महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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रामू पैर दबाते हुए अचानक उत्साह मे बोला- “एक बार आप बताते रहे कि तीर्थाटन में भगत जी के साथ आपको मुगल फौज ने वेगार में पकड़ा था।”
बाबा मुस्कराए, आँखों में स्मृतियाँ झिलमिला उठीं। बोले- “हाँ रे, उसकी तो याद मात्र से ही मेरी पीठ इस समय भी भारी हो उठी है। हमारे उत्साह के कारण बेचारे भगत जी को भी बोझा ढोना पड़ गया था।”
बेनीमाधव जी के चेहरे पर उत्सुकता झलक उठी, कहा- “हमें उस प्रसँग को सुनाने की कृपा करेंगें गुरू जी।”
बाबा बोले- “जब जीवन का मूल्याँकन करने बैठा हूँ तो उसे भी सुना दूगाँ। जीवन-माला की प्रत्येक मंज़िल पर मुझें श्री रामचरणानुराग मिला। अत: कथा मेरी न होकर भक्ति-धारा के प्रवाह की ही है, फिर उसे सुनाने में मुझे संकोच क्यों हो।” कहकर बाबा चुप हो गए। क्षण-भर ऐसे ही बीता, फिर वे रामू के हाथों से अपना पैर झटका देकर छुड़ाते हुए सहसा उठ बैठे। उनकी दृष्टि किसी दूरागत दृश्य को देख रही थी। स्मृति लोक में नगाड़े बज रहे थे और अंधकार क्रमशः उजाले में परिवर्तित होता चला जा रहा था, मानों- दृष्टि में हिमाच्छादित कैलास पर्वत और मानसरोवर का परमपावन और सुहावन दृश्य झलका। नगाड़ों की ध्वनि मानों हर-हर कर रही थी।
तुलसी मेघा भगत और कैलासनाथ के साथ मानसरोवर के किनारे खड़े थे।कैलास बोले- “अपने नाम के पर्वत को तो दूर-से देख रहा हूँ, किन्तु यदि इसके ऊपर डमरू त्रिशूल धारी गंगाधर चन्द्रशेखर जी मुझे दिखलाई पड़ जायें तो फिर यह यात्रा ही नहीं यह सारा जीवन सफल हो जाय।”
“अपनी इच्छा को तीव्र करो कैलास, जिस वस्तु पर जिसका सत्य स्नेह होता है वह उसे अवश्यमेव मिलती है।”
तुलसी मेघा भगत की बात सुनते हुए झील के प्रवाह को देख रहे थे। हिलोरें लेती हुई लहरें सहसा नाचत्ते हुए नर्तकी के पैरों के घुघँरू-सी लगने लगती हैं। नृत्यरत पगों में बड़ा चांचल्य, बड़ी मादकता, बड़ी कविता है। तुलसी के बिम्ब और गूँज दोनों ही मुग्ध हो रहे हैं। चेहरे पर अपार सुख बरस रहा है। तभी मेघा भगत का स्वर कानों मे पड़ता है, वे कह रहे थे- “मेरे लिए यह मानसरोवर राम उजागर बन गया। लहर लहर में सीताराम-सीताराम-सीताराम है।”
तुलसी की अंतर्चेतना गूँजी - “देखा, यह है सत्य स्नेह, तू झूठे ही राम- भक्त बनने का ढोंग करता है।”
तुलसी की मनमोहिनी नृत्य करती कामिनी, खंडित मूर्ति की तरह छपाक से पानी मे गिरकर ओझल हो गई। तुलसी की पलकें नीचे झुक जातीं हैं, दृष्टि आत्मस्थ हो जाती है। अपना ही होश डाटँता है- “मोह भंग कर रामबोला। तेरी भक्ति क्या क्षणभंगुर है?”
