Sunday, 30 April 2023

tc 53

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
53-

फिर भी मन का ग्लानि प्रवाह अभी पूरी तरह से थम नहीं पाया था। कहने लगे-“मुझे जाने दो, गंगा।”
“पर, पर कहाँ जाओगे? अच्छा चलो, कहीं एकान्त में चलें। यहाँ कोई देख लेगा तो क्या कहेगा? सभी तो पहचानते हैं ” - गंगाराम ने उनका हाथ पकड़ कर कहा- “आँसू पोंछों और सावधान होकर हमारे साथ चलो। आज तुम्हें हो क्या गया है ?” 
मित्र के आग्रह से बंधे हुए तुलसी ऐसे चल पड़े जैसे किसी का नटखट पालतू बछड़ा रस्सी मे बंधा हुआ उसके साथ खिंचा चला जा रहा हो। गंगा-तट पर पहुँच कर दोनों मित्र नाव पर सवार हुए और उस पार पहुँच गए। निर्जन एकान्त में तुलसी ने मित्र के आगे अपना मन पूरी तरह से खोलकर रख दिया। बड़ी देर तक तुलसी अपना मन सुना-सुना कर हल्का करते रहे और गंगाराम गंभीर भाव से सुनते रहे। फिर अकस्मात‌ उँगली से बालू पर कुछ अंक लिखे, हिसाब फैलाया और कहा- “विषय चिंतनीय नही है मित्र। अपने उस दिन के शुभ शकुनों को ध्यान करो जिस दिन तुम इस मिथ्या मोहपाश से नियति के द्वारा जकड़े गए थे | तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है।”

गंगाराम के मिथ्या मोह कहते ही तुलसी के मन को घक्का लगा। जिस पाप-पंक को वह अभी स्वयं ही अपने मुख से नकार रहे थे उसे ही उनका अहंकार जोर-जोर से सकारने लगा।हृदय की धड़कन में सहसा ध्वनि गूंजी -'राम राम राम’ -तुलसी एक क्षण के लिए निस्तब्ध हुए, हतप्रभ हुए, फिर आँखें भर आईं। उन्होंने देखा कि श्रीराम के संकेत पर हनुमान जी उनकी हृदयहारिणी को निर्मम भाव से झोंटे से पकड़कर बाहर निकाल रहे हैं और विवश विरही तुलसी प्रभु के आगे कुछ कहने का साहस न करके चुपचाप खड़े चौधार आँसू बहा रहे हैं। प्राण गूजतें हैं, 'क्या चाहते हो ? मोहिनी या राम ? मोहिनी या राम ?” तुलसी विकल होते हैं, “राम को कदापि नहीं छोड़ूँगा” अपने प्रवलतम मनोंद्वद्व को खोई हुई दृष्टि से निहारता हुआ रामबोला काठ के पुतले सा बैठा रहा।
कुछ दिनों तक तुलसी के मन, कर्म और वचन त्रिशंकु की तरह आठों याम अधर ही में लटके रहे।तन सूखकर काँटा होने लगा।आँखें ऐसे डोला करती जैसे उन्हें किसी खोई हुई वस्तु की तलाश हो। गुरू पत्नी पूछती -“तुझे क्या हो गया है रे रामबोला? दिनोंदिन सूखता चला जा रहा है।” उत्तर में- “कुछ नही, आईया।” कहकर वह आँसुओं को अपनी आँखों में आने से रोकने का प्रयत्न करने लगते। कुछ सहपाठी उनके मुख पर और पीठ पीछे भी- प्रमाण सहित यह कहते नहीं थकते थे कि वटेश्वर मिश्र ने तुलसी पर उच्चाटन मंत्र का प्रयोग किया है। कुछ ही दिनों में यह बावले होकर गली-गली डोलेंगे। मामाजी का यह विचार और भी दृढ़ हो गया था कि इसे मेघा भगत का छुतहा रोग लग गया है। उन्होंने अपनी बहन से कई बार कहा कि इसका विवाह हो जाना चाहिए मैंने लड़की ठीक कर ली है। इसे घर भी मिलेगा और धन-सम्पत्ति से भी हैसियत बढ़ेगी। जीजी, तुम जीजा जी से कहो कि इसे विवाह करने की आज्ञा दें। शेष गुरू जी की पत्नी ने अपने पति से इस संबंध में चर्चा भी चलाई। वे बोले- “खिलती कली को तोड़ कर हार में गूँथना बुद्धिमत्ता नहीं होती। अभी इसका अंत:सौंर्दय विकसित होने दो।” 
तुलसी के अनन्य साथी गंगाराम ने ज्योतिष से विचार करके एक दिन तुलसी से कहा- “मित्र, तुम्हारे जीवन में एक विराट परिवर्तन आनेवाला है। तुम निश्चय ही अपनी इष्ट वस्तु को प्राप्त करोगे।”
“इष्ट वस्तु ! क्‍या सचमुच ही मुझे मोहिनी मिल जाएगी?” - रे पगले झूठा मोह क्यों करता है? वह हाकिम की प्राणवल्लभा, सुख से सोने की सेज पर सोती है। हीरे-जवाहरातों से मढ़ी है। वह तेरे जैसे दीन-हीन भिक्षुक के पास भला क्‍यों आने लगी? नहीं -नहीं , वह मेरी प्राणवल्लभा है। असुर कोतवाल, अनाचार करके उसे अपने बंधन में बाँधे हुए है। वह मुझे मिलेगी। जिसका जिस पर सत्य स्नेह होता है वह उसे अवश्य मिलता है, इसमे तनिक भी संदेह नही।”तुलसी दिन-रात ऐसी बातें सोचा करते। कभी अंतश्चेतना भड़कती सदमार्ग प्रदान करती, “क्या यही है तेरी इष्ट वस्तु ? छि तू रहा भिखारी का भिखारी ही। जनम-भर जूठन खाता रहा और अब जबकि सोने के थाल में छप्पन भोग तेरे सामने आए हैं तब भी तू अभागा जूठी पत्तल की ओर ही ताक रहा है। घिक्‌ तेरा जीवन, घिक्‌ तेरे संस्कार ! तू डूबकर मर क्‍यों नही जाता रामबोला?
आत्महत्या का विचार उनके मन में रह-रहकर बादलों का घटा टोप बन- कर छाने लगा। मोहिनी को देखे दस दिन बीत चुके थे। वह मेघा भगत के यहाँ जानबूझ कर नही गए थे।उन्हें पूरा विश्वास था कि भगत जी उनके मन की बात जान गए हैं।

दो-तीन दिनों के बाद मामा जी के आदेशानुसार इच्छा न होते हुए भी तुलसी को एक निमंत्रण में जाना पड़ा। मार्ग में कैलास से भेंट हो गई।उनसे पता चला कि मेघा भगत इस नगर को छोड़ कर अचानक अयोध्या चले गए हैं। तुलसी को इस सूचना से अपार शांति मिली, यद्यपि इस शांति की तह दर तह में मोहिनी की याद का भूत अब तक लिपटा हुआ था।एक महीने से ऊपर दिन बीत गए।तुलसी के मन की हलचल अब प्रायः थम चुकी थी। मन अभी बहला नही था पर चुप अवश्य हो गया था।
गुरू जी के घर के पास ही रहनेवाले सोमेशवर उपाध्याय नामक एक घनाढ्य और प्रतिष्ठित ब्राह्मण के घर पर पौत्र-जन्म की खुशी में एक प्रीतिभोज और गायन का प्रबंध हुआ। पीपलवाली गली में मंडप सजाया गया। तोशक-तकिये लगे, चहचहाते पंछियो के पिंजरे टाँगे गए, बड़ी सजावट हुई। शाम से ही सुनने में आ रहा था कि कोतवाल साहब स्वयं पधारेंगे और उनकी रखैल मोहिनी बाई का गाना होगा। खबर सुनकर तुलसी घक्‌ से रह गए। महीने भर के सारे ब्रत नियम बालू की दीवार से ढह गए। मेघा भगत उन्हें धिक्कारेगें। गुरू जी महाराज सुनेगें तो उन्हें कितना कष्ट होगा।आईया जी को कितना कप्ट होगा। बजरंगबली धिक्कारेंगे, राम जी सदा के लिए विमुख हो जाएगें आदि बातों से चेताकर साधा गया मन इस सूचना से क्षण-मात्र में फुर हो गया।
क्रमशः

Saturday, 29 April 2023

tc 52

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
52-

यों कहने- सुनने की बात और है पर व्यवहार की दृष्टि से देखा जाय तो भगवान की भक्ति और परनारी प्रेम में पड़कर मनुष्य की एक ही सी दशा होती है, वह निकम्मा हो जाता है।” नंददास सुनकर हंस पड़ा, बोला-“धृष्टता क्षमा करें मामा, जान पड़ता है आपने कभी न कभी परनारी से अवश्य ही प्रेम किया होगा, अन्यथा ऐसे गहरे भेद की बात भला आप क्यों कर बतला सकते थे।”
मामा हँसने लगे, कहा-“अबे गावँ नहीं गया पर कोस तो गिनें हैं। बताए देता हूँ बेटों, यदि दुनिया में सफल होकर रहना चाहते हो तो इन दो बातों पर कभी गंभीरता पूर्वक अमल न करना।”

तीसरे दिन तुलसी ने अपने मन को बहुत-बहुत बरजा किन्तु उनके पैर अपने आप ही मेघा, भगत के निवास की ओर बढ़ गए। उस दिन आँखे बार-बार द्वार की ओर दौड़ती रहीं पर मोहिनी न आई। लोगों के आग्रह से उन्होंने मीरा और कबीर के भजन भी गाए पर आज उन्हें गायन में सुख न मिला। तुलसी के कंठ में विरह पीड़ा व्याल-सी लिपटी थी। भक्त मंडली सुनकर आत्मविभोर हो गई परन्तु मेघा भगत ने स्वगत भाव से केवल इतना ही कहा- “हे राम, नारी के विरह में जैसी टीस कामी के कलेजे में उठती है वैसी ही मेरे कलेजे में भी अपने लिए भर दो।” तुलसी को लगा कि भगत जी ने उसके मन का पाप पहचान लिया है। इससे मन में अपार लज्जा और असहाय ग्लानि का बोघ हुआ- “कहाँ जा रहा है रे रामबोला, हीरा छोडकर काचँ की चमक ने लुभाया है?” सोचकर आखें भर आईं। कल्पना में विराजी सीताराम की छवि ऐसे हिल रही थी जैसे पानी मे परछाईं, और उस परछाई के तल में एक अस्पष्ट प्रतिबिम्ब था जो तुलसी की भावना के अनुसार भय से कांप रहा था।“छल है। छल है। चेत रे मन, चल । इस नगरी में तुझे वह वस्तु नहीं मिलेगी जिसे तू चाहता है।प्रेम किए जा रे दीवाने।प्रेम तो अपने आप में ही एक अनुभव है रे।वह देना जानता है और लेने की कल्पना तक नही करता। प्रेम ऐसी मूसलाधार बरसात है जिसमें बरसात का पानी दिखलाई तक नही पड़ता पर घरती तर हो जाती है, सूर्य का ताप अग्नि की लपटों-सा लगता अवश्य है पर वह जलन शीतल है, उर्वेरा है। चल रे मेघ, कहीं और बरस।इस नगरी में सबके मन पत्थर-हैं। वह भले ही मणि-माणिक से चमकते हो पर पत्थरों पर तेरे बरसने से क्या भला कुछ उपज सकेगा ? नहीं नहीं, राम, अब लोकेपणा में नही फँसूँगा।”
मेघा भगत अपने आप से बतियाते हुए आँखें मूँदें बैठे थे। उनके भक्‍तों के लिए उनकी यह बातें एक ऐसा ही रहस्य मात्र थी जिसे भेदकर मर्म पहचानने की विशेष लालसा किसी भी लोकव्योहारी पुरुष में नहीं होती। 
तुलसी के मन में ग्लानि का अथाह‌ सागर फैला हुआ था- “नही, मैं नही फंसा।मेरा मन अब भी राम चरण लीन है। मैं यह कभी नहीं सह पाऊँगा कि लोग-बाग मुझ पर अँगुली उठाकर कहे कि यह किसी अन्य का दास है। यह ग्लानि, यह पश्चात्ताप मैं कदापि नही सह पाऊँगा। हे राम, मुझे इस पाप पंक में पड़ने से बचाओ। राम, मैं तुम्हारा हूँ और किसी का नही।छिटक, छिटक कर कहाँ जा रहा है रे मन? भाग, भाग।”
तुलसी सचमुच भाग खड़े हुए। वह्‌ वातावरण उन्हें काट रहा था। गली के मोहाने पर एक युवक ने बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया किन्तु तुलसी ने ध्यान न दिया। युवक ने उनके कंधे को छूकर उनका ध्यान आकर्षित किया और कहा-“आज आप बड़ी जल्दी चल दिए।”  इस युवक को तुलसी ने मेघा भगत के यहाँ कई बार देखा है किन्तु परिचय नहीं था। एक अपरिचित-परिचित के टोकने से तुलसी ने सहसा कड़े संयम से मन की लगाम साधी, यथाशक्ति प्रसन्‍न मुख बनाकर कहा -“मुझे, एक काम है।” “आपने जब से वटेश्वर के भूतों को मिथ्या सिद्ध कर दिया तभी से मैं आपसे मिलना चाहता था। भगत जी के यहाँ अब आपकी उच्चकोटि की भावुकता से भी प्रभावित हुआ हूँ । कई दिनों से सोच रहा था कि आपसे बोलें करूं। पर वहाँ तो रस ऐसा गाढ़ा बरसता है कि मन मे उठनेवाली और बहुत-सी बाते बिसर- बिसर जातीं हैं।”
ध्यान साधते साधते भी उड़-उड़ जाता था, कुछ सुना, कुछ न सुना। चेहरे पर रूखी यांत्रिक मुस्कान आई, हाथ जोड़े, कहा-“अच्छा तो चलूँ।”
उड़ी -उड़ी आँखें , खोया-खोया चेहरा देखकर युवक अचानक मुस्कुराकरा उठा।उसकी मुस्कराहट तुलसी को और भी घुटन दे गई। यह सारी दुनिया तुलसी को एक पिंजरे जैसी घुटन-भरी लग रही थी। उन्हें ऐसा लगता जैसे गलियों में आता-जाता हुआ हर व्यक्ति पिंजरे में बन्द तुलसी रूपी केहरी को निन्‍दा भरी, नोकीले भालों-सी दृष्टि से देख रहा हो। गलियों में व्यापा जगत कलरव अपने मन के भीतर उन्हें पश्चात्ताप और निन्दा-भरे शोर-सा लग रहा था- 'मुझे जीवित नहीं रहना चाहिए।मुझे मर जाना चाहिए। डूब मर रामबोला, डूब मर।”मन अपनी ही प्रताड़ना से बिलख पड़ा।
गलियों में लोग देख रहे थे कि एक सुन्दर युवक अपने आप से रोता-बड़बड़ाता चला जा रहा है। वह अपने आपे में नहीं है। राह चलते मनुष्यों से टकरा जाता है। कोई झिड़कता है, कोई समझाकर कहता है कि देख के चलो, बचकर चलो।

“अरे, तुलसी, इधर कहाँ जा रहे हो?"
गंगाराम का स्वर मानों तुलसी तक पहुँच न सका।जो गली गुरू जी के घर जाती थी उसे छोड़कर वह सामने गंगा जी की ओर जानेवाली गली की दिशा में बढ़ रहे थे। जब गंगाराम ने अपनी बात तुलसी के कानों में पड़ती न देखी तो उनका ध्यान भंग करने के लिए तेजी से आगे बढ़कर उनका रास्ता रोक लिया। गति में बाधा पड़ने से तुलसी की बहकी आँखें सध कर ऊपर उठीं।
“यह कैसी गत बना रखी है तुमनें? इधर कहाँ जा रहे थे?”
“कहीं नहीं। मुझे जाने दो।”
“पागल तो नहीं हो गए हो तुलसी? रो क्यों रहे हो? कोई देखेगा तो क्या समझेगा ? क्‍या हुआ?” 
तुलसी तब तक बहुत कुछ सावधान हो चले थे। प्रिय मित्र को देखकर उन्हें एक सहारा मिला था।
क्रमशः

Friday, 28 April 2023

51tc

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
51-

उस दिन नगर में कुछ मुगल सिपाहियों ने दर्शनार्थ जाती हुई कुछ स्त्रियों को देखकर छेड़छाड़ भरे गन्दे शब्द कहे थे। एक अहिर युवक सिपाहियों की इस अभद्रता को सहन न कर सका। उसने अपनी लाठी तानकर उन्हें चुनौती दी।गली में आते-जाते कुछ भद्र पुरुष आगे बढ़कर समझावन-बुझावन करने लगे। उन्होनें मुगलों से क्षमा माँगी और अहिर युवक को डाँट -डपटकर भगा दिया।एक व्यक्ति ने भेघा भगत के सामने इस प्रसँग की चर्चा की। इस पर कई लोग कलिकाल का रोना रोने लगे।मेघा भगत ने इसी प्रसँग को लेकर राम के शौर्य को बखानना आरम्भ कर दिया। राम अनाचार को कदापि सहन नहीं कर सकते। उन्होंने ऋक्ष, वानर जैसी अर्ध सम्य जातियों का सहयोग लेकर प्रचण्ड प्रतापी अनाचारी रावण को दण्ड दिया था। मेघा भगत के प्रवचन में आज करुणा नही वरन‌ ओज बरसा। उन्होंने राम-रावण के युद्ध का ऐसा चमत्कारिक वर्णन किया कि कमरे में बैठे हुए हर व्यक्ति को उनकें शब्दों की सम्मोहिनी शक्ति ने बाँध दिया। हर दृष्टि मेघा भगत के मुख पर मानों टिक गई थी। केवल तुलसी की टकटकी मोहिनी के मोहक मुखड़े से ही बंधी रही। मोहिनी चतुर खिलाड़िन थी, बीच-बीच में उसकी दृष्टि घूमकर तुलसी को देखने लगती। मोहिनी की माँ भी अपनी बेटी के इस खेल से अनभिज्ञ न रह सकी। उससे अपनी बेटी के घुटने को दबाकर उसे बरज दिया और मोह मुग्घ तुलसी की दृष्टि को अपनी आँखों की कठोर मुद्रा से डाँटा। मन के रंगीन आकाश में स्वच्छन्द उड़ानें भरते हुए नवयुवक तुलसी की आँखों के आगे सहसा अंधेरा छा गया। ऐसा लगा मानों सतखंडी हवेली की छत पर खड़े होकर पतंग उड़ाने वाला बच्चा अचानक ही नीचे गली में आ गिरा हो।तुलसी आत्मग्लानि से भर उठे, उनका सिर फिर ऐसा झुका कि मानों उनके गले में किसी ने भारी बोझ लटका दिया हो- “मेरा पाप पकड़ा गया।अब वह अवश्य ही गुरू जी के पास जाकर मेरा अपराध बखानेगी। कैसा गहरा धक्का लगेगा गुरूजी को। विद्यार्थी समुदाय मेरी खिल्ली-उड़ाएगा। मैंने यह क्या किया राम।मुझसे ऐसा अपराध क्यों हुआ? पर- नारी को क्‍यों ताका? पर मोहिनी पराई कहाँ, वह तो मेरी है। छि, अपने को छलते हो, रामबोला? उसका स्वामी कोतवाल है। देख पाए तो तेरी बोटी बोटी कटवाकर कुत्तों के आगे फेंक देगा। तेरे कारण मोहिनी की भी यही दुर्दशा होगी।” इस विचार मात्र से तुलसी का मन थरथरा उठा।बेबसी में तुलसी के अरमान घुटने लग। साँस लेना पहाड़ ढकेलने के बराबर हो गया।
मेघा भगत बोलते-बोलते सहसा मौन हो गए थे।मोहिनी ने दबी कनखी से तुलसी को देखा, पीड़ा के समुद्र में तल पर बैठा हुआ मोती सा वह प्रिय भला मोहिनी से क्योंकर देखा जा सकता था। न किसी ने कहा, न सुना, पर मोहिनी अपनी तड़प से आप ही आप गाने के लिए मचल उठी-
“हरि तुम हरो जन की पीर। द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढ़ाए चीर॥”

