Monday, 3 July 2023

107

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
107

दीवानगी ने पूरी शक्ति लगाकर एक बार उन्हें फिर खड़ा कर दिया। वे नदी की ओर चले। प्यासे की आस लहरा रही थी। बस है कितनी दूर। वो झलक रहें हैं राम, नदी किनारे बैठे हुए अपनी हथेली का चुल्लू बनाकर जानकी जी को पानी पिला रहे है। आँखों ने ऐसा साफ दृश्य देखा कि मन में आनन्द के शतशत झरनें फूट पडे़। उनकी काया में सहसा ऐसी स्फूर्ति आ गई कि वह दौड़ने का प्रयत्न करने लगे। आँखें जमुना तट पर टिकी थीं, पैर लडखडाते हुए भी जोश भरे थे। मन की दीवानगी ने केवल अपना चोला बदला था किन्तु वह अपनी सशक्‍त स्थिति में ज्यों की त्यों अब भी कायम थी। दौड़ में देखा नहीं , सामने वाले पेड़ की झुकी टहनी से उनका सिर सीधा टकराया। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। माथे पर लगी करारी खरोंच से खून उभर आया था। पैरों ने जवाब दे दिया | शरीर निर्जीव सा होकर गिर पड़ा।
जब आंखें खुलीं तो देखा कि एक काली गोल मुखवाली, नाक नक्शे से सुहानी स्त्री अपनी गोद में उनका सिर रखे हुए दोनें में भरे पानी से उनके सिर का धाव धो रही है। तुलसी के मन में न नारी आई और न नर। वह स्त्री एक सहारा थी, भरोसा थी, निर्बल का बल थी। मन को बड़ा अच्छा लगा। देने वाले से माँगने की चाह जागी- “पानी-पानी।” 
तुलसीदास फिर मूच्छित हो गए थे। आदिम जाति की उस युवती वे उनका उपचार किया, पानी लाई, पिलाया, फिर उन्हें सहारा देकर बैठाया। नारी के गदराए शरीर का स्पर्श विराग की चेतना के साथ भी बुरा न लगा। टूटे को इस समय सहारा चाहिए, मन रे, कोई तर्क न कर, चुप बैठ, सुख ले। यह न नारी है न नर है, केवल निराधार का आधार है। तुलसीदास के मन को इस समय सहारे की इतनी अधिक आवश्यकता थी कि वे उसे स्वीकार करने के लिए हर तर्क को उसी हठ से नकार सकते थे, जिसके बूते पर वह रात भर और अब तक चलते चले आए थे, दुख सहते चले आए थे। पानी, पिलाकर पेड़ के सहारे उसने उन्हें बिठला दिया, फिर कहा- “मेरा घर दूर नहीं । तुम्हारी देह ज्वर से तप रही है। वहाँ चले चलो तो मैं तुम्हारे घाव पर लेप करूँगी। तुम्हें दूध गरम करके पिला दूँगी।”
हर शब्द कान में टकराया, आँखों मैं फिर हठ की ज्योति बढ़ी , कहा- “घर” 
“कोई तुम्हें मारेगा नहीं। मेरे घर में कोई मरद मानुस है ही नही। मैं अपनी मालकिन आप हूँ। कोई कुछ न कहेगा। आओ आओ, उठो।” युवती उन्हें उठाने के लिए झुकी, काया से काया लगी। तुलसीदास सिहर उठे। उसे हाथ से ठेल कर कहा- “जाओ माई, मुझे अकेला छोड़ दो।” 
युवती झटका खाकर उठ खड़ी हुई, आँखें तरेरकर कहा- “नही चलते तो न सही, पर मुझे माई क्यों कहते हो ? मैं क्या तुम्हारी माई जैसे हूँ? ”
तुलसीदास को इस समय तर्कों से चिढ थी, पर अपनी उपकारिणी के प्रति के कठोर नहीं होना चाहते थे, विनम्र स्वर में कहा- “बैरागी के लिए सभी स्त्रियाँ माँ और बहन होती हैं। तुमने मेरा उपकार किया है मैं तुम्हें बहन कह कर पुकारूँगा।
