Tuesday, 9 May 2023

tc 62

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
62-

वह बाँकी चितवनों से तुलसी को ताकने वाली मीनाक्षी मोहिनी अब सजीव देहनारी न होकर मात्र एक मूर्ति- भर ही रह गई थी, जिसमें प्राण नहीं केवल कलात्मक शक्ति से उत्पन्न प्राण का आभास मात्र ही था। तुलसी अब उससे वीतरागी हो चुके थे। आकर्षण अब वहाँ नहीं वरन्‌ ज्योति के फर्श पर टिके हुए श्यामल-गौर, पाद-पद्मो पर था। सीता माता के अलक्त से रंगे हुए अरुणाभ चरणों में मणियों जड़ा आभूषण तुलसी की आँखों में अपनी कौंध भर रहा था। पैरों की दसों उँगलियों अँगूठो में सोने के जड़ाऊ छल्लों टखनों पर बँधी पायलों में पिरोई हुई हीरे-मोती जड़ी सोने की लड़ियों की चमक में बाबा को अपने ही चेहरे दिखलाई देते थे। जगदम्बा ने मानों अपने चरणों मे तुलसी को गहना बना पहन रखा हो।पास ही दाहिनी ओर धरती पर टिके हुए धनुष के पास ही वे तेजपुज्ज श्याम चरण थे जिन्हे देखते ही बाबा की आनन्द समाधि लग गई।संत वेनीमाधव का निरंतर जूझता रहनेवाला मन बाबा की आत्मकथा के इस प्रसँग को सुनकर गम्भीर हो गया।

सूर्यनारायण धीरे-धीरे अस्ताचलगामी हो रहे थे। आकाश रंगीन बादलों की चित्रपटी बन गया था। बाबा अस्सी घाट के एक तखत पर सूर्य भगवान से टकटकी लगाए, हाथ जोड़े बैठे हुए मौन प्रार्थना-लीन थे। घाट पर उनके साथ वेनीमाधव विराजमान थे। रामू गंगाजल के निकट सीढ़ी पर बैठा हुआ ताबे की कलसी को बालू से चमचमा रहा था। एक-दो व्यक्तियों को छोड़कर घाट प्रायः सूना था। स्नान करनेवालों की भीड़ से मुक्त होने के कारण गंगा इस समय वैसी ही संतोषभरी शान्त लग रही थी जैसी कि दुहे जाने के बाद गाय लगती हैं। अस्त होते हुए सूर्य की ओर दूर पर एक नाव जा रही थी। परन्तु उससे नदी और वातावरण पर छाई हुई मनोरम शांति को कोई व्याघात नहीं पहुँच रहा था। रामू से दो सीढ़ी ऊपर बैठा भाँग घोंटता हुआ एक अधेड़ व्यक्ति किसी पहले से चलती हुईं बात के प्रसँग में कह रहा था-"अरे, हमने अपनी आँखों से देखा है। ये कोने वाली दीवाल से सटा हुआ वह रात-भर एक टाँग पर खड़ा रहता था। बस हाथ जोड़े हुए ध्यानमग्त होकर जप किया करे, न हिले न डुले- ऐसा कठोर तपस्वी रहा।”
उस व्यक्ति के पास ही, गीले बादामों से छिलके उतारते हुए दुसरे अधेड़ व्यक्ति ने कहा- "दिन में भी वह अपनी कुठरिया में बैठे- बैठे जप किया करता था। मैंने तो उसे कभी सोते हुए देखा नही भैया। ऐसी कठिन तपस्या करके भी बड़ा अभागा रहा बेचारा।”
कलसी को पानी से घोते-धोते तनिक रुककर रामू ने बातें करनेवाले व्यक्तियों की ओर सिर घुमाकर पूछा- “अभागा क्यों था, मुन्नू काका?”
“अरे, एक सेठ की जवान-जवान विघवा लड़की रही। वह उसके पीछे लगी। रोज आवे, फल-फलारी मेवा-मिष्ठान्न लावे। बिचारा बहुत भागा उससे पर उस लौडिया ने छोड़ा नहीं। ऐसी दीवानी बनके उसकी सेवा में लगी कि उसका जोगजप सब उस लौडिया की मद-भरी आँखों में बह गया।”
बादाम छीलनेवाला व्यक्ति वोला -“राम जी जिस-तिस को अपनी भक्ति  नहीं देते है भैया। जो ऐसा होता तो सब कोई हमारे गुसाँईं बाबा की तरह से न हो जाते। क्या हम कुछ झूठ कहा बाबा?” -अपने से दो-तीन सीढ़ियाँ ऊपर तखत पर बैठे बाबा की ओर देखकर उसने पूछा। बाबा बोले- “राम तो सब पर कृपा करते है देवतादीन। हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस अपजस बिधि हाथ। अपने प्रतिफलन के लिए पूर्वजन्म के शुभाशुभ कर्मो का भी हमारे इस जीवन के कर्म में प्रबल आकर्षण होता है। यही तो माया है। इस माया का विषेला तीर एक न एक बार सभी को लगता है-

