Monday, 3 July 2023

106

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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सारी रात बीत गई, तुलसी के न पैर थके और न मन। ऐसा लगता था कि घर और घरवालों की पकड़ाई से दूर होने के लिए वे पृथ्वी के दूसरे छोर तक चलते ही चले जाएगे। हृदय और मस्तिष्क में राम को पाने के लिए मानो पूरा समझौता हो चुका था।अब वे राम के सिवा और कुछ नहीं चाहते है। धन वैभव, पत्नी पुत्र, मित्र, नाते गोतिये उन्हें किसी से भी सरोकार नहीं रहा।
“एक भरोसों एक बल, एक आस बिस्वास।
रामरूप स्वाती जलद, चातक तुलसीदास।”

यमुना के किनारे-किनारे वे रात-भर में कितने कोस चले यह कहना स्वयं उनके लिए भी असंभव था। हाँ, ब्राह्म बेला में मुर्गो की बागें उन्हें इतना होश अवश्य दे गई कि प्रात.कालीन कर्मो से निवृत्त हो जाने का समय आ लगा है। एक जगह वे स्नान आदि कर्मो के लिए रुक गए। धरती पर बैठते लगे तो लगा कि उनसे बैठा न जाएगा। कमर एकदम से अकड़ गई थी।किसी तरह बैठे तो लगा कि टांगें पिरा रहीं हैं। तुलसीदास को अपने ऊपर दया आई।उन्हें लगा कि बचपन से लेकर अब तक केवल कष्ट ही कष्ट सहा है। जेठ की चिलचिलाती धूप-सा उनका दुर्भाग्य उन्हें तपाता ही रहा है। कहीं भी तो छाँव नहीं मिली ओर जो मिली वह भी इतने कम समय तक ही सुलभ रही कि उन्हें ऐहिक सुख की तृप्ति का अनुभव न हो पाया।अपने हाथों से अपने पैर दबाते हुए तुलसीदास की आँखों में आँसू आ गए। आँसुओं ने निकलते ही उनके चैराग्य को सचेत कर दिया, “तू क्या राजगद्दी पर बैठकर सुख से राम-दर्शन करने निकला है रे।कबीरदास कितनी सच्ची बात कहते थे कि सीस काटि भुइ मां घर, तापर राखे पाव।अहंकार और उससे, उत्पन्न होने वाले सुखो-दुखों की ओर ध्यान देने से अब काम नहीं चलेगा तुलसीदास। चाकर की अपनी कोई इच्छा नहीं होती। साहब की मर्जी ही उसकी मर्जी है। चल, उठ रे मूढ़, आत्म सेवा का यह स्वाँग छोड़ और अपने नित्य कर्मो में लग। उठ-उठ, तू तनिक भी नहीं थका है और यदि थका भी है तो क्या- इस कारण से तू अपने नित्य -कर्मादि भी छोड़ देगा? उठ-उठ।”
उत्तेजित किए गए उत्साह ने शरीर की अकड़न खोल दी। कर्त्तव्य की निष्ठा ने पीड़ा की चेतना दबा दी। सबसे अधिक अखरन तो उन्हें व्यायाम करने में हुई। परन्तु व्यायाम भी चूंकि उनका नित्य नियम था इसलिए आज उसका पालन करना उनके हठ के वास्ते मानों एक  घार्मिक आवश्यकता सी बन गया था। 'रे मन तू छाँव चाहता है न, अब मैं तुझे वही न लेने दूँगा।’
