Monday, 3 July 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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बेनीमाधव जी बाबा की चौकी के पीछे खड़े थे। उनकी दृष्टि बाबा के सामने काला लहगाँ पहने हुई उस प्रौढ़ा स्त्री की ओर ही लगी थी। अपनी कच्ची पक्‍की दाढ़ी पर धीरे धीरे हाथ फेरते हुए उनका मन तरंगित हो रहा था, 'सुन्दर है, यदि मेरी पत्नी होती तो लगभग इसी आयु की होती।धत्‌ धत्‌, हट रे मन यहाँ से।' वेनीमाधव जी ने उधर से अपना मुँह हटा लिया।
 उसी समय कुछ स्त्रियाँ एक नवयुवती को लेकर आतीं हैं। बाबा उस लड़की को देखकर प्रसन्न होते है।लाज संकोच से भरी वह नवयुवती आकर बाबा के आगे मत्था टेकती है। उसकी पीठ थपथपाकर बाबा कहते है- “ठीक है, ठीक है।” बाबा रामू के लिए बहू पसंद कर रहे थे पर बेनीमाधव अपने मन के खिलवाड़ की प्रस्तावित संगिनी को फिर रसीली दृष्टि से निरख रहे थे। बाबा ने बहू को कंगन पहनाया, उसके सिर पर अक्षत डाले और प्रेम से अपना हाथ फेरा। फिर आस-पास खडी भीड़ की ओर देखकर बोले- “कित्ती बड़ी बरात लावें?”
एक बूढा हाथ जोड़कर बोला - “आपसे क्या छिपाव है महाराज, ये चमेलो तो अभी बतला ही चुकी कि इसके पास केवल कुश-कन्या है। बिचारी ने घर के बर्तन बेच बेच के खा डाले हैं।”
“बिचारी चमेलो' के लिए सहानुभूति के शब्द सुनकर वेनीमाधव ने एक वार फिर उस प्रौढ़ा को देखा, देखना तो सहानुभूति से चाहा पर भूखी दृष्टि रसीली हो गई। मन फिर लहराने लगा, दुखी है बेचारी। इसके चेहरे पर मदन की वह मार भी है जो भली और लोक भीरू विधवा स्त्री के चेहरे पर दिखलाई पड़ा करती है। स्वयं मेरे मुख पर भी तो मन की सूनी उदासी-“घधत्‌-घत्‌ रे मन, फिर बहका?”बेनीमाधव ने फिर अपना मुख फेर लिया। बाबा उस समय कह रहे थे- “घबराओ मत, समधिन, जैराम साब तुम्हारी तरफ का सब खर्चा उठावेंगे और हमारा खर्चा टोडर का बेटा आनन्दराम और पोता कन्हाई मिल कर उठायेगें।”पण्डित गंगाराम बोले-“खर्चे की चिन्ता तुम्हें नहीं करनी होगी, तुलसीदास। मैंने कन्या पक्ष की यह व्यवस्था अपने जिम्मे ले ली है।हमारा एक यजमान इस घर की मरम्मत कराने का भार ग्रहण करना स्वीकार कर चुका है। बात यह है कि यह तुम्हारी होनेवाली समधित चाहती हैं कि उनकी बेटी और दामाद उनके साथ ही रहें।तुम्हारे यहाँ तो नई गृहस्थी बसाने की जगह है नहीं, इसलिए हमें भी यह प्रस्ताव कुछ बुरा नहीं लगता।”
बाबा बोले- “चलो यह भी ठीक है। वैसे ब्रह्मनाल में रामू का पैतृक घर भी है।उसकी पुरानी गृहस्थी का कुछ सामान और गहनें इत्यादि हैं जो मैंने टोडर के यहाँ रखवा दिए हैं, किन्तु तुम्हारा प्रस्ताव रुचिकर है।” 
घर से लगे हुए एक खण्डहर की ओर दृष्टि डालकर बाबा ने पूछा- “गंगाराम, यह पास वाली जमीन क्या बिकाऊ है?” 
