महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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उस वन वासिनी को देख देखकर लगता था कि मेरा सारा पाण्डित्य नितांत खोखला है। उसके यहाँ से विदा होने के कई दिन के बाद चित्रकूट में पर्वत की चोटी पर एक दिन मैं बड़ा ही उदास बैठा था। थोड़ी देर पहले तुम्हारें चेहरे की गम्भीर उदासी देखकर मुझे अपनी उस दिन की उदासी सहसा याद आ गई।”
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चित्रकूट में पर्वत के एक सूने स्थल पर तुलसी गहरी उदास मुद्रा में बैठे सूनी आँखों से शून्य को ही देख रहे है। एक साधु पीछे से आता है, उनके सिर पर अपना हाथ रखता है।तुलसी चौंककर मुड़कर उसे देखते हैं। साधु मुस्कराता है, शांत स्वर में कहता है- “केवल चाहने से ही सब कुछ नहीं मिलता भगत। अपनी चाहना को पूरी करने के लिए भगवान को भी नर देह धर कर हाथ पैर और मन बुद्धि चलानी पड़ती है।”
तुलसी की आँखें छझलछला आई।साधु के पैर पकड़ कर बोले- "मेरे साथ यही तो अभिशाप है, महात्मा जी कि जो जानता हूँ उसे मानता नहीं। मेरे पढ़े हुए सारे अक्षर और तोते की तरह रटा हुआ अर्थ बोध निःसार है। समझ में नही आता क्या करूँ।”
“कहो और सुनो।” साधु का स्वर शांत और सधा हुआ था। तुलसीदास को ऐसा लगा कि साधु का स्वर नरहरि बाबा के स्वर से बहुत मिलता जुलता है। वे कह रहे थे- “राम कहो, राम सुनो। तुम कुछ दिनों तक हठपूर्वक अपने पोथियों के ज्ञान को, अपनी सारी चिन्तन पद्धति को बन्द कर दो।”
“क्या ज्ञान-विज्ञान झूठा है?” तुलसी ने सहसा पूछा।
“नहीं, किन्तु उसका तोता रटंत प्रयोग अर्थहीन है। भ्रामक है।”
“किन्तु हठ की प्रबल पहरेदारी में भी मन के प्रपँच अपने राग विराग को लेकर पड़यंत्र करते ही रहते है, उनका क्या करूँ?”
“अपने हठ का पहरा और कड़ा करो बेटा। राम कहो, राम सुनो और कुछ न कहो, कुछ न सुनो।सतत अभ्यास से तुम्हारी साँस साँस में यह गूँज भर जाएगी और फिर अपने आप ही तुम्हें अपने सारे अध्ययन और पांडित्य का खरा यथार्थ बोघ हो जायगा। राम कहो और राम सुनो। कहो और सुनो।”
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“कहो और सुनो, राम कहो, राम सुनो।” कहकर बाबा ने बड़े स्नेह से संत जी को देखा और उनके कन्धे को थपथपाकर आँखों से ऐसा स्नेह वर्षण किया कि संत जी हरे हो गए।
बेनीमाधव जी का मन पिछले कुछ दिनों से बड़ा तरंगी हो रहा था। गुरूजी के जीवन-प्रसँग सुनते सुनते उनका अपनापन स्वयं अपने ही प्रश्नों का कटीला जंगल बनकर दुखदाई हो गया था। पचपन पार हो गए, साठे की लपेट में आ चले, पर बेनीमाधव, तुमने अब तक पाया क्या? पाने की बात केवल सोचते ही रह गए।