मोहिनी के स्वर मे ऐसी टीस थी कि किसीका भी मन उससे अछूता न बच सका। तुलसी शब्दों से अधिक स्वर से बँधे थे। तुलसी से फिर वहाँ बैठा न जा सका। गायन समाप्त भी नही हुआ था सारे शिष्टाचार भुलाकर वह सहसा उठ कर बाहर चले आए। उन्हें ऐसा लगा कि उनके बाहर आने से गाने वाली का स्वर लड़खड़ा गया है। उन्हें लगा कि वह स्वर उन्हें पुकार- पुकार कर कह रहा है, मत जाओ, लेकिन पश्चात्ताप का आवेश इतना प्रबल था कि तुलसी के पैर तेजी से आगे बढ़ते ही रहे। वह घर, वह गली, दो-तीन और गलियां भी पार हो गईं।घर आया। मामा जी ड्योढ़ी भीतर वाली अपनी कोठरी में चौकी पर बैठे हुए किसी दासी पर गरमा रहे थे। आँगन के चारों ओर बने दालानों में विद्यार्थीगण पाठमग्न थे। तुलसी इस समय न किसी को देखता चाहते हैं और न किसीसे बोलना ही चाहते हैं। सबकी नजरें कतरा कर वह सीधे तिमंज़िले की सीढ़ियों पर चढ़ गए। अपनी कोठरी में पहुँच कर उन्होंने भीतर से किवाड़ बंद कर लिए और घम्म से अपनी बिछावन पर बैठ गए। मोहिनी का स्वर उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था- 'हरि तुम हरो जन की पीर।”
भोजन का समय हुआ पर तुलसी भोजनशाला में न पहुँचें। मामा जी ने दासी की लड़की बेला को उन्हें बुलाने के लिए भेजा। कोठरी के बाहर एक महीन-मीठी आवाज सुनाई दी- “भैया, मामा बुलाय रहें हैं।”
तुलसी के कानों में शब्द तो पहुचें ही नही और स्वर भी दासी-पुत्री का होकर न पहुँच सका। उन्हें लगा कि द्वारे खड़ी हुई मोहिनी पुकार रही है। नहीं नहीं , यह छलावा है। उठ, देख कौन आया है। तुलसी बड़ी कठिनाई से उठे। इस समय उनके मन पर एक सुन्दर कोमल फूल का इतना भारी बोझ लदा था कि तन उठ ही न पाता था। बाहर से बेला की आवाज पर आवाज चली आ रही थी, “भैया ! भैया ! भैया !”
तुलसी उठे, द्वारे का बेड़ना हटाया और एक कपाट खोलकर बेला से कहा-“कह दे बेला कि आज हम भोजन नहीं करेगें।
“काहे भैया?”
“हमारा सिर पिरा रहा है बेला। इस बेरिया न खाऊँगा तो तबियत ठीक हो जाएगी। जा कह दे।
तीसरे पहर गुरू जी ने एक विद्यार्थी को भेजकर तुलसी के हालचाल पुछवाए। अपने होश मे पहली बार तुलसी ने झूठ बोला। उन्होंने असह्य शिरो पीड़ा का नाटक साधा। गुरू जी से झूठ बोलने की ग्लानि मन पर अवश्य चढ़ी किंतु इस समय तुलसी अपने गुरू जी का सामना नहीं कर सकते थे। पाप और पुण्य की ऐसी गहरी खींच -तान उनके मन में चल रही थी कि वह उस समय आचार्य जी से दृष्टि मिलाने का साहस कर ही नहीं सकते।
दूसरे दिन तुलसी अपने मन की छटपटाहट को हठपूर्वक बरज कर मेघा भगत के यहाँ नहीं गए। उन्होंने सारे दिन अपने-आपको अध्ययन में व्यस्त रखने का प्रयत्न किया पर अनमने ही बने रहे। नन्ददास, गंगाराम आदि निकटतम मित्रों ने दो एक बार पूछा भी परन्तु उन्होंने कोई उत्तर न दिया। उनके उतरे हुए चेहरे को देखकर मामा जी बोले -“जान पड़ता है, मेघा के छुतहे रोग ने हमारे रामबोला को भी ग्रस लिया है। अबे, फिर कहता हूँ , इस भगतबाजी की चकल्लस में मत पड़।
क्रमशः

Thursday, 27 April 2023

tc 50

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
50-

आश्वासन पाकर मेघा के राम की आँखें आनन्द से छलछला उठती है- “मेरी प्रिया अब मुझे अवश्य मिल जाएगी। हनुमान के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।”
तुलसी के मनोबिम्ब में अपने लाड़ले वीर हनुमान के पीछे तुलसी भी हाथ जोड़ अर्जी लगाए बैठ गए हैं।वह कहना ही चाहते हैं कि हनुमान जी, मेरा भी विरह ताप हरो।पर सहसा हिचक जाते हैं। मनोबिम्ब में तुलसी चोर-से हनुमान के पीछे से गायब हो जातें हैं और उनके गायब होते ही सारा मनोबिम्ब, अंधेरे मे डूब जाता है, मन सूना हो जाता है। उधर मेघ की वाणी में श्रीराम सहारा पाकर अपनी प्रिया के शोक भरे चिन्तन में डूब जाते हैं- “न जाने कैसे होगी, कहाँ होगी मेरी प्राणवल्लभा जानकी जिसे मैंने अपनी पलकों की सेज पर सदा सुलाया, सहलाया, जिसकी एक दृष्टि में ही मुझे अनन्त ब्रह्माण्डों का साम्रीप्य प्राप्त हो जाता था, उस प्रिया की हँसती 
हुई आँखें इस समय दुःखों का अपार सागर बनकर कहाँ लहरा रही होंगी? प्रिये, प्राणवल्ल्भे, मैं कैसे तुम्हारा दु.ख हरूँ? कैसे तुम्हें झटपट अपने अंक मे भरकर तुम्हारा और अपना दुर्भाग्य मोचन करूँ? सिया सुकुमारी, तुम्हारे बिना यह राम जंगल के ठूँठ की तरह जल रहा है। तुम कब वर्षामंगल मनाने आओगी?”
मोहिनी का मनभावना मुखड़ा फिर आँसू टपका रहा है। हाय, कितना भावुक
है यह जवान ! ऐसा सलोना मर्द रो रहा है, हाय जी चाहता है, यहाँ अकेलापन हो जाय और मै इसे लिपटाकर चूम लूँ। 
मेघा भगत का राम-विरह वर्णन पूर्ण हो चुका था। आँखें बन्द किए आँसू बहाते हुए वे होंठों ही होठो में बुदबुदा रहे थे। उनका मुख अपार शोकमग्न होकर और भी अधिक तेजस्वी हो उठा था। 
सहसा तुलसी ने धरती पर साष्टांग
लेटकर भगत जी को प्रणाम किया और उठकर चल पड़े। मोहिनी की प्यासी आँखें अपने पानी के पीछे पीछे तड़पकर भागी। तुलसी दरवाजे तक पहुँच गए थे। मोहिनी ने अपना सबसे तीव्र शक्ति शाली तीर चलाया। तड़पकर संत रैदास का भजन गाने लगी - 
“अब कैसे छूटै राम, नाम रट लागी,नाम रट लागी।
प्रभुजी तुम चदंन हम पानी। 
जाकी अंग अँग बास समानी॥
प्रभूजी तुम घन हम बनमोरा।
मुँह जैसे चितवत चन्द चकोरा॥ 
अब कैसे छूटे राम नाम रट-लागी।”

मोहिनी के स्वर ने तुलसी के पावँ बाँध दिए। वह वहीं के वहीं खड़े हो गए, गाते हुए मोहिनी के मुखड़े पर हँसी खिल उठी। सभा की चतुर आँखें मेघा भगत के चेहरे से लेकर भीड़ में जिस-तिस की आँखों की ढइया छूती हुई अपने मनभावन की आँखों से जा टकरातीं थीं और उन टकराहटों से राम का तुलती मोहिनी का तुलसी बना जा रहा था-“छि:, कोई देख लेगा। क्या कहेगा? भागो।” और तुलसी तेजी से बाहर निकेल गए। गलियाँ पार करते जाते है । अपने घर भी पहुँच जाते हैं। दोस्तों की जिस तिस बातों का जवाब देने के लिए मजबूर होतें हैं। नदंदास अपनी किसी दाशर्निक गुत्थी को लेकर आ गया, वह भी सुलझानी पड़ी। उसके जाने के बाद किताब खोलकर पढ़ने का प्रयत्न किया, मगर सब कुछ करते-धरते हुए भी तुलसी के कानों में अपने मन बसी मोहिनी की आवाज़ ही सुनाई पडती जा रही है---'अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी।” और यह नाम राम नही, मोहिनी है 'मोहिनी ! मोहिनी !! मोहिनी !!! अब कैसे छूटे राम....”
शाम को गुरु-पत्नी ने कहा-“जान पड़ता है, यह भी एक दिन मेघा जैसा ही राम बावला हो जायगा।”
रात में अपनी कोठरी में आने से पहले नित्य नियम के अनुसार मामा जी के लिए जब वह दूध का गिलास लेकर पहुँचा तो वे बोले- “अबे, अभी से ज्यादा भगतवाजी के फेर में न पड़। मेघा के यहाँ जाना छोड़। सरयू मिश्र की लड़की पर तेरे लिए मैं आखँ गड़ाए बैठा हूँ बे। इकलौती लड़की है, देखने में भी तेरे ही जैसी गोरी-चिकनी है।अबे बीस-पच्चीस हजार से कम की माया नहीं होगी सरयू की विधवा के पास। यहाँ से जाने पर सीधा अपने ही घर घरनी और हजारों की सपंदा का मालिक बनकर बैठ जायगा। काशी के पंडितों में पुज जायगा। पहले दस-पाँच चेले और दस पाँच बाल-बच्चे तो पैदा कर ले रे, फिर भगतबाजी करना।” 
भागँ के नशे में तुलसी के प्रति अपनी चिन्तनाओं का प्रसार करते हुए मामा जी जरा गहरे रस के बहाव में भी आए, कहने लगे- “अबे, जवानी में मर्द को औरत की छाती में ही शरण मिलती है । राम की शरण तो बुढ़ापे में ही खोजनी चाहिए। अभी तूने दुनिया देखी ही कहाँ है बेटा।”

तुलसी के लिए यह सारी बातें दोहरी मार थी। ऊपर अपनी कोठरी में जब वह अकेले बैठे तो मुक्त निरालेपन में अपनी ओर प्यार भरी दृष्टि से ताकती हुई मोहिनी पल भर के लिए मांसल होकर उनकी आँखों के सामने उभर आई। मन की बाँछें खिल गईं- “मोहिनी, तुम चंदन हम पानी.... नही राम ...नही, यह धोखा है। मैं जग को धोखा दे रहा हूँ । लोग समझें हैं कि यह मेरा राम-विरह है। मुझे ऐसा ढोंग भी नहीं करना चाहिए।”
परतु मन के भीतर वाला अतृप्त कामी तुलसी विद्रोह करता है। कहता है कि मोहिनी मुझे चाहती है।नगर की सर्वश्रेष्ठ गायिका, हाकिम के ऊपर भी राज करनेवाली सलोनी प्रियतमा मुझे चाहती है। तब मैं क्यों न उसे चाहूँ, प्रेम का प्रतिदान देना क्या पाप है? विवेकी तुलसी समझाता है, 'वह कोतवाल की चहेती है। उससे आँख लड़ाओगे तो कोड़े बरसेगे कोड़े। दुनिया तब तेरे मुँह पर थूकेगी। तेरी यह सारी धोखा-धड़ी लोक उजागर हो जायगी।” सुनकर विरही तुलसी का विद्रोह ठिठक गया। लोहे की मोटी साँकल में फँसे हुए पैर वाला जगंली गजराज बरगद के मोटे तने से बँधी अपनी ज़ंजीर को तोड़ने के लिए रात भर मचलता रहा- “अब कल से वहाँ नहीं जाऊँगा, नहीं जाऊँगा, नही जाऊँगा।
लेकिन दूसरा दिन आया, समय हुआ तो तुलसी के पैर अपने आप ही मेघा भगत के घर की ओर भागने लगे। जब सड़क पार कर वे गली की ओर मुड़ने लगे तो रथ से उतरकर मोहिनी अपनी एक दासी के साथ गली की ओर बढ़ रही थी। मोहिनी ने तुलसी को देखा तो खिल उठी।
क्रमशः

Wednesday, 26 April 2023

tc 49

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
49-

मोहिनी और उसकी माता ने मेघा भगत के चरणों में झुककर प्रणाम किया। माँ ने दासी को संकेत किया।सीक की बुनी हुई रंगीन डोलची में सुन्दर गूँथी हुई फूल-माला के साथ रखे फल लेकर वह चट से सामने आ गई। माँ ने उसके हाथों से डोलची ली और भक्तराज के चरणों मे उसे रखकर फिर सिर झुकाकर प्रणाम किया।बच्चे के समान भोले आनंद से वह माला अपने हाथ में उठाकर मेघा भगत देखने लगे। मुग्ध स्वर में बोले- “वाह कैसी सुन्दर है यह माला। तूनें गूँथी है बहन?” उन्होनें मोहिनी की ओर देखकर पूछा।
मोहिनी ने लजाकर अपनी आँखें झुका लीं। माँ बोली- “कल आपके दरबार में गाकर मानों इसके भाग्य की रेखाएं ही बदल गई महाराज। कल शाम ही जौनपुर के राजा साहब के यहाँ से साई मिली। आपके आशिर्वाद से बड़े राज दरबार का यह पहला बुलावा मिला है।”

मेघा भगत का घ्यान प्रौढ़ा की बातों पर नही, माला की सुन्दरता पर था। फूलों में राम ही राम झलक रहे थे। कुछ देर बाद अपने आप ही कहने लगे- “बहन, तेरा यह श्रम और कला मुझसे अधिक तुलसी के लिए है। इसे पहना दूँ ?” स्वीकृति के लिए मेघा रुके नहीं , वह माला तुलसी के गले मे डाल दी। आनंद और संकोच से भरे हुये रामबोला की आँखें एक बार झुकीं फिर बरबस उठकर मोहिनी की आँखों से जा अटकीं। वह बड़े चाव से इन्हीं की ओर देख रही थी। 
आज फिर गाना हुआ। मोहिनी ने गाया, तुलसी ने गाया और फिर मेघा भगत भी आनन्दमग्न होकर गाने लगे-

“आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णा तरंगाकुला। 
राग्रग्राहवती वित्क विहगा घीर्य द्रमध्वंसिनी।
मोहावते सुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुण चिस्तालसी। 
तस्याः पारगता विशुद्ध मनसा नन्दन्ति योगेश्वरा।”

मेघा भगत के द्वारा गाया गया श्लोक तुलसी के अबीर गुलाल भरे बसंती मन पर पानी सा पड़ा । रंग उजड़ गए,कीचड़ हो गई। मेघा भगत से दृष्टि मिलाने में भय लगता था। मोहिनी के सुख कमल पर पुतलियों के भौरे जा चिपकने के लिए मचलते तो बहुत थे पर इस श्लोक ने सब कीचड़ कर दिया था। सिर भुकाए हुए युवा तुलसी अपने ही में मन मारे बैठे अपने पश्चात्ताप और सत्या- चरण के मतवाले मुर्गे लड़ाते रहे। मन नीचे से ऊपर की ओर खौल रहा था, ज्यों चूल्हे की आग पर चढ़ा पतीली का पानी खौलता है।
मेघा भगत से फिर क्रमशः अपनी भाव वाचालता में आना आरंभ कर दिया। अपनी कल्पना स्वयं अपने ही को सुनाने में तन्मय होकर यों सीता के खो जाने के बाद श्रीराम के विरह-प्रसँग को लेकर वे अपने जी का दुखड़ा बाँधने लगे-“कुटिया सूनी है। राम का मन भी कुटी की तरह ही सूना हो गया है।भीतर बाहर के यह सूनेपन एक जैसे ही भयावह हैं। कहाँ गई सीता महारानी? क्या हो गया उनकों?”- राम के भय आँसू और विरह की बेसुधी से भरे हुए प्रलापों का वर्णन मेघा भगत की वाणी में चलने लगा।बीच बीच में प्रसँग से सम्बन्धित वाल्मीकि के श्लोक भी गाने लगते थे। विरहरूपी रामकीर्तन बढ़ रहा ह।
“श्रीराम जैसा कर्मयोगी केवल आँसू बहाता तो बैठ नही सकता। विरह भी उनके लिए शक्ति और कर्मंदायक ही बनता है।वे सीता महारानी को खोज कर ही रहेगें।उनकी बुद्धि उन्हें यह निश्चय भी कराती है कि शूपर्णखाँ के अपमान और उसके पति की हत्या का बदला लेने के लिए ही किसी ने उनकी प्रिया को हर लिया है। विचारों की इन्हीं उथल-पुथल में उन्हें जटायुराज मित्रते हैं जो सीता को हर ले जानेवाले रावण से लड़े थे....” 
आरंभ में तुलसी अपने भीतर के दु.ख से सने हुए अनमने बैठे रहे, फिर क्रमशः मेघा भगत के शब्द चित्र उनकें कानों में गूजँने लगे। कल्पना के पट पर मनोपीड़ा अपने चित्र झाँकने लगी। कभी मेघा भगत के शब्द के सहारे हबहू उन्हीं के मन की तरह से छटपटाते हुए श्री राम झलकते और कभी जंगले के आरपार अपने और मोहिनी के बिम्ब। राम और तुलसी मन नें पूछा, कौन रहे?मन ने ही अपने कठिन मोह जाल को भेदकर सत्य को स्वीकारा और फिर कुछ पल पश्चात्ताप में गूँगा हो गया। आँखें बरसने लगीं मोहिनी की ओर दृष्टि गई।यह टप-टप आँसू टपकाता हुआ गोरा, सुन्दर, कुवाँरा चेहरा मोहिनी की आाखों में अटक गया।जो क्षण मेघा भगत के लिए श्रीराम की विरह ज्वाला में और रामबोला के अपने पहले-पहले विरह ज्वाल में जलने का था, वही क्षण मोहिनी के मन मिलन का भी था।आयु में मोहिनी तुलसी से लगभग दो-चार वर्ष बड़ी ही थी और मन से अभी तक कवाँरी भी।उसका तन काशी के कोतवाल का जुठारा हुआ था। चिरअतृप्तिदायक बूढ़े हाकिम की गुलामी की घुटी-घुटी दारूणता और भक्ति- भावना में बह मेघा भगत का माहात्म्य सुनकर उनके दर्शन करने आती थी। सहज प्यास में तुलसी जैसे सुन्दर जवान का रूप-कूप अचानक मिल गया-'हाय, कितना प्यारा, कितना सुहाना चेहरा है । ये सपन भरी बड़ी बड़ी काली पुतलियों वाली आम की फाँकों जैसी आँखें ये लम्बी सुतवा नाक, ठोड़ी, रोएदार जवानी भरा भोला-भोला सुहाना मुखड़ा, ये कूसरती बदन।हाय, जो कहीं इसे वह खाना नसीब हो जो हमारे बुढऊ सैंया को खाने और फेंकने के लिए रोज मिलता है तो चार ही दिन में ये गवरू जवान हुस्न के मैदान में रुस्तम की तरह झूमने लगे। हाय, गाता भी खूब है।’

