Monday, 1 May 2023

tc 54

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
54-

परंतु अंतर्चेतना शिकारी कुत्ते की तरह म‌न का पीछा कर रही थी। “मैं क्या करूँ राम, कैसे छुटकारा पाऊँ? हे बजरंगबली, हे सकंटमोचन, दलदल में फँसे हुए इस जीव को उबारो- ‘को नहिं जानत है जग मे प्रभु संकटमोचन नाम तिहारो।’
रात को महफिल हुई पर कोतवाल और वह नहीं आई। कहाँ तो मोहिनी के आने की सूचना से वह भटक रहा था और कहाँ अब उसके न आने से छटपटा उठा।किसी करवट चैन नही। 
एक पखवारे का समय तुलसी के लिए अनेक लबे-लंबे युगों का योग बनकर बीता। फिर एक दिन मेघा भगत के दरबार में मिलनेवाले एक नवयुवक कवि कैलासनाथ दोपहर के समय उनके पास आए। उनकी गंगाराम से भेंट हुई। गंगा ने कहा- “वह आजकल एकांत सेवन कर रहा है, हम लोगों से भी प्राय: नही मिलता, आप उससे क्या चाहते है?”
“तुलसी जी से कहिएगा कि भगत जी अयोध्या से लौट आएँ हैं और उन्हें देखने के लिए तड़प रहे हैं।” गंगाराम कवि कैलास को लेकर तुलसी की कोठरी में गए, किंतु कोठरी सूनी थी।

