महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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रत्नावली बच्चे को थपककर सुलाने और उसे अच्छी तरह उढा़ने के बाद पति की खाट पर आकर बैठ गई और बोली-“अब बताओ, काशी में कैसी रही?” तुलसीदास तकिये का सहारा लेकर मस्ती से बैठते हुए बोले “शंकरपुरी मेरे लिए सदैव भाग्यशालिनी रहीं हैं। जानती हो, इस बीच में मैंने कितना कमाया?”
“मैं क्या जानूँ। मेरे हाथ में लाकर रखते तो मैं भी जानतीं। तुम्हारे लिए ही तो कमाकर लाया हूँ। तुम और यह मेरा तारापति।मेरी कमाई की प्रेरणा ही तुम दोनों हो।अन्यथा भिखारी को क्या चाहिए।”
“बड़े भिखारी बिचारे ! पण्डितों को मैंने बहुत देखा है। जब लक्ष्मी नहीं मिलती तो दार्शनिक बन जाते हैं और जब मिलती है तो राजा-महाराजा भी उनके आगे भला क्या ठाट करेगे, ऐसे रहते हैं।”
पत्नी की बात सुनकर तुलसीदास हँस पड़े, फिर कहा--“लक्ष्मी जी मे इस बार मेरी अद्भुत परीक्षा ली, लेकिन राम-कृपा से सफल हुआ लोभ से बचा और अर्थसिद्धि भी अच्छी हो गई।” कहकर तुलसीदास ने रामाज्ञा प्रदान रखे जाने की कथा और सवा लाख का इनाम मिलने की बात सुनाई, फिर पूछा- “मैंने ठीक किया?”
रत्वावली के मन में एक लाख रुपया निकल जाने की कचोट थी। उसने कोई उत्तर न दिया। तुलसी ने फिर तूछा-“क्या तुम इसे अनुचित मानती हो रत्ना?” पैताने की ओर गुड़मुड़ी मारकर लेटे हुए, रत्ना बोली- “धन तो वास्तव में राम जी ने हमें ही दिया था।”
तुलसीदास गम्भीर हो गए, बोले-“स्वार्थ से तनिक ऊपर उठकर सोचो रत्ना। मैं अपने बालबन्धु का अधिकार हनन करता? मैंने तो उन्हें यह भी नहीं कहने दिया कि प्रश्न मैंने विचारा था।”
“इसीलिए तो और भी कहती हूँ कि धन हमारा था। तुमने अपने मित्र की साख बढ़ा दी। एक नई विद्या दे आए, जिससे वे लाखों कमाएँगे। हमारे भाग्य में तो यह पहला सवा लाख आया था।”
रूठी पत्नी की ओर बढ़ कर खुशामदी मुद्रा में उसकी बाँह पर बाँह रखकर तुलसी बोले- “जिसके पास अनमोल रत्नावली हो उसे सवा लाख की भला चिन्ता ही क्या हो सकती है। प्रिये घबराओ मत, बहुत कमाऊँगा। मैं तुम्हे रत्नजड़ित हिंडोले पर बिठाकर तुम्हारे साथ लाड़ लड़ाऊँगा और इतना कमाकर रख जाऊँगा कि वह धन पीढ़ियों तक न चुकेगा।”
पति का हाथ झटककर फुर्ती से उठते हुए रत्नावली ने पूछा- “अच्छा, जाने दो उसे, लाख दे आए मगर बाकी रुपया कहाँ है? ”
“बारह हजार रुपया तो मैं काशी में हनुमान जी का मन्दिर बनवाने के लिए , एक कोठी में जमा कर आया हूँ।जिनकी कृपा से मुझे रामाज्ञा मिली और जीवन
की सारी समस्याएँ हल होतीं हैं उनके प्रति अपनी निष्ठा को बनाए रखना मेरा कर्तव्य था। तीन हजार रुपया और धर्म-कार्यों मे खर्च हुआ। दो पुराने सहपाठियों की कन्याओं का विवाह करवाया। एक दरिद्र ब्राह्मण को घर खरीदवा दिया। ऐसे ही धर्म-कर्म में दान किया। बाकी बचे दस हजार सो वह फिर ऐसे ही दो तीन तांत्रिक अनुष्ठानों में , कुछ ज्योतिष विद्या की कृपा से सात हजार रुपया और मिला। वह सन्रह हजार की हुण्डी भुनाने के लिए राजा को देकर ही मैं यहाँ आया हूँ। घर चलो तो वह राशि तुम्हें सौप दूँगा। हाँ, राजा के निमित्त भी मैने दो हजार रुपये उसमें से अलग कर दिए हैं। बुरा तो नहीं किया?”
