग कथा सुनने के लिए आए थे। गाँव में कई तम्बू-खेमे पड़े हुए थे। बहुते से घरों में अतिथि ठहरे थे। स्वयं पाठक जी के घर में भी तीन संबंधियों के परिवार टिके हुए थे। तुलसीदास ने पहले ही दिन सबके हृदय जीत लिए।
इस घर में आने पर उनके लिए एक अचम्भा अचानक आया। भोजन इत्यादि करके पाठक जी अपने छोटे भाई के पुत्र गंगेश्वर और साले के साथ तुलसीदास के सामने ही उनकी प्रशंसा करते हुए मगन मन बैठे थे। तभी अचानक ही उन्होंने कहा- “भैया, है तो मेरी बेटी, पर मैंने उसे बेटे की तरह से ही पढ़ाया-लिखाया है। जो पण्डित मुझे योग्य जँचा उसी से मैंने उसे शिक्षा दिलवाई है। देखो मैं बुलाता हूँ। उसने ही तुम्हारे अभुक्तमूल नक्षत्र की व्याख्या मुझसे की थी- “अरी रत्नू, ओ रत्नू, यहाँ आ बिटिया, वैसे उसे यह मालूम नहीं है कि वह कुण्डली आपकी है।”
तुलसीदास अचानक रत्ना के सामने आने की बात सुनकर घक से रह गए। उनका कलेजा धड़ धड़ कर उठा- राम प्रभु मेरी परीक्षा न लो। राम करे, वह न आए, न आए, वह न आए।तुलसी तो अपने चेहरे पर चढ़ती धुकपुकाहट को सँभालकर उसपर गम्भीरता का मुखौटा चढ़ाने में व्यस्त हो गए, पर उनका मन भीतर ही भीतर सकपका रहा था।
भीतर के उढ़के हुए द्वार खुले। शुभ्र वर्ण की एक तन्वंगी सामने थी। तेज- युक्त ललाट, पतले होंठ, नाक और ठोड़ी नुकीली तथा आँखों में दर्प-भरी चमक थी। उसने एक बार तुलसीदास की ओर देखा। चार आँखें अनायास ही मिलीं।तुलसी के हृदय में मचती हुई हलचल दृष्टि मिलते ही थम गई।एकाएक उनके भीतर-बाहर मानों सन्नाटा छा गया। उन्हें लगा कि वे अब अपनी सम्पत्ति नहीं रहे। आँखें नीची हो गईं।
रत्नावली ने तुरंत ही पिता की ओर देख कर पूछा- “क्या है बप्पा?”
स्वर था कि मानों गला हुआ सोना बह रहा हो। उसमे मिठास तो थी ही किन्तु अधिकार का तेज भी था। तुलसीदास उपस्थित मण्डली के सामने अपने आपको कसे हुए बैठे थे। बिछे हुए गलीचे का एक रेशा तोड़कर अपनी चुटकी से मीजते हुए वे ऐसे गम्भीर और दत्तचित्त भाव से बैठे थे जैसे किसी महत्त्व के काम में व्यस्त हों। पाठक जी ने स्निग्ध दृष्टि से अपनी बेटी को देख कर कहा- “आओ बिटिया, आज तुमने हमारे तुलसीदास जी की कथा सुनी थी?”
तुलसीदास के कान खड़े हो गए। रत्ना ने छोटा सा उत्तर दिया-“हूँ”
तुलसीदास को ऐसा लगा कि रत्नावली ने बड़ी अनिच्छा और दबाव से ही यह उत्तर दिया है।
पाठक जी ने पूछा-“तुम्हे कैसी लगी इनकी कथा?”
“कथा तो राम जी की थी”- रत्ना बोली
तुलसी को लगा कि मानों इस वाक्य के पीछे खिलखिलाहट भरी है। उसी समय रत्ना के मामा हँस पड़े और पाठक जी से कहा -"देखो, हमारी बिटिया कैसी बात पकड़ती है।”
पाठक जी मुस्कराकर बोले- “अरे ये बड़ी नटखट है। मैं इनके कथा कहने के ढंग और व्याख्या-पद्धति के संबंध में तेरा मत पूछ रहा था।”
तुलसीदास के कलेजे में फिर हलचल मची, किन्तु रत्ना चुप रही । मामा बोले- “क्या पूछ रहे हैं जीजा, बताती क्यों नही?”
रत्नावली के चचेरे बड़े भाई गंगेशवर ने हसँकर कहा- “अरे यह बड़ी बुद्धू है मामा, इसे चंगुद खेलने से ही अवकाश नहीं मिलता, ये क्या बताएगी? ”
रत्ना ने एक बार गंगेश्वर की ओर देखकर आखे तरेरी। वह हँसने लगा। मामा बोले-“हमारी बिटिया बुद्धू, नहीं है। छोटी होने पर भी यह तो अच्छे- अच्छे पण्डितों के कान काटती है।”
पाठक जी बोलें-“बड़े भारी ज्योतिषी हैं हमारे तुलसीदास जी। इससे ताजक ज्योतिष के लटके भी सीख ले।”
तुलसीदास ने एक बार नजर उठाकर रत्नावली को यों देखा कि मानों वे
उसका उत्तर सुनने के लिए उत्सुक हों। रत्नावली ने अपने पिता से कहा- मुझे क्या आज ही सीखना है वप्पा?””
'तुलसीदास अचानक ही हड़बड़ा कर बोल उठे- “नहीं-नही, फिर किसी दिन, अभी तो यहाँ पर एक सप्ताह ठहरूँगा।”
“अच्छा रत्नू, इन्हे अभुक्तमूल के संबम्ध में बतला। तुलसीदास जी कहते है कि तेरी व्याख्या गलत है। वह जातक निश्चय ही मूल के पहले-दूसरे चरण की सन्धि में हुआ होगा”।
“केवल माता-पिता की मृत्यु के प्रमाण से ही यह कह देना ठीक नही है वप्पा। प्रश्न यह है कि जातक को नव वर्ष की आयु से समुचित प्रतिष्ठा, विद्या और उन्नति के सोपान मिलते जा रहे है या नही?”
पाठक जी ने तुलसीदास की ओर देखकर पूछा- “कहिए, आपका क्या विचार है?”
“पहले इनका विचार सुन लूँ।”
रत्नावली ने भी उचटती नजरों से अपने भावी पति को देखा, फिर पिता से पूछा-“बप्पा, वह टेवा आप ही का था न?”
“यह तूने कैसे कहा?”
पिता के इस प्रश्न से रत्ना झेंप गई। कुछ उत्तर न दिया। मामा जी बोले-“अच्छा मेरा एक प्रश्न विचार। हमारे इन शास्त्री जी का विवाह हो गया है या नहीं।”
तुलसीदास का चेहरा और कस गया। उन्हें पाठक जी के साले का यह प्रश्न करना अच्छा नही लगा। वे भीतर ही भीतर अनख उठे। रत्नावली भी यह प्रश्न सुनकर सहसा लज्जा से लाल हो उठी। उसने कहा-“अच्छा घर में काम है बप्पा मैं जाऊँ?”
पिता के कुछ कहने से पहले ही वह तेजी से उठकर भीतर चली गई।सात दिन तुलसीदास की ख्याति के सात सोपान बन गए। तुलसी के प्रति पाठक जी का ममत्व प्रतिक्षण गाढ़ा होता ग़या। तीसरे चौथे दिन की बात है दिन में भोजन कर के पाठक जी तुलसीदास के साथ भीतर के कमरे मे बैठे थे। टाँडों पर ग्रथों के बस्ते बँधे हुए रखे थे। ग्रथों का यह विशाल भाण्डार देखकर तुलसी ने कहा-“काशी में गुरू जी का ग्रंथ भंडार इससे कदाचित् ही कुछ अधिक हो। आपके यहाँ बहुत अच्छा संग्रह है।”
क्रमशः
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