उस समय तुलसी अपनी प्रिया मोहिनी के प्रति कल रात रचे गए, दो दोहे एक पर्ची पर लिखकर उन्हें स्वयं अपने हाथों चुपचाप अर्पित करने की तीव्र कामना लिए उसकी कोठी के द्वारे पर थे। बूढ़े कोतवाल उसमान खां ने मोहिनी के लिए बस्ती से कुछ हटकर गंगा-तट पर एक बगीचीदार हवेली बनवा दी थी। वह ऊँची संगीन चहार दीवारी से घिरी थी। द्वार पर यमदूत से पहरेदार डटे हुए थे। भीतर खबर करवाने पर ऊपर एक बड़े कमरे में तुलसी को बैठा दिया गया। बड़ी देर प्रतीक्षा के बाद मोहिनीबाई की माँ आई।बड़े हीरेवाली अपनी नाक की लौंग को बड़ी अदा से घुमाते हुए प्रौढ़ा ने कहा- “ब्रह्मचारी को नारी से दूर रहना चाहिए महाराज, पालागन।” 
तुलसी की आँखों में क्रोध और क्षोभ झलक उठा।यह देख तुलसी की ओर बढ़ते हुए बाई जी ने धीमे किंतु कठोर स्वर में कहा-“खबरदार, जो फिर कभी इस घर में आए। कोतवाल साहब को खबर लग जायगी तो तुम्हारी इस सुन्दर काया से तुम्हारा सिर कटकर पल भर में ही अलग जा पड़ेगा। विधर्मियों को ब्रह्म हत्या का दोष भी नही लगता।जाओ, भागो,पालागन। जोगी-ब्रह्मचारियों की सिद्धी में देवता विध्न भी डालते हैं। विश्वामित्र मुनि को जैसे मेनका ने फंसा कर कुत्ता बनाया था वैसे ही राडँ मेरी लड़की तुम्हारे पीछे पड़ गई है। जाओ जाओ, भागो, भागो।”- कहकर बाई जी ने पीठ मोड़ ली और दालान की ओर चली गई।
तुलसी के स्वाभिमान को वर्षों से ऐसा करारा आघात नही लगा था। बचपन में जब मारपीट कर, मड़ेया उजाड़कर, वह गाँव से निकाले गए थे, तब उनका मन जैसे लड़खड़ाया और छटपटाया था, ठीक वैसा ही अनुभव इस नये परिवेश में इस क्षण हुआ। उनकी सम्पूर्ण चेतना एकदम से जड़ हो गई थी। वह काठ के पुतला बने खड़े के खड़े रह गए। मुठ्ठी में अनमोल रतन की तरह बड़े प्यार से संभाली हुई छोटी-सी कागज की पर्ची कंकड़ की तरह बेमोल होकर फर्श पर गिर गई। एक बार सिर में तेज चक्कर आया, उनकी आँखों में आँसू आ गए। यह आँसू मानों उनकी जड़ काया के लिए नये प्राण थे। तुलसी अपने यथार्थ-बोध में भर गए और तेजी से सीढ़िया उतरकर ड्योढ़ी-फाटक पार कर बाहर निकल आए ।
मोहिनीबाई के घर से निकलते समय तुलसी का बावला मन कह रहा था- अब यह जीवन नि:सार है। यह अपमान असहाय है, अब नहीं जीऊँगा कदापि नहीं जीऊँगा।आँखें पोंछते, किन्तु वे फिर भर उठती थीं- डूब मर रामबोला डूब मर ! तू सचमुच अभागा है। डूब मर ! तुझे गंगा ही शरण देगी और कोई नहीं।
तुलसी द्वशाशमेघ घाट के पास पहुँच गए। वहाँ एक गली से बाहर निकलते हुए उनके पुराने सहपाठी महाराष्ट्र के मित्र धोड़ू फाटक ने उन्हें देखकर आवाज लगाई- “अहो, तुलसी भैया | तुलसी भैया ”
स्वर ने कानों को झटका दिया। उन्होंने चाहा कि वह फाटक के स्वर को अनुसुना करके आगे बढ़ जाएँ पर घोड़ू फाटक भला मानने वाला था। उसने फिर हाकँ लगाई -“अरे सुनो तो, सुनो तो, मैं आ रहा हूँ।” फाटक लपककर पास आ गया। तुलसी की दशा देखकर पूछा- “क्या बात है मित्र, चेहरा क्यों तमतमाया हुआ है? तुम्हारी आँखें भी भरी हुई हैं। क्या किसी से लड़ाई हो गई है? ” 
“कुछ नही, कुछ नही।” फिर आँखें पोंछते हुए एकाएक नाटकीय ढंग से हसँकर बोले- “पीछेवाली गली में इतना धुँआ था, इतना धुँआ था कि आँखें भर आईं। तुम कहाँ से आ रहे हो? ”
घोड़ू फाटक मुस्कराया, बोला- “अपनी धोबिन के यहाँ से । उस दिन गंगा- राम ने बड़ी सच्ची बात कही थी मित्र।प्रेमिका सचमुच धोबिन ही होती है। वह कामी पुरुष के मन को ऐसे पछाड़ -पछाड़ कर धोती है कि बस पूछो मत। तुम कभी इसके फेर में न पड़ना तुलसी मैया। श्रीमद्शकंराचार्य भगवान सत्य ही कह गए है कि....”
“नारी की व्यर्थ ही निन्‍दा क्यों करते हो फाटक?”
“काए कूँ? म्हणजे- कोई धोबिन-बोबित हो गई है काय?” कहकर घोड़ू फाटक हो-हो करके हँस पड़ा। वह हँसी तुलसी के कलेजे पर हाथी के पावँ -सी धमाधम पडी़। धोड़ू का वाक्य मानों संदेह होकर उन्हें बड़ी सतर्कता के साथ घूर रहा था | तुलसी दोनों ही प्रकार के मानसिक खिंचावों से अत्यधिक पीड़ित हुए। बात का उत्तर दिए बिना फिर आत्महत्या की धुन में फाटक से पीछा छुडाकर तुलसी ने गंगा जी की ओर कदम बढ़ाया ही था कि पास की एक दूसरी गली से उनके नव परिचित कैलासनाथ आते हुए दिखलाई दिए। दोनों की दृष्टि एक-दूसरे पर प्रायः साथ ही साथ पड़ी। तुलसी की आँखों में कतरा जाने का पैंतरा चमका और कैलास की आँखों में मिलने की ललक उदय हुई।दूर ही से वे उत्साहित स्वर में बोले- “नमस्कार ! वाह, इस समय आपसे खूब भेंट हो गई। मैं आपको ही ढूँढ रहा था। इधर कहाँ जा रहे हैं? ”
झूठ बोलने के पहले तुलसी का मन तेजी से ऊंचा-नीचा हुआ, पर झूठ का सहारा लिए बिना उन्हें गति न मिल सकी, कुछ हकलाकर कहा- "ऐसे ही, बस खाली मन की बहक में इधर आ निकला।”
“खाली है तो हमारे साथ चलिए। भगत जी के यहाँ जा रहा हूँ।
क्रमशः

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