Wednesday, 10 May 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
63-

सब लोग हँस पड़े। संत वेनीमाधव ने बाबा से पूछा- “गुरू जी आपने यह व्यसन कभी नहीं किया?” 
नटखट बच्चे की तरह वेनीमाधव की ओर देखकर बाबा मुस्कराए, फिर अपनी उँगलियों से अपनी छाती को छूकर कहा- “अरे यह काया भागँ का पौधा बनकर ही उपजी थी, तुलसी तो राम-कृपा से हुई है। हमारी पाठशाला के व्यवस्थापक मामा जी की भागँ घोटते-घोंटते ही मुझे उसका इतना नशा चढ़ गया कि फिर पीकर क्‍या करता।” कहकर बाबा हँसे। बेनीमाधव जी ने पूछा- “आपने कहाँ कहाँ तीर्थाटन किया प्रभु?”
“अरे राम भगत कहाँ तक हिसाब बतावें। तब हमारी मन की आँखें कुछ काल के लिए अंधी हो और गईं थीं। मेघा भगत, अंधे की लाठी के समान थे। आयु में भी हमसे लगभग आठ-दस वर्ष बड़े थे।राम जी ने अपनी ड्योंढी तक लाने के लिए हमारे लिए नेह-नातों की जो सीढ़ियाँ बनाई थीं उनमे पार्वती अम्मा थीं , सूकरखेत वाले बाबा थे और यहाँ पूज्यपाद गुरू जी महाराज के रूप में मुझे पिता मिले। बजरंगबली को मैंने सदा अपना सगा बड़ा भाई करके ही मन से माना है।बड़ी घुटन में उनसे गिड़गिड़ाकर कहता था कि कभी प्रत्यक्ष होकर भी मेरी बाँह गह लो।मैं यह मानता हूँ कि मेरे लिए बजरंगी ही मेघा भगत का रूप धरकर मुझे नये प्राण देने के लिए आ गए थे।”
“आप भगत जी से बहुत अभिभूत हैं?”
“अभिभूत तो इस भूतभावन की परम पावन काशी नगरी से हूँ। काशी के वायुमण्डल ने ही तुलसी को तुलसीदास बनाया। इसने मुझे गुरु, माता-पिता, मित्र, भाई, यश, अपयश और राम पद नेह सभी कुछ दिया।” कहकर बाबा रुके, फिर हँसकर कहा- “हम तुम्हारे जी की उतावली जान रहे है बेनीमाघव।तुम्हारा मन हमारे तीर्थाटन का वृत्तांत जानने में लगा है किन्तु भाई, हमारा भी तो मन है। जब हम उन बीते क्षणों का द्वार खोलते है तो एक-एक क्षण के अनंत भंडारों से तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर खोज लाने के सिवा हमें और भी बहुत कुछ आकृष्ट कर सकता है। अब हमारा अन्तकाल आ गया समझो। बहाने- बहाने से पुराने दिन, पुराने लोग, इन नब्बे वर्षों के अनगिनत क्षणों का हिसाव लगाने को जी अधिक चाहता है।कितना करना था, कितना किया, आगे के लिए धर्म को और किस तरह से साधें कि जिससे इसी जन्म में अधिकाधिक सिद्धि मिल जाय।राम पद नेह प्राप्त करने का उछाह मेरी सासों में एकरस होकर ही इस देह से बाहर जाये, बस यही एक कामना है।”
अँधेरा झुक आया है, रामू आ जाय तो भीतर चलें। पहर-भर रात बीते आ जाना वेनीमाधव, आज रात तुम्हें और रामू को अपने बीते क्षण अर्पित करूँगा।

