महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
59-
तुलसी जब भीतर पहुँचे तो अपनी दृष्टि भरसक मोहिनी से दूर ही रखी। उन्होंने पूछा- “आईया मुझे बुलाया?”
“रामबोला, इस स्त्री का अपराध केवल इतना ही है कि इसने कोतवाल साहब से तेरी गायन-कला की प्रशंसा कर रखी है।सुना है कि तू किसी हाकिम के लिए न गाने की बात इससे कह चुका है। भविष्य में भले ही ऐसा न करना, पर आज तो इस लड़की की मान और प्राण की रक्षा के लिए तुम्हें इसके यहाँ जाना ही पड़ेगा। तेरा भोजन भी वहीं होगा। मैं तेरी ओर से निमंत्रण स्वीकार कर चुकी हूँ।”
आईया का आदेश सुनकर तुलसीदास को सचमुच आश्चर्य हुआ, उन्होंने कहा-“आईया, काशी के गौरव, गुरुपाद का कोई शिष्य भला….”
“मैं तुम लोगों की आईया हूँ। तुम्हारी और कर्ता महाराज की मान-प्रतिष्ठा का ध्यान रखना मेरा कर्तव्य ह, जो मैंने कहा है वही कर।प्रतिष्ठा हृदय की होनी चाहिए, जवाहर वही है। बुद्धि-अंहकार आदि तो केवल जौहरी मात्र हैं।”
तुलसी से इतना कहकर आईया ने मोहिनी से कहा- “जा मगंलामुखी, तेरी मान-रक्षा ही गई। भविष्य में कभी किसी ब्रह्मचारी के प्रति ऐसा आग्रह न करना। तुलसी को छोडकर मैं अपनी पाठशाला के अन्य किसी युवक को तेरी जैसी रूपसी और चतुर गायिका के घर भेजने की बात तक नहीं सोच सकती थी। उसके लिए आचार्य जी से आज्ञा लेनी पड़ती किंतु तुलसी पर मुझे पूरा भरोसा है। वह समद्र-तल में डूबकर भी उबर सकता है और आग की लपटों में घिर करके भी सुरक्षित बाहर निकल सकता है। तुलसी मेरा बेटा है।”
कहकर आईया नें तुलसी को ऐसी स्नेह दृष्टि से देखा कि उसे देखते ही तुलसी का दुलार-भूखा मन नन्हा मुन्ना बालक बनकर आंनदमग्न हो गया। यह एक ऐसा आनंद था जो तुलसी को रसातीत लगा।
दो रथ पूरी सड़क छेककर मंथर गति से दौड़ रहे थे। चार घुड़सवार आगे, चार पीछे चल रहे थे। एक रथ पर मखमली जरी काम के पर्दे पड़े थे और दूसरे पर ब्रह्मचारी तुलसीदास शास्त्री विराजमान थे। पर्दे के भरोखें से दो आँखें चमक रहीं थीं जो अपनी चाहत उडे़लकर दरिद्र, अभागे ब्रह्मचारी रामबोला की अहंता को एक अतुलनीय वैभव से समृद्ध कर रहीं थीं। चलती सड़क, हाट-बाजार वालों की नजरों और अपने ब्रह्मचारी वेश की मान-रक्षा के प्रति सतर्क रहकर, अपने आपको उन नजरों से बचाकर तुलसी संयत रहने के अपार जतन कर रहे थे।रथ से उत्तरते ही अर्दली तुलसी की झुक झुककर जुहार करने लगे। तुलसीदास को प्रतीत हुआ मानों वे बैकुंठ में प्रवेश कर रहे हों। दहलीज में घुसकर सीढ़ियों में चढ़ते हुए मोहिनी ने अपनी आँखों से तुलसी के प्रति ऐसी गहरी रीझ उडेंली कि तुलसी की काया को संकोच और गुदगुदाहट दोनों की अनुभूति हुई।तभी ऊपर के उजाले से अम्मा की आँखें मानों छतकर टपक पड़ी। दोनों विशेष रूप से तुलसी सहम गए।अम्मा ने कहा-“उसमान मिया आ गए हैं”
