Monday, 3 July 2023

103

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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राम-राम-राम।” तुलसीदास का स्वर और सारा शरीर कांप रहा था। तब तक पति का स्वर सुनकर रत्नावली भी ऊपर से खट- खट सीढ़ियाँ उतरकर दालान में आई। पति को देखकर चेहरा खिला। प्रिया का घुंधला सा आकार देखते ही प्रिय के बदन मे उल्लास की गर्मी आ गई, बोलें- “पुटलिया खोलो। बीच मे घोती दबी है। स्यात्‌ वह गीली नही हुई होगी।” 
तख्त पर रखी गीली पोटली उठाकर बहन की शोर बढ़ाते हुए गंगेश्वर ने कहा- "लेओ, देख लेओ, सूखी न होय तो अपनी भौजी से एक कोरी धोती निकलवा लो। पर कुरता और दुशाला भी तो गीला है क्या ओढ़ोगे?”
गंगेश्वर की पत्नी अगौंछा लिए हुए तब तक आ पहुँची थी, हँसकर कहा -“जिस गर्माई के लिए आए हैं वह तो सामने खड़ी है, फिर ओढ़ने-बिछाने की चिन्ता ही क्‍या है? ”
रत्ना लाज से गड़ी गीली पोटली को यों सरकाकर बैठ गई कि चेहरा आड़ में हो गया। गंगेश्वर मुस्कराएं। सलहज से अगौंछा लेकर तुलसीदास सर्दी की सिसियाहट को खींची हुई खिलखिलाहट में मिश्रित करते हुए बोले- “हा-हा- हा, आपबीती सुना रही हो भौजी? हम तो राम रसायन की गर्मी में रहते है, कहो तो रात भर ऐसे ही खड़े रहें।”
 आड़ में ही मुँह किए हुए रत्ना बोली -“धोती गीली तो नही है पर सीली है।”
गंगेशवर अपनी पत्नी से बोले-“कहा तो कोरी धोती निकाल लाओ। जमाईयों का तो काम ही है हाथ झुलाते आना और ससुराल से कुछ न कुछ झटक ले जाना।”
रत्नावली को बुरा लगा। खड़ी होकर धोती चुनते हुए ऊपर से भोली और भीतर से पैनी होकर बोली-“जमाइयों जमाइयों मे भी अन्तर होता है। रावणों की आड़ लेकर राम को नकारते वाले, कभी पण्डितो की श्रेणी मे नहीं गिने जाते भैया।” 
धोती चुनकर पति की ओर बढा़कर कहा- “यह लो। दुशाला ऊपर से लाती हूँ।”
पिछले दो महीनों से सारे धर का खर्चा उठाने वाली बहन के बोल सुनते ही भैया-भौजी के विनोद को मानों साँप सूँघ गया । गंगे की बहू तुरन्त ही दूसरे दालान की ओर पग बढ़ाते हुए बोली-“धोती लाती हूँ न।”
“नही, आवश्यकता नहीं है।” कहती हुई रत्नावली ऊपर चढ़ गई। तुलसीदास साले-सलहज के प्रति अपनी पत्नी के चढ़े तेवरों से ही तन-मन को प्रफुल्लित करने वाली गर्मी पा गए। उसी समय बड़ी भतीजी गोड़सी में अंगारे दहकाकर ले आई- “राम-राम, फूफा।”
“आशीर्वाद बिटिया। राम-राम।”
“कहाँ बैठेंगें?” 
“इसे यहीं रख। ढिबरी उठाके पहले बैठक का दिया बाल। वही बैठेगें।”गंगेश्वर ने अपनी बेटी को आदेश दिया।
लड़की के हाथों से गोड़सी लेकर उसे जमीन पर रखकर उकड़ूँ , बैठते हुए तुलसीदास बोले- “अब तो यह बड़ी हो गई है गंगेश्वर।”
लड़की ढिबरी उठाकर दहलीज की ओर बढ़ी किन्तु जैसे ही वह ऊपर की सीढ़ियों  के सामने से गुजरी वैसे ही उसने गोद में तारापति को लेकर अपनी बुआ को उतरते देखा। उन्हें दिया दिखाने के लिए वह वहीं खड़ी हो गई। बच्चे को देखकर पूछा- “मुन्ना सो रहा है बुआ? ”
“हूँ ।” रत्नावली ने छोटा सा उत्तर दिया। उसकी आँखें आग तापते बैठे पति की ओर थीं।बेटे के साथ आती हुई प्रिया को देखकर तुलसी पण्डित का हिया हरख उठा। बच्चे को गोद में लेने के लिए वे एक बार तो उचके, फिर पराये घर का विचार करके थम गए। रत्ना ने पास आकर अपने दाहिने हाथ में लटका हुआ लाल जरीदार दुशाला बढ़ा दिय।तुलसी उठकर आग से तनिक दूर खड़े हो गए। रत्ना की बाँह पर लटका दुशाला उठाते हुए स्पर्श का सुख भी इतने दिनों बाद अनुभव किया। चोला मदमस्त हो गया। ढिबरी का प्रकाश दहलीज की ओर बढ़ते हुए अब दूर हो गया था।फिर भी दुशाले पर दृष्टि डालते हुए पूछा- “यह मेरे दुशाले ही जैसा दूसरा कहाँ से आ गया?”
“बप्पा का है। वे इसे दे गए हैं।” -
दुशाला ओढ़ते हुए तारापति की ओर भावभीनी- दृष्टि से देख रहे तुलसी- दास ने पत्नी की बात से चौंककर पूछा -“कही गए है बप्पा?”
बहन के कुछ कहने से पहले ही गंगेश्वर बोल उठे- “बसंत पंचमी के दिन तीर्थ यात्रा पर गए हैं। हमसे कह गए है कि लौटकर आने की संभावना अधिक नहीं है। अपनी विशेष जमा-पूँजी सब तारा पति को ही दे गए है।”

