महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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यह आजन्म भोग-विलास में डूबा रहनेवाला व्यक्ति भला मेरे जैसे पंडित और तपस्वी को शिक्षा देने का अधिकार रखता है।मूर्ख कही का, पर क्या मुँह लगूँ इसके। खीर मे कंकड़ की तरह आकर पड़ा है। कैसा अन्याय-भरा है विधि का विधान कि मेरे जैसे गुणी व्यक्ति के लिए तो मोहिनी का प्रेम-चोरी की वस्तु है और इसके समान मूर्ख और दम्भी पुरुष सीना जोरी से उसके ऊपर अधिकार करता है। मेरे गुणों की आभा दब गई। कैसे करूँ कि इसके सामने से हट जाऊँ? देखो, पड़े पड़े गधे सा झपकने लगा। सुना है अफीम बहुत खाता है। असुर कही का। उसमान खां अपनी तोंद पर दोनों हाथ रखे मुँह फाड़े अधलेटी मुद्रा में ही खुर्राटे भरने लगा था। अम्मा पहले ही कमरे से गायब हो चुकी थी।तुलसीदास ऊब चले थे। उसमान खां का मुख देखना उन्हें अच्छा नही लग रहा था। वह शिष्टाचारवश कोतवाल की ओर पीठ घुमाकर तो न बैठे पर मुँह मोड़ लिया। फिर भी तुलसी के भक्ति रस पर वीभत्स रस का घिनौना आवरण पड़ा ही रहा। सहसा 'आँय ! क्या कहा?” बड़बड़ाते हुए उसमान खां चौंककर जाग पड़े। तुलसीदास को मजबूरन उधर मुँह घुमाना पड़ा। उन्होंने पूछा- “श्रीमान् ने मुझ से कुछ कहा?”
अपनी दोनों आँखें मलते हुए उसमान खां बोले- “नही”
फिर सुनिश्चित होकर आवाज लगाई-“नहीं कोई है” तुरन्त ही दरवाजे का परदा हटाकर एक दासी ने प्रवेश किया- “मोहिनीबाई कहाँ रह गईं ?” कोतवाल ने पूछा।
दासी अदब से आगे बढ़ी और धीमे स्वर में उसमान खां से कुछ कहा। उसमान खां सुनकर बैठते हुए गंभीर स्वर मे बोला- “अच्छा, हमारा घोड़ा कसने के लिए कह दो।अब हम जाएगें। इस ब्रह्मचारी को कुछ खिलाओ-पिलाओं भाई। इसकी कुछ खातिर करो। वो बूढ़ी , खुर्राट कहाँ है? उसे बुलाओ।” दासी अदब से सिर झुकाकर बाहर चली गई। मोहिनी की अम्मां के लिए उसमान खां के द्वारा खुर्राट शब्द कहा जाना तुलसीदास को बड़ा अच्छा लगा। उन्हें वह दिन याद आया जब वह यहाँ आए थे और अम्मा के खुर्राट स्वभाव का पहला अनुभव पाया था। खुर्राट नें कमरे में प्रवेश किया। आते ही पूछा-“हुजूर ने मुझे याद फरमाया था?”
