महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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बेटा,पहले अपने उत्साह को चेताओ। देखो में तुम्हें अपने ही जीवन के दृष्टांत देता हूँ। ”
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चित्रकूट में ब्रह्मदत्त घाट वाले के घर अपनी कोठरी मे तुलसीदास पद्मासन साधे माला जप रहे हैं। सामने दीवार पर सफेदी से एक सूर्य अंकित है और उस पर गेरू से 'राम' लिखा है। तुलसीदास की आँखें शब्द को देख रही हैं। होठ निश्चल है,मन में राम गूँज रहे हैं।गूँजते गूँजते सहसा आँखों से भानु कुल मणि राम का नाम लोप जाता है। आँखों के आगे सफेदी छा जाती है और उस सफेदी से एक आकार उभरता है। स्पष्ट होती है शोकमूर्ति रत्नावली।मन से भी राम शब्द लोप हो गया है।क्रम चलता है, फिर गूँज से तारापति उठता है और आँखों में स्पष्ट झलक पड़ता है। मन प्रसन्न होकर ललकता है, फिर अंतर की हुंकार भरी चेतावनी फिर रामधुन और शब्द का दर्शन।
इसी तरह जप की प्रक्रिया में ध्यान को बिंब में रमाने में मन बार बार, बिछल बिछल जाता था। कभी मोहिनी, कभी नंददास की प्रेयसी, कभी नरहरि स्वामी, पार्वती अम्मा, शेष सनातन गुरु जी और भी अनेक भूले- बिसरे चित्र मन मे उभर
आते और उन चित्रों में निहित भावों की तरंगे कलेजे में संगीत सी बज उठती थी। मन समानांतर गति पर दौड़ता था। जप भी चलता था और जप की तह मे
पुराने प्रसँग भी आप ही आप उभरते थे। कभी भोजन का स्वाद, कभी नारी की झलक, कभी दर्शन-अध्यात्म की कोई बात और कभी-कभी ऐसी गहरी उदासी भी अपने-आप ही उन पर छा जाती थी कि राम जप का छकड़ा दलदल में अटक अटक जाता था।
तुलसीदास उदास होकर उठ खड़े हुए, कोठरी से बाहर चले आए। दालान के दूसरे सिरे पर ब्रह्मदेव का ५-६ वर्ष का बेटा बैठा, हुआ पहाडे़ रट रहा था-“पद्रा दूनी तीस, त्तिया पैताली, चक्को साठ,पँचहु पीएछोत्तर, छाका नब्बे, सत्ते पंजे अट्ठे नौवें वीसे….।
बच्चा बड़े उत्साह से रट रहा है। फिर वह उत्साह मंद पड़ जाता है, फिर 'दाहम डेढ़ सौ” कहते कहते तक जमुहाई आती है, फिर उसे जल्दी-जल्दी जमुहाइयाँ आती हैं। पहाड़ा रटता हुआ स्वर मंद पडने लगता है, कभी सिर, गाल, कभी बाँह, कभी जाँघ में खुजली मचने लगती है। फिर आकाश में उड़ती चील को देखते-देखते स्वर ही मौन हो जाता है। घर के भीतर से किसी बुड्ढे की आवाज आती है- “क्यो बे। चुप हो गया? ”' बच्चा फिर चौंककर ऊँचे स्वर में“पंद्रह दूना तीस तियो पंताला' की धुन पकड़ लेता है। तुलसीदास खड़े खड़े देख रहे है, मुस्कराते है, स्वयं अपने से ही कहने लगते हैं - “भय के बिन प्रीति भी नहीं होती। पर मैं किसका भय करूँ , राम का? नहीं, जिस मालिक का चाकर बनने की चाह है उसके प्रति निरर्थक भय रखकर चलना उचित है।नहीं।