मेघा भगत के वर्णन में विरही राम श्रौर सेवक हनुमान की भेट हो चुकी है। तुलसी के आँसू सूख चुके हैं। झुका सिर उठकर मेघा भगत को एकटक निहारने लगा है। मेघा के चेहरे का आधार उनकी कल्पना को रामविम्ब में रहने के लिए आत्मबल देकर साधता है। इस समय जैसे मेघा भगत के मन में , वैसे ही तुलसी के मन में भी हनुमान हाथ जोड़े हुए वीरासन पर विराजमान हैं। उनके पास ही पीपल तले बने अनगढ पत्थरों और मिट्टी के चबूतरे पर शोक चिन्ता मग्न श्री राम विराजमान हैं। बाँई ओर चबूतरें से सटकर वीर लखनलाल क्रोध और चिन्ता से भरे हुए खड़े हैं और मेघा भगत के हनुमान जी कह रहे है, तुलसी के हनुमान जी सुन रहे है- “नाथ, आपके चरणों की कृपा से एक रावण तो क्या में सौ रावणों से एक साथ जूझकर जगज्जननी को छुड़ा लाऊँगा।”
क्रमशः

tc48

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
48-

वे एक ही अनुसाधन के दो परस्पर पूरक रूप हैं।अच्छा, चल बैठ भाई। आज तो तू ही पहले कोई भजन सुना। कल से कोतवाल साहब की गायिका इस भवितिन के स्वर ने मेरें राममोह में एक दिव्य मादकता सी भर दी है। तेरा स्वर उस तरल मद को मेरे लिए प्रगाढ़ कर देता है।गा भाइया, गा। अभी वातावरण शांत है। भीड़ नही हुई है। मेरी आत्म- चेतना के कभी-कभी उठ आनेवाले झोंकों को सुलाने के लिए तू अपने स्वर और भाव से उसे कवचमंडित कर दे भैया, फिर इस देवी से सुनूँगा। एक जगह पर इसका स्वर इसके अनुपम रूप से अधिक सच्चा है।”
अब पहली बार तुलसी और मोहिनी की आँखें मिलीं। चारों आँखे एक-दूसरे की प्रशंसा में निछावर हुई जातीं थीं। मोहिनीबाई ने हँसकर कहा- “आपका स्वर तो अगम सरोवर का कमल है, पंडित जी, कल से मेरे कानों में भी अब तक गूँज रहा है।” 
तुलसी लजा गये, बैठते हुए बोले -“आप जैसी शास्त्र-निपुण कुशल गायिका के आगे भला मेरी हस्ती ही क्या हैं। एक भिखारिन की गोद में पला, उसने जो भजन सिखा दिए वही जानता हूँ । फिर थोड़ा स्वर का अभ्यास पूज्यपाद गोलोक वासी नरहरि बाबा ने करा दिया था।” यह कहकर तुलसी अपनी गुनगुनाहट में रम गये। आँखें मुँदने लगीं और नरहरि बाबा द्वारा गाया जानेवाला संत जी का एक भजन वे अपने घ्यान में स्व० नरहरि बाबा की छवि लाकर गाने लगे-
“प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी। जाकी अँग-अँग बास समानी।”
यह तुलसीदास नही गा रहे थे, उनके ध्यान में बैठा हुआ उनका जीवनदाता गा रहा था। इस समय तुलसी का स्वर गोलोकवासी गुरु के भाव और स्वर का वाहक मात्र था। मेघा भगत आत्मविभोर हो गए। उनकी बंद आँखों से अश्रु झर रहे थे। बीच-बीच मे उनके होंठ कुछ बुदबुदाहट भरी फड़कन से भी भर जाते थे। बाकी सारी काया निश्चेष्ट थी।
मोहिनीबाई की काया उसके अन्तर-उल्लास की प्रतिमूर्ति बन गई थी।उसकी चमकती हुई आँखें जैसे अपने से मिल कर तुलसी में समा गई थीं। कल  
जैसे तुलसी मोहिनी के स्वर से आत्मविभोर होकर उसके साथ गा उठे थे वैसे ही मोहिनीवाई भी आज स्वतःस्फूर्त होकर तुलसी के स्वर मे स्वर मिलाकर गा उठी- “प्रभुजी तुम मोती हम धागा”
तब तक कुछ और लोग भी आ गए। मेघा भगत आज संगीत सुनने की मौज में थे, इसलिए मोहिनीबाई ने संगीत का समा बांध दिया। उसकी आँखों का यह भाव तुलसी के मन मे स्पष्ट था कि वह केवल उनके लिए ही गा रही है। तुलसी आनन्दमग्न थे। स्वयं भी जयदेव रचित एक गीत गाया। उस दिन भक्तों में मोहिनीबाई सरीखी सरनाम गायिका से टक्कर लेनेवाले नये पुरुष-स्वर की धूम मच गई। सभी कोई कहे, 'वाह तुलसीदास जी, वाह तुलसीदास जी।'
मोहिनीबाई की सयानी माँ ने शीघ्र ही उठने का अंदाज साधा।तीसरे दिन मेघा भगत के यहाँ मोहिनीबाई और शेष महाराज के एक शिष्य के भक्ति संगीत होने की चमत्कारी प्रशंसाएँ सुनकर जन समुदाय अपने लिए एक नया आकर्षण पाकर, अधिक सँख्या में आया।इस तरह आते-जाते लगभग छ: दिन बीत गए । तुलसी के लिए मेघा भगत का स्थान दोहरा आकर्षण बन गया था। तुलसी को अब यह भी स्पष्ट हो गया था कि दोनों में मोहिनी के प्रति ही उनका आकर्षण अधिक तीव्र है। 

आज जब पहुँचे तो भक्तवर नें उन्हें बड़े प्रेम से देखा, लेकिन तुलसी की आखें उन्हें न देखकर कुछ और देखना चाहती थी।भक्तराज की प्रशंसक मंडली में बहुत से लोग बैठें थे पर वह न थी जिसे देखने की लालसा उन्हें यहाँ ले आई थी। मेघा भगत मुग्धभाव से तुलसी को ही देख रहे थे। उनका इस प्रकार देखना तुलसी के मन में संकोच भर रहा था। उनका मन कचोट रहा था कि वह ऐसे सात्विक भक्‍त को धोखा दे रहें हैं। पहले जिस उत्सुकता को लेकर वे यहाँ पर मेघा भगत के दर्शनार्थ आए थे वह उत्सुकता अब उनके प्रति कम होकर किसी और के प्रति थी। बीच-बीच में चौंककर चोरी से द्वार की ओर ताक लेते थे, मानों उन्होंने मोहिनी आवन की , आवाज सुन ली हो।
मेघा पूछ रहे थे- “वाल्मीकीय  रामायण पढ़ी है तुलसी?”
“हाँ महाराज, मेरा रसस्रोत उसी से फूटा है।”
“घन्य हो, मेरी दृष्टि मे रामायण से बढ़कर और कोई काव्य नही, महाकवि इतने महान‌ थे कि अन्य कोई भी कवि मुझे उनके आगे ऊँचा पूरा ही नहीं लगता।”
“आप ठीक कहते है महाराज।”
“मेरी इच्छा होती है कि वाल्मीकि जी की रामायण का पाठ हो। तुम पाठ करो, में सुनूँ।”
“इसके लिए मुझे गुरू जी से आज्ञा लेनी होगी महाराज।”
“ओह, अभी कितने वर्ष और पढ़ोगे?”
“राम जाने महाराज, वैसे तो अब गुरू जी की पाठशाला में पढ़ाता हूँ । वही मुझ अनाथ के पिता भी हैं।”
“आखिर कब तक तुम वहीं रहोगे?”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “जब तक राम रखेंगे।”
“तुम मेरे साथ रहो। हम दोनो भाई राम और भरत के समान रह लेंगे। क्या तुम विश्वास मानोंगे तुलसी कि इतने ही दिनों के संग में तुम अब दिन रात मेरे और मेरे राम के साथ ही रहने लगे हो। कल सपने मे भी प्रभु ने मुझसे यही कहा कि मेघा, मेरी इस घरोहर को तुम वहुत सहेजकर रखना। क्या जाने तुम में ऐसा क्या है जो मेरे राम तुम्हारे प्रति इतने रीझ गए हैं। देखो तो सही, तुम्हारी आँखों में कैसी अलौकिक मोहनी छिपी है।”
मेघा भगत अपने बावले उत्साह में तुलसी की बाँहें अपने हाथों से थामकर उनकी आँखो में आँखें डालकर देखने लगे। तुलसी संकोच से जड़ीभूत हो गए। सारी भक्त मंडली उधर ही देख रही थी और तुलसी की आँखों में सूरज चमक उठा। द्वार पर वह खड़ी थी जिसे देखने के लिए प्राण तड़प रहे थे।ऐसा लगा कि मानों कमरे में प्रकाश ही प्रकाश भर उठा हो। लगा कि वह मुक्त प्रकृति के वातावरण में पहुँच गए हैं जहाँ सैकड़ौ फूल अपने रंग लुटाते हुए आन्नद के झोंकों से झूम रहे हैं। बेसुधी को मन की चतुराई ने झँकझोर कर चेताया- 'सावधन, ध्यान कर कि तू किसके दर बार मे बैठा है।'
चोर चोरी से तो गया, पर हेराफेरी से भला क्यों कर हठे।
क्रमशः

Monday, 24 April 2023

tc 47

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
47-

ज्योनार का समय हो गया था। बुलावा आने पर शेष जी की शिष्य मंडली के साथ ही कुछ और ब्राह्मण गृहस्थ भी मेघा भगत को प्रणाम करके उठ खड़े हुए। जब तुलसी उनके आगे नतमस्तक हुए तो मेघा ने उनका हाथ पकड़कर उठा लिया और उनकी आँखो में आँखें डालकर देखने लगे। तुलसी का मन अचम्भे से बंध गया- “यह इतने ध्यान से मेरी आँखों में क्या देख रहे हैं? मैं तो कुछ भी नहीं समझ पाता।”
मेघा बोले- “अब ,तुम बराबर आना भाई। तुम्हारे बिना यह मेघ सूखा रहेगा। तुम्ही मेरी वर्षा हो। वचन दो, कि तुम नित्य आओगे।”
अपनी प्रशंसा से तुलसी सकुच गए, कहा- “गुरू जी से आज्ञा लेकर अवश्य आऊँगा।”
“कौन है तुम्हारे गुरु?”
“परमपूज्यपाद आचारयंपाद शेष सनातन जी महाराज।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“रामबोला तुलसी।” 
सभी विद्यार्थी कमरे से बाहर निकलकर दालान में खड़े थे। मामा जी की भूख भाँग के नशे के साथ ही भड़क चुकी थी। उन्हें तुलसी का मेघा से खड़े खड़े बतियाता उबा रहा था। तुलसी मेघा को प्रणाम करके जो चले तो द्वार की चौखट पर फिर अटक गए। किवाड़ से टिकी हुई गायिका खड़ी थी। पास पहुचनें पर उसने तुलसी को आँखों ही आँखों में प्रणाम किया।तुलसी का मन गुदगुदी में भर उठा। आपे से बाहर होकर वे उसके रूप में लीन हो गए।
”आप इतना सुंदर गाते हैं, किससे सीखा।”
“आपसे”
“आईये”- कहते हृए गायिका की आँखों की पुतलियाँ शोखी से फिरीं।उन्हें देखते ही तुलसी के मन में कुछ कुछ होने लगा। उन्हें लगा कि उनका सारा कलेजा उनके भीतर से निकल कर सामने वाली की आँखों में समाया जा रहा है। अपनी इस विषम मुग्धता पर वे ठगे से उसे देखते ही रह गए।
बाहर से मामाजी चिल्लाये- “अरे अब आओ भी कि साली पतुरिया के रूप से ही पेट भरोगे।”
तुलसी हड़बड़ा कर चले तो चौखट की ठोकर लगी। लड़खड़ाए तो गायिका ने उन्हें थामने के दिए हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ  तुलसी की कलाई से छू गईं। सारा शरीर बिजली की सनसनाहट से भर गया। यह एकदम नव अनुभव था, मन चक्कर में पड़कर चौकन्ना हो गया। तुलसी के कसरती कुश्तीबाज शरीर ने उसी बिजली से फुर्ती लेकर ऐसी सफाई से पैंतरा लिया कि तन और मन दोनों ही गिरने से बच गए। दूर छिटककर खड़े होते हुए उन्होंने फिर मुड़कर भी न देखा। अनुभवहीन नवयौवन मन इस अपूर्व आनन्द से दहल गया था।मोहिनीबाई की चोर आँखें मृग मरीचिका की-सी प्यास से बँधी टकटकी से अपने जाते हुए मन-भावन को कनखियों से ताक रहीं थीं।

मेघा भगत के द्वारा की जाने वाली तुलसी की प्रशंसा का प्रसार पूरी पाठशाला में हो चुका था। दूसरे दिन अपने विद्यार्थियों को समय से पहले ही पढ़ाने के लिए बुला लिया।आज सबेरे ही से उनके मन मे उत्साह की हिलोरें उठ रही थी। मन में भाव-सूत्र अभी सब गड्ड-मड्ड थे। तुलसी का मन अपनी खोह में नन्हा-मुन्ना बनकर गेंद-सा उछलकर अपने श्रद्धा दीप के चारों ओर नाच रहा था। वह मगन था। उसके मगनपने में राम थे। उसकी भक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रश्न अभी तुलसी के मन में उदय नही हुआ था। मोहिनी इन सबके बीच में एक विशेष आभा लेकर उभर आई थी, यह बात उनके भीतर-बाहर की चेतना में स्पष्ट रूप से जरूर संकेत कर रही थी। मोहिनी की आकर्षक छवि भी उनकी बिम्ब- गुफा में कभी कभी उनके साथ ही साथ श्रद्धा दीप के चारों ओर नाचने लगती है। मोहिनी अपनी यथार्थ आयु में और तुलसी बालक के रूप में एक साथ एक ही लय और गति में यह आनन्द ताण्डव कर रहे थे। उसी उल्लास में जब वे पढा़ने बैठे तो कालिदास के मेघदूत वर्णन में ऐसे तन्मय हुए कि विद्यार्थी भी तन्मय हो गए। विद्यार्थी यों भी पंडित तुलसीदास की अध्यापन कला पर मुग्घ रहते हैं किन्तु आज तो वे छक-छक गए। तुलसीदास की इस तन्मयता को भंग करनेवाली केवल एक ही वस्तु थी, छत की घूप। समय के संकेतों पर उनका ध्यान बीच-बीच से अपने-आप ही जा पड़ता था। चलते हुए विचारों के रंगीन पर्दो के भीतर मोहिनीबाई की आकर्षक छवि बार-बार आकर उनका मोद बढ़ा जाती थी। तुलसीदास ने समय से ही अपने सारे कार्य उत्साहपूर्वक निबटा लिए और मेघा भगत के यहाँ जाने के लिए गुरू जी की आज्ञा लेने जा पहुँचे। तब तक उनके शिष्यों ने पाठशाला के समस्त विद्याथियों के आगे अध्यापक तुलसी की ऐसी महिमा बखान की थी कि उसकी भनक गुरू जी के कानों में भी पड़ चुकी थी।
गुरू जी बोले- “हमने सुना है कि आज तुमने अपनी व्याख्यान कला से पाथिव और अपार्थिव के बीच में प्रेम रज्जु का लक्ष्मण झूला निर्मित कर दिया है।” सुनकर तुलसी गद्गद हो गए । गुरू जी के चरणों में तुरंत अपना सिर नवाकर वे बोले- “आप मुझसे ये न कहे। सबकुछ आप ही का प्रसाद है और स्वर्गीय बाबा जी के दिए हुए संस्कार हैं। मैं तो आपका अनुचर मात्र हूँ।”
तुलसी की पीठ अपने दोनों हाथो से थपथपाकर गुरू जी बोले- “विश्वेश्वर तुम्हें अपने इष्टदेव के प्रसाद का सर्वेश्रेष्ठ वितरक बनाए। महामृत्युन्जय-तुम्हारी रक्षा करें, सर्वत्र विजयी हो, सिद्ध हो।”