“न माई, न बहिनी, हम हैं रामकली।तुम्हारे मन में औरत को लेकर अब भी पाप जागता होगा, सो माई बहिनी कहके उसे बाड़े में घेरते हो। मेरे मरद को मरे पाँच बरस हो गए पर मेरा मरद मेरे मन में अब भी बैठा हैं। बाकी सारे मरद मेरे लिए वैसे ही हैं जैसे कंकड़ पत्थर, गाय बैल, संग संगाती। तुम अपने को बड़ा मरद समझते हो तो न चलो। मैं कोई तुम्हारे साथ घर बैठउवा करने तो जा नहीं रही हूँ। आए बड़े बैरागी कहीं के।” रामकली गुस्से के मारे पर पटकती हुई चली गई। 
बाबा पुकारते ही रहे- “रामकली, रामकली” फिर ऊपर का स्वर तो मौन हो गया पर मन पुकारता रहा- "रामकली- रामकली।”  उनका ज्वर बढ़ गया था। वे सारी घ्वनियों और गूँजो की गठरी समेटकर मूच्छित हो चुके थे।
दोपहरी ढली, किसी के झिझेड़ने और बैरागी बैरागी कहने सेआँखें खुलीं, रामकली सामने थी। उनसे कह रही थी-“लो, दूध पी लो”
तुलसीदास की आँखों में श्रद्धा जाग उठी। कुछ न कहा। उसने उन्हें अपने शरीर का सहारा देकर बिठलाया और अपने हाथों मिट्टी के तौले से दूध पिलाने लगी। तुलसीदास आँखें मूदें सुख से दूध पीते रहे। दूध पीने के बाद आँखें खोल कर तृप्ति एवं कृतज्ञता की दृष्टि से रामकली को देखा। वह बोली- "देखो तुम्हारा ज्वर बढ़ गया हैं। तुम तप रहे हो। अब घूप ढल रही है।थोड़ी देर में ठंडक बढ़ेगी तो जड़ाने लगोगे। मेरे घर चले आओ। दो दिनों में चंगे हो जाओगे, फिर चले जाना।”
तुलसीदास के मन में संकोच आया, रामकली के शरीर का स्पर्श बोध भी जागा और वे तुरन्त ज्वर के आवेश में तनकर बैठ गए।
रामकली हँसी,कहा- “पाप जागा? कैसे बैरागी हो? मेरे मन में तो मेरा मरद बैठा है पर तुम्हारा मन साइत सूना है।सूने घर में तो भूत रहते हैं भूत।” कहकर रामकली खिलखिला उठी।
ज्वर के आवेश में मैली कुचैली कृष्ण सुन्दरी रामकली की खिलखिलाहट ने मानों आस्था की चादँनी बिछा दी।झोंक में बोले- “राम जाने क्या लीला है, पर तू खरी रामकली है। चल, मुझे सहारा दे। अब मेरे मन में राम है, वहाँ कोई भूत नहीं है।” रामकली ने तुरन्त उन्हें उठाया, सहारा दिया और वे सुख से उसकी झोंपड़ी की ओर चल दिए। वन के वृक्षों के पत्ते हवा में हिलकर तुलसी के मन में राम गूँज उठा रहे थे। ऐसे लगता था कि हिलती डालें एक झोंका 'रा' का लेती है और दूसरा 'म' का। रामकली का एक डग ‘रा’ बनकर बढता है और दूसरा 'म’ बनकर।स्वयं अपनी चाल भी उन्हें ऐसी ही लगी। जो कुछ भी गतिमान‌ है सबकी एक ही लय है- राम राम राम। 
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सन्त बेनीमाधव उस दिन बड़े ही दुःखी और उदास थे। बाबा अखाड़े में कुछ लड़कों को कुश्ती के दांव पेंच सिखा रहे थे। शत्रु यदि शक्ति में बलवान हो तो उसे किन किन दावँ पेंचो से पराजित करना चाहिए, इसी का प्रदर्शन कर रहे थे। अखाड़े में जोश और उल्लास का वातावरण था।
क्रमशः

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