महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
55-
आज तो मैं आपके यहाँ गया भी था, आप मिले नहीं। भगत जी अयोध्या से लौट आए हैं, आपको बुलाया है, आइए।”
कहीं भी, विशेष रूप से मेघा भगत के यहाँ जाने के लिए तुलसी का मन इस समय राजी न था, बस मरने के लिए धुन समाई थी। पर कैलास ने उनके मुख से कोई बात निकलने से पहले ही उछाह भरे स्वर में कहा- “भगत जी ने आपके सबंध में कल एक बड़ी ही विचित्र बात कही।”
तुलसी का मन धड़का कि कहीं उन्होंने उसके मन का चोर न उद्घाटित कर दिया हो। तभी कैलास ने गदगद स्वर में कहा- “वे बोले कि पहली बार देखने पर मुझे लगा कि मानों परशुराम के सामते राम आ गए है।”
घोडू फाटक सुनकर जोर से हंस पड़ा , कहा-“लो, तुलसी भइया, तुम तो रामचन्द्र के अवतार हो गए। जाओ-जाओ, भगतबाजी करो। आज वहाँ भोजन- दक्षिणा का डौल तो है नही, अन्यथा मैं भी तुम्हारे साथ चलता।”
कैलास की आाखों से यह भाव स्पष्ट था कि उसे घोड़ू फाटक की हँसी अच्छी नहीं लगी। उसनें बड़ी आत्मीयता से तुलसी का हाथ पकड़ते हुए कहा-“आइए, आइए ” कैलास के द्वारा हाथ पकड़कर खीचे जाने पर तुलसी ऐसे बढ़े जैसे बलि का बकरा कसाई के द्वारा खीचे जाने पर अड़-अड़ कर बढ़ता है। उनका मन इस समय केवल मृत्युमोहिनी की भावना से अभिभूत है। वह राम से कतराना चाहता है। किसी प्रकार का अपराध करने के बाद घर से भागा हुआ दंगई बच्चा जैसे लौटकर घर-जाने में हिचकता है, वैसे ही तुलसी भी हिचक रहे थे। रास्ते भर कैलास उनसे मेघा भगत की चर्चा ही करता रहा। बातों के प्रसँग में उसने कहा- “नदिया के चैतन्य महाप्रभु के कृष्ण प्रेम की चर्चा बहुत सुनी थी, परन्तु भगत जी का राम-प्रेम तो प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। इस कलिकाल में ऐसा भगवत-प्रेम मुझे तो कहीं देखने को नहीं मिला। क्या आपने कोई ऐसा दूसरा व्यक्ति देखा है।”
तुलसी की अंहता को चुभन हुई। 'मेरा राम-प्रेम क्या किसीसे कम है? फिर आत्म-ग्लानि उपजी, अब कहाँ रहा वह अनन्य भाव।मोहिनी मेरे राम- प्रेम का हिस्सा बँटा ले गईं। मेघा भगत खरा सोना है जबकि मुझमे तांबा मिल चुका है।राम के आगे मोहिनी? परमब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम के आगे वेश्या ? छि छि, तुलसी, गंगा-स्नान करने के बाद कीच-कूड़ा भरे नाले में डुबकी लगाने की ललक रखते हो? किन्तु मोहिनी हाँ मोहिनी। नहीं , नहीं। राम- राम-राम-राम मोह रा म मोह राम।”
ऊहापोह चलता रहा, कदम आगे बढ़ते रहे। जिस समय तुलसी और कैलास भगत जी के यहाँ पहुँचे उस समय संयोग से सेठ जैराम को छोडकर वहाँ और कोई न था।भगत जी तकिये के सहारे अध- लेटे आँखें मींचे धीमे स्वर मे संस्कृत का कोई श्लोक गुनगुना रहे थे। जैराम सेठ चुपचाप बैठे सूनी दृष्टि से छत्त की ओर ताक रहे थे। कैलास को देखकर जैराम बोले- “आओ-आओ, कविराज.......”