मेघा भगत के यहाँ आज भी कल जैसा ही संसार जुड़ा था। मोहिनीबाई
अपनी माता के साथ पहले ही आ चुकी थी। उसका रथ और सरकारी प्यादे गली के मुहाने पर ही खड़े दिखाई दिए। देखते ही तुलसी का उल्लास रंगीन होकर चमक उठा लेकिन प्रवेश करते समय से अपने- आपको संयत बना लेने का होश रहा। मोहिनीबाई ने वातावरण से बेहोश होकर भर नजर तुलसी को देखा । एक उचकती कनखी से इस आनंद के कण को समेटकर तुलसी बराबर मेघा भगत से अपनी श्रद्धापूरित आँखें मिलाए रखने में सतर्क रहे।मेघा भगत के चरण छूते समय उनके मन ने सहसा व्यंग्य किया 'जो भाव कल तक सहज था उसमें आज सतर्कता क्‍यों बरती जा रही हैं?'
मेघा भगत ने तभी दोनों हाथों से प्रेमपूर्वक तुलसी के दोनो कंघे हिलाते हुए कहा- “आ गया आत्मन्‌ ? अरे तुझे तो मैं अपने साथ ही भगा ले जाऊँगा। राम और भरत मे कोई अंतर नही है।
क्रमशः

Sunday, 23 April 2023

cc 46

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
46-

पर इस ऐन परीक्षा के अवसर पर वह कट्टर हो गया है, तनिक सी कुनमुनाहुट तक नहीं हो रही है- “हे प्रभु, मैं बड़ा अपराधी हूँ। मेरा कलेजा बड़ा ही कठोर है जो ऐसा निर्मल भवितिरभाव-भरा वातावरण पाकर भी अब तक उमड़ न सका।सारा वातावरण करुणा के अपार सागर में डूब गया है। तुलसी से कुछ ही दूर बैठी कुछ स्त्रियां रो रही हैं। पुरुषों में अनेक चेहरे अश्रु-विगलित दिखाई दे रहे हैं। मेघा भगत के करुणा सागर में डूबे हुए स्वर का प्रभाव सभी के चेहरों पर बोल रहा है, लेकिन तुलसी की आंखें मरुभूमि-सी उजाड़ हैं। मेघा भगत के मौन भावमग्न होते ही सभी कुछ क्षणों तक तो भावावेश मे गूँगे बने रहे फिर हल्की हलचल होने लगी।

दर्शनार्थी भक्‍तमंडली में एक तरुणी अपनी माँ के साथ बैठी हुई थी। तुलसी गंगाराम और नंददास उससे कुछ ही दूर पर बैठे थे। एक प्रौढ़ व्यक्ति ने प्रौढ़ा से कहा- “मोहिनी से कहो एक भजन गाए। महाराज को शाति मिलेगी।” मेघा भगत आँखे मूँदें करुणा में डूबे बैठे हैं। तरुणी गायिका ने अपनी प्रौढ़ा माँ के संकेत पर कुछ क्षणों तक गुनगुनाते रहने के बाद मीराबाई का एक भजन गाना आरम्भ कर दिया- ‘सुनी री मैंने हरि आवन की आवाज’।
स्वर मीठा तड़प-भरा था। गाने वाली कला निपुण थी और मनमोहक भी।थोड़ी ही देर में गीत और गायिका की मघुरिमा वातावरण पर जादू बन कर छा गई। मेधा भगत के भक्तों में आधे से अधिक लोग राम को भूलकर रागरंजित हो गए।गानेवाली के भावमग्न चेहरे पर अनेक आखें लालच के गोंद से चिपक गईं। स्वर सभी के मनों की भौतिक सतह को छेदकर कहीं अवश्य गहराई में हवा की तरह छा रहा था। लोगों की रसमग्न आँखों में गायिका का रूप किसी हद तक समाया तो था, कितु कानों में गूजने वाली मिठास रूप के मोह को बहा ले जाती थी। ऐसा लगता था कि गायिका के स्वर और मीरा के शब्दों ने जन-मानस को त्रिशंकु की तरह अधर में औंधा लटका दिया है। केवल मेघा भगत आँखें मूँदें पत्थर की मूर्ति बने ध्यानावस्थित हो गए थे।

गायिका का स्वर प्यासा चकोर बनकर तुलसी के हृदय के पर्दे हिलाने लगा। हरि आवन की आवाज ही मानों गायिका के स्वर में सुनाई पड़ रही थी। कठिन कलेजा पिघलकर ऐसा तरंगित हो उठा था कि तुलसी का मानस इच्छित गति पाकर बड़ी शाति और सुख का अनुभव कर रहा था। उस दु:ख के बहाव में ही गाने वाली के लिए प्रशंसा की बिजली भी कौंधी। “कितना मधुर गा रही है।भक्‍तराज इससे अवश्य ही प्रभावित हो रहे हैं। धन्य हैँ यह स्त्री, जो वेश्या होकर भी इतनी भक्तिभावपूर्ण है। मेरे मन मे भी राम रमते हैं। मेघा जी भक्त है, अब यह भी मानी जायगी। इसमें भक्ति भाव  जो है सो है पर यह कला कुशल है। मेरे मन में भाव भी है और मैं गा भी सकता हूँ। ऐसे ही गा सकता हूँ।”
मन गायिका के स्वर में स्वर मिलाकर बहने लगा, आँखें मुदँ गईं। गानेवाली तुलसी के मन की गुफा में श्रद्धा दीप के पास बैठी गा रही थी और मन वाले तुलसी का स्वर मानों गुप्त सरस्वती की भाँति उसके स्वर में अंतर्धारा बनकर प्रवाहित हो रहा था।तुलसी एक ऐसे मोड़ पर पहुँच कर स्तब्ध हो गए थे जहाँ फूलों के रगों से भरी हरीतिमा उनके आभ्यंतर को अपने में लपेट रही थी। उनके मन-प्राण में केवल स्वर और शब्द ही थे और कुछ भी न बचा था।
गायिका का स्वर ज्यों ही अपने पूर्ण विराम पर थमा त्यों ही तुलसी का स्वर अनायास गतिमान हो गया- ‘सुनी री मैंने हरि आवन की अवाज।’
गायन शैली वही थी, शब्द भी वही किंतु स्वर नया था। सुनने वालो को लगता था कि वे जैसे अपने अंतर में हरि के आने की आहट पा रहे हैं। हरि से मिलने की छटपटाहट हर प्राण में बस गई। लोग मुग्ध होकर इस अनजाने युवक को देख रहे थे। गायिका चकित गौर रसमग्न दृष्टि से एकटक होकर तुलसी को निहार रही थी।तुलसी मेघा भगत की ओर देखते हुए गा रहे थे- ‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर बेगि मिलो महाराज’।
महाराज तक पहुँचते -पहुँचते वातावरण प्रायः सभी के लिए आत्मविस्मृत- कारी बन गया था। गायिका के स्वर को सुनते हुए जहाँ मेघा भगत की आँखें मुँद गईं थीं, वहाँ तुलसी का स्वर आँखे खोल देने वाला वन गया। स्वर में एक ऐसी सचाई थी जो कोरी कला के सिद्ध से सिद्ध रूप की भी पहुँच के बाहर थी।

भजन समाप्त होने पर मेघा भगत गद्गद स्वर में बोले- “कहाँ से आ गया रे तू मेरे स्वरूप? तू तो मेरी अनचाही चाह बनकर आया है रे भैआ, मैं तेरी बलेया ले लूँ।” मेघा भगत भावावेश में उठकर तुलसी के पास आ गए और उसे अपने कलेजे से चिपटाकर रोने लगे। बोले- “मैं जिसे अपने भीतर पुकार रहा था वह यों बहाने से मुझे बाहर प्रत्यक्ष होकर मिल रहा है।तू बड़ा दयालु है, बड़ा ही दयालु है मेरे राम।”
सब दृष्टियाँ भगत और तुलसी के मिलन दृश्य पर लगीं थीं। मेघा की आँखें बरस रहीं थीं।
तुलसी की आँखें प्रयत्न करने पर भी न बरसीं। जिसे रिझाने के प्रयत्न में उनका कलेजा उमड़ा था उससे इच्छित प्रशंसा पाकर मानों वह फिर घमण्ड की ठसक में ठोस बन गयीं। अपने प्रति किए गए भगत जी के संबोधन और प्रशंसा का विचित्र प्रभाव तरूण तुलसी के सद्य सफलता से उल्लसित मन को पहेली सा उलझा गया। काया पर प्रसन्नता और विनय मुद्रा, मन में घमंड। अंतर्चेतना में घुड़की की गूँज- सावधान, घमंड नहीं ।मन अपराध भावना से सकुच गया और उससे कतराने के लिए ही तुलसी की दृष्टि भीतर से बाहर आ गईं। सामने गायिका उन्हें अपलक दृष्टि से देख रही थी। 
उसकी आँखों में अपने लिए चमकता हुआ प्रशंसा का भाव पाकर वे लोहे की तरह उस चुंबक की ओर खिंचते ही चले गए। उन्हें ऐसा लगा कि मानों मेघा से अधिक उन्हे गायिका की प्रशंसा की ही चाह थी और उसे उसकी आँखों में पाकर वे निहाल हो गए हैं।
क्रमशः

cc 45

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
45-

उस संन्यासिनी के पास सुना है कि एक हंडिया भरके सोने की अशफियाँ हैं। वह अधेड़ संन्यासिनी विलासिनी और महाकंजूस है। उसने इसके जैसे दो-तीन बटुक प्रेमी पाल रखे हैं। उनकी दक्षिणा की सारी राशि वही छीन लेती है और सबको ही लालच देती है कि जिसकी सेवा से मैं अधिक संतुष्ट होऊँगी उसीको अशफियाँ दे दूगी।”
तुलसीदास ठठाकर हँस पड़े, कहा-“माया महा ठगनि मैं जानी। कबीर साहब सत्य ही कह गए हैं। पर यह मेघा भगत कौन है गंगाराम? आजकल बड़ा माहात्म्य सुनाई पड़ता है इनका।” गंगाराम बोले- “भाई, मैंने स्वयं तो उन्हें देखा नहीं है, पर सुना अवश्य है कि बढ़े काव्य-मर्मज्ञ हैं और मेधावी छात्र थे। कहते है कुछ महीनों पहले अयोध्या में इन्हें चैतन्य महाप्रभु के समान ही अचानक आनंद का दौरा पड़ा। कहते हैं उस समय वाल्मीकीय रामायण का कोई प्रसंग पढ़ रहें थे । बस तब से राममय हो रहे हैं। सस्वर भजन सुनकर प्रसन्न होते है, उन्हीं के सबंध में प्रवचन करते हैं।आठों पहर रामदीवाने बने रहते हैं। कहते है कि उनकी वाणी पर माँ विराजती है। किसी को यदि वे वरदान दे देते हैं तो वह अवश्य पूरा होता है।”
सुनकर तुलसी के मन में मेघा भगत के प्रति कौतुहल जागा और स्पर्धा भी। मन कहने लगा, में भी ऐसा राम-राम जपूँ कि सारी दुनिया ऐसे ही मुझे भी देखे। होड़ लेने की इस इच्छा के साथ ही साथ नई उमर की बेताबी ने उनके भीतर डाह भी जगाई। सोचने लगे कि अब उसकी राम-भक्ति में कोई कमी तो है नही। वह अपने आस-पास की सारी दुनिया को दिन-रात देखा करते है, पर कोई भी उन्हें अपने समान राम-प्रेमी अब तक मिला नही है। मुँह से झूठ-मूठ 'राम-राम, शिव-शिव' कह लेने से कहीं भला भक्तिभाव जागता है?  फिर अपने घमंड पर ध्यान गया, मन को डाँटा - “धत्‌ तेरे की राममभगतवा झूठ-मूठ ही खिलवाड़ करता है। अभी देखेंगे कि मेघा जी का भक्तिभाव कितना गहरा है।” 

सेठ जी की हवेली के एक बड़े कमरे में भीड़ भरी थी। तुलसी झाँकने लगे। कुछ हुआ है, सब लोग बीच ही में क्यों झुके हैं।पता लगा कि भक्‍तवर को मूर्च्छा आ गई। केवड़ाजल के छीटे दिए जा रहे थे। दो व्यक्ति अपने-अपने अगोछों से हवा कर रहे थे। तुलसी अपनी उत्सुकतावश उस छोटी भीड़ मे घुसकर मेघा भगत के पास तक तो अवश्य पहुँच गए परतु हवा डुलाने वाले अगौछों के कारण उन्हें युवा भगत जी का चेहरा दिखलाई नही पड़ रहा था। उनका मन अगौंछा झलनें वालों पर झुँझला उठा।गरदन कभी दाहिनी ओर झुकाई, कभी बाँई ओर। कभी एड़िया उचकाकर तथा आगे की ओर अधिक झुरकर देखा। हल्की ललाईं लिए गोरा वर्ण भर भूरे वालों वाले मुखमंडल की सुन्दरता कुछ-कुछ झलकी। तभी भगत का शरीर हिला। अगौछें का झला जाना बंद हुआ। भगत जो अब तक बाँई करवट से पड़े हुए थे अब चित हो गए। छोटी-सी दाढ़ी वाला लम्बा चेहरा अपनी सारी पीड़ा के बावजूद बड़ा तेजस्वी और शातं था। तुलसी उस चेहरे को अपलक दृष्टि से निहारते रहे, मन बार-बार भाषता रहा और अपने- आप से यह कहता भी रहा कि मूच्छित व्यक्ति सचमुच भक्त अवश्य है। मूर्छा टूटी। आँखें खुलीं।मेघा भगत उठने का उपक्रम करने लगे तो भक्‍तों ने उन्हें सहारा देकर बैठा दिया। तुलसी अपनी दृष्टि से उस चेहरे को पीने लगे। कैसी आत्मलीन दृष्टि हैं इनकी।देख सामने रहे हैं पर ऐसा लगता है कि मानों वे यहाँ नही बल्कि काले कोसों दूर-किसी ऐसी वस्तु को देख रहें हैं जो दूसरों को नहीं दिखलाई देती। क्या यह भगत की अभिनय मुद्रा है ? तभी तुलसी ने  देखा कि मेघा भगत की आखें कील-सी भर आई है और उनके होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं। वे बड़ी छटपटाहट के साथ अपने दाँयें-बाँयें देखने लगते हैं मानों उन्हें किसी चीज की तलाश हो। एक बूढ़े से व्यक्ति ने पूछा-“क्या चाहिए राज?”
“कुछ नही, क्या चाहता हूँ, कैसे बतलाऊँ? राजमहलों में रहनेवाले सैकड़ों दास-दासियों से सेवित राजकुमार वन की कंकड़ काटों भरी राह पर चले जा रहे हैं, पर मैं कुछ भी नही कर सकता,नि:सहाय।जिनकी इच्छाओं का पालन पर सैकड़ों दास-दासियाँ सदा हाथ बाँघे खड़े रहते थे, बड़े बड़े
सेठ-साहुकार और राजे-सांमत जिनकी कृपादृष्टि के प्यासे बने सदा उत्सुक नेत्रों से उनकी ओर देखा करते थे।उनसे इस गहन वन में कोई यह भी पूछने वाला नहीं कि नाथ, आपको क्या चाहिए ?”

मेघा भगत रोने लगे। कुछ थमे तो फिर कहना शुरू किया। सीता जी के थके- काँपते लड़खड़ाते पैरों का करुण वर्णन, उनकी प्यास जनित व्याकुलता, उनका बार-बार पूछना कि है स्वामी अब वन कितनी दूर है, कुटी कहाँ छवाई जायगी, इत्यादि बातों की कल्पना कर करके मेघा भगत घारों धार रो पड़ते हैं। उनका कंठ भर आता है और वे दुख की सजीव मूर्ति बने ऐसे विवश हो जाते है कि उनसे बोलते भी नहीं बनता।इस कमरे में ऐसा कोई नहीं जिसकी आँखों से गंगा-जमुना न वह चली हो। सभी रो रहे हैं। उनके साथियों मे गंगाराम और नंददास भी आँसू बहा रहे हैं, लेकिन तुलसी की आँखों में पानी क्या सीलन तक नही है। मन की गुफा गूँजती है, देखा यह है राम-भक्ति, तुलसी अपराधी से फुँक जाते हैं। दृष्टि पालथी पर रखी हथेलियों पर सघकर अनर्तमुखी हो जाती है।मन मानों एक गुफा है जिसमे सिर भुकाए खड़े हुए तुलसी एक ओर जहाँ अपराध भावना से सिहरते है वहाँ दूसरी ओर इच्छा की तीव्रता से भी काँप - काँप उठते हैं- “हे राम जी, मेरे मन में भी आपके प्रति ऐसी ही चाहना है। भले ही मेरी आंखों से इस समय आँसू न बह रहे हों पर मेरा कलेजा आठों याम आपके लिए ऐसे ही तड़पता है।” यह कहते हुए मन यह भी अनुभव कर रहा था कि उसका स्थूल रूप अब भी उसी तरह भावशून्य पत्थर बना हुआ है जैसा कि अभी तक था। उसमें किसी भी प्रकार का करुण स्पंदन नहीं है।इस समय न सही, पर क्या मेरे हृदय में राम जी के प्रति ऐसा विरह भाव कभी नहीं जागता? जागता है.... जागता है।
क्रमशः

Friday, 21 April 2023

cc 44

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
44-

“मामा, सारी बातें अपने इस भानजे के ही ऊपर छोड़ दीजिए। मैं आपके लिए विजया का गोला भी पीसकर ले आया हूँ। यह लीजिए, यह भागँ, यह बादाम और यह रही केसर की पुड़िया और दूध के पैसे .....”
“रहने दे, रहने दे, दूध तो घर में बहुत है।अच्छा तो हम सबको लेकर समय से पहुँच जायेगें।”
निमंत्रण के दिन छात्र वर्ग में एक विशेष आनद की लहर दौड़ जाया करती थी। कुछ बातूनी विद्याथियों के लिए तो न्यौता पाकर जीमने से पहले तक का समय निमंत्रणकर्ता की हैसियत का अनुमान लगाकर उस हिसाब से मिठाई, पकवानों और तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यजनों की कल्पना करने में बीतता था। न्यौता के पहले मुहँ से लार टपकाना और उसके बाद संतोष से डकारे ले-लेकर भोजन का रसालाचन करने में ही वे अपने ज्ञान की चरम सिद्धि मानते थे।