मिलेगी तो तुझे श्री जानकी-जीवन के वरदहस्त की छत्रछाया ही मिलेगी, नहीं तो दुःखों से पिस पिसकर तू यों ही मिट जाएगा। स्नान ध्यान, व्यायाम, संध्या वनन्दन आदि सभी कर्मों से छुट्टी पाकर तुलसीदास ने हठपूर्वंक चलना आरंभ कर दिया। पर अब उतने तेज नही चल पा रहे थे। मन में चलने का हठ तो था किन्तु काया विश्राम पाने के लिए अधीर थी। कहाँ जाएँ, यह प्रश्न अभी उनके मन में ठीक तरह से उभर तो नही रहा था किन्तु यह कामना अवश्य कुनमुनाने लगी थी कि कहीं ऐसी जगह चलकर बैठें जहाँ उनके और राम के बीच में तीसरा न आ सके। चूँकि हठ के मोटे पर्दे के नीचे थकन के अतिरिक्त उनकी भूख भी दबी दबी भड़क रही थी इसलिए उनका हठ प्रेरित चेतन मन यह भी सोच रहा था कि वह ऐसी जगह जाएँ जहाँ उन्हें कुछ भोजन मिल सके। मन में चित्रकूट के शान्त वनप्रान्तर की सुखद स्मृतिया भी उभर रहीं थीं किन्तु वहाँ वे जाने से हिचक रहे थे। पैर चलते हुए लड़खड़ा रहे थे किन्तु हठ मन में पुरजोर था। आँखों की पुतलियाँ हठ के शिकंजे में कसी हुई अचल-अडिग थीं किन्तु उनके भीतर भयंकर दीवानापन भी चल रहा था। उन आँखों में रामहठ तो था किन्तु राम नहीं। पुराने बीते हुए जीवन के क्षणों को लौटकर न देखने की कसम तो चमक रही थी किन्तु रत्नावली बरबस बीच बीच में झाँक जाती थी। इसी से उनका दीवाना पन उग्र होता चला जा रहा था। रात भर की जागी आँखें यों भी लाल थीं किन्तु उस लाली में मन का दीवानापन मानो अंगार सुलगा रहा था। बीच में दो छोटी छोटी बस्तियाँ भी पड़ी किन्तु वहाँ वे न रुके। उनकी लड़- खड़ाती चाल, उनकी श्रंगारे जैसी आँखें और कसा हुआ मुख देखकर पहली बस्ती के पास खेलते हुए बच्चों ने उन्हें पागल समभकर छेड़ना आरम्भ कर दिया।तुलसीदास की चलती हुई मानसिक स्थिति में उनके स्वाभिमान को स्वाभाविक रूप से ठेस लगी और वे वहाँ न ठहरे। दूसरी बस्ती दूर से ही झलकी, पर वे उधर से कतराकर फिर नदी किनारे के जंगल की ओर मुड़ गए। दोपहर हो गई। सूरज ठीक सिर पर आ गया। पैर इतने लड़खड़ाने लगे कि चलते चलते एक जगह ठोकर खाकर गिरे। शरीर की चोट ने मन में धमक दी। 'क्यो नही मानता रे मन, ज्ञानी होकर भी अज्ञानी बनता है।विश्राम कर, फिर चल ,पर कहाँ विश्राम करें?” उठकर बैठ गए। आँखों के अंगारे अब राख की गुदड़ी ओढ़ कर चमक रहे थे, उनमें थकन और हताशा की पतें सी जम गईं थीं। कण्ठ भी सूख रहा था। अपने गले को सहलाते हुए उन्होंने नदी की ओर देखा। पेड़ो के भुरमुट से पानी झाँक रहा था। बस, उठकर वहाँ तक चले भर जाएँ तो प्यास बुझ जाए लेकिन चलें कैसे, काया उठ ही नही पा रही थी। पानी है प्यास है, पर प्यासे के पास पानी तक पहुँचने की शक्ति नही है। मृगमरीचिका की इस स्थिति में रत्नावली पानी की लुटिया लिए बार-बार साग्रह सामने आ जाती है। कानों मे उसका स्वर गूँजता है, “पी लो,पी लो- अपने को मत सताओ, आ जाओ। लौट आओ। 
'नहीं। अब लौ नसानी अब न नसहो। भव तें नसही।’
अब तो राम को ही लूगाँ। राम ही मेरी तृष्णा हरेगें।राम राम राम- सूने मे उनका स्वर मुक्त होकर राम-राम की बावली पुकार कर रहा था। आँखों के अंगारे अपनी राख कराड़कर फिर चमकने लगे। पेडों के झुरमुट से झाँकता हुआ पानी भी ललचाने लगा। गला सूख रहा था।
क्रमशः

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