महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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तुम्हारे लिए मेरे मन में जैसा अच्छा भाव था वैसा ही अब क्रोध हरदम बना रहता है। सारी बस्ती, आस पास के गाँव भौजी बिचारी का कष्ट देखकर हाय-हाय कर रहे हैं और एक तुम हो जो हमारे बार बार आने पर भी हमसे कतराते रहे। जो ऐसे ही हमसे मुँह फेरना था तो नेह क्यों लगाया था।”
तुलसीदास ने अपनी शांति तब भी न खोई। वे सरककर चौकी के कोने पर आ गए और राजा के कंधे पर अपना हाथ रखकर कहा- “तुम्हारे आक्रोश के लिए मेरे मन में सहानुभूति है, रत्नावली के लिए तो मेरा मन अनंत शुभ कामनाओं से भरा हुई है।”
राजा ने उनकी बात पर अपनी बात चढ़ाते हुए उत्तेजित स्वर में कहा- “तो फिर भौजी से ही यह सब कहो। एक बार उनसे मिल लोगे…।”
बात काटकर तुलसी ने दृढ स्वर में कहा-“यह असभव है।”
“क्यो ?”
“मैं अब विरक्त हो चुका। मेरा मार्ग बदल नही सकता। मिलकर क्या करूँगा?”
राजा ने गम्भीर उदास स्वर में कहा- “तुम्हें मालूम है भैया, मुन्ना नहीं रहा।”
तुलसीदास के मन में महीनों के श्रम से जमाई हुईं शांति, क्षण के हजारवें अंश में ही वालू की दीवार की तरह ढहने लगी। अचानक मुँह से निकला- “मेरा तारापति, कहाँ गया?”
'“राम जी के घर।”
“राम जी के घर।” स्वगत बड़बड़ाते हुए तुलसीदास की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। मन में ऐसा आभास हुआ कि जैसे उनके भीतर रमी हुई लय बिखर रही हो और कलेजे मे छुरा भुकता चला जा रहा हो।लड़खड़ाए स्वर में आप ही आप पूछ बैठे- "क्या हुआ था उसे ?”
“बड़ी माता निकली थी, उसी में चला गया।”
तुलसीदास की आँखें छलछला उठीं। मन करुण होकर अपने राम को गुहारने लगा- “यह तुमने क्या किया राम ? यह कैसी परीक्षा ली?” और मन की तह में दबा अपना ही एक और आदेश भरा स्वर गूँजा। हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश यह सब विधि के हाथ में है। अपना जप न छोड़। राम की माया में तू बोलने वाला कौन है?”
राजा धीमें, करुण स्वर में कह रहे थे- “भौजी तुमसे कुछ नहीं चाहती, बस एक बार तुमसे मिल लेना चाहती है। तुम्हारे दरसन करके उन्हें सब कुछ मिल जाएगा।”
तुलसी के आँसू थम गए। कराहता कलेजा सहसा कठोर हो गया, बोले-“अब मैं चित्रकूट से कहीं नहीं जाऊँगा।”
“भौजी यहीं आई है।”
राजा की इस बात से तुलसीदास फिर चौंके, चौकी से उठकर कोठरी में चक्कर लगाने लगे। एकाएक दीवार पर लिखे हुए राम शब्द से उनकी दृष्टि जुडी- ठिठककर खड़े हो गए और शब्द की और देखते हुए ही राजा से कहा- “मैं विरक्त हूँ। मेरे न क़ोई स्त्री है न कोई बेटा।”
बाहर दालान में बैठी हुई रत्नावली सिर झुकाए सब चुपचाप सुन रही थी। एकाएक उठी और भीतर आ गई। तुलसीदास ने द्वार पर पत्नी को खड़े देखा। आँखों से आँखें मिलीं। कुछ क्षण बँधी रहीं। फिर एकाएक तुलसी ने सिर झुकाकर रूखे स्वर से कहा- “यह तुमने उचित नही किया, रत्ना।”
“दु:ख में उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रह जाता। सहारा माँगने आई हूँ।”
“सहारा राम से माँगो।” ,
“मैं तुम्हारे हृदय में रमते हुए राम ही से सहारा लेने आई हूँ।”
तुलसीदास चुप, जिस दीवार पर राम लिखा था उसी से सटकर खड़े हो गए। रत्नावली उनकी चौकी के पास आकर खड़ी हो गई थी। राजा उसके भीतर आते ही उठकर बाहर चले गए थे। रत्ना ने रोते हुए कहा- “मेरा मुन्ना नही रहा, उसमें तुम्हें देख लेती थी, अब किसके सहारे जिऊँ?”