इनकी भीड़ से अलग बड़े आँगन के एक दूर कोने में तुलसी और गंगाराम एक गम्भीर विचार में लीन थे। तुलसीदास कह रहे थे- “गंगाराम, आज बड़े भोरहरे ही मैंने पहले नीलकठ के दर्शन किए और फिर संयोग से एक चकवे को भी देखा।यों तो इस घर में न्‍योले प्राय: ही देखने को मिल जाया करते है, फिर भी संयोग की बात है कि आज मैनें उसे भी बार बार देखा। बोलो, इन सबका अर्थ क्या हुआ?”
गंगाराम अपने पालथी पे दोनों पैरों के तलवों को अपने दोनों हाथों से मस्ती में मींजते हुए मुस्कराकर बोले- “फिर क्या है, आनंद ही आंनद है।”
तुलसी को उत्तर से अधिक संतोष नहीं हुआ। वह स्वयं हो विचार करते हुए बोले- “शुभ शकुन तो है ही, किंतु जब अलग-अलग विचार करके तीनों को एक चित्र मे बाँधता हूँ तो अर्थ निकलता है कि नीलकंठ विष को पचाने वाला है, चकवा विरही है नकुल सर्प संहारक हैं। सब मिलाकर अर्थ यह‌ हुआ कि आज का दिन मेरे लिए संघर्ष करने, विष पीने ओर पचाने तथा विरह ज्वाला में दहकने का दिन है। फिर शुभ कहाँ हुआ?”
गंगाराम मस्ती में थे। मित्र को झिड़कते हुए कहा- “तुम कवि लोग अपनी कल्पनाशीलता में अति पर पहुँच जाते हो। यह शकुन शुभ न होते तो पुराने ज्योतिषाचार्य लोग क्या यों ही इन्हें गिना जाते।”
उस समय घोड़ू फाटक नाम का एक छात्र आया और बड़े उत्साह से बोला--“अहो तुलसी जी, शुभ सूचना सुनी काय?”
“कौन सी ?”
“दूधविनायक पर मेघा भगत का भंडारा। म्हणजे किसी धनी ने अनेक प्रकार थे मिष्ठान आदि नाना प्रकार के बररस व्यँजन जिमाने का उत्साह दिखलाया है। हाँ , जरा हमारा प्रश्न विचारों तो सही गंगाराम भैया, कि मिठाइयों में कौन कौन सी वस्तुएँ हो सकती हैं?”
गंगाराम मुस्कराए, बोले- “घोड्या फाटक, अभी ज्योतिष ज्ञानरूपी किले के मिठाई वाले फाटक में मेरा प्रवेश नही हुआ है। रामबोला से पूछो इनकी जिभ्या से राम बोलते हैं।”
“खबर आई है। तब भी विसरलोच हो तो। तुलसी भैया, हमारा प्रश्न तो तुम्हीं विचारो। छात्र मंडल में तुम्हारे विचारन से चाँगला प्रभाव पड़ेगा। विचारो, झटपट। हमको चौक जाना है।”

तुलसी उस समय अपने ही जुताड़ में थे, बोले- “घोडू फाटक और चाहे जो व्यँजन हों, पर तुम्हारे महाराष्ट्र के वह लक्कड़तोड़ दतं-भंजक लड्डू कदापि नही होगें, इतना में तुम्ह विश्वास दिलाता हूं। अच्छा अब स्वाद चर्चा यहीं समाप्त करो”
फाटक चिढ़ गया, बोला-“तुम रसहीनों को, सच पूछा जाए तो भोजन कराना ही पाप है।” 
“अरे हमारो रोटी-दाल को तो पुण्य बना रहने दो भैया।” गंगाराम ने विनोद में गिड़ागड़ाने का स्वाग किया। 
“तको । तुम्हो ज्ञानाचों रोटी आणि ज्ञानाची डाल खाओ। अरे स्वाद-चर्चा ब्रह्म-चर्चा से तोल में कदापि कम नहीं बैठती महाराज, समझते क्या हो? और एक तरह से देखिए तो स्वाद-सुख रति-सुख और ब्रह्म-सुख, इन तीनों प्रकार के सुखों में स्वाद-सुख ही मानव के साथ जन्मता और मरता है। बाकी दोनों सुख तो यहीं के यहीं पड़े रह जाते हैं।”
“हूँ”- गंगाराम ने गम्भीरता का ढोंग करते हुए कहा- “यथार्थ हैं कितु सतमार्ग पर निकल भागने वाले मनुष्य के मगज में यह गूढ़ सत्य कभी समा ही नही पाता। मैं भी तुलसी को समझा समझाकर हार चुका हूँ।”
“अच्छा चलूँ , पाचक ले आँऊ। मैं सदा थोड़ा अधिक ही ले आता हूँ। गंगाराम भैया, जिस किसी कों आवश्यकता हो वह दस कौड़ी पर हमसे पाचक खरीद सकता है।”
गंगाराम बोले- “तब तो तुलसी के कारण तुम्हे अवश्य घाटा होगा, फाटक। इन्होंने हाल ही में ढे़र सारा लवणभास्कर चूर्ण बनाकर रखा है।”
“बेचने के लिए ” 
“नहीं, भोजन भट्टों को दान करके पुण्य कमाएगे।”
घोड़ू फाटक तुलसी को गंभीर रहस्यभेदी दृष्टि से घूरने लगा। फिर एकाएक गिड़गिड़ाहट वाली मुद्रा में आ गया और कहने लगा- “अरे भैया, हमारी द्रव्यहानि काहे कराते हो? थोड़ा-बहुत यही सब करके मैं अपना खर्चा पानी निकाल लेता हूँ।” 
तुलसी बोले- “खर्चें-पानी के लिए तुम्हें विशेष द्रव्य आवश्यकता ही क्यों होती है घोड़ू?”
 अर्थ-भरी दृष्टि से फाटक को देखकर गंगाराम बड़ी जोर से खिलखिला कर हँस पड़े, कहा- “तुम समझते नही तुलसी, दशाश्वमेव पर एक घोबिन से यह अपनी धुलाई कराने लगे हैं। धुलाई के पैसे भी देनें पड़ते हैं न। तुलसी ने घृणा से नाक-भौ सिकोड़ी और कहा- “विद्यार्थी जीवन में यह सब।”
 फाटक ताव खा गया, बोला-- “बस बस, ज्यादा ज्ञान मेंरे आगे न बधारना। तुलसी भैया, काशी मधे दोनों पंडित, मी आणि माझा भाऊ। शास्त्रार्थ में सबको हरा सकता हूँ।” 
“हमारे सामने सिंह की तरह दहाड़ने का स्वागँ मत करो फाटक। अभी परसों-नरसों जब तुम्हारी संन्यासिनी प्रिया तुम्हारे कान उमेठ रही थी .....”
“भैया गंगाराम जी, मैं तुम्हें और तुलसी भैया को, यह लो साष्टांग दडवत्‌ किए लेता हूँ , यह लो नाक भी रगड़ता हूँ। यह बात किसी से मत कहना। पिता जी आजकल मेरे विवाह की बात चला रहे हैं।व्यर्थ में मेरी बदनामी फैल जायगी। अच्छा तो चलूँ , पाचक ले आँऊ। मोहन भोग, श्रीखंड और देखो क्या-क्या उत्तम सामग्री मिलती है। विश्वनाथ बाबा मेघा भगत की भक्ति, उसके यजमान के धन में बढ़ोत्तरी करें। नित्य ब्रह्मभोज हो।” 
फाटक के जाने के बाद तुलसी बोले-“यों तो भोजन भट्ट है, पर है बड़ा 
निष्कपट।”
गंगाराम बोले- “घाघ है घाघ। बस देखने में ही भोला-भाला लगता है।
क्रमशः

Thursday, 20 April 2023

cc43

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
43-

अन्त फजीहत होहिंगें गनिका के से पूत॥ 
सेये सीताराम नहिं, भजे न सकर गौरि।जनम गँवायो वादिही, परत पराई पौरि।”

फिर वाहवाही का भ्रँमर गुँजन हुआ। कवि कैलास की छोटी पुड़िया खुल चुकी थी। एक चुटकी तमाकू उठाकर अपने मुँह मे डालते हुए वे बोले- “जोतसी जी, अब तमाल पत्र छोड़ो, ये खाया करो तम्बाकू।”
प० गंगाराम मुस्कराए, बोले- “हम केवड़ा डालके ये सुरती खाते हैँ कविवर।फिरंगी अच्छी वस्तु लाए। सुना रहा कि पहले कोई एक फिरंगी आयके अकबर बादशाह को नजर किहिसि और अब तो हमारे देखते-देखते पिछले बीस बाईस वर्षों मे इस विश्वनाथपुरी में बस सुरती ही सुरती छाय गई है। बाकी तमालपत्र चूर्ण को स्वास्थ्य की दृष्टि से हम अव भी इससे श्रेष्ठ मानते हैं।” बातचीत हल्के लौकिक रंग पर उतर आई थी। एक गम्भीर प्रसँग के बाद दूसरा उठने के बीच मे विनोद की लहर पट-परिवर्तन के रूप मे सुसाहिबी कला का विशिष्ट गुण बनकर आ ही जाती है।

बाबा बड़ी देर से बाहरी प्रसँगों से अलग अपने मन की गुफा मे बैठे थे। प्रशँसा, प्रशँसा और प्रशँसा। लोगों के जाने के बाद सन्नाटा होने पर भी बाबा के मन से प्रशँसा का हिमालय न उतरा। वह बोझ उन्हें भारी लग रहा था। अपने दैनिक काम काज करते हुए भी वे प्रायः गुमसुम ही रहे। भोजनोपरान्त बेनीमावव जी ने पूछा- “आप उदास हैं गुरू जी। कोई बात मन को मथ रही है कदाचित?” बाबा हँसे - “हाँ , मन्मथ की बातें मथ रही हैं। दिन में जब तुम सब मेरी प्रशँसा के पुल बाँध रहे थे तब मेरे मनोलोक में आकर अहंत्ता मुझसे पूछ रही थी- “भूत से जीते पर क्या अपने गुरु से भी जीत सके?” 
मैनें सोचा, बेनीमाधव के मनोसंघर्ष को मेरे प्रथम नारी-आकर्षण का अनुभव कदाचित्‌ प्रेरणादायक सिद्ध हो सके। लो सुनाता हूँ।
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शेष सनातन महाराज की वही पाठ शाला, वही सारा वातावरण। अन्तर केवल इतना ही हो गया था कि अब रामबोला तुलसीदास शास्त्री हो गया था। उसकी आयु अब तेईस-चौबीस के लगभग पहुच चुकीं थी। छोटी सी दाढ़ी नोकीली नाक, रहस्यमय अगम में झाँकती हुई प्रश्न भरी आकर्षक पुतलियों और लहराते बालों वाला उसका उन्नत कपाल ऐसा चमक रहा है कि पूरी पाठशाला में केवल एक नन्ददास को छोड़कर और कोई भी इतना तेजवान स्वरूप नहीं दिखलाई देता। नन्ददास के चेहरे पर केवल कोमलता है, किन्तु नवयुवा तुलसी के चेहरे पर वज्र सी कठोरता और कुसुम की कोमलता एक साथ झलकती है और यही ,उसके चेहरे को सबसे अलग विशिष्ट बना देती है। तुलसी अब पाठशाला के नये विद्याथियों को पढ़ाते हैं। वाराहक्षेत्र में उनके भाग्य-विधाता गुरु का देहान्त हो चुका है। गुरुपाद शेष सनातन महाराज ही अब उनके अभिभावक हैं। उनका तथा उनकी धर्मपत्नी का तुलसी के प्रति पुत्रवत्‌ मोह है।तुलसीदास काशी के नये पंडितों में प्रशँसा पा रहा है, इससे गुरू जी अत्यधिक संतुष्ट हैं। गुरू जी के साले, घर और पाठशाला के व्यवस्थापक-भाँग, भोजन, और बातों के अनन्य प्रेमी थे। वे तुलसी के विवाह का डौल भी बैठाने लगे थे पर तुलसी का कहना था कि अभी उसका अध्ययन समाप्त नही  हुआ।मामा जी, इस कारण से आजकल कुछ रुष्ट हैं। तुलसी-विवाह हो तो मामा जी को समघी के घर ज्यौनार का सुख मिले।गुरू जी की पाठशाला में भी किसी का न्योता स्वीकार न करने का अधिकार मामा जी को ही था । मोटा थुलथुल शरीर, गौरवर्ण, बड़ी -बड़ी सफेद मूछें। छात्रों के मामा होने के कारण वे अब जगत मामा हो गए थे। उनका आसन ड्योढ़ी के पास आँगन में ही जमता था। वहीं से वे सारे दिन बैठे-बैठे हुकुम चलाया करते थे।

सबेरे का समय था। एक ब्राह्मण युवक न्योता देने आया था- “मामा जी दण्डवत्‌ प्रणाम करता हूँ । विद्यार्थियों को न्योता देने आया हूँ ।”
सामने चौकी पर ढेर सारे ठाकुर जी फैलाए, उन पर चन्दन की बिंदिया लगाते हुए बात सुनकर मामा जी नें चन्दन की कटोरी चौकी पर रख दी। एक नजर उठाकर यजमान को देखा, फिर जनेऊ से पीठ खुजलाते हुए पूछा-“कितने विद्यार्थी चाहिए? ”
“कितने विद्यार्थी हैं महाराज?” ,
“तुम्हे किस मेल के चाहिए, पहिले यह बतलाओं | द्रविड़, महाराष्ट्र, पुष्करिया, गुर्जर, गौड़, मैथिल, उड़िया, कनौजिया, सारस्वत कौन से मेल का ब्राह्मण जिमावोगे?
“अरे मामा जी, हम सब मेल के ब्राह्मणों को निमंत्रण देंगे। पन्द्रह-बीस जितने विद्यार्थी आपके यहाँ हो सबको लेकर पधारिए। आज मेघा भगत का भंडारा है।”
ठाकुरों पर फिर से चन्दन की बिंदिया टपकाने की क्रिया आरम्भ करते हुए मामा जी बोले- “बड़ी तेजी से पुजने लगा है यह लड़का मेघा भी।अच्छा भला पण्डित था, अब भगताई सूझी है, राम राम। हमारे तुलसी को भी एक दिन यही पागलपन लगेगा। खैर, तो कौन भंडारा दे रहा है?”
“जुराम साब।”
“कहाँ होयगा भंडारा ? राजघाट में, त्रिलोचन में, कि दुर्गाधार,मगंलाघाट रामघाट, अग्नीश्वरघाट, नाग.....? ”
“बिन्दुमाधव घाट पर होयगा, मामा जी।” 
“हूँ, तो बिन्दुमाधव में कहाँ पर होयेगा? लक्ष्मीनसिह के पचंगंगेश्वर, आदि-विश्वेश्वर, दक्षेश्वर, कि दूधविनायक, कि काले......  कहाँ होगा यह भंडारा?” पूछकर मामा फिर से चंदनी सँभालकर एक-एक ठाकुर पर चंदन थोपते हुए महल्लों के नाम लेते चले।
“दूधविनायक के पास।” मामा नें बचे कुचे ठाकुरों को जल्दी से चंदन लेप- कर अब उनपर फूल चिपकाना आरंभ करते हुए कहा- “हाँ तो निमंत्रण देने आए हो? हमारी पाठशाला के विद्यार्थी कुछ ऐसे-वैसे नही हैँ, जो हर जगह चले जायें। क्या समझे ? कोई तंत्र में, कोई मंत्र में, कोई ज्योतिष, छांदस, व्याकरण में, कोई वेशेषिक तर्क, साँख्य, योग भीमासा, काव्य, नाटक,अलंकर आदि में.... “
न्योता देने के लिए आए हुए ब्राह्मण युवक ने हाथ जोड़कर मामा जी की बात काटते हुए उत्तर दिया- “मामा जी, मैं केवल आपके विद्याथियों को ही नहीं बल्कि उनके साथ आपको भी सादर निमंत्रण देने आया हूँ ।”
मामा जी का मन तरी से भर आया। मान भरें स्वर में बाले- “तो पहले क्यों नहीं बताया? क्‍या नाम है तुम्हारा” “महाराज, इस अकिंचन का नाम अलपियुध्मगजपुरदरगरुड्ध्वज बाजपेई है।” 
मामा नाम सुनते ही सकते से आ गए। मुँह और आँखे फाड़कर उसे देखते हुए कहा- “इतना बड़ा नाम ! दक्षिणा तो अच्छी मिलेगी न ? समझ लो, आचार्यों के आचार्य परमपडित शेप सनातन जी के शिष्य और क्या नाम है कि उनके माननीय साले अर्थात्‌ .......”
क्रमशः

Wednesday, 19 April 2023

tc 41

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
41-

कभी-कभी हवा शरीर का ऐसे स्पर्श करती है कि लगता है कोई हमारी देंह रगड़ता हुआ चला गया है। यह सब क्या होता है अईया जी ?”
“अपने गुरू जी से पूछता”
“साहस नही होता। गुरू जी कहेगें, तुम्हे अभी इन बातों से क्‍या प्रयोजन। फिर राम जी भी तो.....”
गुरूपत्नी हँसी, कहा- “तुमने राम जी को देखा है रामबोला?”
“नही, आईया जी।”
“तुमने भरत को नही देखा श्रौर राम जी को भी नही देखा। जिस पर चाहों विश्वास कर लो। मन माने की बात है।”
तुलसी बोला- “तब फिर मैं राम जी को क्यों न मानूँ | भूत मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।”
तुलसी की गंभीर कितु भोली बातें गुरु-पत्नी को भली लगीं। स्निग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कहा- “तुम बडे़ अच्छे लड़के हो। भगवान तुम्हारा सदा मंगल करे।”
गुरु-पत्नी के आशिर्वाद  ने तुलसी के मन को बड़ा बल दिया किंतु पाठशाला के बड़े विद्यार्थी विशेष रूप से उसे दिन-भर डराते और चिढ़ाते रहे। शुभचिंतक साथियों ने न जाने के लिए आग्रह किया। तुलसी के मन में उनके तर्को से भूत कभी वास्तविकता का आभास कराते थे और कभी अपने हठवश वह उसे नकारने लगता था। गुरू जी से पूछने की इच्छा बार-बार मन में जागी परतु उनके सम्मुख होने पर उसका सारा साहस मानों समाप्त हो जाता था। वे कहेंगे कि जब जाने की आज्ञा ले ही चुके हो तो स्वयं अनुभव करना।” उनका तेजस्वी, शांत और गंभीर मुखमंडल देखते ही उसे मानों अपने न पूछे हुए प्रश्न का उत्तर मिल जाता था किंतु ऊहापोह फिर भी शांत न हुआ और बालक मन हाँ और ना के झूले में झूलता ही रहा। यह होते हुए भी जितना ही उसे डराया या सझाभाया जाता था उतना ही उसका हठ और दृढ़ होता जाता था।
शाम आई, तुलसी ने गुरू जी के घर का सारा काम-काज पूरा किया, फिर गुरु-पत्नी से कहा- “आईया जी, हमें आज रात के लिए एक शंख दे दीजिए।”
“तो तुम जाओगे ही रामबोला? ”
“हां, आईया।”
"कोई भी बाधा आए पर डरना मत बेटा।”
“नहीं आईया, डरूँगा तो फिर मेरे बजरंगबली रूठ जाएंगे। मुझे उनके रूठने का भय है। रावण का मानमर्दन करनेवाले रामप्रभू मुझसे न रूठे, केवल इसी की चिंता है।” अपने इस उत्तर से उसे सहसा वह आस्था मिल गई जिसे वह इतने दिनों से पाने और संगठित करने के लिए सतत प्रयत्नशील था।शंख लेकर तुलसी अपनी कोठरी मे आया। आज उसके हाथ में दिया नही था। वह बाहर के अंधेरे से लड़ने के लिए अपने भीतर के प्रकाश का सहारा ले रहा था। 

