महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
58-
अगले दिन गंगा जी के लिए नियत समय पर तुलसी भइया जब नीचे न आये तो नंददास अँधेरे में सीढ़ियाँ टोहते हुए उनकी कोठरी में पहुँच गए। तुलसी दास उस समय तन्मय होकर सूरदास का एक पद गा रहे थे-
“मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आवे।”
नंददास द्वार पर खड़े खड़े सुनते रहे। तुलसी के स्वर में उतनी करुणा थी कि नंददास भावविभोर होकर आँसू बहाने लगे। गायन समाप्त होने पर बाहर ही से नंददास ने कहा- “तुम्हारे राम प्रेम की सौं भैया, मैं अपने नंद के दुलारे से लड़ झगड़कर अब तो ऐसी ही प्रीति माँगूँगा। प्रेम उपजे तो ऐसा ही उपजे”
झटपट द्वार खोलकर तुलसी ने कहा-“आज तुम्हे आना पड़ गया नंद, मैं तो माया में सब कुछ बिसार बैठा।”
“माया बिना हरि नही मिलते, भैया। मेरा श्याम राधा बिना आधा हैं।”
कोठरी के अंदर से अपना अगौछा और लंगोट-उठाकर कोठरी के द्वार बंद करके कुंडी चढ़ाते हुए तुलसी ने कहा- “किन्तु तुम्हारे श्याम और मेरे राम की माया बड़ी कठिन है नंददास। उसपर रीझते भी दु:ख और उसे रिझाते हुए भी दु:ख।केवल दु:ख ही दुःख व्यापता हैं।” फिर सीढ़ी के पास पहचकर वे थम गए। सिर झुकाकर गहरे स्वर में कुछ स्वगत और कुछ-कुछ नंददास को भी सुनाते हुए तुलसी ने कहा- “जी चाहता है, डूब मरूँ। आयु के यह पहाड़ से चौबीस वर्ष ढकेलते-ढकेलते मैं अब ऊब गया हूँ। न माया मिलती है न राम। मैं बहुत अभागा हूँ।”
दु:खावेश में उनका कंठ भर आया और आँखें छलछला उठी। इस मन स्थिति के बहाव में आकर वह तेजी से सीढ़ियाँ उतरने लगे।घाट पर पहुँचने में आज नित्य से कुछ विलम्ब हो गया था। रोज जब आते है तो तारों-भरा आकाश काला रहता था कितुं इस समय वह खुलता साँवला लग रहा था। वस्तुएँ और चेहरे कुछ-कुछ स्पप्ट हो चले थे। घाट पर फिर कल वाली दासी मिली- “आपसे एक बात कहनी है।”
कल दासी की सूरत ठीक तरह से नहीं देखी थी, केवल उसके स्वर के सहारे ही तुलसीदास ने उसे पहचाना, चेहरा क्रोध से तमतमा उठा, कहा- “जो कुछ कहना है यहीं कह दो।”
दासी हिचकी। नंददास तुलसी को वहाँ छोड़कर आगे बढ़ गए। दासी ने कहा - “बाई जी ने कल के लिए क्षमा माँगी है। उनके मालिक अचानक आ गए थे।”
मालिक शब्द सुनकर सहसा ईर्ष्या और फिर क्रोध उमड़ा। अपनी मुद्रा को कठिनाई से सयंत करते हुए तुलसीदास ने कहा -“तो? इन बातों से मुझे क्या प्रयोजन?”