लगभग साल पैसठ की आयु वाले लंबे-चौड़े, मोटे-थुलथुल शरीर के मंगोल मुखी उसमान खां मसनद के सहारे अधलेटे हुए गंडेरियाँ चूस रहे थे। उन्होंने तुलसीदास को पैनी नज़र से देखा।कमरे में तुलसी के साथ केवल अम्मा ही आई थी, मोहिनीबाई पोशाक बदलने के लिए दूसरे कमरे में चली गई थी। अम्मा ने कमरे मे पहले ही से लाकर रखी गई, कुशासन मृग-छाला बिछी चौकी पर तुलसीदास की सादर बिठलाया। फिर कोतवाल से कहा, “हुजूर इनके गुरू महाराज काशी के पंडितों के सिरमौर हैं। बड़ी मुश्किल से मोहिनी इनके गुरू की इजाजत लेकर इन्हें यहाँ लाई है। वैसे संगीत तो इन्होंने किसी से नही सीखा, मगर क्या गाते हैं कि, अब आप से क्या अर्ज करूँ सरकार।” कोतवाल से कहकर अम्मा फिर तुलसी की ओर मुड़ी और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा- “हुजूर के बहाने हमको भी आपके संगीत की प्रसादी मिल जाएगी। महात्माओं की भभूत जहाँ पड़ जाती है वहीं बैकुंठ बस जाता है। पहले वही मीरा का भजन सुनाएँ महाराज, 'हरि आवन की आवाज”
“आप देखेंगे हुजूर कि हूबहू हमारी मोहिनी के अंदाज में गाया है और उसमे भी एक अनोखी बात पैदा कर दी है।”
उसमान खां ने गंडेरी चूसते हुए कहा-“माशाल्लाह खूब गाते हो।”
प्रशंसा सुनकर तुलसी की अहंता को मद चढ़ आया, दंभ बोले- “अपने राम को रिझाने के लिए गाता हूँ।”
तभी मन पर उसमान खां का दम्भ-भरा रोबीला स्वर आरोपित हुआ। उसमान खां ने गंडेरी उठाते हुए कहा- “हम तुम्हारी तालीम के लिए कुछ वजीफा मुक़र्रर कर देंगें।”
तुलसी के स्वाभिमान को ठेस लगी। मन में ताव आया कि, 'अबे खटमल, तू मुझे क्या दे सकता है? मैं किस बात में कम हूँ ? जिसके पीछे तू आला हाकिम होकर भी कुत्ते की तरह दुम हिलाता डोलता है वह मुझ भिखारी को रिझाने के लिए दीवानी बनी डोलती है। तेरे पास तलवार है, मेरे पास ज्ञान है। तेरा भरोसा दिल्ली के वादशाह पर है और मैं निद्वन्द्न राम के भरोसे रहता हूँ।” मन अपने तेहे में खटाखट चढ़ते हुए दम्भ की ऊँची अटारी पर पहुँच गया। उसमान खां के चुप होकर गडेरी चूंसने की मुद्रा में आते ही तुलसीदास ने सिर तानकर कहा-“कोतवाल साहब, जैसे आप बादशाह के चाकर है वैसे मैं राम का चाकर हूँ । मेरा मालिक मुझे अपने गुजारे के लिए सब कुछ देता है। फिर भी आपकी इस उदारता के लिए मैं आपको बड़ा -बड़ा शुक्रिया अदा करता हूँ।”
सुनते हुए उसमान खां की आँखें लाल हुईं , पैनी हुईं और फिर गंडेरियो सी ठंडी मीठी हो गईं,बोले-“अच्छा है बरखुरदार, आजाद रहोगे, वरना इस दुनिया में रह कर सभी को चाकरी करनी पड़ती है। एक सलाह तुम्हे और दूँगा। किसी औरत के गुलाम मत बनना। हर तरह की आजादी पसंद करने वाले लोग भी अक्सर अपनी बेहोशी में औरत के गुलाम बन जाते हैं। तुम जवान हो, तन्दुरुस्त और खूबसूरत हो और फिर माशाअल्लाह, गला भी खूब सुरीला पाया है लेकिन तुम्हारी इन्हीं खूबियों की सीढ़ियाँ बनाकर कोई हुस्नवाली तुम्हारे वास्ते खूबसूरत पिंजड़ा भी बना सकती है, फिर जब होश में आओगे तो पछताओगे।” तुलसीदास को लगा कि यह बूढ़ा अपनी कोतवाली के रोब में मेरा शिक्षक बनने की चेष्टा कर रहा है।
क्रमशः
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