रात का पहला पहर समाप्त हुआ।कसौटी पर चढ़ने का क्षण आ गया। तुलसी ने शंख उठाया, अंधेरे में शंख के स्पर्श मात्र से उसके मन मे एक विचित्र- सी सनसनाहट भर गई। हृदय धक-धक करने लगा, कितु उसे लगा कि यह धड़कन भयकारी नही वरन्‌ उत्साहवर्धक है। हृदय “राम-राम' बोल रहा है, उठ उठ कह रहा है। तुलसी खड़ा हो गया। कोठरी से बाहर निकला, कुंडी चढ़ाई। आगे की छोटी-सी छत अंधकारमय थी। बाँई ओर का पीपल अंधेरे में भय की सघन छायामूर्ति बनकर खड़ा था। तुलसी स्तब्ध होकर उधर ही देखता रहा।मन तेजी से कल्पना करने लगा कि नीचे से बड़े -बड़े दांतों और सींगों वाला ब्रह्मराक्षसत अपना आकार बढ़ाता हुआ मानों अब उठने ही वाला है। वह आएगा और उसके हाथ से शंख लेकर चूर-चूर कर डालेगा। वह धक्का देगा ओर तुलसी छत से गिर के नीचे गली में जा पड़ेगा। उसकी एक एक हड्डी पसली चूर-चूर हो जाएगी। इस दुनिया से उसका नाम-निशान तक मिट जाएगा। लेकिन तुलसी की कल्पना शक्ति ने उसके भय का साथ न देकर एक नया रूप ही धारण कर लिया। ब्रह्माराक्षस के बजाय उसे हनुमान जी अपनी कल्पना में बढ़ते हुए दिखाई देने लगे।हनुमानजी के दाहिने कंधे पर राम और बाँये पर श्री लक्ष्मण जी विराजित हैं और अपने-अपने धनुषों पर बाण चढ़ाए मानों तैयार बैठे है।तुलसी कल्पना से प्रसन्न हो गया। “जहाँ राम है वहाँ भय कहाँ?चल रे रामबोला, चल आज यह दिखा दे कि तेरा भय अधिक शक्तिशाली और विशाल है कि जय बजरंगबली।वह संकरी घुमावदार सीढ़ियों पर वह उतरने लगा। उतरने की सतर्कता में एक बार भय फिर उमगा। अपने ही मन के धक्के से उसकी देह दीवार से जा टकराई। वह सहमा और फिर सँभल गया- “राम-राम जप रे मन, कहाँ लड़खड़ाता है?”
सीढ़ी का एक द्वार पीपलवाली गली की ओर पड़ता था। वह द्वार यों तो बन्द रहता था किन्तु गुरुपत्नी से आज्ञा लेकर उस द्वार का ताला तुलसी ने आज शाम ही को खुलवा लिया था।तुलसी उसी से होकर बाहर आया।द्वार बन्द किए, कुंडी चढ़ाई , ताला बन्द किया, कुंजी अंगौछे में बाँधी और अंगोछे को कमर पर कसकर बाँध लिया, 'जय गणेश, जय भूतेश्वर, बजरंग, रामभद्र जय जय जय-जय। तुलसी पीपल के नीचे से ही गली पार कर रहा है। शीत उसकी रुई की मिर्जई को भेदकर उसके भीतर कंपकंपी भर रहा है | ऐसा लगता है कि तुलसी की परीक्षा लेने को सरदी भी आज अपने चरम बिन्दुं तक पहुँच रही है। पर अब तो चाहे सर्दी सतावे या स्वयं भूत ही आकर उसका हाथ क्यों न पकड़े, तुलसी अपने निश्चय से डिग नही सकता। वह सदा आगे ही बढ़ेगा।

अँधेरी सूनी गलियाँ पीछे छूटती जाती हैं।शीत के मारे कुत्ते भी इघर उघर दुबके हुए बैठ हैं, केवल आहट पाकर जहाँ तहाँ भौं-भौं कर उठते हैं। गलियों में यत्र-तत्र बैठे हुए साँड भी तुलसी के चलने की आहट पाकर अथवा जीत की प्रतिक्रियावश अपनी सांसों की फुफकारें सी छोडते हुए मिल जाते हैं।संकरी गलियों मे बन्द घरों की दीवारें मानों सांय-सांय बोल रही हैं। एक जगह पर छत्ते के नीचे एक साँड पूरी गली घेरे हुए पड़ा था। घने अंधेरे मे वह तुलसी को दिखलाई न पड़ा।वह जैसे ही आगे बढ़ा तो ठोकर खाई। पैर लड़खड़ाया और वह बैल पर ही गिर पडा। शंख की नोक बैल के शरीर में चुभी और उसने फुंफकारते हुए अपने सींग इधर घुमाए। तुलसी घबरा गया। बैल भी घबराकर उठने का उपक्रम करने लगा।
क्रमशः

tc 42

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
42-

उसकी पीठ पर गिरे हुए बालक की घबराहट इस कारण से और भी बढ़ी कि भूत भले न हो पर भूतनाथ के इस नन्दी ने यदि आक्रमण कर दिया तो तुलसी की जान की खैर नही। इस भय ने सुरक्षा की भावना तेज कर दी। बैल के पिछले पैरों के पूरी तरह उठने के पहले ही वह फुर्ती से फिसल पड़ा और फिर घुटनों तथा बाँयें हाथ के पंजे के बल पर उठकर वह तेजी से भागा। अपने भय के भाग जाने पर पशु वहीं का वहीं खड़ा रह गया। आगे थोड़ी ही दूर पर गली समाप्त हो गई, खुला मैदान आ गया, तुलसी की साँस में साँस आईं।कितना शीत है। सीलन भरी गलियों की बंदिनी शीत से यह मैदान की मुक्त ठिठुरन तुलसी को अपेक्षाकृत भली लगी। तीन साल पहले गुरू जी के एक  यजमान के द्वारा विद्याथियों को दान में मिली हुई मिर्जइयाँ अब अपनी गर्मी प्रायः खो चुकी थीं। तुलसी को लग रहा था कि शीत महाबली योद्धा बन कर हवा के सनसनाते तीर छोड़ रहा है।मिर्जेई का कवच उसकी रक्षा नही कर पा रहा है। दौड़ने से गर्मी बढ़ती है और वही उसकी रक्षा भी कर सकती है।

शमशान तट पास आ गया। विशाल वट-वृक्ष की अनगिनत जटाएँ हवा में भूलती हुई ऐसी लग रही थीं मानो सैकड़ों फासी के फंदे लटक रहे हों । बरगद पर कोई पक्षी इस तरह रिरिया रहा था कि मानों कोई बच्चा पीड़ा से कराह रहा हो। तुलसी के पावँ भय से थम, गए पर यह भय अब उसके लिए चुनौती बन गया था। वह श्मशान में आ पहुँचा है। बटेश्वर निश्चय ही यहाँ उपस्थित होगा। वह अपने कापालिक गुरु से मंत्र-विद्या सीख रहा होगा। यहाँ तक पहुँच कर अब यदि तुलसी घबराया तो उसकी लोक हँसाई होगी। कल विद्यार्थियों के सामने बटेश्वर दम्भ-भरे ठहाके लगाएगा। नहीं , ऐसा कदापि नहीं होगा। तुलसी के पावँ अब पीछे नही लौट सकते। यह शमशान उसके शंखघोष से गूजँना ही चाहिए। तुलसी वट के नीचे से निर्भय होकर गुजरने लगा। लटकती जटाएँ उसके सिर और कंधों को छू जातीं है लेकिन अब वह उनसे तनिक भी भयभीत नहीं हो सकता। शमशान की जलती-बुभती चिंताएँ दिखलाई पड़ रहीं हैं। एक चिता की .. लपटों से उसे तरह तरह के आकार भी दिखाई देतें हैं लेकिन तुलसी अब भयभीत नही हो सकता। भूत चाहे उसका गला ही क्यों न दबोच दे पर जब तक वह शिव जी के मदिर में शंखघोष नहीं कर देता तब तक उसके प्राण कदापि नही निकलेगे। “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपींस तिहुँ लोक उजागर।”
तुलसी शिव मदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। सामने गंगा तट पर जलती हुई चिता के पास उसे दो आकृतियाँ बैठीं हुई दिखलाई दीं। निश्चय ही बटेश्वर और उसके गुरू कापालिक की आकृतियाँ होगीं। इस विचार ने तुलसी के भीतर मानों नये प्राण फूकँ दिए।पैर तेजी से ऊपर चढ़े। भूतनाथ अपने इष्टदेव के इस भक्‍त को कदापि हतोत्साहित नहीं कर सकते- “जय भूतेश्वर, जय बजरंग, जय-जय-जय सीताराम।”
तुलसी ने विशाल शिवलिंग के समक्ष खड़े होकर पूरी शक्ति के साथ अपना शंख बजाया, एक बार नही, पूरे तीन बार बजाया । बाहर दूर से एक कड़कड़ाती हुई आवाज आई- “कौन है रे ”
“राम जी का खास सेवक तुलसीदास।” शिव जी के चबूतरे से ही आात्म- विश्वास से जगमगाए हुए बालक ने कड़क कर जवाब दिया।
“ठहर तो सही, रे भण्ड।” दूर की आवाज फिर गरजी, लेकिन तुलसी उस चुनौती का सामना करने के लिए फिर खड़ा न रहा। जल्दी से शिवलिंग की परिक्रमाँ करके सीढ़ियों से उतरकर वह भागा। इस समय भूतों से अधिक किसी जीवित मनुष्य की मार खाने का भय ही उसे अधिक सता रहा था। शमशान से बाहर निकलकर वह थमा और दम भर खड़े होकर हाँफते हुए वह श्मशान की ओर देखने लगा- “आव बच्चू, बटेश्वर होवे, चाहे उनके गुरू होवें, चाहे गुरू के भूत होवें, हमार कोऊ का बिगराड़ि सकत है? अरे हम तौ राम जी का जय- घोष करि आयेन।” 
तुलसी श्मशान से यों घर लौट रहा था मानो त्रिलोकविजय करके आ रहा हो। इस समय न तो उसे जाड़ा ही सता रहा था और न किसी प्रकार का भय । आस्था प्रबल होकर उसे राममय बना रही थी। 

भूत भय विजय का यह वृत्तान्त सुनाकर पंडित गंगाराम बोले- “ऐसे विकट
साहसी है हमारे यह परममित्र।इनके कारण हम लोगों का भय भी निर्मूल हो
गया। उस समय मेरी जान में हम लोग पंद्रह -सोलह वर्ष के बालक रहे होगें किन्तु हमसे बड़ी आयुवाले विद्यार्थी भी उसके बाद से इनका विशेष आदर करने लगे और गुरू जी का मन तो इन्होंने फिर ऐसा जीत लिया कि वे इन्हें पुत्रवत्‌ प्यार करने लगे। उसके बाद आईया अर्थात्‌ हमारे गुरू जी की पूजनीया पत्नी ने इनसे भृत्य का काम लेना प्रायः बन्द ही कर दिया। वे इन्हें अधिकाधिक अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहन देने लगीं।”
पण्डित गंगाराम के द्वारा कथा-प्रसँग जब पूरा हुआ तो कवि कैलास मगन मन अपनी पालथी बदलकर पास ही धरती पर रखे अपने अगौछें की गाँठ खोलते हुए बोले- “आस्था में तो यह आरम्भ ही से अंगद का पावँ रहे हैं। तभी तो इनकी भावना और काव्य-प्रतिभा मिलकर इन्हें महाकवियों मे बजरंगबली के समान उडानें भरने की शक्ति  देती है।” 
वृद्ध कविवर की प्रशंसा का औरों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। जब तक बात की सराहना में वाह-वाह हुई तब तक कैलास जी के अगौछें की गाँठ से पान का दोना निकल आया। गोस्वामी जी के सामने बैठकर पान खानेवाला कवि कैलास जी को छोड़कर इस नगर में और कोई व्यक्ति नहीं था। दो बीड़े पान जमाए और फिर दूसरी छोटी सी पुड़िया हाथ में उठाकर बोले- “हमारा हृदय तो इस समय यह कह रहा था कि पवनसुत केसरी किशोर की जब कवि बनने की इच्छा हुई तो वे हमारे इन मित्र के रूप में अवतार धारण करके हमारे बीच में आ गए।”
श्रोतामण्डली यह सुनकर भाव-विभोर हो गई। सामने मूर्तिवत्‌ बैठे हुए महापुरुष की स्तुति के खिले अधखिले शब्द फूल कई, मुखों से झरने लगे। रामू बोला- “अंध भूतविश्वास के प्रति प्रभु जी का एक दोहा भी तो है--
“तुलसी परिहरि हरि रहे, पाँवर पुजजहिं भूत। 
क्रमशः

Monday, 17 April 2023

tc 40

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
40-

इन बारह नक्षत्रों में धन-घान्य, घरोहर-धरती का लेन-देन करो तो लाभ होगा।”
उसी समय कुछ दूर पर बैठे केशव ने बटेश्वर से हँसकर कहा-“ये तुलसिया परसों अमावस्या को अर्धरात्रि के समय हरिश्चन्द्र घाट के मंदिर में शंखघोष करने जाएगा।”
सुनकर तुलसी और उसकी मण्डली के बालक चुप हो गए। बटेश्वर उपेक्षा भरी हँसी हँसा , किन्तु कहा कुछ भी नहीं। हरि ने बात आगे बढ़ाईं , बोला- “कहता था, राम शब्द से अधिक सिद्ध और कोई मंत्र ही नही है।”
कहकर वह जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ा।तुलसी आवेश में आ गया। वही से बोला “हाँ हाँ, अब भी कहता हूँ, कल जाकर रामकृपा से अवश्य ही शंकर जी के मंदिर मे शंखनाद करूँगा। देखूँगा कि भूत बड़े हैं या रामसेवक कपि केसरी किशोर।”
तुलसी का तैश देखकर हरि और केशव दोनों ही हो-हो करके हँस पड़े- “अरे वाह रे कपि केसरी किशोर के भक्त। जब शंखिनी-डंकिनी दहाड़ेंगी तब कहना।” हरि ने व्यंग्य कसा और फिर हँस पड़ा ।
तुलसी फिर तैश खा गया, झटके से उठकर खड़ा हो गया और हरि की ओर देखते हुए हाथ बढ़ाकर बोला- “भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावै। एक भी भूत-चुड़ैल मेरे सामनें नहीं ही आवैगी। देख लेना।”
वटेश्वर क्रोध में आँखें निकालकर गरजा-“अच्छा बक बक बंद कर।ससुरा भिखारी की औलाद टहल-मजूरी करके पढ़ता है और हम विद्वानों से उलझता है? बड़ा हौसला होय तो आना बेटा कल रात में। परसों सबेरे मंदिर के नीचे से डोम ही तेरा शव उठाएंगे और वहीं लोग फूंकेंगे।”
तुलसी भी ताव खा गया, बोला-“जाको राखे साइँया, मार सके नहिं कोय।
बाल न बाँका कर सके जो जग बरी होय- तुमसे जो बने सो कर लेना। मरना बदा होगा तो राम जी के नाम पर मर जाएँगें। कौन हमें रोने को बैठा है।”कहकर तुलसी दालान से बाहर चला आया। गंगा भी उसके पीछे ही पीछे आया। आवेश में भरे तुलसी के कंधे पर प्रेम से हाथ रखकर गंगा से कहा -“तुलसी, मेरे पिता मणिकणिका घाट के योगीजी को जानते हैं। मुझे भी उनके कारण योगीजी जानते हैं। चलो चलकर उनसे सारी बात कहें। वे निश्चय ही कोई सिद्ध जड़ी बूटी अथवा मंत्र तुम्हें दे देगें।”
“राम सिद्धमंत्र है। बंधु, मुझे अपने स्वर्गवासी गुरू बाबा की बात ही राजमार्ग जैसी सरल और सुखद लगती है। तुम जानते नहीं हो, हनुमान जी बचपन से ही मेरी बाँह गहे हुए हैं।अच्छा, अब चलूँ , गायों की सानी करना है, फिर माता जी के सायँ स्नान के हेतु दो गगरी गंगाजल लाना है।”

उस रात तुलसी जब सब कामों से छुट्टी पाकर अपना दिया लिए हुए ऊपर चला तो सीढ़ियों में ही हवा का ऐसा गूँज भरा थपेड़ा आया कि दीप की लौं झोंका खाकर बुझी अब बुझी जैसी हो गई। मन सहम उठा, राम-राम का जप
स्वर में हल्की कंपकंपी के साथ तीव्र गतिशाली हुआ। बत्ती की लौ नन्‍ही बूँद जैसी बन गई पर बुझी नहीं, फिर क्रमश: उसमें उजाला बढ़ने लगा। उस उजाले से बालक के चेहरे पर आत्मविश्वास का उजाला बढ़ गया। सीढ़ी पर जमे डग फिर उठे। तुलसी छत के द्वार तक पहुँच गया। रात घनी काली थी कितु सर्दी की स्वच्छ रात में तारों की चमक लुभावनी लग रही थी। नीचे गली से लेकर कोठरी की छत को छूता हुआ पीपल रात की कालिमा में अँधेंरे की एक और गहरी पर्त बनकर खड़ा था लेकिन आज वह तुलसी के लिए रुकावट न बना। उसकी न कोठरी की छत पर आज उसे कोई दीर्घाकार बैठा दिखलाई दिया और न वह छत पर धम से कूदा।न कोई आवाज ही सुनाई दी। बालक उत्साह मे तनिक जोर से बड़बड़ा उठा-“जै बजरंगबली। हे बजरंगबली, आज हमनें तुम्हे सारे दिन-भर ध्याया है। भला कौन भूत अब मेरे सामने आने का साहस करेगा? ” बड़बड़ाते हुए कुंडी खोलकर जो कोठरी में कदम रखा तो ऐसा लगा कि उसकी चटाई पर कोई लेटा है। सारी आस्था, मन का चैन लड़खड़ा गया। एक बार उल्टे पैरों लौटा, फिर देखा तो लगा कि कहीं कुछ भी नही है। बालक के मन में नये सिरे से उत्साह आया। उसने अपनी कोठरी में पुन. भीतर तक प्रवेश किया। दिये के प्रकाश में कोठरी के चारों कोने और फर्श से लेकर छत तक, सतर्क नजरों से सब छान मारा, कही कुछ भी न था। मन का विश्वास फिर लौटा। दिया आड़ में रखा। द्वार खुले होने से ठंडी हवा भीतर आ रही थी। तुलसीदास ने दरवाजे अंदर से बंद कर लिए। छोटी सी कोठरी की अकेली दुनिया कुछ अजीब सी लगी। कुछ भय, कुछ अभय मिलकर तरुण मन को सनसनाहट से भरने लगा। भरी सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूँदें चुचुआ उठीं।फिर आप ही बड़बड़ा उठा- “धत्‌ तेरे की रामभगतवा। हनुमान जी का ध्यान कर”
वह अपनी चटाई पर बिछी हुई कथरी पर बैठ गया। मिट्टी की दवात और सरकंडे की कलम सामने रख ली। कागज उठा लिया और लिखना आरंभ किया-
“जे॑ हनुमान ज्ञान गुन सागर।जै कपीस तिहुँ लोक उजागर॥”

