Monday, 3 July 2023

108

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
108

एक तगड़े जवान पठ्ठ को, जो उनसे स्वाभाविक रूप में कहीं अधिक शक्शिाली लगता था, बाबा ने ऐसी तरकीब से पछाड़ा कि लड़के “वाह बाबा, वाह बाबा” करने लगे। राजा भगत भी वहीं खड़े हुए मजा ले रहे थे। बाबा बोले- “आओ बुढ़ऊ, एक पकड़ हमारी तुम्हारी भी हो जाए।”
सब लोग हँस पड़े। राजा ने हँसते हुए कहा- “अरे अब तुमसे क्या लड़ें। जिन दांव पेंचों से तुम हमें मारोगे भैया, उन्हीं से हम भी तुम्हें पछाड़ेंगे। दोनों पहलवान चित्त होकर गिरेंगे और यह लड़के हंसेंगे।” बाबा हँसते हुए अखाड़े से बाहर चले आए और राजा के कन्धे पर हाथ थपथपाकर कहा- “ठीक ही है, हम दोनों जन्म भर एक ही शत्रु से लड़ते रहे हैं, अब आपस में क्‍या लड़े। वैसे राजा, एक दिन इस अखाड़े में बुढ़वा दंगल हो जाए। नगर भर के बुड़ढों को बुलाया जाए कि आओ कुश्ती लड़ो।देखें तो सही कि बुड्ढों में अब तक कितने जवान हैं।”
मंगलू बड़े जोर से हँसा, कहने लगा-“वाह बाबा, बड़ा मजा आएगा। हमसे कहो तो कल ही दंगल करवाय दे साला। मजा आ जाएगा।”
बाबा बोले- “अरे भाई, दंगल और मजा तुम्हारे साले हैं फिर हम क्या बोलें।”
लड़के खिलखिला कर हँस पड़े। मंगल लज्जा से जीभ निकालकर अपनें दोनों कान पकड़ते हुए ऐसी मुद्रा में खड़ा हो गया कि अखाड़े की हँसी दोबारा हो गई। बाबा अखाड़े के अहाते से बाहर निकलने के लिए राजा के साथ बढ़ते हुए एकाएक रुक गए और मुड़कर गम्भीर स्वर में मंगल से बोले- “मंगल , हम तुम्हें इस गाली रूपी शत्रु‌ को पछाड़ने की एक तरकीब बतावें?”
“हाँ, बताय देव बाबा।” मंगलू दौड़कर बाबा के चरण पकड़ कर बैठ गया। गिड़गिड़ा कर बोला- “अरे बाबा जो तुम हमरी यह आदत छुडा़य देव तो क्या कहें, तुम्हारे यह चरन धोय धोय के पिएँगे साले।” 
इस बार तो अट्टहास के बादल ही गड़गड़ा उठे। अखाड़े के द्वार पर खड़े सन्त बेनीमाधव से लेकर अखाड़े के अहाते में नहाते धोते, मालिश करते, मुग्दर हिलाते और अपने वातावरण से बँधी हुई नित्य की सारी क्रियाओं से व्यस्त दस-पन्द्रह आदमियों की भीड़ अपने सब काम छोड़कर हंस पड़ी। यहाँ तक कि बाबा भी उस मुक्त अट्टास की लहर से बच न सके, लेकिन उनके चरणों में बैठे हुए मंगलू की आँखें अपनी विवशता से छलछला उठी थी।बाबा ने उसे देखा और तुरंत अपनी सहज गंभीर मुद्रा में आ गए। झुक कर अपने दोनों हाथों से मंगलू को उठाया और उससे बोले- “इस लोक हँसाई की चिन्ता न कर रे पहलवान। तू अपने शत्रु से लड़े जा। अच्छा, मैं तु्झे एक तरकीब बताता हूँ सुन, जैसे तेरे मुँह से गाली निकले, तू राम-राम कहके तुरंत दुइ बैठक लगाय लिया कर।लोग हँसे तो परवाह न करना, समझा रे।”
मंगलू की आँसुओं डूबी आँखों में आस्था की ऐसी चमक आई मानों काले बादलों को छेंदकर सूर्य चमकने लगा हो। दूसरे लोग भी इस बात से अपनी सहज गम्भीर मनःस्थिति में आने लगे। मंगलू बोला-“सच बाबा, आदत छूट जाएगी?”
“आदत? अरे, जहाँ राम-नाम की हुंकार भर के तू बैठकी लगावेगा तो आदत क्या भूत पिशाच ब्रह्म राक्षस तक तुम्हें हाथ जोड़ते हुए दुम दबाकर भाग जाएँगें।” 

