महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
112
“जगदम्बा के बिना मेरे मोहाकुल मन को और कौन शांत कर सकता था।”
बाबा अपनी कोठरी की दीवार पर चित्रित श्रीराम-जानकी की छवि को निहारने लगे। क्रमशः वे छवियाँ सजीव सी हो उठीं। बाबा उन्हें देखते हुए गदगद आनंदलीन हो गए।”
बेनीमाधव अपने गुरु की यह अपूर्व तेजोमयी छवि निहार रहे थे। उनका मन कह रहा था- “राम यों मिलते हैं, वेनीमाधव यों मिलते हैं।”
गुरू जी के संस्मरण संत वेनीमाधव की विचार प्रतिक्रिया को तीन गति प्रदान कर गए। मन में जो विकार थे, अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिए मानों पूरी सेना सजाकर मोर्चे पर आ डटे। विकार डंके की चोट पर न्याय की दुहाई देकर उनके मन में गरजने लगे, हमारी भूख भरे बिना तुम एक डग भी आगे नहीं बढ़ सकोगे संत जी, हमारी माँग समझो। हमारा तप परखो। हम बार बार हठ नही करते तुम्हारे प्रार्थना मार्ग में हम रोज रोज रोड़े नहीं अटकाते किन्तु काया का धर्म कभी न कभी तो आखिर पुकार ही उठेगा और उसमें भी हम तुम्हारे लिए कितनी उदारता बरतकर कितना त्याग कर चुके है। हम तुमसे दूसरे साधु-संतो की तरह आाठों पहर चेलियाँ फँसाने की चिन्ता भी नहीं कराते। हम तो आप प्रतिष्ठा के लिए बदनाम भक्तिनों और साधुनियो के सम्पर्क से अपने को सतर्कतापूर्वक सदा दूर रखते हैं। हम मात्र इतना ही तो चाहते हे कि बरस-छ: महीने मे कभी हमको भी ऐसा अवसर दे दिया करो जिससे लोक-समाज में तुम्हारे राम पंथगामी की मान-प्रतिष्ठा को भी आँच न आए और हमारा काया-धर्म भी निभ जाए। हे राम, कितने संयम के साथ इस एकमात्र कायिक कामना की लाज भी तुम नही निभा सकते? देखो तुम्हारी दुनिया में इस समय कैसी कसी दुष्प्रवृत्तियों का सफल प्रचार हो रहा है । दुष्टजन परदारा परधन-लोलुप हर तरह से फल-फूल रहे है, राज कर रहे हैं। हमारे साधु महन्त, संत बैरागी गुसाइयों आदि में जो जितने अधिक बुरे काम करते है वे उतने अधिक पुजते भी हैं। सज्जनों को कोई नहीं पूछता। ऐसे कठिन कलिकाल में कम से कम पाप कामना करने वाले अपने इस दास की क्या एक छोटी सी मागँ भी पूरी नही कर सकते?
अहम के इस तर्जन-गर्जन के बीच में कई बार मन की भीतरी तह से एक और स्वर उठने का प्रयत्न करता था, पर जब भी विकारशील अहम् को यह आभास होता तभी वह और भी अधिक बिफरकर बोलने लगता। अंत में उसकी बात समाप्त हो गई और भीतर वाला स्वर ही उठा, “ ऊँचे ऊँचे वृक्षों की ओर न देखो वेनीमाधव, धरती पर जमकर फँसी हुई दूब को देखो। ये ऊँचे ऊँचे वृक्ष किसी भी आँधी में उखड़कर गिर सकते हैं। पर दूब को चाहे जितना भी रौदों या काटो वह धरती पर उतनी ही गहरी जड़े जमाकर फैलती चली जाती है। तुम्हारी गुरु दूब है वेनीमाघव। उन्होंने अपनी दीनता में ही यह वैभव सिद्ध किया है।इतने वर्षों तक इतने निकट रहकर भी क्या तुमने अपने गुरू में किसी भी प्रकार का विकार उभरता देखा है?”