चतुर दासी ने एक बार आँख उठाकर पैनी दुष्टि से तुलसी की मुखमुद्रा को घ्यानपूर्वक देखा फिर स्वर में गिड़गिड़ाहट लाकर कहा- “अबला पर यों गुस्सा न हो महाराज, मेरी मालकिन आपके दर्शनों के लिए ऐसी तड़प रही है जैसे पानी बिना मछली। कल रात उनकी पलक तक नही लगी। बहुत तड़पी है।” कहते हुए दासी का गला और आँखे भर गई।
पीछे की सीढ़ियों पर पाँच छः आदमियों की टोली नीचे उतर रही थी। दासी ने उधर देखकर हड़बडी में कहा- “कोतवाल साहब आज फिर आपको बुलाएँगे। आपके लिए रथ आएगा। मालकिन ने कहा है कि जो आज आपने उन्हे दर्शन न दिए तो रात में वह जहर खा लेगीं।” कहकर वह प्रणाम करने के लिए झुकी। तुलसीदास की ईष्या फिर चढ़ गई, बोले- “मै किसी सेठ, अमले या हाकिम के लिए तुम्हारी बाई जी की तरह गाना नहीं गाता। ऐसा प्रस्ताव फिर कभी मेरे सामने न लाना।”
कहकर वे तेजी से सीढ़ियाँ उतरने लगे। भावों की हलचल में तुलसी का मन विचलित सा होने लगा।स्नान, व्यायाम और संध्या आदि प्रात: कर्मो से छूट्टी पाकर तुलसी और नन्ददास जब घर की ओर चले तब तक तुलसी का मन फिर मोहिनी के फंदे से मुक्त हो गया था। अन्तर्द्वन्द्व वश वे उस समय अत्यधिक गभीर हो गये थे।सीढ़ियाँ पार कर चुकने के बाद गली में आने पर नंददास ने एकाएक कहा- “अब मेरा मन काशी से ऊब गया भइया। सोरों जाना चाहता हूँ।”
“अपना अध्ययन तो समाप्त कर लो?”
“पढ़ लिया जो कुछ पढना था। अब ऊब गया हूँ। पढ़ने का अंत नही। अब केवल कृष्ण-नाम ही पढ़ूँगा। तुम भी मेरे साथ सोरों चलते तो मुझे बड़ा सुख मिलता।”
“तुम्हारा तो वहाँ घर है। मेरे लिए भला कौन-सा आकर्षण है?”
“मेरे लिए चलो भइया। मेरे मन के लिए श्रीकृष्ण परमात्मा के बाद तुम हो सबसे बड़ा सहारा बन गए हो। तुम भी मिथ्या माया से छूटोगे। वहाँ चलकर घर बसाना। नृर्सिह चौधरी महाराज नाम के एक बड़े ही राम-भक्त विद्वान वहाँ रहते हैं। काशी आने से पूर्व मैं उन्हीकी पठशाला में पढ़ता था। वे अब बहुत वृद्ध हो गए हैं। अपनी पाठशाला चलाने के लिए उन्हें एक अच्छा विद्वान मिलेगा और तुम्हारी जीविका का सहारा हो जाएगा। चलोगे भइया?”
“तुम्हारे इस आग्रह का मर्म तो पहचानता हूँ नंदू, कितु क्या कहूँ? नदू, तुम मुझे बड़े भाई की तरह-मानते हो, मेरा एक आदेश भी मानोंगे?”
“कृष्ण को छोड़कर राम भजने को मत कहना, बस और तो तुम्हारी आज्ञा पर सिर कटाने को भी तैयार हूँ।”
“मेरा भेद किसी से ने कहना।”
“मुझे लगता है यह तुम्हारा असली भेद नहीं है भैया तुम अपने राम को छोडकर रह नही सकते।”
“यह प्रसंग न छेड़ो नंदू। मैं इस समय कुछ नही सुनना चाहता।” तुलसीदास के स्वर मे चिड़चिड़ाहट भर गई थी। स्वयं उन्हें भी लगा कि यह चिड़चिड़ापन अनावश्यक और अप्रत्याशित थी।
लगभग डेढ़ पहर दिन चढ़े घर के भीतर से आईया का बुलावा आया। तुलसी उस समय दो विद्याथियों को कालिदास का मेघदूत पढ़ा रहे थे। गुरु-पत्नी का आदेश पाते ही वे अपना आसन छोड़ कर उठ खड़े हुए। भीतर की ड्योढी में प्रवेश करते ही उनके कानों में एक स्वर तरंगित होकर आया। मोहिनीबाई गुरु-पत्नी को जयदेव रचित एक गीत सुना रही थी- “नाथ हरे,सीदति राधा वास गृहे।”
मोहिनीबाई ने गुरु-पत्नी को रिझा लिया था। उसने चिरौरी करके, आँखों में आँसू भरके गुरु-पत्नी को यह भी समझा दिया था कि यदि तुलसीदास ने कोतवाल महोदय को अपना कीर्तन न सुनाया तो वे मोहिनी से अवश्य ही रुष्ट हो जाएँगें।
क्रमशः
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