मध्य रात्रि तक हनुमान चालीसा पूरी की। तुलसी ने अपने अब तक के
जीवन में यह पहला लंबा काव्य रचा था। मन बड़ा ही मगन था। जोश में आकर उसने दो तीन बार अपने चालीसा काव्य को पढ़ा।दो-एक जगह संशोधन
भी किए, फिर ऐसे सुख से टांगें पसारकर सोया मानों उसने कोई बड़ी भारी दिग्विजय कर ली हो।
दूसरे दिन युवक जब वह गंगाजल की गगरियों को घर के भीतर पहचाने के लिए गया तो गुरु-पत्नी ने पुछा- “रामबोला, हमने सुना है, तुम आज शमसान जाने वाले हो?”
तुलसी झेंप गया, फिर कहा-“हम राम जी की शक्ति को भूतही की शक्ति से बड़ी मानते हैं, आईया जी क्‍या हम गलती करते है?”
“नही बेटा, भूत तो बनते-बिगड़ते रहते हैं, वह तुम्हारे मन के विकारों की तरंगें मात्र ही हैं। उनकी चिंता कभी न करना।
गुरु पत्नि की बात अच्छी तो लगी पर मन को जैसे विश्वास न हुआ, पूछा-“अइया जी, रात में पीपल तले कभी-कभी ऐसा उजाला दिखलाई देता है कि हम आपसे क्‍या बतलाएँ। आकार भले भय के हों, पर यह उजाला कौन करता है?
क्रमशः

Sunday, 16 April 2023

tc 39

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
39-

कूडें वाली डलिया उठाकर तुलसी ने कहा-“बटेश्वर अमावस्या की रात्रि में वहाँ जाते हैं तो उनसे कहना कि अबकी अमावस्या की रात्रि में मेरा शंखघोष वे राम जी की दया से सुन लेंगे।”
“अरे जा, जा, बड़ी राम जी की दया वाला बना है। हग भरेगा बच्चू, हग भरेगा।” 
तुलसी के चेहरे पर निश्चय की स्फटिक शिला जम गई थी। उसने अपने सिर पर कूड़े की डलिया रखी और सधे पावँ बाहर की ओर चला। गंगा भी उसके साथ ही साथ चला। कुछ कुछ सहमे से स्वर में उसने पूछा--“'तुलसी, क्या तुम सचमुच अमावस्या की रात में वहाँ जावोगे। मैंने बड़ी गलती की जो आवेश में आकर कह गया। तुम्हे भी जल्दी आवेश मे नही आना चाहिए था। हम दोनों से चूक हुई।”
तुलसी चुप रहा। घूरे तक वे लोग चुपचाप आए।तुलसी ने कूड़ा घूरे पर डालकर डलिया को झाड़ा फिर संयत स्वर में कहा -“अब तो अमावस को जाऊँगा , गंगा। नहीं जाऊँगा तो मेरे राम जी, हनुमान जी झूठे सिद्ध होगे।”
गंगा बोला - “राम जी समर्थ हैं। अपनी निन्दा बढ़ाई को वह आप संभाल सकते हैं। तुम भूत-प्रेतों से मत खेलो तुलसी।”
"नहीं, अब तो बात दे चुका। मैं जाऊँगा।”
“भाई, मेरे मत से तुम्हें पहले आचायंपाद से आज्ञा ले लेनी चाहिए।” 
“हाँ हाँ, निश्चिन्त रहो। गुरू जी से पूछकर ही जाऊँगा।मेरा विश्वास है कि वे आज्ञा दे देंगे।” 
“अभी से यह भरोसा न बाँधो। गुरू जी ज्ञान नारायण को धारण करनेवाले साक्षात्‌ शेष भगवान है।” 
“तभी तो विश्वासपूर्वक यह कह रहा हूँ कि वे आज्ञा दे देंगे।”

नीम के पेड़ तले मिट्टी के चबूतरे पर कुश आसन बिछाए विराजमान, ज्ञानमूर्ति, तपोपुज आचायंपाद शेष सनातन जी महाराज अपने सामने बेंत की बुनी हुई चौकी पर रखी पोथी के कुछ पन्ने हाथ में उठाए हुए बाँच रहे थे। बालक तुलसी दबें पावँ वहाँ पहुँचा और चुपचाप हाथ बाँधें खड़ा हो गया। गुरू जी कुछ समय के अन्तराल में पोथी के पन्ने पढ़कर पलटते हैं और आगे पढ़ने में तल्‍लीन हो जातें हैं। तुलसीदास की ओर उनका ध्यान तक नही जाता। बालक सिर झुकाए हाथ बाँधे खड़ा रह जाता है। गुरू जी जब उन पृष्ठों को पढ़कर पोथी में मिलाते हुए आगे के पृष्ठ उठाते हैं तब उनका ध्यान एकाएक तुलसी की ओर जाता है।पूछा- “क्या है?”
हाथ जोड़कर तुलसी ने कहा-“एक आज्ञा लेने के लिए सेवा में आया हूँ गुरू जी।”
"कहो” -गुरू जी ने नये पृष्ठ हाथ में उठा लिए।
"दो दिन पहले हरि और केशव से मेरी बदाबदी हो गई थी। वे भूतों का भय दिखला रहे थे।मैने कहा कि भूत पिशाच बजरंगबली से बढ़कर शक्तिशाली नहीं हैं। जिसकी भक्ति राम के चरणों में अटल है वह भूतों से कदापि नहीं डर सकता। इस पर हरि ने कहा कि जो ऐसे भक्त हो तो हरिश्चन्द्र घाट पर शिव जी के मंदिर में अमावस्या को आधी रात के समय शंख बजा आओ तब हम जानें। बटेश्वर वहाँ किसी भूत-विशारद से भूत-विद्या सीखने के लिए जातें हैं। वे मेरे शंखवादन के साक्षी होंगे। यदि आप आज्ञा दें तो चला जाऊँ।”
गुरू जी मौन रहे, फिर पूछा- “अपनी कोठरी में कभी डरे हो कि नहीं?”
“कुछ कुछ तो अवश्य डरता हूँ गुरू जी, परन्तु श्री केसरीकिशोर के ध्यान से मेरे भय के भूत भाग जाते हैं। आपके उपदेश भी मेरे मत को बल देते रहते है।”
पक्की परख भरी दृष्टि से अपने शिष्य का मुख निहारकर फिर पोथी की ओर देखते हुए गुरू जी गंभीर स्वर मे बोले-“पीपलवाला तो बड़ा सभ्य भूत है,केवल दुष्टों को ही सताता है, परन्तु सब भूत-प्रेत ऐसे नही होते। कुटिल और क्रूर भूतों की कमी नही है। हरिश्चन्द्र घाट भूतों की अति भयावनी लीलास्थली है।”
“बालक की वाचालता क्षमा हो गुरू जी, बटेश्वर भी तो वहाँ जाते है।”
“बटेश्वर मंत्र-कवच-मंडित है। तुमको तो भूत फाड़ खाएंगे।”
तुलसी एक क्षण तक स्तंभित खडा रहा, फिर सिर में कुछ तनाव आया झटके से स्वर उठा, कहा- “राम जी के रहते मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। आपके चरणों का ध्यान ही मेरा रक्षा कवच बनेगा।”
“यह तुम्हारा अटल विश्वास है?”
गुरू के चरणों मे शीश नवाकर तुलसी ने कहा- “हां, गुरू जी, मेरी परीक्षा ले ले।”
“तुम्हें स्वयं अपनी ही परीक्षा लेती है तुलसी। यदि तुम्हारी भवित अटल है तो भव भूतताथ तुम्हारी रक्षा करेगें। जाओ, मेरा आशीर्वाद है।”

बाबा ध्यानमग्न बैठे अपने पूर्वानुभव के मनोदृश्य देख रहे थे। पंडित गंगाराम की स्वर उन दृश्यों को गति दे रहा था। पण्डित जी कह रहे थे- “पाठ्याला में सभी छात्रों को घीरे-घीरे यह बात विदित हो गई। पाठशाला में केवल हम चार पांच छात्र ही छोटी आयु के थे। उनमे भी केवल तीन बालक गुरू जी के घर में रहकर सेवा-वृत्ति से शिक्षा ग्रहण करते थे, बाकी सब स्थानीय निवासी थे और दक्षिणा देकर पढ़ा करते थे। उनकी सँख्या आठ थी, उसमें भी छ: विद्यार्थी सत्तरह- अठारह से बीस-पचीस की आयु वाले थे। बटेश्वर मिश्र की आयु २३-२४ वर्ष के लगभग थी।वह श्याम वर्ण का दुबला पतला क्रोधी और अहंकारी युवक था। गुस्सा सदा उसकी नाक पर ही धरा रहता था। धनी पिता का पुत्र था इसलिए अपने आगे किसी को कुछ समझता नही था। जरी काम का दुशाला और लाल मखमल की मिर्जई पहनकर वह पढ़ने के लिए आया करता था। हरि केशव दोनों ही सदा उसकी चाटुकारी में रहा करते थे। चतुर्दशी के दिन गूरूजी महाराज किसी नरेश के यहाँ बुलावे पर गए थे। हम सब लोग उस दिन प्रायः अनुशासन-मुक्त थ, तभी हरि ने छेड़ -छाड़ की।हरि, केशव, बटेश्वर तथा उनके समवयस्क दो और छात्र दालान में गुरू जी की सूनी चौकी के पास बैठे हुए थे।तीन बड़े छात्र एक अलग कोने में बैठे हुए आपस में साहित्य विवेचना कर रहे थे ।
तुलसी, गंगाराम और उनके समवयस्क दो छात्र बैठे हुए आपस में ज्योतिष संबंधी चर्चा कर रहे हैं। एक ने पूछा -“अच्छा तुलसी, बताओ व्यापार के लिए कितने नक्षत्र अच्छे होते हैं?”
तुलसी बोला-“बारह। श्रवण के तीन, हस्ति के तीन, फिर पुष्प और पुनर्वंसु, इसके बाद मृगशिरा, अश्वनी, रैवती तथा अनुराधा।
क्रमशः

tc 38

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
38-

शीघ्र ही हम लोग ऐसे गहरे मित्र बन गए कि अपने मन की एक एक बात एक दूसरे के आगे कहने लगे। उन्हें गुरूजी महाराज के घर में छत पर बनी एक छोटी सी कोठरी रहने को मिली थी। उस कोठरी की दीवार पर एक विशाल पीपल की टहनियाँ हवा से डोलती हुई भड़ भड़ लग कर आवाज किया करतीं थीं और विचित्र विचित्र से छाया चित्र बनातीं थीं। तुलसी भृत्य शिष्य थे। गुरूजी के घर का सारा कामकाज भृत्य के रूप में करते, तीसरे पहर गुरूजी से शिक्षा ग्रहण करते और रात में पतली सीढ़ियाँ चढ़कर हथेली की ओट से दिए की लौ को सुरक्षित करके यह तिमंजिले की छत पर पहुंचतें।
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छत के द्वार पर बारह-तेरह वर्ष का एक गौरवर्ण बटुक दिया लिए हुए खड़ा है। अभी ही उसने सीढ़ियाँ चढ़कर द्वार पर पहला कदम रखा है। सामने पीपल की टहनियाँ उसकी कोठरी की छत से लेकर इस छत की मुँडेर तक दीवार तक हवा के झोंकों से ऐसे भिड़ जातीं हैं मानों किसी के बोझ से इतनी नीचे झुकती हों। बालक की भावना में एक विशालकाय मनुष्याकार झलकता है जो क्रमशः बड़ा होते हुए आकाश को छू लेता हैं और फिर तिरोहित हो जाता है। कलेजे के अन्दर धमाके की गूँज अब भी सनसनाहट भर रही है। बच्चे का चेहरा फीका पड़ गया, काया काठ हो गई,हाथ पैर भय की सनसनाहट से जल्दी जल्दी काँप उठते, जिससे हाथों का दिया हिल हिल जाता था।अपने भय जड़ित स्वर को क्रमशः खोलने के प्रयास मे ऊँचा उठाते हुए बालक के हाथ पैरों में गति आई। कदम आगे बढ़ा 'जै बजरंग....”दूसरा कदम बढ़ा 'बजरंग-बजरंग', दो सहमे डग और आगे बढ़ गए, बढ़ने से भय कुछ कुछ पीछे हटा किन्तु अभी तो भय का आगार, वह दीवार ठीक सामने थी जिसके सहारे दस-पाँच पल पहले बच्चे ने अति विशालकाय काया देखी थी। भय अपने आप में हाँफने लगा, साथ ही उसमें फिर से एक नई तेजी भी आई, “भूत-पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावे ” अपने शब्द अपने ही लिए नई आस्था बनकर वच्चे को आगे बढ़ाने लगे। वह डरता जाता है और डर को जीतते हुए बढ़ता भी जाता है। वह अपनी कोठरी के द्वार तक पहुँच ही गया। दिये को हवा से बचानेवाला दाहिना हाथ दरवाजे की कुण्डी तक लड़खड़ाता हुआ उठा। काँपते हाथों से कुण्डी खुली फिर झटके से द्वार खुला। बच्चा हवा की तरह भीतर घुस गया और द्वार उड़काकर उसपर अपनी पीठ टेककर अपनी हथेली के दिये को सँभालने शरीर अपने आप ही निरापद महसूस करने की स्वचालित प्रक्रिया में रम गया।
दूसरे दिन पाठशाला में रामबोला ने अपने मित्र गंगाराम से कहा -“गंगा, भूत-प्रेत सचमुच होते हैं। कल मैंने पीपलवाले ब्रह्मराक्षस को अपनी आँखो से देखा है।”
साँयकाल के समय तुलसी और गंगाराम दोनों ही पाठशाला के आगे का आँगन बुहार रहे हैं, दोनों सूखे पत्ते, गर्द आदि सारा कूड़ा एक जगह लाकर एकत्र कर रहे हैं , हथेलियों से कूड़ा एक जगह डाल रहे हैं और बाते कर रहे हैं। तुलसी कह रहे हैं- “हमारी कुठरिया, की छत पर पीपल की डाल पकडे़ हुए बैठा था न उसने जो हमको देखा तो ऐसी जोर से टहनी को झकझोर उठा कि मानों हमें देखकर उसे बड़ा क्रोध आ गया हो और वो बड़ा होने लगा। मैंने भी जोर जोर से राम-राम, बजरंग-बजरंग जपना आरंभ कर दिया। एक पंक्ति भी बन गई, 'भूत-पिशाच निकट नहीं आवें , महाबीर जब नाम सुनावै।” 
बालक गंगाराम बोले- “हमारी तो भैया ऐसे में सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाय। काशी में विश्व भर के भूत आते हैं।तुलसी बोला-“हमारे बाबा कहते थे कि राम मंत्र सिद्ध मंत्र है। हमको तो वही फलता है। जिसके हनुमान और अंगद जैसे महावीर सैनिक हैं,जो नाथों के नाथ विश्वनाथ के भी इष्टदेव हैं, उनके चरण भला क्यों न गहै ! अरे, हम तो कहते हैं गंग़ा, कि ऐसे बड़े मालिक को कष्ट देने की भी आवश्यकता नहीं, उनके परम सेवक बजरंगबली से ही हमें रक्षा मिल जाती है-
'भूत-पिशाच निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावे।
नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा। 
संकट से हनुमान छुड़ावै, मन-क्रम-वचन ध्यान जो लावै।” 
पास ही से दो विद्यार्थी साग-भाजी लेकर आँगन से प्रवेश कर रहे थे। उन्होंने सुना। एक ने मुस्कराकर कहा- “अरे वाह, कवि जी, बड़ी जोर से कविताई हो रही है।”
तुलसी झेंप गया, गंगा ने हंसकर कहा-“भूत-बाधा दूर करने का मंत्र बना रहे हैं।”
दूसरा लड़का हँस कर बोला-“हें -हैं-हैं, अभी नाक पोंछना तो आता नहीं, मंत्र बनावैगें। अभी पिछवाड़े का पीपलवाला जो इनके सामने आकर खड़ा हो जाय तो डर के मारे इनके वस्त्र बिगड़ जायें। ही.. ही.... ही मंत्र बनाने चले हैं।” 
तुलसी को ताव आ गया। उस लड़के की ओर देखकर कहा -“देखा है, देखा है उस पीपलवाले को भी। मेरी कोठरी की दीवार पर ही तो बैठता है। पर मैं जैसे ही जाकर हनुमान जी का नाम लेता हूँ, वैसे ही भाग जाता है।” 
लड़के आँगन में खड़े हो गए। एक ने कहा -”अरे जा रे लवार, झूठमूठ की न हाकँ ” 
“मैं गुरू जी के चरणकमलों की सौगंध खाकर कहता हूँ। मैंने पीपलवाले को कई बार कई रूपों में देखा है।”
इतनी बड़ी शपथ का प्रभाव उन विद्यार्थियों पर पड़े बिना न रह सका । एक बोला-“अपना बटेश्वर प्रत्येक अमावस्या की रात को श्मशान पर एक कापालिक से भूत विद्या सीखने के लिए जाता है। वह कहता था कि आधी रात को वहाँ शिव जी के मंदिर में सारे भूत एकत्र होते हैं और भूतनाथ की आरती उतारते हैं। वह कहता था कि उस समय जो कोई वहाँ जाकर शंख बजा दे तो सारे भूत उसके वश में हो जाएँ पर कोई बजा ही नही सकता। बड़े बडे़ सिद्ध भी यह साहस नही कर सकते।”
गंगा बोला- “हमारा तुलसी जा सकता है। यह बड़ा राम-भक्‍त है।”
“ ही ही, देखी-देखी इसकी भक्ति।”-एक ने कहा।
तुलसी की आँखें स्वाभिमान से चमक उठीं।
क्रमशः