“श्रीमद वक्त न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि,
मृगनयनी के नयनसर की अस लाग न जाहि।”

दोहा पढ़ते हुए बाबा की आखो में एक बार वर्षो पहले की मोहिनी छवि मांसल होकर उभर आई। उसने दोनों हाथ नृत्य की मुद्रा में ऊँचे उठाए और देखते ही देखते मोहिनी चांदी की चमकती सीढ़ी बन गई। जिसपर चढ़ते हुए तुलसीदास अपने राम के पास आधी दूरी तक पहुँच गए। राम अब भी आकाश में थे किन्तु सीढ़ी चुक गई थी। बाबा के ध्यान-पट पर अपना युवारूप सीढ़ी के आखिरी डण्डे पर खड़ा हुआ अपने राम तक पहुँचने के लिए अधीर दिखलाई दिया। युवा तुलसी के अपने और अपने इष्टदेव के बीच मे रहस्य की सतरगी पारदर्शी घटाओं में रतनों का चेहरा चमक उठा।
अपने अंतदृश्य को देखकर बाबा मुस्कराए। पैर के तलुए पर थीमें से हथेली रगड़ते हुए मुख से भाव-भरा श्रीराम शब्द उच्चारित किया। 
तभी नीचे से देवतादीन सिल की भागँ समेटकर उसका गोला बनाते हुए बोले-“साचँ कह्यो बाबा, जवानी ससुर बंबडर होत है बंबडर। जेहिका राम बचाय ले जायै वहै भागवान है। हम लखनऊ मा रहत रहे, महाराज, तब हमें कसरत-कुस्ती का बड़ा शौक रहा। तौन एक नउनिया हमारे ऊपर आसिक हुए गई। वहै हमका यू भागँ का शौक लगाइस रहै। राम जी की किरपा भई, हम एक व्यौपारी की नौकरी पाय गयन, तब हियाँ चले आयत। उइ निगोड़ी का साथ छूटा। पर ई महारानी विजया महामाया हमरे संगे ऐस लिपट गईं कि देखौ, आपी के लाज-सरम हम नाहिं करिति हैं। मुदा एक बात है बाबा, हम जब भागँ पीसत रही, तो “ओम नम: शिवाय, ओम नम शिवाय” जपत रहिति हैं। यहिते माया हमका लिपटाय न सकी।”
“लिपटाए तो हुए है। बरसों से देखता आ रहा हूँ , साम-सबेरे दो घड़ी का समय तुम अपनी उस साथन से लिपटने में नष्ट कर देते हो। तुम जो इतना समय अकेले मंत्र जपने में लगाते तो तुम्हें उस समय के सदुपयोग का अधिक सुफल मिलता।”
बाबा की बात सुनकर देवतादीन, अपनी झेंप को अपनी मस्ती से दबाकर बोला-“अरे बाबा, अब दोष है तो दोषे सही हमार,का करी? जोरू न जाता, राम जी से नाता। ई बनातेदारी के कारण हमका आपके नित्य दरसन मिलत है और आपके चरतन में हम भागँ घोटिति हैं। दिन मा चार घटा गल्‍ले की दलाली और हिया ते जाइके दुई घड़ी…..”
“अरे बसकर अपनी बक-बक।नहीं तो आज ओम नम शिवाय के बजाय यह बक-बक ही भागँ के साथ तेरे पेट में जाएँगी।”
क्रमशः

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