द्वार पर खड़े सन्त वेनीमाधव के मुख पर बाबा की बात मंत्र सी छप गई थी।अखाड़े से अपनी कोठरी की तरफ आते हुए मार्ग में राजा बोले- "हमने तुम्हारे भीतर एक खूबी देखी भैया, तुम दवाई तो सब रोगों मे एक ही बाँटते हो पर इसके पालन मैं हर एक के हिसाब से ऐसा उलट फेर करते हो कि तुम्हारी दवाई अचूक हुई जाती है। हमें मरखनी गायों के पैर छूने का नुस्खा बताया रहा।”
भगत जी के कन्धे पर बाबा की एक बाँह तो पहले ही से टिकी हुई थी, अब चलते चलते दूसरी से गम्भीर उदास संत वेनीमाघव की बाँह को भी घेरते हुए बाबा भगत जी से बोले- “इन्द्रिय दोषों को वश में करने वाला ही गोस्वामी बनता है राजा। इसीलिए मठ के गोस्वामी पद का त्याग करने के बाद भी मैंने लोगों के द्वारा आदरपूर्वक कहे जाने वाले इस शब्द पर कभी संकोच नहीं किया। मुझे गोस्वामी बनना अच्छा लगता है। जब तुम्हारी गोशाला देखता था तब बार-बार यह शब्द मुझे अपने यथार्थ से प्रेरित करता था लेकिन तुम्हें जो नुस्खा उस समय बताया, राजा, उस पर मैं तब स्वयं पूरी तरह से अमल नहीं कर पाया था।” कहते हुए सहसा वेनीमाधव की ओर मुँह करके उन्होंने अपनी बात जारी रखी, कहने लगे-“कथनी और करनी में बड़ा अन्तर होता है। बेनीमाधव, दूर से पहाड़ देखो तो लुभाता है, मन में ललक होती है कि इसकी चोटी पर चढ़े, और ऐसा लगता है कि उस चोटी पर पहुँचना बस बायें हाथ का खेल है, यों सोचा और वो पहुँच गए।”
एक घुटी साँस की उभरन के साथ-साथ ही सन्त बेनीमाघव का रुँधा हुआ कण्ठ-स्वर अकस्मात‌ फूटा। वे बोल- “हाँ गुरू जी, इस मृगमरीचिका ने ही मुझे अब तक दौड़ाया है। आदर्श भोले मन के विश्वास को लेकर इतना तेज दौड़ पड़ता है कि मैं उसके साथ नही दौड़ पाता। इस आगे पीछे के संघर्ष से ही मन मथते मथते कभी अत्यधिक निराश हो जाता हूँ। लगता है, जितना सोचा था उसका एक चौथाई भी इस जीवन में न कर पाऊँगा।”
बाबा अपनी कोठरी के सामने पहुँच चुके थे। रामू घाट पर बैठा कुछ पंडितों से बतिया रहा था।बाबा को आया देखकर तुरंत आगे बढ़ कर कोठरी की कुण्डी और द्वार खोले। प्रवेश करते हुए बाबा ने बेनीमाधव से कहा-“आओ बैठो, हम तुम्हें एक पुरानी बात सुनाते हैं। घर त्यागकर जब हम निकले तो कुछ दिन एक वनवासिनी शबरी के घर पर ज्वरग्रस्त होकर हमें रहना पड़ा था। वेनीमाघव, इस काम पीड़ित उपदेशक तुलसीदास की अंहता को धो धोकर स्वच्छ करने के लिए ही बजरंगबली ने रामकली के रूप मे मेरी परीक्षा ली थी। अपने मैले कुचैलेपन में गदराया यौवन और सौन्दर्य छिपाये हुए थी वह रामकली।उसकी बातों के कोड़े खा खाकर ही तीन दिनों में ही मैं अपने भीतर भीतर हीन भावना से बावला हो उठा था। कितनी महत्ता थी उस जय योग साधन में, हीन सिद्ध योगिनी में।
क्रमशः

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...