Monday, 3 July 2023

113

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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समय आने पर वे बतलाएँगे। बस यही चिन्ता कभी कभी सता जाती है कि जाने कब प्रभु जी आदेश कर दें, अन्यथा अभी तक उन्हें छोड़कर और किसी का ध्यान मेरे मन से प्रायः नहीं रहा।”
संत जी ने रामू को अपनी बाँह में भर लिया और कहा-“तुम आयु में छोटे हो पर योग में मुझसे बड़े हो रामू। मुझे तुमसे ईर्ष्या हो रही है।”
रामू हँस पड़ा, बोला- “दीनों के प्रति सज्जनों की ईर्ष्या भी वरदान होती है सन्‍त जी। आप हर रूप में मेरा मंगल ही करेंगे।”
बाबा अपनी कोठरी के आगे राजा भगत के साथ बैठ बातें कर रहे थे।बेनीमाधव जी को देखकर बोले- “आओ वेनी माधव, आज हम एक कन्या को देखने और बात पक्की करने जा रहे हैं।” “किसका विवाह कराएँगे गुरू जी?” संत जी ने हँस कर पूछा। स्वयं उन्हें
ही अपनी हँसी खोखली लगी।
राजा भगत बोले-"अपना ब्याह रचावेंगे बाबा। अब सौ बरस के होने आए, उनके जवानी फिर से फूटने वाली है न।” 
बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े, कहा- “अरे हमारे ब्याह की चिन्ता तो पहले भी तुम्हीं ने की थी और अब भी चिता से तुम्हीं कराओगे। हम तो अपने रामू के लिए जानकी मैया की एक चेरी लाने जा रहे हैं।”
सुनकर रामू लज्जित हो गया। वह बाबा की कोठरी में चला गया। राजा भगत के कंधे पर हाथ रखकर जाने के लिए बढ़ते हुए बाबा ने ऊँचे स्वर में रामू को आदेश दिया- “अरे रामू बेटा, टोडर का भतीजा आवे तो कहना, कल चौथे पहर हम उससे मिलेंगे। कल दिन में भी हमें चेतराम साहू के यहाँ निमंत्रण पर जाना है।”
मार्ग मे चलते हुए वेनीमाधव जी ने बाबा से एकाएक पूछा- “आप अपने मन के मोह-विकारों को शांत करने के लिए ही मिथिला गए थे अथवा यों ही मन की साधारण तरंग में?”
“सच तो यह है कि चित्रकूट से इतनी दूर भाग जाना चाहता था जहाँ राजा अथवा रत्नावली फिर न पहुँच सकें। चलते चलते एक जगह पता चला कि जगदम्बा का नैहर पास में है। प्राचीन जनकपुरी, धनुषभंग का पवित्र स्थल देखने की ललक में हम उधर ही चल पड़े।”
“वहाँ आपको क्या अनुभव मिला?”
“मेरा काव्य पुरुष वहाँ जाकर सचेत हुआ।” 
“जानकी मंगल की रचना कदाचित‌ आपने वहीं की थी?”
आगे वाली गली के नुक्कड़ पर कुछ भीड़ थी।हँसी के ठहाके भी गूँज रहे थे।किसी ने रामबोला बाबा को आते हुए देख लिया। फुसफुसाहट शुरू हुई, “बाबा आ रहें हैं, बाबा।”
 बहुत से चेहरे पलटकर बाबा को देखने लगे और हुजूम छँट गया। सामने मंगलू डण्ड लगा रहा था। बाबा उसे देखकर खिल उठे। बेनीमाधव से कहा- “मेरे काव्य पुरुष ने ऐसी ही डण्ड बैठकें जनकपुरी में लगाईं थीं।”
“जै सियाराम बाबा।” कई लोगों ने तेज डग बढ़ाते हुए आकर बाबा के चरण छूना शुरू किया।
“जै सियाराम, जै सियाराम, अरे मंगलू, काहे की भीड़ लगाए हो भैया।”
मंगलू स्वयं भी बाबा के पास आ पहुँचा था। उनके चरणस्पर्श करते हुए उसने स्वयं ही उत्तर दिया- “कुछ नही बाबा ये गाली स्स….।” मुँह से गाली का पहला शब्द निकलते ही मंगलू ने बात करना बन्द करके तुरंत अपने दोनों कान पकड़े और जल्दी जल्दी पाँच बैठकें राम-राम करते हुए लगा डालीं।