बेनीमाधव को बाबा सुना रहे थे-“राम घाट पर एक लंगड़ी बुढिया रहती थी। वह बड़ी ही लोभी थी। अपने आस-पास बैठे अ्रंधे फ़क़ीरों के आगे पड़ने , वाले अनाज या टकों की चोरी करने मे सदा उसकी नीयत रहती थी। वह उचक- उचक कर ऐसे अंधों के पैसे और अनाज चुराती थी कि देखने वाले हँस हँस पड़ते थे। न जाने कितने बार वह मारी पीटी गई, कितनी कितनी कलह हुईं, निकाली गई परतु वह फिर वहीं की वहीं आ जमती थी और वही का वही काम करती थी- जब वह मरी तो उसके पास पूरे पाँच हजार रुपये निकले। मैं सोचने लगा कि जैसे इस बुढ़िया को अर्थ संचय के लोभ ने लुभाया था, वैसे ही मुझे राम- नाम संचय का लोभ होना चाहिए। जैसे वह दूसरों की चोरी करती थी, वेसे ही मुझे भी अपने मन में, उठने वाले दूसरे भावों से अर्थ संचय करना चाहिए। मान लो, मन मे रत्नावली झाँकी तो मैंने उससे उत्पन्न मन के आनद को राम अर्पित कर दिया। किसी भोजन का स्वाद जागा तो उसका लालच भी राम ही को सौंपने लगा।कभी कभी मैं सोचता कि कामुक लोगों की काम-लिप्सा अत्यन्त घिनौनी भले हो पर उसके प्रति इसकी बावली निष्ठा प्रणम्य है। श्रीराम के लिए भी मेरे मन मे ऐसा ही उत्साह जाग जाए।बजरंगवीर, अतुल उत्साह के धनी, मेरी भी राम-लगन ऐसी ही प्रबल बना दो | मैंने काम, क्रोध, मोह, लोभ सब में अपने राम को रमाने का खेल खेलना आरंभ किया, पापी के पाप में भी भक्त कामी को अपने आराध्य के प्रति दिव्य प्रेरणा मिल सकती है। मैंने चित्रकूट में अथक भाव से इस प्रेरणा को साधा।राम नाम मेरी साँस साँस में गूँजने लगा। तब फिर मेरी परीक्षा की घड़ी आई।
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ब्रह्म दत्त घाटवाले के घर में अपनी कोठरी में तुलसीदास बैठे जप कर रहे हैं। राजा भगत कोठरी में प्रवेश करते हैं। तुलसीदास का घ्यान विचलित नहीं होता। राजा कुछ देर खड़े रहने के बाद उनकी चौकी के पास बैठ जाते हैं किन्तु तुलसी का ध्यान भंग नही होता है। उनके कानों में मृदंगों और झाँझो का सम्मिलित स्वर राम-राम बनकर गूँज रहा है। राजा को खांसी आ जाती है और वह खाँसी तुलसी के मन की एकरसता में व्याधात पहुचाती है।आँखें खुलती तो है पर उनमे उजाला क्रमशः ही आता है। राजा को देखकर वे प्रसन्न होते है, कहते हैं- “कहो राजन फिर वही आग्रह लेकर आए हो?”
उदास स्वर में राजा ने नख से धरती को खुरचते हुए कहा- “हम तुमसे कुछ भी कहने नहीं आए भइया, तुम अब राम जी के हो, हमारे थोड़े ही रहे।”
तुलसी ने शांत भाव से कहा- “राम जी सबके हैं,फिर उनका चाकर भला सबका चेला क्यों न होगा?”
“तो भौजी में राम को क्यों नहीं देखते हो? और कितना दण्ड दोगे बिचारी को? ” राजा के स्वर में आक्रोश था।
तुलसीदास ने अपना सिर झुका लिया, फिर गम्भीर स्वर में उत्तर दिया- “तुम्हारी भौजी के प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं है, राजा। उन्होंने मेरे प्रति अनंत उपकार किया है।”
“और तुम राम रूपी छुरी लेकर,कसाई की तरह उस बेचारी को मारने पर ही तुल गए हो। ये तुम्हारी भगती है या स्वारथ? तुम्हारा पुन्न है या पाप? ऐसी औरत लाखो करोड़ो में ढूढे़ नहीं मिल सकती।
क्रमशः
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