Monday, 3 July 2023

105

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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“मैं कामी हूँ , मैं कामी हूँ , पामर हूँ। राम को छोड़कर चाम चाहा। तो उसके लिए मुझे यह बातें सुननी पड़ रही हैं। और कहाँ तक सुनोगे तुलसी?  कहाँ तक सुनोगे? क्यों सुनोगे? क्‍या कापुरुष हो?”
रत्नावली ने देखा कि पति मौन हो गए हैं। तो फिर बोली- “बुरा मान गए?” तुलसीदास ने कोई उत्तर न दिया, रत्ना ने फिर कहा- “मैं क्षमा चाहती हूँ।”
वे गम्भीर स्वर में बोले- “तुम्हें क्षमा माँगने की आवश्यकता नहीं। तुमने सच ही कहा, मैं कामी हूँ। काम के वश होकर ही कदाचित मैंने दीवाने की तरह तुमहें चाहा है।मैंने रतनावली को नहीं चाहा, या चाहा है तो अपनी चाहत को ठीक से मैं पहचान नहीं पाया।” रत्नावली ने देखा कि पति सचमुच दु:खी हैं तो फिर उनसे लिपटते हुए बोली- “काम तो स्त्री-पुरुषों के बीच मे प्रेम बढ़ाने का बहाना मात्र होता है। क्या मैं इच्छा नहीं करती। मैंने तो हँसी में ताना दिया था। तुम तो सचमुच रूठ गए।”
रत्नावली की आँखें भर आई ।इस मनावन से तुलसी कुछ तरम पड़े, कहा- “रूठा नहीं रत्ना, तुम्हारी वाणी से स्वयं सरस्वती ने जो ज्ञान-बोध दिया उससे मौन अवश्य हो गया था।“
“अरे भूलो यह बात, सारा जीवन पड़ा है, फिर यह बातें कर लेना।तुम लेटो, मैं पैर दवाऊँ।”
“नही, मैं गुरु से पैर नही दबवा सकता।”
रत्ना रूठ गई-“यह कैसा विनोद? मैं तुम्हारी गुरु कब से हो गई?”
रूखी हँसी हँस कर तुलसी ने कहा-“अभी कुछ ही क्षणों पहले तुमने मुझे गुरु मंत्र दिया है। तुमने मुझे सच्चे प्रेम का मार्ग दिखलाया है। खरी गुरु हो।” 
रत्ना रोने लगी।कहा- “इतना लज्जित करोगे, तो सच कहती हूँ, कुएँ में जाकर डूब मरूंगी।“
तारापति उसी समय चौंककर सहसा जोर से रो उठा। रत्नावली उसके रोने पर भी ध्यान न दे सकी। आप ही बैठी रोती रही। जब बच्चे का रोना बढ़ा तब खाट से उठकर उस चौकी पर चली गई जहाँ बच्चा लेटा था। तुलसीदास के मन में इस समय न तो रत्ना ही थी और न तारापति ही। उनके अन्तर मे केवल एक ही गूँज बार-बार उठ रही थी- तुलसी तू झूठा है, झूठा है। कभी कहता था राम से प्रेम करता हूँ। राम को चाहते-चाहते मोहिनी का मतवाला बन बैठा, मोहिनी से मुक्त हुआ तो रत्नावली का दास बन गया। मुझे कामवश ही नारी प्यारी लगी। मैंने न उसे चाहा और न राम को ही। दोनों ही से दगादारी की। पण्डित उपदेशक भण्डा तुझे घिक्कार है। तू स्वार्थी है प्रेमी नही। यों आत्मदर्शन फूटा तो मन ने चाहा कि ढाँढस बाँध लें पर निचली तहों में घिक-घिक‌ गूँज रहा था। तुलसीदास का मन और भारी हो गया।मन की तह तह में आत्मग्लानि की गूँज भरी थी। तू स्वार्थी है। प्रेमी नहीं प्रेमी नहीं ।
बच्चे को दूध पिलाकर-सुलाकर रत्नावली फिर पति की खाट पर आ गईं। रत्नावली के स्पर्शमात्र से ही तुलसी दास का मन ग्लानि से भर उठा।मैंने इसे घोखा दिया।मैंने अपनी रामरूप सत्यनिष्ठा को भी धोखा दिया। मैं कुटिल, खल, कामी हूँ, धिक तुलसी दास धिक।
पति के मुख पर झुककर रत्नावली ने प्यार भरे धीमे स्वर में पूछा- “सो गए क्या।”
तुलसीदास ढोंग साधे आँखें मूँदे पड़े रहे। प्रिया के होठ, उसकी गर्म सांसों का स्पर्श, अपने ऊपर उसके शरीर का हल्का सा लदाव उन्हें फिर मतवाला बनाने लगा, किन्तु हठीला और वैराग्य की ओर उन्मुख हुआ मन उन्हें भीतर से कस रहा था। मन कहने लगा- “अब नहीं, तुलसी अब नहीं। भव लौ नसानी अब न नसहौ। चुंबक उत्तेजक है, मादक है, किन्तु प्रलोभन छोड़कर तुलसी चाम का लोभ तज, राम को भज, राम को भज।अब लौं नसानी अब न नसेहौ।काव्यतरंग पंख बन गई।
रत्नावली धीरे-धीरे पति के पैर दबाने लगी। नारीरूपी बहेलिया अपने जाल से निकले हुए पंछी को फिर से फँसाने के लिए दाने डालने लगा। अपनी काया पर नारी का मचलता हुआ मादक हाथ पुरुष की काम-चेतना को रोष दिलाने लगा। काम की शक्ति के आगे राम हारने लगे। “नही, मेरे राम अब नहीं हारेंगे। अब मैं प्रेम का निष्काम रूप देखकर ही रहूँगा।”
“अब लो नसानी अब न नसहौ। 
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे पुनि न डसैहौं।”