“सहारा केवल राम का है रत्ना।”
“मैं तुम्हारे जप तप ध्यान में तनिक भी बाधा न बनूँगी।”
“यह माना परन्तु नारी पुरुष के लिए प्रलोभन होती है।”
“मैं राम जी की सौंह खाती हूँ, तुम्हें किसी भी प्रकार से लुभाने का प्रयत्न नही करूँगी। कहोगे तो मैं तुम्हारे सामने तक नहीं आऊँगी। मुझे केवल अपने पास रहने दो।तुम निकट से अपने राम को निहारा करना और मैं दूर से तुम्हें देखा करूँगी।”
“बात कहने सुनने में बड़ी अच्छी लगती है, किन्तु हवा रहेगी तो आग अपने आप ही भड़केगी।”
“मुझे तो अपने ऊपर विश्वास है। क्या तुम्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं है?”
“अब यह प्रश्न ही नही उठता देवी, जो त्याग चुका सो त्याग चुका।”
“तुम्हारी झोली में यह फूल -कपूर, सब कुछ तो झलक रहा है। इनको अपनाओगे और पत्नी को त्यागोगे, क्या यह उचित है? अग्नि को साक्षी देकर विधिवत तुमने जिसकी बाँह गही थी….”
“उसी ने तो मेरी वह बाँह रामजी को पकड़ा दी। तुम्हारा आजीवन उपकार मानूँगा रत्नावली। जो दिया है उसे अब मुझसे वापस न मांगों। आज से यह चंदन-कपूर आदि झोली का स्वांग भी छोड़ता हूँ। जितना नि:संग रह सकूँ उतना ही भला है।”
रत्नावली सहसा उठकर उनके पास आ गई, उनकी टांगो को अपनी बाहों
से बाँध कर, उनके चरणों पर अपना सिर रखकर वह बिलख-बिलखकर रोने लगी- “मुझे न त्यागो स्वामिन। मुझे न त्यागो।”
तुलसी अपने कलेजे मे तूफान छिपाए पत्थर से खड़े रहे। मन कह रहा था- “माया मे न बंधना तुलसी।आज नहीं तो कल नारी का संग तुम्हें फिर से कामानुरक्त बना ही देगा। हे जानकी मैया, मेरी रक्षा करो। हे बजरंग मेरी बाँह गहो, मुझे अब राम-पथ से विलग न करो।”
रत्नावली का करुण क्रंदन और प्रलाप चलता रहा। तुलसी बोले- “मैं खड़े खड़े थक गया हूँ, रत्नावली, मुझे बैठने दो।”
रत्नावली ने घीरे घीरे अपने हाथ सरका लिए। मुक्त होकर तुलसीदास ने डग आगे बढ़ाते हुए कहा- “तुम्हारे और अपने भोजन की व्यवस्था कर आऊँ। आता हूँ।”
रत्नावली सहसा घबराकर बोली- “तुम जा रहे हो?”
“आता हूँ।” कहकर तुलसीदास तेजी से द्वार के बाहर निकल गए। राजा भगत दालान में खड़े थे, तुलसी को देखकर पूछा- “कहाँ जा रहे हो भइया”
“फिर बताऊंगा।” - कहकर तुलसीदास बिना रुके ही मुख्य द्वार की ओर तेजी से बढ़ गए और गली में निकलकर उन्होंने दौड़ना आरंभ कर दिया।
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“मैने राम की ऐसी लगन साधी कि फिर जो कुछ भी राह में आया उसे हटाकर भाग चला।”
बेनीमाधव जी ने उत्सुक होकर पूछा-“तो आपने चित्रकूट भी त्याग दिया?”
“मेरे लिए वह अनिवार्य था।”
“तब फिर कहाँ गए आप?”
“सीता माई के मायरे”
क्रमशः
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