मन कुछ पाने के लिए तड़प रहा है। उस 'कुछ' का हल्का सा आभास मन को होता है, पर उसे स्पष्ट न देख पाने की उलझन, देखने की लालसा, अपनी सामर्थ्य की सीमा पहचान लेने से उपजा हुआ लज्जा-बोघ, विवशता और चिढ़ की भट्ठियों में तपते हुए अंततोगत्वा अपनी शक्ति की सीमा के भीतर ही उस 'कुछ' की उपलब्धियों को उपलब्ध करने के लिए मचलने लगता हैं। राम मिलन यदि इस जन्म में संभव नही तो फिर कामसुख ही सही ब्रह्मानंद सहोदर है।
लेकिन बेनीमाधव यह सुख भी अपने आपको नही दे पाते। उनका मन बड़ा शील और संकोच भरा है।कुछ ब्रह्मचारी होने का डंका बजने के कारण, कुछ धर्म बोध वश और कुछ अपनी भीतरी तहों से उठने वाली राम मिलन की चाह के मोह में। ऐसे मौके आने पर वे कामतृप्ति के लिए छलावे की तरह आया हुआ अवसर सा दे जाते है और फिर पछताते हैं। पछतावे में राम-राम की उत्ताल तरंगे भी उठती है और काम सुख साधन खोजने की दबी ढंकी लालसा भी।पर यों सारी उमर रेगिस्तान सी ही बीती। अब मन में पलटने की चाह होती है।संत जी का मन अपने भीतर के द्वंद्व से थक गया है, कुछ कुछ पक भी गया है। उनका जी करता है कि अब दो में से एक घाट पर ही उनकी इच्छा की नाव लग जाए।
इधर कई महीनों से गुरू जी के साथ रहते हुए उनकी राम चाहना को सतत् बल अवश्य मिला है, पर केवल इस रूप मे कि अब वे नारी के संबंध में नहीं सोचते। काम वासना की ओर बढ़ते हुए मन पर निषेध की अर्गला लगाने में वे सफल हुए हैं पर एक दिशा के बंद हो जाने पर चूंकि उनकी दूसरी दिशा नहीं खुली इसीलिए मन में कचोट है।
बाबा से 'कहो और सुनो’ मंत्र पाकर वैसा ही हठ साधकर वे जैसे-जैसे राम को पाने का हठ करने लगे वैसे-वैसे ही दिन बीतने पर फिर से उनकी काम-तृष्णा सहसा उस हठ की जड़ काटने में सक्रिय होने लगी। जिस शत्रु को मरा हुआ मान लिया था, वह फिर से सजीव हो उठा। इससे वे अधिक अनमने हो गए। संयोग से एक दिन उन्हें बाबा के साथ बिताने के लिए एकांत के क्षण मिल गए। बात बाबा ने ही आरंभ की। बाहर से प्रसन्न पर भीतर से उदास बेनीमाघव जी की मुख भंगिमाएँ निहारकर बाबा एकाएक अपने पाल्थी बँधे पैर का दाहिना तलवा सहलाते हुए बोले- “हाँफो मत बेनीमाधव और हफाँई चढ़े भी तो अपनी दया विचार के रुको मत। मन में राम-राम की दौड़ लगाते ही चले जावो। जब काया थक थक कर हारेगी तो तुम्हारे मनोलोक का सूर्य अपने आप ही उदित हो जाएगा।”
बेनीमाधव जी का सिर मन की लज्जा और गंभीर विचार से झुक गया, आँखें भी छलछला आईं। उन्हें पोंछते हुए बोले - “क्या कहूँ, गुरू जी, इतने वर्षो से पारस के साथ रहकर भी यह लोहा-लोहा ही रहा। मुझ पर राम जी की कृपा ही नहीं होती। बड़ा अभागा हूँ।”
प्यार से झिड़कते हुए बाबा बोले- “दौड़ तो लगाते नहीं और फिर राम जी को कोसते हो।ध्यान, उत्साह के बिना थोड़े ही जम पाता है। जब तक यह नही समझोगे तब तक तुम्हारा ध्यान एकाग्र कैसे होगा?”
“क्या करूँ गुरू जी, प्रयत्न त तो बहुत करता हूँ पर…”- कहते कहते बेनीमाधव चुप हो गए।
बाबा ने हँसकर कहा- “पर, पर क्या, ‘मैं बहुढ़ी दूढ़न गई रही किनारे बैठ’ क्यों? यही हाल है न तुम्हारा?
क्रमशः
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