“मै क्या जानूँ।” मान भरे स्वर में रत्नावली अपनी नकबेसर घुमाते हुए मुँह फुलाकर कहने लगी - “लक्ष्मी कहती है कि जब में आऊँ तो पहले मुझे घर से निकालने की उतावली मत करो। हमारे बप्पा कहा करते थे कि दान पुण्य करना अच्छी बात है मगर गृहस्थ को सोच-समझकर ही सब कुछ करना चाहिए।” तुलसीदास ने रूठी प्रिया को बाहों में भरते हुए कहा- “देखो प्रिये, तुम भी जानती हो और मैं भी जानता हूँ, मेरी जन्म कुण्डली में संधि के ग्रह हैं। या तो करोड़पति बनूँगा या फिर विरक्त।
“तो बन जाइए न विरक्त, कौन रोकता है आपको?”
“तुम रोकती हो ”
“मैं क्यों रोकने लगी। तुम्हीं लालची भौरें से मेरे आसपास मँडराते हो।”
रत्नावली ने पति की बाँहों से छिटकना चाहा किन्तु और कस गई। तुलसीदास वोले- "मैं स्वीकार करता हू कि तुम्हारे द्वार का भिखारी हूँ और सदा बना रहूँगा।”
“कामी पुरुष अपने लालच में स्त्रियों के आगे ऐसी ही बातें बनाया करते हैं। कल को मैं मर जाऊँ।”
तुलसीदास ने चट से रत्नावली के मुख पर अपना हाथ रस दिया और भर्राए कण्ठ से बोले- “अब कभी ऐसी बात मुँह से न निकालना। मैं इसे सह नही सकता।”
एक क्षण गम्भीर मौन का बीता। पत्नी जान गई कि पति रिसाने हैं। अपने मुँह पर रखा उनका हाथ अपने हाथ में लेकर प्यार से उसे दबाते हुए पति के कंधे पर अपना सिर डालकर बोली- “तुम तो हँसी को भी बुरा मान जाते हो।”
“मैं हँसी में भी यह बात नहीं सह सकता। रत्नावली के बिना अब तुलसी- दास अपनी कल्पना ही नही कर सकता।”
पति का हाथ छोड़कर उनके गले मे हाथ डालते हुए रत्नावली बोली- “अच्छा अब कभी नहीं कहूँगी, पर एक बात गम्भीरतापूर्वक पूछतीं हूँ, बुरा तो नही मानोगे?”
“मैं समझ गया, क्या कहना चाहती हो, किन्तु रत्नू तुम भी यह समझलो कि तुम और केवल तुम ही मेरा मायापाश हो। एक जगह मुझे पुत्र से भी इतना अधिक मोह नही है। तुम न रहो तो उसे किसी को भी सौंप के मैं विरक्त हो जाऊँगा।”
सुनकर रत्नावली तन गईं। तीखे स्वर मे कहा- “स्त्री और पुरुष में यही तो अन्तर होता है। नारी भले ही कामवश माता क्यों न बने किन्तु माता बनकर वह एक जगह निष्काम भी हो जाती है और पुरुष पिता बनकर भी दायित्व-बोध भली प्रकार से अनुभव नहीं करता। सच पूछो तो वह किसी के प्रति अपना दायित्व अनुभव नही करता। वह निरे चाम का लोभी है, जीव में रमे राम का नही।”
तुलसीदास के कलेजे पर मानों गाज गिरी। बँधे पानी में जैसे पत्थर गिरने से लहरें उठती हैं वैसे ही उनके शब्दहीन भाव तरंगित हो उठे। थोड़ी देर तक तो उन्हें अपने मस्तिष्क की सनसनाहट और हृदय की घड़कनों के आगे और कुछ सुनाई ही न पड़ा। फिर मन घबराने लगा, पत्नी की लुभावनी काया का स्पर्श उन्हें भीतर ही भीतर घुटाने लगा।
क्रमशः
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