रत्नावली को बुरा लगा, पूछा-“कौन सी विशेष संपत्ति थी जो….”
“अरे बहिन, गंजेड़ी भंगेड़ी की बातों का बुरा क्‍यों मानती ह। यह तो जिस थाली में खाते है उसी में छेद करते हैं।” गंगेश्वर की पत्नी ने कहा।
“चुप कर, नहीं तो संन्यास लेके निकल जाऊंगा।”
अच्छी तरह से दुशाला ओढ़कर, पत्नी की गोद से अपने बेटे को लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए तुलसी पण्डित बोले- "सन्यासी बनकर फिर भौजी के आगे ही भीख मांगने आओगे।”
“वह तो सभी आते हैं। नारी बिना किसी की गति नही, न हमारे जैसे फक्कड़ों की, न तुम्हारे जैसे परम पवित्र शास्त्रियों की। यात्रा से आए तो सीधे भागे भागे यहीं चले आए। एक रात भी तो सबर नही हुई। हा-हा-हा।” पति की बात सुनकर तुलसीदास की सलहज हँस पड़ी।
पिता की गोद में आते ही तारापति चौंककर जाग पड़ा। उसे देखने की खुशी में तुलसी ने साले के विनोद को झेल लिया। बात बनाते हुए बोले- “मै तो इसके मोह में झुकाया हूँ। चलो, चलके बैठे भाई। अरे वर्षा तो थम गई लगती है (चलते हुए दालान से आकाश को झाकँकर) तारें भी निकल आए।
गंगेश्वर गोड़सी उठाते हुए तुलसी से बोला- “शास्त्री जी, थकान लग रही हो तो भाँग-वाँग घोंट दें तुम्हारे लिए?”
“अरे भैया, भाँग तो तुम्हारे जैसे परम पुरुषाथियों के लिए ही शिवजी ने बनाई है । हम तो अपने कर्मानुसार साक्षात्‌ भागँ बनकर ही पैदा हुए हैं, पिसते हैं, छनते हैं।”
“और उसका नशा हमारी ननदियां को चढ़ता है।” कहकर सलहज खिल- खिला पड़ी।तुलसीदास और गंगेशवर भी हँस पड़े। लाज भरे क्रोध में रत्नावली अपनी भावज को धक्का देती हुई बोली- “जाओ भौजी तुम बड़ी वो हो।”
आधी-पौन घड़ी के बाद भोजन इत्यादि करके तुलसीदास और रत्नावली जब अपने कमरे में पहुँचे तो चहक रहे थे, तुलसी ने कहा- “विश्वामित्र सच कह गए है कि जाया ही घर होती है। आज मैं परम आनन्दमग्न हूँ।”
क्रमशः

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