Monday, 3 July 2023

115

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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रुँधे हुए कंठ से कहा- “मन सच्चा प्रबल शत्रु होता है गुरू जी, मेरे अपराधों का अन्त नहीं।”
“तुम अपने मन को खाली क्यों छोड़ते हो? उसे अपने आराध्य की विभिन्‍न लीलाओं के चिंतन से भरा रखो न। मैंने मिथिला में अपने विकारों को जानकी मंगल मनाकर धोया था। यह जीवरूपी सीता सुहागिन अंर्तयामी राम पर रीझ उठी है। मेरा विकार भरा मन इस ध्यान से भयमुक्त होकर विकसित हुआ। मन मैली चांदी सा काला था, ध्यान से मंजते मंजते उजला हो गया। भांग से भी भोंडा यह तुलसी राम कृपा से मुनिराज तुलसी कहलाने लगा।”
“आप समर्थ हैं गुरू जी, मैं बहुत दुर्बल हूँ। आजीवन मन से लड़ते हुए भी अब तक उसे जीत नहीं पाया।”
“हार जीत की चिन्ता छोड़ो वत्स, चावल का दाना मुख में दबाकर बार बार दीवार पर चढ़ने और गिरने वाली उस चींटी के समान अपराजेय उत्साही बनों, जो सात बार गिरकर भी अपने निदिष्ट स्थान पर पहुँच कर ही मानीं। पछतावे से बुरा और कोई शत्रु नही होता। पछतावे में बिताए जाने वाले अपने अनमोल क्षणों को राम धुन से भर दो।”
“गुरू जी आप मेरे लिए राम से अधिक बड़ा सहारा बन कर आए हैं।”
“तो मेरा ही ध्यान किया करो, वैसे ही सोचो जैसे मैं सोचता था। मिथिला में अहुनिशि मैंने केवल राम जी की ब्याह-बरात का ही ध्यान किया।सारे पकवानों का स्वाद मन में आ गया। सारा राम रंग आनन्द और आमोद मैंने राम जी की बरात में एक अत्यन्त दीन बराती के समान मनाया। ‘जानकी मंगल' काव्य की रचना उसी उत्साह में हुईं और तुम जानों कि इतना बड़ा प्रबन्ध काव्य मैंने उससे पहले नहीं लिखा था।” 
सहसा कहते कहते वे राजा की ओर मुड़ गए भर बोले- “राजा ”
“हाँ भैया।”
“हमारी ओर से वेनीमाधव को समधी बनाय के बेटा ब्याहने भेज दिया जाय?”
“तुम्हीं चलना भैया, बरात की शोभा कुछ और ही हो जायगी।”
“नहीं हम जायगें तो भीड़ भाड़ बहुत बढ़ जायगी। वेनीमाघव हमारी समधिन के जोड़ीदार समधी जचेंगे। ज्योनार के साथ गालियाँ खाएँगे तो इनकी बुद्धि ठिकाने आ जायगी।” बेनीमाधव नतशिर, भारी मन लेकर चले जा रहे थे। लज्जा उनके रोम रोम में शूल सी चुभ रही थी।मन कह रहा था कि ऐसे त्रिकालज्ञ गुरु की उपस्थिति में भी मेरे मन मे पाप विकार आया? गुरू जी सब जान जाते हैं। मै बड़ा ही नीच हूं, पतित हूँ।
मैदान से गुजर रहे थे। दूर तक दूब घास फैली हुई थी। देखकर बाबा बोले- “देखो वेनीमाधव, इस ऊबड़ खाबड़ धरती को पकड़कर भी दूब जमी है और फैलती ही चली जाती है। राम भक्ति रूपी धरती तो बड़ी समतल है। उस पर अपनी मति रूपी दूब जमाओ। बहुत दूर तक पहुच जाओगें।”

