Monday, 8 May 2023

tc61

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
61-

प्रिय का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उसने सहसा गाना आरम्भ कर दिया-

“तन तरफत तुब मिलन बिन अरू दरसन बिन नैन। 
श्रुति-तरफत तुब बचन बिन सुन तरुणी रसऐन॥”

मोहिनीबाई ने दूसरा दोहा बड़ी अदा और नखरे के साथ गाया-

“बड़ो नेह तुलसी लग्यो और न कछू सुहाय॥
तुलसी चंद्र चकोर ज्यों तलफत रैन विहाय॥”

मोहिनी के स्वर में सचमुच ही बड़ा आकर्षण था। तुलसी के प्राण संगीत के स्वर में लहरा उठे। तुलसी हसँ पड़े।मोहिनी का मानों सब कुछ मिल गया था। पूर्ण तृप्ति के साथ प्रिय को देखती हुई वह खिलकर बोली- “अच्छा उठिए, भोजन कर लीजिए। असुर का राज्य है। यह सारे दास-दासी उसी के हैं, मैं शीघ्र से शीघ्र आपको लेकर यहाँ से निकल जाना चाहती हूँ।”
सुनते ही तुलसी चौंक  उठे, पूछा- “कहाँ?”
“काशी राज्य की सीमा से बाहर, जहाँ उसमान का शासन न हो”

तुलसी गंभीर हो गए।मोहिनी का आनन्द से चमकता मुख इस यथार्थ-बोध से स्थाह पड़ गया।आँखों की ज्योति बुझ सी गई परन्तु मन के उल्लास ने इतनी जल्दी सहसा अपने ऊपर भय का आरोपण पसंद नहीं किया।अपनी बेवसी पर क्रोध चढ़ आया।उसका चेहरा आवेश से फड़फड़ा रहा था। आँखें ऐसी
लग रही थी जैसे पानी में आग लगी हो।
तुलसी ठिठककर रह गए, ऐसा लगा संस्कारों ने पैरों के आगे मानों लक्ष्मण- रेखा खींच दी। मन फिर विचारमग्न हो गया। मोहिनी के आँसू आँखों से ढुलक पड़े, गालों पर बहने लगे, होठों के किनारों पर सुबकियों की फुदकन बढ़ने लगी।चुपचाप खड़ी आँसू बहाती हुई मोहिनी का कलेजा फिर तड़पा। रुँधे हुए कण्ठ से बोली - प्रेम विचार-विचरण मात्र से नहीं होता ब्रह्मचारी जी, वह मनुष्य को कर्म-संलग्न करना जानता है।”
इस व्यंग्य से तुलसी का आत्मतेज भड़क उठा, बोले -“तुम्हारा कृतज्ञ हूँ मोहिनी बाई, तुम्हारी इस बात ने मेरे मन में प्रेम का स्वरूप उजागर कर दिया।नही, मैंने तुमसे प्रेम नही किया और तुम भी निरचय ही काम-क्षुधावश मुझ पर आसक्त हो। यह प्रेम नही है, तृष्णा है। प्रेम मैं राम से करता हूँ। तुम्हें पाकर कदाचित शीघ्र ही मेरे मन में यह असंतोष भड़केगा कि नारी तृष्णा के कारण मैंने राम को खो दिया।”
मोहिनी दीवानी-सी दौड़कर तुलसी से लिपट गई और बिलखकर कहने लगी-“यह न कहो प्राणधन, मेरे मोह-मंडित काचँ के महल को सन्यास के पत्थर न मारो। यह रूप, यह यौवन, यह देह भोगने के लिए है। इसे भोगकर ही प्रेम उपजता है।”
तुलसी के अंतर का स्वर नरहरि बाबा का स्वर बनकर बोल उठा- “कौड़ी के लालच में अपनी गाठँ-बँधी मोहर गवाँएगा मूख ? वेश्या के लिए राम को त्यागेगा।”
”ना, ना, मुझे जाने दो मोहिनीबाई, मैं अप्राप्य वस्तु के प्रलोभन में अपने आपको कदापि नही डालूँगा”- कहकर तुलसी ने अपने-आपको बन्धन से मुक्त कर लिया और एक डग पीछ चले गए, कहा- “तुम अपनी अभिलाषाएँ किसी और से पूरी करो मोहिनीबाई। मैं राम का गुलाम हूँ, तुम उसमान खां की चाकर। हम दोनों अपने-अपने बंधनों से बंधे हैं।”
रोते हुये मोहिनी ने कहा- “मनुष्य के मन से सुंदर कुछ नहीं होता।ईश्वर यदि हैं तो मनुष्य के मन में ही समाये हैं।उसे तोड़ कर जाओगे पंडित जी तो तुम्हें राम कदापि नहीं मिलेगें।एक अबला का शाप तुम्हें खा जायेगा।”
तुलसी को बुरा लगा, व्यंग्य भरी हँसी हँस कर बोले- “जब महाश्मशान के सारे भूत मिलकर मेरे राम प्रेम को न खा सके तो तुम्हारा वासना प्रेरित शाप मेरा क्या बिगाड़ लेगा? अब मुझे और अपने को व्यर्थ के छलावे में न डालो।मैं जाता हूँ, जै सियाराम।”
तुलसी की गम्भीर बातों के यथार्थ में मोहिनी बँध गई थी।उसकी मनोदशा उस शेरनी के समान थी जो जंगल के प्रेम में अपना पिंजड़ा तुड़ा कर भागी हो किंतु फिर पकड़ी जाकर दोबारा पिंजड़े में बंद करने को बाध्य की जा रही हो।अपनी विवशता के बोझ से मोहिनी का मन आँसुओं के समुद्र में डूबने लगा।वह अपने आपे में नहीं थी।तुलसी जाने लगे तो उसे सहसा चौंक कर होश आया, हाथ आगे बढ़ा कर भर्राए हुये स्वर में कहा- “भोजन तो करते जाईये।”
तुलसी रूके, मुस्कराये, कहा- “आज की यह पार्थिव भूख ही मेरी वैचारिक भोजन बन गई है।”