“नहीं नहीं“- प्राणों के भीतर विकल सत्य गूँज उठा- “तब फिर राम को देख, जैसे प्रबल उत्साह से तेरे भीतर यह मोहिनी भड़क उठती है ऐसे ही जब राम जी के दर्शन होने लगेंगे तब तेरा जन्म सार्थक हो जाएगा। राम को देख।”
तुलसी सावधान होकर राम का ध्यान करते हैं। पहले ध्यान-पट पर कुछ भी नहीं आता, फिर एक धनुर्धारी आकर बहुत हल्का सा झलकता है। क्रमश: उभरता है किन्तु पूर्ण रूप से नहीं और जब उभरता है तो वह आकार अचानक लुप्त जाता है। मन में गूँज उठी 'राम-राम'। तुलसी की काया पर सिहरन आ गई। ध्यान-पट फिर शून्य हो गया। मनोलोक में नया दृश्य आरम्भ हुआ। तुलसी अपने हाथों मानों एक मूर्ति गढ़ रहें हो। मूर्ति बिजली की रेखाओं से गढ़ती चली जाती है। सारी मूर्ति गढ़ गई। धनुष, तीरों-भरा तरकस, मुकुट, राजसी वेश- किन्तु चेहरा फिर लुप्त हो गया। ना, ना,ना - तुलसी की बहिर्चेतना तक थरथरा उठी। उनकी यह नकारने की ध्वनि इतनी स्पष्ट थी कि कैलास और मेघा भगत चौंक कर उनकी ओर देखने लगे।
“क्या हुआ तुलसी ?” कैलास ने पूछा ।
“कुछ नहीं”
“कुछ तो अवश्य था तुलसी। किसको घबरा के न-न कहा? ”
“किसी को नहीं।” तुलसी ने घबराहट भरा उत्तर दिया।
“छलना बड़ी विकट होती है राम। बड़ा नाच नचाती है।” मेघा भगत मानों अपने आप ही से कह उठे।
हारे, घबराये हुए तुलसी उन्हें करुण दृष्टि से देखने लगे। दृष्टि मिलते ही उन्होंने कहा- “घबरा मत मेरे भइया सत्य भी सहसा प्रकट नही होता। एक बार तो वह मन में ऐसा प्रकट होता है कि जैसे प्रत्यक्ष ही हो, परन्तु फिर उस प्रत्यक्ष को वस्तुत: प्रत्यक्ष करने में मनुष्य को लोहे के चने चबाने पड़ते हैं।”
“जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।”
तुलसी गंभीर भाव से सिर झुकाकर सुनते हैं। इस समय उनकें प्राण राम ही राम रट रहे हैं।
“राम-राम”- बाबा अपने गम्भीर चितंन लोक से उबरकर बर्हिचेतना के धरातल पर आ गए। एक बार रामू की ओर देखा फिर वेनीमाधव से दृष्टि मिलाते हुए बोले- “अपनी गहरी थाह लेने को मेरा ये मन और गहरी थाह में चला गया था। अस्तु….. तो मैं क्या कह रहा था?”
“मुगलों के द्वारा बंदी किए जाने की बात उठी थी।”
“हाँ ऐसा हुआ कि हम लोग मानस होकर, बदरिकाश्रम आदि होते हुए हरिद्वार पहुँचे। वहाँ सुनने मे आया कि हुमायूँ ने दिल्ली फिर से जीत ली थी, किन्तु उसकी मृत्यु हो चुकी थी।लोदियों के पठान तथा हिन्दू सैनिकों ने मिलकर अपने सेनापति हेमू वक्काल को दिल्लीश्वर की गद्दी पर आसीन कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान के उपरांत तीन सौ वर्ष बाद दिल्ली पहली बार स्वतंत्र हुई थी। हरद्वार में अनेक साधु और ब्राह्मण बड़े उत्साहित हो रहे थे कि अब फिर से साधु -सन्तों की प्रतिष्ठा होगी तथा गो-ब्राह्मणादि को संरक्षण मिलेगा।कई लोग नये दिल्लीश्वर महाराज हेमचन्द्र विक्रमादित्य को आशिर्वाद देने के लिए दिल्ली जाने को ललक रहें थे।
कैलास भी उत्साहित हुए। परन्तु मेघा भगत बोले- "वहाँ जाना मेरी समझ में उचित नही होगा। अभी मुझे स्थायित्व का आभास नहीं होता है। लगता है युद्ध होगा। कदाचित अन्य प्रकार की आपदायें भी वहाँ जाकर हमें भोगनी पडे़ं।
कैलासनाथ आवेश में आ गए, बोले- “विपत्तियों से क्या डरना महाराज। युद्ध होगा तो उसे भी देखेंगे। क्यों तुलसी?”
“हाँ, वीर भूमि के दर्शन करना तीर्थ दर्शन समान ही पुण्यदायक होता हैं” तुलसी की बात सुनकर मेघा भगत मुस्कराए।
क्रमशः
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