महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
56-
आँसू पोंछ, पोंछ।मैं रात भर रोया हूँ रे, मेरी थकी आँखों को तनिक विश्राम करने दो।”
तुलसी ने अपनी आँखें पोंछ लीं। कैलास बोला- “महाराज, अभी थोड़ी देर पहले इनके एक मित्र ने नारी को, कदाचित अपनी प्रेमिका को, धोबिन कहकर उसे गहरा अर्थ दे दिया था।”
मेघा भगत हँसे, कहा- “वाह, यह तो कवियों जैसी बात है।ठीक कहा, माया सचमुच धोबिन ही है। वह जीव में लिपटे अज्ञात रूपी मैल को धोकर उसका निर्मल रूप निखार देती है।”
कुछ देर रुक मेघा भगत फिर कहने लगे- “मैं अभी अयोध्या गया था। वहाँ पर, जहाँ पावन जन्मभूमि का मन्दिर तोड़कर बाबर ने एक मस्जिद बनवाई है, उसी के पास एक टीले पर एक नवयुवा रामदीवाना मिला।अरे, बड़ा ही सुन्दर और सौम्य मुख वाला था, रामबोला। फीकी काया में से ऐसा दिव्य तेज मैंने पहले कभी नही देखा था और उसकी आँखें क्या थी मानों चुम्बक थीं। उनसे दृष्टि मिल जाय फिर तो नजर छुड़ाए नहीं छूटती थी। आयु में वह मुझसे लगभग ५-६ वर्ष छोटा था। बस यह समझ लो कि तुम्हारी ही आयु का था। तुम्हें देखकर मुझे बरबस उसकी याद हो आती है। वह सूर्योदय से सूर्यास्त तक पेड़ की आड़ में बैठा हुआ मस्जिद की ओर टकटकी बाधँ कर देखा करता था। कभी हँसता, कभी रोता और कभी योगी-सा समाधिस्थ हो जाया करता था। तो, मेरी उससे भेंट हुई, फिर आकर्षण हो गया। मैं रोज सूर्यास्त के बाद उसके पास जाने लगा। एक दिन मैंने उससे पूछा कि तुमने कौन सा योग साधन कर ऐसा उत्कट राम प्रेम सिद्ध किया?”
कहने लगा- “किसी वस्तु पर रीझ जाओ और फिर रीझते ही चले जाओ, तुम्हे तुम्हारा अभीष्ट मिल जायगा।”इसके बाद प्रसँग बढ़ने पर उसने मुझे अपनी कथा सुनाई। कहने लगा कि एक राजरमणी मुझ पर रीझ गई थी। मैं भी उसके रूप सौन्दर्य, हाव-भाव, उसकी प्रेमल दृष्टि और दासियों द्वारा भेजे गये गुप्त संदेशो को पाकर ऐसा मस्त हुआ कि राम-रहीम सब भूल गया। उसने मुझसे कहलाया कि तुम अपना धर्म परिवर्तित कर लो और मेरे चाकर बनकर दिल्ली चलो। मैं बिलकुल तैयार हो गया था। वह रीझकर मुझे देखती, मैं उसे देखता। वह हँस पड़ती, मैं भी उसका प्रतिबिम्ब बनकर हँस पड़ता। दूर से देख-देखकर मिलन-आकांक्षा में वह आहें भरती, मेरी भी साँसे भर उठती थीं। उसकी आँखों मे आँसू देखकर मेरी आँखों की भी वही दशा हो जाती थी। अपनी तन्मयता में वह कभी भय से चौंक उठती थी कि किसी ने देख न लिया हो, मैं भी वैसे ही चौंक उठता था। उसके विरह में आठों याम बावला बना रहता था। एक दिन वह तो चली गई और मैंने विरह ज्वाला में जलते-जलते यह देखा कि मैं अपने राम के संकेतों को बूझने लगा हूँ। कभी- कभी बातों के अर्थ और यथार्थ मे अदुभुत अन्तर होता है।”
आम्यन्तर चौकन्नी एकाग्रता के साथ तुलसी ने यह कथा सुनी। मन बोला, यह तो तत्काल गढ़े हुए रूपक-सा लगता है। भगत जी कदाचित् मेरे ऊपर बीती हुई को लेकर ही यह रूपक सुना गए हैं। मोहिनी का प्रेम क्या मुझे भी राम- भक्ति का मर्म समझा देगा? मोहिनी सुन्दर है। गुणवती है। वेश्या होते हुए भी शीलवती है। वह बहुत मोहक है।“-अंतर्चेतना गूँजी, “श्री राम तेरी मोहिनी से भी कई गुना अधिक सुन्दर और मोहक हैं। काया का सौंदर्य मोहक होता अवश्य है परन्तु वह सुन्दरता मन ही की होती है जो काया की सुन्दरता पर अपने आप को मढ़कर उसे असंख्य गुना अधिक सुन्दर बना देती है।क्या किसी स्त्री से प्रेम किए बिना राम को पाया जा सकता है?”