तुलसी ने सीढ़ियाँ पार कीं, ड्योढ़ी, बगीचा और फाटक पार किया, बाहर निकल आये।तुलसी का अहम बुरी तरह सिसक रहा था और इस सिसकन में ज्ञान की गूँज सहारा सी बनकर आती थी। तुलसीदास टूटा अधीरा-सा मन लेकर सीधे मेघा भगत के यहाँ ही पहुँचे।
दिन का समय था। मेघा भगत भोजन करके अपने भीतर वाले कमरे की चौकी पर लेटे कुछ गुनगुना रहे थे। बाहर से किसी भक्त की आवाज कानों में आई-“नहीं , नहीं , यह उनके विश्राम का समय है। इस समय कष्ट न दीजिए।”
“कौन है, सकता?”मेघा भगत ने तकिये के सहारे बैठते हुए पूछा।
“तुलसी पंडित हैं, महाराज।”
“अरे आ रे, मेरे भइया।” कहकर मेघा भगत उछलकर अपनी चौकी से उठ खड़े हुए और बदहवास से आगे बढ़े। उसी समय तुलसी ने भीतर प्रवेश किया। एक बार आँखों का आमना-सामना हुआ। तुलसी को आँखें छलछलाईं फिर नीची हो गईं, फिर जैसे भटका बच्चा अपनी माँ की गोद में आया हो वैसे ही झपटकर वे आगे बढ़े। थोड़ी देर तक दोनों एक-दूसरे से चिपके आँसू बहाते रहे।ऐसे ही कुछ क्षण बीत जाने पर मेघा भगत ने हँसकर कहा- “कहते हँसी आती है, पर मेरे राम प्रभु अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी होकर भी अपने भक्तों के लिए काम धोबी का करते हैं। जीव को, जहाँ उसमें मैल होता है, ऐसा पछाड़- पछाड़ कर धोते है कि बस देखते ही बनता है। मैं तो उनके इसी सौंदय पर रीझा हूँ रे। बोल, तुलसी, आज चलूँ पूज्यपाद शेष महाराज जी के यहाँ? तेरी ओर से मैं आज्ञा मागूँगा। चल तीर्थ कर आएँ।”
तुलसी बोले- “आप मेरे जी की बात कह रहे हैं। इस समय काशी में मेरा मन नहीं लगेगा। मेरा वातावरण बदलना ही चाहिए।”
♦️♦️♦️♦️♦️♦️♦️

स्मृति-पट से मोहिनी का प्रसँग बीत जाने के बाद बाबा को ऐसा लगा मानों उनका एक जन्म बीत गया हो। ध्यान में वे फिर से एक बार मोहिनी के वर्षों पुराने चेहरे को खींचकर लाने का प्रयत्त करने लगे।
क्रमशः

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...