रत्नावली हारकर सो गई। अपने कलेजे पर रखे हुए उसके हाथ के बोझ को तुलसी दास असह्य भार मानकर सहते रहे। राम-राम जपता हुआ उनका मन बीच-बीच में बहुत उछलता मचलता रहा। कई बार रत्नावली की ओर देखा किन्तु मचल मचलकर वे फिर फिर थम गए। तुलसी ने ठानी सो ठानी। नारी की आकर्षण शक्ति और सौन्दर्य ने दो बार हमें राम से विलग कर दिया, नहीं तो इतने वर्षों में यह अभागा तुलसी सौभाग्यवान बन गया होता। शंकराचार्य सच ही कह गए है, मोक्षार्थी के लिए नारी नरक का द्वार है। आयु प्रतिक्षण झीज रही है। यौवन दिनोंदिन बासी पड़ता चला जाएगा। जो दिन जाता है वह फिर लौटकर नही आता। यह काल जगत् भक्षक है। रत्ना ने उस समय ठीक ही कहा था, यह भी किसी दिन मर जाएगी।सभी जीव धारी मरते हैं, फिर ऐसे से क्यो न‌ प्रेम करे जो अजर अमर हो, जो हँसी में भी कभी ताने न दे। ना ना अब तो-
“करे एक रघुनाथ संग, बाघ जटा सिर केस। 
हम तो चाखा प्रेम रस, पतिनी के उपदेस।”

आधी रात बीत चुकी थी। रत्नावली सो रही थी। अचानक मन में एकाएक ढोल से बजने लगे-मत जा, भक्ति मार्ग कठिन है, मत जा किन्तु दूसरा मन अपनी ही आन साधे रहा। काव्यतरंग पंख बनकर लहरा रही थी, नही, राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे पुनि न डर डसैहौं।
दबे पावँ उठे। बच्चे के पास जाकर एक बार उसे देखा, पत्नी को अपना ओढ़ा हुआ दुशाला उढाया।पत्नी के सिरहाने रखी ऊनी चदरिया उठाई, झोली ली, मौन भाव से हाथ जोड़े, दबे पाँव नीचे उतरे। चोर की तरह चुपके से द्वार खोला, फिर उसे धीरे से खीचंकर बन्द किया और अब एक मुक्त संसार तुलसी दास के सामने था। सनसनाती हवा की तरह ही वे अपने नये भावों मे बहे चले जा रहे थे। काव्यतरंग पंख बनकर लहराती ही रही, 
अब लो नसानी अब न नसैहीं।अब लौ नसानी अब न नसैहीं।
क्रमशः

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