“हाँ , देखा है पूज्यपाद गुरू जी महराज अब भी ‘मोसो कौन कुटिल खल कामी’ गाया करते हैं।”
“उनकी खलता कुटिलता और काम-प्रवुत्ति किस सतह पर छनकर किस रूप
में बोल रही हे, क्या इसको कभी तुमनें पहचानने का प्रयत्न किया है वेनी माधव? जल की लहरें दिखलाई देती है परन्तु हवा की अदृश्यमान लहरें केवल स्पर्श से ही अनुभव की जाती है। अपने आपको खोजो बेनीमाधव, नादान न बनो। जितना कामानन्द तुमने प्राप्त किया है वह अपने अनुभव में क्या एक सा नही हैं? फिर उससे उच्चतर अनुभव की ओर क्यों नहीं बढ़ते? एक सुख देखा, अब दूसरा देखो, जो इससे भी अधिक सुन्दर और दिव्य संतोष कारी है।”
अहम का स्वर विनम्र हुआ। गिड़गिड़ा कर बोला- “वही तो चाहता हूँ नाथ। असल में मैं वही चाहता हूँ। पर क्या करूँ दुर्बल हूँ । तुम्हारे सहारे के लिए गिड़गिड़ाता हूँ। एक बार मुझे फिर वही प्रकाश दिखला दो, जो मेरी उन्नीस वर्ष की आयु में तुमने मुझे दिखलाया था। नारी के द्वारा ही मेरे उर अन्तर, में वह प्रकाश आलोकित किया और उसी के हाथों वह ज्योति बुझवा भी दी। यह तुम्हारा कैसा अन्याय है राम कि मुझें एक साथ दो सिरों पर नचा नचाकर बावला करते चलते हो। मुझे चैन नहीं देते।जैसा भी हूँ तुम्हारा शरणागत हूँ। मेरी बाँह गहो प्रभु।”
सन्त जी अपनी कोठरी में बैठे शान्तभाव से आँसू बहाने लगे। तभी रामू ने घीरे से द्वार खोलकर दबे पाँव कोठरी मे प्रवेश करने का भरसक जतन किया, पर सन्त जी का चुटीला चौकन्ना मन तनिक सी आहट पाकर ही सजग हो गया। जुड़े हुए हाथों को अलग अलग करके दोनों आँखों के आँसू पोंछने के काम से लगा दिया और अपने भरे स्वर को सँभालते हुए वे चटपट बोल उठे- “कहो रामू कैसे आए? ”
"प्रभु जी ने आपका स्मरण किया है। आप किसी कारणवश उदास हैं।संत जी?”
उठकर सन्त बेनीमाधव ने अगौंछे से फिर एक बार अपना मुँह पोंछा और आगे बढ़ते हुए कहा- “मनुष्य का मन है भैया, जब कभी भटक जाता है तो रो पड़ता है।”
“मैंने प्रभु जी को उनके करुण क्षणों में अनेक बार देखा है।उनकी आँखें कभी कभी सील तो जातीं हैं पर आँसू बहाते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा।”
सन्त जी सुनकर गम्भीर हो गए। सीढ़ियाँ उतरकर नीचे जाते हुए रामू के कंधे पर हाथ रखकर बड़े स्नेह से उन्होंने पूछा-“क्यों रामू भैया, तुम्हारे मन को क्या कभी विकार नहीं घेरते?”
सहज भाव से हँस कर रामू ने कहा-“विकार और संस्कार तो मन की तरंगें हैं संत जी, अपने अपने ढंग से सभी के मन को घेरती है, पर मुझे उनके सबंध में सोचने का अभी तक अवकाश नहीं मिल पाया।”
“क्यों? आत्मालोचन करना ब्रह्मचारी का काम है।”
“मुझे अभी तक एक बार उसकी आवश्यकता नहीं पड़ी। प्रभु जी के ध्यान
से अवकाश ही नहीं मिल पाता। वह पढ़ने पढ़ाने का काम भी उन्हीं की आज्ञा से करता हूँ।”
“कभी थकते नहीं रामू ?”
रामू एक क्षण मौन रहा, फिर कहा-“अभी तक यह सब बातें मैंने कभी सोची नहीं है सन्त जी प्रभु जी मे एक बार कहा था, मुझे गृहस्थ बनना है।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment