Monday, 3 July 2023

tc 117

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
117

दो पल मौन रहकर बाबा फिर कहने लगे “मैंने कभी किसी प्रकार का नशा नहीं किया है पर दूसरों से नशे का विवरण सुनकर मैं यह अनुभव कर सकता हूँ कि मेरा अंतर्मन उस समय राम-मतवाला हो गया था। ऊपर की काया तुलसीदास थी पर उसके भीतर राम थे। मैंने अयोध्या में प्रवेश क्या किया मानों राम ने मेरे उर अन्तर में प्रवेश किया।”
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खण्डहरों टीलों भरी अयोध्या। बीच बीच में खण्डित मूर्तियाँ भी देखने को मिल जातीं थीं। तुलसीदास को दिखलाई दिया, कि दक्षिभाग में हनुमान और लक्ष्मण के साथ श्रीराम-जानकी अयोध्या के आकाश में खड़े हुए हैं।तुलसी मुग्ध होकर आकाश की ओर देख रहे है और बढ़ते चले जाते हैं। थोड़ी दूर पर बन्दरों की आपसी लड़ाई का शोर उन्हें होश में ले आता है।अपने आप ही कह उठते हैं- “सब कुछ कैसा अद्भुत्‌ उल्लासप्रद है, आनन्द है भय भी है। मेरे बजरंगबली सहाय होगें। वही मेरा भाग्य निर्देश करेंगे।”
चलते हुए तुलसीदास उसी मठ पर आए जहाँ पंच संस्कार कराने के लिए नरहरि बाबा उन्हें लेकर आए थे।मठ में अनेक साधु थे। कोई भांग घोट रहा था, कोई खीर मालपूये की चर्चा छेड़ रहा था।एक साधु दूसरे पर अपनी लंगोटी चुराने का आरोप लगाकर लड़ रहा था। तुलसी को वहाँ किसी के भी हृदय में राम न दिखलाई दिए। भांग घोटते हुए साधु से कहा- “जे सियाराम महाराज।”
“जै सियाराम, कहाँ से आवना भया?”
“इस समय तो सीतावट के दर्शन करके आया हूँ। लगभग छत्तीस-सैंतीस वर्षों के बाद मैं यहाँ आया हूँ। पहले पूज्यपाद नरहरि बाबा के साथ आया था।”
“बड़ी पुरानी बात है।हमने नरहरि बाबा का नाम भर ही सुना है।” कहकर वह फिर भांग घोटने में दत्त-चित्त हो गया।