लोग बाग फिर हँस पड़े, बाबा ने मुस्कराते हुए मंगलू को हौसला दिया-“डटे रहो पहलवान, राम जी तुम्हें अवश्य विजय देंगे।”
आत्म संयम भरे उत्तेजित चेहरे को ऊँचा उठाकर तेजस्वी दृष्टि से बाबा को देखते हुए मंगलू बोला- “अरे राम जी तो जब दया करेंगे तब करेंगे, पहले तो हम ही अपनी इस आदत साली …..।”
मुँह से गाली निकलते ही मंगलू की बैठकें और लोगों की हँसी फिर शुरू हो गई। बाबा मुस्कराते हुए आगे बढ़ चले। वेनीमाधव से कहा- “इसकी हठ शक्ति ठीक मेरी ही जैसी है किन्तु मैंने अपना मन साधने के लिए दूसरा उपाय किया था।”
राजा बोले- “तुमने क्या उपाय किया था भैया।” 
“हमनें कुछ नहीं किया, जानकी मैया ने रास्ता बतलाया।”
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मिथिला क्षेत्र में पण्डे यात्रियों को प्राचीन स्थलों का विवरण दे रहे हैं-यहाँ राजा जनक ने हल चलाते हुए सीता जी को पाया था। यहाँ राम जी ने धनुषभंग किया था। जानकी मैया ने उनके गले से जयमाल डाली थी, सीता स्वयंवर हुआ था । यहा राजा जनक की फुलवारी थी। यात्रियों के पीछे पीछे तुलसीदास यह सारे विवरण सुनते चले जा रहे हैं। सारा हरा-भरा क्षेत्र ओर मन्दिरों की इमारतें अपना वर्तमात रूप खोकर तुलसीदास की कल्पना में पुराने दृश्य उमगाने लगीं। राजा का महल, राम जी की बरात के तम्बुओें का नगर, स्वयंवर , जनकदुलारी के द्वारा श्रीराम जी के गले में जयमाला डाले जाने का दृश्य , विवाह मण्डप की हलचत, ज्योनार और उत्साह से गाई जाने वाली स्त्रियों की गालियाँ, सारे दृश्य भावुक तुलसीदास की आँखों के आगे आने लगे। 
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“मैंने उल्लसित होकर गीत गाए।जानकी मैया के दरबार में सारी नारियों की कल्पना की। लुहारिन अहीरिन तमोलिनें दरजिन मोचिन वारित नाइन आदि हर स्त्री के रूप में विवाह के अवसर का उल्लास निहारा। राजा दशरथ के राजसी ठाट के अनुरूप ही उनका विलास वर्णन किया। राम जानकी की भक्ति के प्रभाव से मेरे मन का श्रृंगार उमंग कर भी विकार रहित हुआ। मन के घोड़े पर संयम की लगाम कसी। हर स्री जानकी मैया की दासी थी, फिर भला मैं उनकें प्रति कोई कलुषित भाव अपने मन में कैसे आने देता? मानव मन बड़ा अद्भुत होता है बेनीमाघव। जब तक वह संस्कार धरता नहीं, तभी तक विकार- ग्रस्त रहता है और एक बार वह निश्चय कर ले तो जादू की तरह उसकी दृष्टि बदलकर कुछ और ही हो जाती है।”

दक्षेश्वर के पास एक गली में, एक कच्चे पक्के छोटे से घर मे बाबा तखत पर विराजमान हैं। पण्डित गयाराम भी उन्हीं के पास बैठे हैं। मोहल्लेवालों की छोटी सी भीड़ उन्हें घेरे खड़ी है। एक प्रौढ़ा उनकी चौकी के पास बैठी हुई हाथ जोड़ कर कह रही है- “मेरे पास दान दहेज देने को कुछ नही है महाराज। खाली कुश कन्या सौंपूँगी।”
“अरी राम भक्तिन, तेरे पास कन्या है। कन्यादान तथा विद्यादान से बड़ा और कौन सा दान होता है?”
क्रमशः

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