यह बात मन में उठते ही चेतना ने सहज प्रश्न किया- “क्या स्त्री ही राम तक पहुचनें का साधन है?” चंचल मन पर्त दर पर्त में प्रश्नों से जूझने लगा।
भगत जी ठठाकर हसँ पड़े, कहा-“नहीं , नहीं । मुझे तो श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के शक्ति, शील और सौन्दर्यमय काव्य पर रीझकर राम की ड्योढ़ी तक पहुँचने की राह मिली। तब से अब तक वहीं पर बैठा अपना सिर धुन रहा हूँ कि राम जी द्वार खोलो, दर्शन दो। पर कुसुम से कोमल मेरे राम प्रभु वज्र से अधिक कठोर भी हैं। शासकों में भी वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। देखो, कब मेरी गोहार उनके दरवार तक पहुँचती है। कब मुझे वह शक्ति और सौंदर्य पुँज देखने को मिलता है जिसके आगे उत्तम से उत्तम कविता भी लजा जाती है। कब वह दिन लाओगे राम? अब तो ले आओ रे, मेरे राम ! तुम्हारे बिना मैं बड़ा दु:खी हुँ। बड़ा ही दुःखी हूँ ।”
मेघा भगत आँसू बहाने लगे। कुछ देर बाद कैलास ने तुलसी के हाथ पर हाथ रखकर घीरे से झिंझोड़ा। तुलसी भगत जी की विरह वेदना में तन्मय हो गए थे। विरह समान था पर विरह के आलम्बनों में अन्तर था। भगत जी के और स्वयं अपने भी राम के आगे उन्हें अपनी मोहिनी की कल्पना तक इस समय अच्छी नही लग रही थी।मक्खी और क्षेमकरी पक्षी की उड़ान में अपार अन्तर का बोध उन्हें अब हो रहा था। अपनी मोहिनी की यह क्षुद्रता एक ओर जहाँ तुलसी की अहम्भाव-रहित चेतना को अपार आनन्द दे रही थी, वहीं उनकी ग्रहता की तह दर तह मे नन्हीं फाँस की तरह तीखी चुभन भी दे रही थी। उनका अति मोह कहीं पर अपनी प्रवुद्ध चेतना से कुंठित था। कैलासनाथ के द्वारा अपने हाथ का झिझोंड़ा जाना पहली बार तो उन्हें व्याप्त ही न सका, फिर जब दुबारा उनका हाथ दबाया गया तो वह चौंककर कैलास कीओर देखने लगे। कैलास ने उनके कान में कहा, “ऐसा भजन सुनाओ जिससे इनका रस अश्रु-भंवर से निकल कर आगे बहे।”
तुलसी सोचने लगे, फिर आँखें मूँद कर मीरा का एक भजन गाना आरम्भ किया -“हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय।”
उस दिन तुलसी को ऐसा लगा कि जैसे उनके मन का मैल कट गया है।मन की सारी थकन मिट गई है। ऐसा लगता है कि जैसे एक रम्य किन्तु कठिन यात्रा के बाद वे नहा-धोकर चंगे हो गए हों। मोहिनी मन में टीस की तरह सतत् विराजमान थी किन्तु राम की याद वे सप्रयत्न बढ़ा रहे थे।
क्रमशः
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