“अरे, भई इस बेचारे बिरमचारी की कुछ खातिर तवाजोह तो करो। इससे मिल कर मुझे वहुत खुशी हुई। लेकिन मेरी यह समझ में नही आता कि मैं इसको किस तरह से खुश करूँ। किसी ने सच कहा है कि शांह की हैसियत, अगर हारती है ती फकीर की हैसियत से ही हारती है।”
“सरकार बेफिक्र रहें। ये महाराज जी यहाँ से खुश होके आपको दुआएँ देते हुए ही जाएँगें।” कहकर अम्मा ने तुलसीदास की ओर ऐसी कड़ी दृष्टि से देखा कि वह सहसा कुन्द हो गए। तभी एक दासी ने कोतवाल को घोड़े के तैयार होने की सूचना दी। कोतवाल जाने के लिए उठा। तुलसीदास को भी उसे विदा देने के लिऐ चौकी से उठना पड़ा। चलते हुए बूढ़ा उसमान ख़ाँ जब बुढ़िया अम्मा के पास से गुजरा तो तुलसी को लगा कि तुलना में अम्मा की मुखमुद्रा ही अधिक कठोर और आसुरी है।उसमान खां की बातों ने सब मिलाकर तुलसी के मन में उसके प्रति एक कोमल भाव उत्पन्न कर दिया था।
तुलसीदास ने झरोंखे से देखा कि कोतवाल अपने घोड़े पर सवार हो चुका था। फाटक पर लगभग पन्द्रह बीस घड़सवार सिपाही खड़े थे जो उसमान खां के बाहर निकेलते ही उसके पीछे-पीछे घोड़े दौड़ाने लगे। सरकारी रोब की आवाजाही की हलचल मिट्ते ही बगिया में चिड़ियों की चहचहाहट की गूँज फिर कानों में जाग उठी।
तुलसीदास ने जो झरोखे की ओर से मुड़कर देखा तो द्वार पर सोलहों सिंगार सजी स्वर्ग की अप्सरा सी मोहिनी दिखलाई दी।
“अरी अपने जरा से स्वार्थ के पीछे काहे इस बिचारे भोले बामन का धरम बिगाड़ती है? तेरा कुछ भी नही जायगा, उस बेचारे का लोक-परलोक सभी बिगड़ जायगा।” मोहिनी कमरे के भीतर आई भी न थी कि पीछे से अम्मा का कड़ा स्वर सुनाई पड़ा।मोहिनी ने माँ की ओर मुड़कर देखा तक नही हाँ , चेहरे पर तेहा जरूर चमक उठा। तुलसीदास की आँखों में आँखें डालकर मोहिनी ने उनसे पुछा- “मैं क्या आपका लोक परलोक बिगाड़ सकती हूँ? यदि ऐसा है तो …”
“प्रेम शुद्ध हो तो लोक और परलोक दोनों सुधर ज़ाते हैं, किंतु तुम्हारे और मेरे तो अब बिगड़ ही जाएंगे मोहिनी। मैंने अपने मन के सत्य को पहचान लिया है।”
मोतियों टँके धूपछाह रंग के लहराते घाघरा चोली, ओढ़नी में हीरे पन्ने और मानिकों से मढ़ी हुई मानवती मोहिनी के चेहरे पर यह सुनकर सुहाग सा चढ़ गया। दर्प भरी मुस्कराहट, रीझ भरी आँखें और मद-भरी लचकती इठलाती काया सहित तुलसी की ओर बढ़ती हुई मोहिनी आज अपने तुलसी को पूर्ण रूप से अपने बस में कर लेने को उन्मादी थी।
दरवाजे पर अम्मा आ खड़ी हुई।उसने वहीं से कुछ ऊँची और कड़कदार आवाज में कहा- “कान खोलकर सुन ले मोहिनी जिसे पर तू अपना सर्वस्व अर्पण कर चुकी है वह तेरा नहीं राम का दास है। एक ब्रह्मचारी की तपस्या भंग मत कर।मेरा अन्तकाल अब जरूर पास आर चला है, पर उस कोतवाल जल्लाद के हाथों अपना सिर कटाकर नही मरूँगी। दो रोटियों के लिए गंगा जी के किसी भी घाट की सीढ़ियाँ मेरी अन्नपूर्णा बन जाएँगी। मैं तेरा घर छोड़कर जाती हूँ।” कहकर अम्मा तेजी से बाहर निकल गई।तुलसीदास का मन कुछ-कुछ भयभीत हो गया। मोहिनी ने इठलाते हुए उनका हाथ पकड़ा और आँखों की मोहिनी से बाँधकर उन्हें उनके आसन पर बैठा दिया। हाथ का स्पर्श तुलसी को आनन्द के बजाय भय से चौंकाने लगा। मस्तिष्क की शिराओं में ऐसा विचार कम्पन हो रहा था कि जैसे बिजलियाँ लपलपा रहीं हों। मस्तिष्क में एक साथ बहुत कुछ गूँज रहा था। अर्थ शब्दों के बिना भी अपना बोध करा रहे थे। उन्होंने दाहिने हाथ से अपनी वह बाँई कलाई छुड़ा ली और उसे धीरे धीरे रगड़ना आरभ कर दिया था, मानों वह मोहिनी के स्पर्श को मिटा रहे हों। उनकी आँखें कहीं अदृश्य में टँग गईं थी। मुखमुद्रा पर गहन गंभीरता आ गई।
मोहिनी की प्यासी आँखें अपने प्रिय के मुख को मृग-मरीचिका के समान निहार रहीं थीं।
क्रमशः
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