मेघा भगत ने आँखें खोलकर आगन्तुकों को देखा। तुलसी कैलास की पीठ की-आड़ मे अपना चेहरा भरसक छिपाने का प्रयत्न करते हुए कमरे में आगे बढ़ रहे थे। मेघा भगत उन्हे देखकर आह्वादित हो गए।झटपट बैठते हुए कहा--“अरे अरे, मेरे स्वरूप, तू कहाँ भटक गया था।”तुलसी को बड़ी लज्जा लग रही थी। भगत जी की बात सुनकर उन्हें लगा कि वे अपनी किसी अलौकिक सिद्धि के द्वारा उसके मन का सारा हाल जानते हैं। इससें उनका लज्जाबोध और अधिक गहरा हो गया। कैलासनाथ तेजी से डग बढ़ाकर भगत जी के पास तक पहुँच चुका था, इसलिए उसकी पीठ की आड़ लेकर अपना मुँह छिपाना अब संभव न था। आत्मग्लानि से पीड़ित तुलसी, लज्जावश आखें झुकाए हुए भगत जी की ओर बढ़े। कैलास उनके पैर छूकर, पीछे हट चुका था तुलसी ने आगे बढ़कर उनके पैरों में अपना सिर झुका दिया। मेघा भगत ने झटपट अपने दोनों हाथों से उनके दोनों कंघे छूकर गदगद स्वर में कहा- “बस रे बस भाई, तू मेरे पैर छूयेगा तो मैं भी तेरे पैर छूने लगूँगा।प्रेम में कोई छोटा बड़ा नही होता।
“दोऊ परे पैया, दोऊ लेत है बलैयां। उन्हें भूलि गईं गइया, इन्हे गागरी उठाइवो।”
तुलसी तब तक भगत जी के चरणों में अपना मुँह छिपा चुके थे। तुलसी को पैर छूने से रोकने के लिए कंधो पर रखी हथेलियाँ फिसलकर उनकी पीठ पर आ चुकी थीं। अपनी बात पूरी करने पर उनकी पीठ थपथपाकर भगत जी बोले- “अरे बस करो, उठो मेरे रामरूप, अपना मुखड़ा तो दिखा। तुझे तो मैं बहुत याद कर रहा था भइया। मैं कहूँ कि जल तो मछली से खेल रहा है फिर मेघ बरसे कैसे? देख, अरे मेरी आँखों में आँखे डालकर देख, तेरी सिद्धि का प्रसाद मुझे भी तो मिले भाई।”
भगत जी के आग्रह पर तुलसी अपनी आँखें उठाने का जितना प्रयत्न करते है उतनी ही वह और भी झुकी झुकी पड़ती हैं। भगत जी के अत्याग्रहवश उनकी आँखें मिली तो अवश्य, पर इस तरह, जैसे तुरंत पकड़ा गया पक्षी बहेलिये को देखता है। भगत जी मुस्कराए, कहने लगे- “अरे चार ही दिंनों में तेरी आँखों की मोहिनी बदल गई है रे? इनमें तो एक पूरा ब्रह्माण्ड चमकने लगा है।”
मन की भयजनित शंका तुरंत आँखों में चमकी, क्या यह इनका व्यंग्य है? विवशता में आँखें भर आईं, कहा- “मैं बड़ा अपराधी हूँ , महाराज।”
भगत जी हँसे , कहा- “अरे मेरे भोले भइया, तू पानी के बहाव को न देखकर उसके ऊपर तैरने वाले मैल को क्यों देख रहा है ? बहाव देख, बहाव। यह मैल तो लहरों के थपेड़ों से आप ही आप बह जायेगा।”
यह कहकर भगत जी जैराम सेठ की ओर देखते हुए बोले-“सेठ, मेघा रहे न रहे पर तुम अवश्य देखोगे कि संसार मेघा को भूल जायगा और तुलसी को याद करेगा। भक्ति तो कोई मेरे इस छोटे भाई से सीखे। यह पृथ्वीवासियों के हेतु स्वर्ग से आया हुआ राम का प्रसाद है।”
तुलसी अब रोने लगे थे। सिसककर बोले- “अब नही महाराज। आपकी बातों से मैं अत्यधिक दण्डित अनुभव करता हूँ। मैं बहुत ही अधिक पीड़ित हूँ”- कहकर उनकी आँखें स्रोतों सी फूट पड़ीं।
“यह लो, तुम तो रोने लगे। फिर मेरी आँखें भी बरस पड़ेंगी, भइया। ये आँसू बड़े छुतहे होते हैं।
क्रमशः
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