विवाह के उपरांत बाबा ने जब रामू को ससुराल वाले घर में रहने की आज्ञा दी तो वह रोने लगा, बोला- “प्रभु जी मेरे लिए इन चरणों से दूर रहना बड़ा कठिन है। इनकी सेवा के अतिरिक्त मैंने आज तक कभी कुछ सोचा ही नहीं है। आप मुझे यह दण्ड न दें।“
“यह दण्ड नहीं है पुत्र। मैं चाहता हूं कि मेरे जीवनकाल में तू व्यवस्थित होकर बैठ जा। अपनी पाठशाला चला और मानस की कथा सुनाया कर। उससे तेरी जीविका सुचारु रूप से चलेगी।बेनी माघव मेरे पास है। राजा के लिए भी हमारी इच्छा तो यही है कि वे अब अपने गाँव लौट जायें।” 
पास बैठे हुए राजा बोले- “अब अन्त काल में तुम काहे को हमें अपने से दूर करते हो भैया?” 
बाबा बोले- “बाल बच्चों में जाओ राजा।”
“हम, नहीं भैया, अब हमें कोई मोह नहीं रहा। तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेंगे। इस संबंध में अब कुछ न कहो।”

रामू अपने नये घर मे रहने के लिए चला गया। राजा भगत और संत जी बाबा के पास ही रहे। बेनीमाधव का मन अभी पूरी तरह से अपने वश में न हो पाया था। अधिक श्रम करने का अभ्यास भी उन्हें नही था। बाबा की नियमित सेवा करने के लिए उन्हें अपनी इस ढलती आयु में अधिक कायिक श्रम और मानसिक सतर्कता बरतनी पड़ी। इससे उनकी थकान और बढ़ गई थी। रामू की सास अब प्राय: बाबा के दर्शनार्थ आती थी। वेनीमाधव के लिए वे क्षण आग की लपटों से गुजरने वाले हुआ करते थे। उनका मन लड़खड़ा उठता था। वे जानते थे कि बाबा को उनके मन की हलचलों की थाह मालूम है। एक दिन समधिन के सामने ही बाबा ने कहा- “मन को वश में करना कोई हमारी समधिन से सीखे।” बाबा के आगे भूमि पर मत्था टेककर समघिन गद्गद स्वर में बोली- “अरे महाराज, हमारे में इत्ता बल कहाँ? राम जी निभाते है।”  
“तेरे चेहरे पर आत्मसंयम की छाप छपी है। तू अब मेरा,एक कहा मान ले तो सत्य कहता हूँ तर जायगी।” 
“आज्ञा होय महाराज, आप जो कहेगें तो मेरे भले के लिए ही कहेगें।” 
“अपने बेटी दामाद को तू राम-जानकी मान और नित्य सबेरे यहाँ आकर हम तीन प्राणियों का भोजन बना जाय कर। जो सिद्धि औरों को,जप से प्राप्त होती है वह तुझे इस भाव से आप ही आप मिल जाएगी।” 
रामू की सास का प्रतिदिन आना बेनी माधव के जीवन में एक नये सधाव का कारण बना। जिस स्री के प्रति उनका मनोविकार जागा था वह एक तो ऊँचे दर्जे की चरित्रवान थी और दूसरे उन्हें बाबा की पैनी अन्तदृष्टि का भय भी सताता था। भय से राम-प्रीति जागी। स्री मोह दबने लगा। गुरू जी अपनी समधिन का इतना मान करते थे कि वेनीमाधव के मन में भी उनके प्रति आदर भाव बढ़ने लगा था। गुरू जी की समधिन के प्रति अपने मन में कलुष लाने से वे स्वयं ही डरने लगे और यह डर उन्हें संवारने लगा। एक दिन एकान्त में बेनी माधव गुरूजी के पास बैठे हुए थे। गुरू जी बोले -“विचारो की निर्मलता मनुष्य के चेहरे पर छा जाती हैं। जब हम जानकी मैया के दरबार में रहे तो हमें बराबर यह भय बना रहता था कि यहाँ यदि हम किसी पर कुदृष्टि डालेंगे तो जगज्जननी हमसे कुपित हो जायेगीं। इस भय ने ही हमारे मन को साध दिया। यों ही सचेत रहोगे तो तुम्हे मनचाही सिद्धि अवश्य प्राप्त होगी।”
क्रमशः

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