रात के समय बाबा आपनी चौकी पर सुख से लेटे हुए थे। बेनीमाधव चौकी के नीचे आसन पर बैठे थे और रामू उनके पैर दबा रहा था। दीवाल पर पड़ते हुए दिये के प्रकाश में हनुमान की मूर्ति चमक रही थी। बाबा कह रहे थे- “जब मैंने काशी छोड़कर तीर्थाटन करने का निश्चय किया तो मेरी अइया, गुरु भगवान की सहधर्मिणी बहुत दु:खी हुई थीं। मामा ने तो क्रोध में आकर मुझे और मेरी ही लपेट में भगत जी को भी शाप तक दे डाला था”- खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं- “कैसे-कैसे निर्मल, लोग थे।मामा तो बस क्या कहें, उनमे बाल युवा, प्रौढ़ और वृद्ध सभी रूप ऐसे स्पष्ट आभिव्यक्त होते थे कि देख-देखकर मन खिल उठता था। हम आइया की चौकी के नीचे दालान में थे।आईया कह रहीं थीं- “मेरी इच्छा तो यही थी कि तुम यहीं रहते। एक बार तुम्हारे गुरु महाराज ने मुझसे कहा था कि रामबोला के संरक्षण में बड़े मुनुवा, छोटे मुनुवा हमारे बाद भी सुरक्षित रहेगें। हम दोनों का तुम्हारे प्रति जो मोह है वह तुम जानते हो।”- आँखें भर आईं। अइया पल्‍ले से आँसू पोंछ रही ही थीं कि मामा- भीतर आए। उनके हाथ में सोंटा भी था,आते ही परशुरामी मुद्रा में तुलसी को देखकर अपनी बहन से कहा- “तुम इस मूर्ख के लिए रोती हो जीजी।हजार उल्लू के पठ्ठे जब पैदा होकर मरते है तब उनकी मिट्टी गूँथकर भगवान एक तुलसी ग़ढ़ता है।अच्छा भला विवाह तय किया इसका लड़की ऐसी सुन्दर रूप में उस, कोतवाल क़ी चहेती को भी लज़वाबै और वेद पढ़ने में तो मानों सुग्गा है सुग्गा। बीस-पच्चीस हजार की माया, रूप सगुण, लक्ष्मी, सरस्वती,सब एक साथ और एक सास ससुर घर में बस। सो इनसे सहा नहीं गया। अब, मेघा भग़त‌ के साथ गाँव-गाँव डोलेंगे।लाख लाख दु:ख सहेगें।कलिकाल के लड़कों की बुद्धि बिल्कुल भ्रष्ट है ज़िज्ज़ी।इनसे बात करना भी वृथा है।”
अइया बोली - “इसकी बुद्धि तो भ्रष्ट नहीं है भइया, यह राम मार्ग पर जा रहा है बेचारा।”
“राम नही भाड़ भड़साई मार्ग कहो।अरे घर गृहस्थी लेकर क्या लोग राम राम नही जपते है? अब मेघा और तुलसी जैसे लड़के घर गृहस्थी की राह छोड़कर भगतबाज़ी की बात करेगें तो इनसे पूछो कि ससरऊ पढ़े क्यों थे। फिर राम राम तो मूरख भी रट सकता है।”
“क्या कहूँ मामा श्रीगुरू चरण रूपी पारसमणि का स्पर्श पाकर भी यह अभागा जंग लगा लोहा ही बना रहा।”
मामा लाठी तानकर आँखें निकालते हुए बोले- “देख बे मेरे सामने जो तूने दर्शन ज्ञान बधारा तो मारते-मारते अभी भुरकस निकाल दूगाँ तेरा।”
“रहे देव भईया अपनी भाँग का क्रोध इसके ऊपर न डालो।”
“अरे,क्या जिज्जी, मैं सरजू मिसिर की पत्नी से पक्का कर आया था कि चाहे और कुछ न देना लेवा पर बड़हार में ग्यारह मिठाइयाँ परोस देना। हम संतुष्ट हो जाएँगें। चुन्नी साहब से पक्का, किया रहा कि सरऊ उस दिन जो तू हमें कस्तूरी में भाँग छनाय देओगे तो तुम्हें हम शुद्ध अन्त करण से बेटा होने का आशिर्वाद देगें।सो बह हाथ जोड़कर राजी हो गया था। अब यह हमारी सारी योज़ना मिट्टी में मिलाकर घर से भागा चला जा रहा है। जा अभागे, अब इस ब्राह्मण का भी शाप है कि तू ग्रहस्थ न बनकर भगत ही बनेगा।”
तुलसी हँस पड़े, मामा के पैर छूकर कहा- “गुरुजन प्रेमवश जब शाप भी देते हैं तो ऐसा कि वह वरदान बन जाता है।”
क्रमशः

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