समधिन बोली- "हाँ महाराज, यह घर दीनदयाल दूबे का था। उनका पोता अब जौनपुर में रहता है।एक बार आया था तो हमसे कह गया था कि सौ रुपये में वह बेचने को राजी हैं। कोई गाहक हो तो वह तैयार हो जायगा।”
बाबा बोले- “हम तैयार हैं। हमें उस घर के सौ रुपये मिल रहे हैं। बाकी जो कमीवेशी होगी सो भी पूरी कर दी जाएगी। गंगाराम, तुम इस जमीन को भी इस घर में मिला लो।
प्रौढ़ा बोली- “हमें तो महाराज जैसे आपकी आज्ञा होयगी वैसा करेंगे। इस गरीबनी की कन्या आपने अपनी सरन में ले ली यही मेरा सबसे बड़ा भाग है। हम गंगा काका से कभी उरिन नहीं हो सकेगीं।”
रसीली दृष्टि से देखते हुए वेनीमाधव का मन कह रहा था-तू मेरे विफल मन का सहारा बन जा।तू मेरे कलेजे में फाँस सी चुभ गई है। तेरे बिना अब मुझसे रहा नहीं जायेगा। वेनीमाधव कामना भरा लहराता मन लेकर लौटे।रास्ते भर उनके मन में भय भौर कामना की लुकाछिपी चलती रही। भय लगता था कि बाबा उनके मन को भाषकर फटकारेंगे। कामना होती थी कि लोक-लाज के निभाव के साथ उनका यह काम ज्वर इस स्त्री की कृपा से उतर जाय। रास्ते चलते हुए उनकी खोई आँखें अपनी मनभावती कल्पना के चित्र देखती चली जा रही थीं। कल्पना में वेनीमाधव और वह स्त्री आमने सामने होते, एक दूसरे को रसमग्न होकर निहारते, वेनीमाधव उसके कंधे पर हाथ रखकर दूसरे हाथ से उसकी ठोड़ी ऊंची उठाते- घत तेरी की राम भगतिनिया।”
अपनी नाक पर बार बार बैठती हुई एक मक्खी को हटाते हुए गुरू जी ने जैसे ही घत्‌ कहा वैसे ही बेनीमाधव भय से चौंक कर उनकी ओर देखने लगे। बाबा की दृष्टि भी उनकी ओर मुड़ी, बोले-“मक्खी भी बड़ी हठीली होती है बेनीमाधव, जहाँ से उड़ाओगे वहीं आ आकर बैठती है।”

बेनीमाधव का सहमा हुआ कलेजा धड़का। मन ने कहा- “गुरू जी ने तेरे चोर को पकड़ लिया है।”
बाबा कह रहे थे- “रामू का विवाह करके मुझे ऐसा ही लगेगा राजा, कि जैसे मैं तारापत्ति को गृहस्थ बना रहा हूँ।”
राजा के मुँह से एक ठंडी साँस निकल गई, बोले- “अब उन पुरानी बातों का ध्यान हमें न दिलाओ भैया। कलेजा मुँह को आने लगता है।”
बाबा बोले- “क्यों? अरे मैं तो अपने रहे सहे मोह विकारों की इसी प्रकार से धोता हूँ। बहु देखने गया तो स्वाभाविक रूप से अपने बेटे की याद आई। मेरा वह बेटा ही तो अब रामू बनकर मेरे पास है। तारापति के ध्यान से उपजी उदासी क्षण के एक छोटे अंश में ही राम के ध्यान से मेरा आनन्द बन गई। (वेनीमाधव की ओर देखकर) विचारवान पुरुषों के लिए मन से सदा लड़ना भी अच्छी बात नहीं होती वेनीमाघव।मंगलू जैसे अविकसित बुद्धि के लोगों का मन ही उस उपाय से सुधर सकता है, हमारा तुम्हारा नहीं समझे।”
वेनीमाधव समभ गए, लज्जित भी हुए। मुँह से केवल एक धीमा सा शब्द फूटा-”हाँ गुरू जी”
तुलसीदास कह रहे थे- “मैंने तुम्हें अभी बतलाया था न कि मैं अपने विकारों को भी राम रंग में रंग लेता था। राम प्रसँग से जुड़ते ही विकार भी संस्कार बनने लगते हैं। किसी भी स्त्री को देखो और तुरंत ही यह ध्यान करो कि यह जगदम्बा की दासी है।”
वेनीमाधव का मन लज्जा और दुःख से अभिभूत हो रहा था।उनकी आँखें छलक आईं।
क्रमशः

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