तुलसीदास ने सविनय कहा- “इस मठ में क्या मुझे रहने का स्थान मिल सकेगा?” 
सिल पर बट्टा रगड़ते हुए साधु बोला-“मिल क्यों नही सकता।साधुओं की सेवा करो तो मैं महंत जी से कह दूँगा।”
“आपकी बड़ी कृपा है।”
“किरपा-उरपा कुछ नहीं, तुम्हें हमारा चेला बनना पड़ेगा। भोरहरे की कागा बीसी और दोपहर की सत्यानाशी तथा सायंकाल की भोग-बिलासी भांग तुम्हें ही पीसनी होगी। राजी हो तो महंत जी से जगह दिला देंगे।”
तुलसीदास बोले- “मैं यथासाध्य आपकी यह सेवा कर दूगाँ।”
“और देखो, जितनी देर हमारी भाँग घोटोगे उतनी देर राम-राम जरूर जपोगे।”
तुलसीदास ने गदगद होकर कुछ कहना चाहा, पर भंग घोटने साधु जी अपने स्वर को और ऊंचा चढ़ाकर बोलने,लगे- “हम एकी घूँट में परख जाते है कि ये राम-राम जप के पीसी गई है या नहीं।नहीं नहीं, पहले हमारी बात सुनो, जित्ती बादाम, कालीमिर्च इत्यादि-इत्यादि हम तुम्हें देंगे उत्ती सब हमारी भाँग मे बोले और जो एक भी कम हुई तो बच्चू कमर पे दुइ लात मारकर हम तुम्हें यहाँ से निकाल बाहर करेंगे, याद रखना।”
तुलसीदास ने हाथ जोड़कर कहा- “मैं बड़े प्रेम से राम-राम जपूँगा और जो सामग्री आप मुझे देंगे उसमे से एक भी पत्ती भांग या एक भी दाना काली मिर्च आपको कम नही मिलेगी।”
“और सुनो,” स्वर घीमा करके और फिर संकेत देकर तुलसीदास को अपने पास बुलाकर साधु जी बोले- “महंत्त जी जो है न, वो जब हमसे अपनी भाँग घुटवाए तो लपक के उनके सामने कहना कि गुरू जी, हम महंत जी की भांग घोटेंगे।”
“अच्छा महाराज।”
“महाराज-वहराज कुछ नहीं। हमें गुरू जी कहके पुकारा करो और सुनों यहाँ जो चेलियाँ आावै तो उनके सामने तुम्हें हमारे गोड़ भी दबाने होगें।”
तुलसीदास संकोच में पड़ गए, कहा-“आपने मुझे अपनी भाँग घोटते समय राम जपने का मंत्र दिया इसलिए आपको गुरू जी कहूँगा। आपके चरण भी राम-राम जपकर ही चापूँगा परन्तु स्त्रियों की उपस्थिति में मैं आपके पास नहीं आऊँगा।” 
मठ के भंगधोटने साधु ने आंखे तरेरी, फिर पूछा- “क्या तुम सचमुच के ब्रह्मचारी हो।राम जी की सौगंध खाके कहो कि ब्रह्मचारी हूँ।”  
“रामजी साक्षी हैं, मैं ब्रह्मचर्य ब्रतधारी हूँ।” 
“तो भागों यहाँ से। एकदम दूर चले जावो। हियाँ जो ससुर असली ब्रह्मचारी रहेगा वह आज नही तो कल, कल नही तो परसों, सारी की सारी चेलियाँ अपनी ओर खींचकर ले जायगा।ये चेलियाँ तो असली ब्रह्मचारी को ही रिझाने के फेर में रहतीं हैं। तुम तो देखने में भी सुन्दर हो। भागो भागो। असली ब्रह्मचारी का कलयुग के मठों में काम नहीं है।” कह कर साधु जी बड़े जोर से अपनी भाँग घोटने लगे।
तुलसीदास साधु की बातें सुनकर विचित्र मन: स्थिति में पड़ गए। एक तरफ तो यह साधु राम-राम जपने का मन्त्र देता है और दूसरी ओर असली ब्रह्मचारी का निन्‍दक भी है। सब मिला कर इसकी बातें बहकी बहकी सी हैं। वे उठ खड़े हुए, हाथ जोड़कर कहा-“अच्छा तो चलता हूँ। राम-राम।” तुलसी दास चलने लगे तो साधु ने आँखें तरेरकर देखा।
तुलसीदास बाहर आए। एक अन्य प्रौढ़ साधु फाटक पर मिले। इन्हे देखकर कहा- “जै सियाराम।”
“जै सियाराम, महाराज।”
“अयोध्या में नये आए हैं कदाचित्‌?”
“हाँ महाराज, गोलोकवासी नरहरि बाबा के साथ बचपन में एक बार यहाँ आया था। यहीं मैंने पंच संस्कार पाए थे। इसीलिए यहाँ शरण लेने आया था।”
“भंगड़ गुरू से आप की क्या बातें हुईं?” 
तुलसीदास खिसियानी हँसी हँसकर  बोले- “क्या कहूँ महाराज, विचित्र महात्मा हैं।”
“हाँ, बातें अवश्य विचित्र करतें हैं पर इस मठरूपी जल में कमलवत‌ रहने वाले एक वही व्यक्ति हैं, पर भला ही होगा जो आप यहाँ न ठहरे। बाहर आइए।”

प्रौढ़ साधु ने अपनी बातों से तुलसीदास के मन में हल्की सी उत्कंठा जगा दी।गली में मठ के फाटक से दस कदम आगे बढ़ कर साधु बोले- “यह भंगड़ अखण्ड ब्रह्मचारी है। सिद्ध पुरुष है। इस मठ का वातावरण अब पहले जैसा नहीं रहा। नरहरि बाबा का आगमन मुझे याद है।आपके संस्कारादि होने का प्रसँग भी अब मुझे याद आ रहा है। मैं तब यहीं रहता था। उस समय मेरी आयु पद्रह-सोलह वर्ष की रही होगी। बड़े महन्त जी के गोलोकवासी होने के बाद अब यहाँ कोई सच्चा साधक नही रह पाता। यह राम जी की अयोध्या अब विचित्र हो गई है।”
तुलसीदास उदास हो गए, बोले- “यहाँ चिन्तन-मनन के क्षण बिताने के लिए बड़े भाव से आया था किन्तु पापी पेट को सहारा तो चाहिए ही।”
क्रमशः

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