tc 37

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
37-

रविदत्त रामू को मारने के लिए झपटे।वेनीमाधव और बाबा के आगे जो युवक खड़े थे वे भी उनकी ओर बढ़े। दर्शनाथियों की कौतूहल भरी दृष्टि उस नाटक को खड़ी देखती रही। पंडित रविदत्त बावले की तरह से प्रलाप कर रहे थे। बाबा शान्त स्वर में बोले -“रविदत्त जी शांत हों। आप जैसै सुप्रतिष्ठित
तंत्रविद्या-विज्ञारद .....”
“चुप कोर, चुप कोर शाला शोण्डो।”
एक युवक ने तैश में आकर पंडित रविदत की दाढ़ी पकड़ ली। बाबा ने उसे वरजा- “कन्हाई, दूर हटो।” 
फिर विनम्र स्वर में रविदत्त जी से कहा- “देवस्थान में कोध प्रदर्शन न करें । मैं जा रहा हूँ, चलो हो, राजा।” कहकर बाबा ने भोले बाबा को प्रणाम किया और रविदत्त की तनिक भी परवाह करके लगड़ाते हुए बाहर निकल गए। रविदत्त चिल्लाते रहे। उन्होंने तुलसीदास को पृथ्वी से उठा देने की प्रतिज्ञा की।
मंदिर के आगँन में अनेक भक्त गोस्वामी जी, महाराज की महत्ता बखान रहे थे और रविदत की निन्दा कर रहे थे। एक ने कहा-“अरे, जब बंटेश्वर महाराज जैसे प्रकाण्ड तांत्रिक गोस्वामी बाबा का कुछ न बिगाड़ सके तो ई रवीदत्तवा का उखाड़ लेगा ?”
मन्दिर के भीतर समझाने वालों की भीड़ से घिरे पडित रविदत्त यह सुनकर बड़ी जोर से उखड़े। अपने शुभचिन्तकों का घेरा तोड़कर बाढ़ के प्रचंड प्रवाह की तरह बाहर निकले- “हाम क्‍या उखाड़ शोकता, देख” कहकर वे द्वार तक पहुँच जाने वाले बाबा की ओर, एक बूढ़े का लठ्ठ उसके हाथ से छीनकर, झपटे किन्तु हड़बड़ी में चौखट लाँघते हुए ठोकर खाकर धड़ाम से गिर पड़े। भीड़ में कुछ लोग उन्हे फर्श पर गिरा देखकर एकाएक जोश में बजरंगबली और बाबा विश्वनाथ की जै-जैकार कर उठे।
थोड़ी ही देर मे काशी की गली-गली में यह खबर गूँज गई कि विश्वनाथ बाबा के मंदिर में गोस्वामी तुलसीदास जी पर आक्रमण करनेवाले रविदत्त पंडित को हनुमान जी ने उठाकर पटक दिया।बाबा की महिमा इस कारण से और बढ़ गई। नगर में तरह-तरह की बात सुनकर कई शुभचिन्तक बाबा के दर्शनार्थ आए। पंडित गंगाराम ज्योतिषी, पंडित काशीनाथ, कवि कैलास, सेठ जैराम, आदि लोग यह खबर सुनकर आए थे कि रविदत्त पंडित ने बाबा पर लाठी से प्रहार किया और प्रहार होते ही उन्होंने हनुमानजी को गोहराया।
सुनकर बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े, बोल-“अरे मैया, बजरंगबली के मारने के लिए अनेक दुष्ट पड़े हैं , बेचारे रविदत्त का तो केवल एक यही दोष है कि वह निर्वुद्धि है। बेचारा अपने ही आवेश में गिरकर चुटीला हो गया। राम करें शीघ्र ही स्वस्थ हो जाए।”
“स्वस्थ? अरे महाराज, उसकी तो हड्डी-पसलियों तक का चूरा हो जाना चाहिए। दुष्ट दिन रात माँ माँ चिल्लाकर ढोंग रचाया करता है और इस उमर में भी महरियों और मेहतरानियों के पीछे मारा-मारा डोलता है।”
कलास कवि की बात सुनकर पंडित गगांराम मुस्कराकर बोले- “आप तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बात कर रहे है कवि जी। रविदत्त के कतिपय विरोधियों ने उसके विरुद्ध बहुत-सी भूठी बातें उड़ा रखीं हैं। रविदत्त निर्बृद्धि-अहंकारी अवश्य है, जगदम्बा के नाम पर वारुणी का सेवन भी करता है किन्तु वह कट्टर धर्माचारी तांत्रिक है, व्यभिचारी कदापि नहीं।मैं जानता हूँ।”
रामू बोला- “तब तो महाराज उसे अपने ही मंत्रपूत जल के छीटों से मर जाता चाहिए।” पूछे जाने पर उसने सारी कथा सुनाई।
पंडित काशीनाथ बोले- “अरे भाई उसके मंत्रपूत जल से शक्ति  उत्पन्न नहीं   होती। हाँ, वारुणी के एक चुल्लू से ही वह कदाचित्‌ ......”
“उल्लू भले ही बन जाता पर मरता तब भी नही काशीनाथ जी। वह बड़ा ही चीमड़ है।” कैलास जी ने हँसते हुए कहा।
बाबा बोले- “इसके पिता मेरे और गंगाराम के सहपाठी थे। ज्योतिष विद्या में हम लोगों के आगे जब उसकी दाल न गली तब वह हम लोगों से चिढ़ कर तांत्रिक बना था। भोला और भड़भडि़या था।”
“किन्तु यह रविदत्त परम कुटिल है, तुलसीदास, स्मरण करो कि इसकी तामसिक सिद्धियों ने तुम्हें कितना सताया है।” गंगाराम ने कहा।
“अरे हमका का सतइह ! भूत-पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावे। संकटमोचन के आगे कौंन खड़ा हो सकता है।”
“धन्य हैं महात्मन आपकी, अटल श्रद्धा से हम सदा हाँ ना में कूलनेवाले मोह-आत्माओं को ऐसा लगता है जैसे बंद तहखाने में ताजे पवन झकोरे आनें लगें
हों।” जैराम सेठ ने गदगद भाव से कहा।
“वाह कैसी बढ़िया बात कही जैराम। हमें गर्व है कि गोस्वामी जी महाराज के निकट आने का सौभाग्य पा सके। पिछले चालीस बरसों से यही तो हमारी संजीवन बूटी हैं। राम तुम्हारी जय हो !”
पंडित काशीनाथ की बात से गर्व-स्फूर्ति लेकर कैलास जी बोले- “अरे, हमें तो तिहत्तर वर्षों से यह वरदान प्राप्त है। हम इनसे चार वर्ष छोटे हैं। पहली बार मेघा भगत के यहाँ बात भई रही, फिर तो साथ-साथ बदरी-केदार, मान- सरोवर, द्वारका तक की यात्रा की।”
कैलास जी की बातें सुनते हुए गंगाराम जी मद-मंद मुस्कराते रहे। जब उनकी बात समाप्त हुई तो घीरे से गर्दन उठाई और कहने लगे- “इन देवता को,मित्र मानकर तुलसी, तुलसिया, रामबोला आदि कहकर पुकारने का सौभाग्य आप लोगों के बीच में सबसे पहले मुझे ही मिला था। बारह-तेरह वर्ष की आयु
से हम दोनो साथ साथ पढ़े हैं । राम-भक्ति तो मानो इनकी घुट्टी में ही पड़ी है। पर भाई भूत से ये भी कुछ कम नही सताए गए है। हः-ह.-ह , कहौ तुलसी, बताबैं तुम्हारे हाल?” 
बेनीमाधव की उत्सुकता उनकी आँखो में गेंद सी उछलीं। बाबा बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से अपने सहपाठी को देखते हुए बोले- “सुनाओ सुनाओ। इन सब का मनोरंजन और मेरा आत्मलोचन होगा।”
पंडित गयारास ज्योतिषी का मुखमडल हर दृष्टि के लिए चुम्बक बन गया।
पालथी पर बायाँ हाथ थोड़ा रखकर उसपर अपनी दाहिनी कोहनी टिकाकर अधबढ़ी दाढ़ी पर मुलायमियत से उँगलियाँ फेरते हुए पण्डित गंगाराम पिचहत्तर- छिद्त्तर वर्ष पूर्व के अपने स्मृति-प्राकाश में शब्दों के पंख लगाकर उड़ने लगे।बाबा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। सहपाठी के शब्दों का लंगर बाँधकर उनकी ध्यानमग्न काया स्मृति के समुद्र में गहरी पैठने लगी और अपनी अनुभवगम्य बिम्ब सजीवता को सागर के तल से मोतियों की तरह उबारकर लाने में तल्लीन हो गई।
गंगाराम जी कह रहे थे -“हमारी इनकी भेंट पूज्यपाद प्रात:स्मरणीय देव जी महाराज की पाठशाला में हुई थी।
क्रमशः

tc 36

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
36-

कई बालक, युवक और प्रौढ़ लोग वहाँ डण्ड-बैठकें लगाते, मुग्दर घुमाते अथवा मालिश करवाते या फिर अखाड़े में कुश्ती लड़ते दिखलाई पड़ रहे थे। घाट पर भी थोडी बहुत भीड़ भाड़ थी। अधिकतर लोग घाट की सीढ़ियों अथवा चबूतरों पर बैठे पूजामग्न थे।शहर से आए हुए कुछ देहाती स्त्री-पुरुषों का स्नान भी चल रहा था। 
बाबा को देखकर अखाड़े के लड़कों ने 'बाबा आ गए, बाबा आ गए’ कहकर वैसे ही चिल्लाना आरंभ किया जैसे सूर्य भगवान को देखकर चिड़ियाँ चहकती हैं। थोड़ी ही देर मे बाबा अपने भक्तों से घिर गए। रामू और बाबा दोनों ही बनारस वापस आकर अत्यंत मगन थे। बेनीमाधव और राजा भगत को मकान के ऊपरी भाग में दो कोठरियों में बसाने का आदेश देकर बाबा अपनी कोठरी की ओर बढ़े।कोठरी का द्वार सफेदी से पुता हुआ था। द्वार के चारों ओर रामनामी से अंकित गणेश जी बने हुए थे। द्वार के अगल-बगल दीवारों पर ऐसे ही राममय स्वस्तिक और कमल बने थे। कई युवक बाबा को सहारा देते अथवा उनके आगे-पीछे लगे हुए उनके साथ बढ़ रहे थे। बाबा ने कोठरी मे प्रवेश किया। कोठरी लिपी पुती स्वच्छ थी।उनकीअनुपस्थिति में किसी भक्त ने चारों ओर गेरू और चूने से राम शब्द के बड़े ही कलात्मक और सुन्दर वेल बूटे चीत दिए थे। चौकी के सामने की दीवार पर राम नाम की तरंगों में एक रामनामी हंस भी बताया गया था और जिधर बाबा की चौकी लगी थी उधर दीवाल में हनुमान जी की एक विशाल काय मूर्ति भी राम शब्दों से अंकित की गई थी। चारों ओर देखकर बाबा मगन हो गए। बोले- “वाह, तुम लोगों ने तो इस कोठरी को बैकुण्ठ बना दिया, किसने किया यह सब?“
बाबा को सहारा देकर चौकी पर बैठाते हुए एक युवक बोला- "कन्हई इसे एक दिन पुतवा रहें थे तभी सुमेरू रंगसाज इधर आए। उन्होंने आपके नाम की कुछ मानता मानी थी सो पूरी हो जाने पर बड़ा परसाद-वरसाद लेकर आपके दर्शन करने आया था। उसी ने कहा कि हम इस कोठरी का राम-श्रृंगार करगें।”
“वाह, बड़ा रामभक्त है। उसका सदैव मगंल हो।” 
आने के दूसरे दिन बाबा ने विद्वनाथ और विन्दुमाधव के दर्शन की तीव्र इच्छा प्रकट की। उन्हें ले जाने के लिए डोली का प्रबन्ध हुआ। काशी का मध्य भाग अन्‍तगृह ही कहलाता था और श्रेष्ठ पण्डितों, सेठ, साहुकारों तथा सम्पन्न हाट-बाटों से सदा जगमगाया करता था। क्षत्री, ब्राह्मण और बनियों की बस्ती इस भाग में अधिक थी। लगभग छत्तीस-सैतीस वर्ष पहले राजा टोडरमल के पुत्र राजा गोवर्धनधारी ने सुलतानों के समय तोड़े गए काशी विश्वेश्वर के मन्दिर को फिर से बनवाकर नगर का तेज बढ़ा दिया था। भक्तों की भीड़ से मन्दिर में बड़ी चहल पहल थी। ब्राह्मणों के समवेत मन्त्रोच्चार से वह विशाल मंदिर गूँज रहा था। काशी विश्वेश्वर की पावन मूर्ति के पास पुजारियों और दर्शनार्थियों की भीड़ लगी हुई थी। “गोसाईं जी महाराज आ रहे हैं।रामबोला बाबा आ रहे हैं।हर-हर महादेव, जै-जे सीताराम” आदि ध्वनियों  से मंदिर का आँगन गूँज उठा। कइयों ने घृणा और उपेक्षा से मुहँ भी बिचकाएँ किन्तु बाबा के लिए मार्ग बनता गया और वे मदिर में पहुँच गए। मन्दिर के पुजारियों में बाबा के विरोधी अधिक थे किन्तु महन्त जी उनका बड़ा आदर करते थे। कुछ दूर से ही उन्हें देखकर महन्त जी का मुख खिल उठा। बाबा सहारा लेकर बढ़ रहे थे किन्तु शकंर जी की मूर्ति को देखते हुए वे बड़े आनन्द- मग्न थे। दर्शन करते ही वे हाथ बढ़ाकर सस्वर काव्यपाठ करने लगे- 

“खायो कालकूटु, भयो अजर अमर तनु, भवनु मसानु गथ गाठरी गरद की॥ डमरू कपालु कर, भूपन कराल व्याल, बावरे बड़े को रीफ बाहन बरद की॥तुलसी बिसाल गोरे गात विलसति भूति, मानो हिमगिरि चुरु चाँदनीसरद की॥
ग्रंथ धर्म काम मोच्छ बसत बिलोकनि मे, कासी करामाति जोगी जागति मरद की॥

अपना दु:ख दरद आसपास के वातावरण को अतंर के उभरे भावावेश से रंगकर मानो सूर्य के प्रकाश में अन्धकार सा विलीन हो गया। दृष्टि के सम्मुख केवल विश्वनाथ थे और वह भी भाव सरिता के मस्त प्रवाह से बहकर अपना प्रत्यक्ष स्थापित रूप परिवर्तित कर चुके थे। भाव के दूध में उमंग रूपी चीनी जैसे जैसे घुलती गई वैसे वैसे ही आँखों का स्वाद बदलता चला गया। मूर्ति के स्थान पर जागते जोगी मरद की आकृति अपने आप उभरती ही चली गई। पिगंल वर्णी मस्तक पर जटाजूट से प्रवाहित पावन गगांजल, विशाल अरुणाभ नेत्रों की ज्योति की दमक, ललाट पर द्वितीया का, चन्द्र, भस्मीभूत, सर्पभूषित, दिगम्बर वेशधारी, परम कल्याणकारी शिव भोलानाथ गोसाईं बाबा की आँखों के आगे खड़े श्रंगी बजा रहे थे, जिसकी गूँज उनके रोम-रोम मे अद्भुत नाद जगा रही थी। अन्तमर्न के आखँ कानों से देखते-सुनते बाबा अपने में तन्मय हो गए थे। बाबा एक के बाद एक दो-तीन कवित्त सुनाते ही चले गए। सारा वातावरण बँधकर महाभावयुक्त हो गया। उनके विरोधियों के मन का लोहा तक उनकी भावाभिव्यक्ति के ताप से पिघलकर रस बन गया था।

“अहो ए ई शाला शोण्डो गोशाई ए बार फिर एशे देखे दी।”
लगभग साठ-पैसठ वर्ष के प्रकाण्ड तान्त्रिक पण्डित रविदत्त लाल वस्त्र पहने, लाल टीका लगाए, लाल-लाल आँखों से आग बरसाते हुए मन्दिर में प्रविष्ट हुए। महंत जी ने हाथ उठाकर उन्हें शान्त करना चाहा किन्तु रविदत्त जी का क्रोध उस समय और भी अनर्गल हो गया। वे बोले-“हामको आप चुप नही कोरने शकता मोहोत जी। हामको मा बोला जे तुलशीदा शोण्डो दगाबाज के दोण्ड दामो रोबीदत। ए बार आमि एइ दुष्ट के निशचोइ मारबों।” 
अपने कमंडलु से चुल्लू में जल लेकर - “ओम- ओम‌, आग्रच्छ-ग्रागच्छ, मारय-मारय”- मंत्र का पाठ जोर से आरम्भ करके फिर धीरे-धीरे होठों में बुदबुदाते हुए अंत में कर्कंश स्वाहा शब्द के साथ झटके से हाथ उठाकर बाबा पर जल छिड़कना चाहा, किन्तु पहले से ही सावधान राय ने छपाक से आगे बढ़कर उनके उठे हुए चुल्लू को ऐसा झटका दिया कि पानी स्वयं रविदत्त के मुख पर ही पड़ गया। अब तो रविदत्त के रोष का ठिकाना न रहा। साँप का विषदंत मानों उसके ही शरीर में संयोग से चुभ गया।महंत जी उठे, बाबा ने भी दृष्टि फेरकर देखा।
क्रमशः

Wednesday, 12 April 2023

tc35

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
35-

बेनीमाधव ने फूँककर चुल्लू से उसके अधखुले होठों में पानी डाला। पानी का स्पर्श पाते ही गर्दन थोड़ी हिली।राम-राम जपते हुए बेनीमाधव ने उसके मुँह पर पानी का एक हल्का सा छींटा दिया। युवती ने आँखें खोली।
“राम-राम जपो बिटिया”
गाड़ीवान और भगत जी का सहारा लिए हुए बाबा गाड़ी से उतरकर लँगड़ाते हुए इसी ओर आ रहे थे।
युवती ने बेनीमाधव से पूछा-“उइ मरि गए?” 
बेनीमाधव ने समझा कि युवती शत्रुओं के सम्बन्ध में पूछ रही है। प्रेम से आश्वासन दिया-“हाँ, बिटिया, अब तुम्हारा कोई भी शत्रु बाकी नही बचा। राम-राम जपो।”
युवती की आँखें मुँद गईं , हफँनी तेज हो गई।बाबा तब तक निकट पहुँच चुके थे। बेनीमाधव जी निरन्तर जोर-जोर से राम-नाम जप रहे थे। बाबा जब उसके सिरहाने पहुँचे तब उसके होठ फिर पानी के लिए बुदबुदाए। बेनीमाघव अपनी रामधुन में युवती के होंठों की हरकत पर ध्यान न दे पाए। रामू ने लोटें से एक चुल्लू जल लेकर उसके होंठों में डाला। पानी का स्पर्श पाते ही होंठ कुछ और खुले और पानी के गले से नीचे जाते ही आँखें भी एक बार खुलीं।बाबा को देखा, आँखें कुछ और ऊपर उठी, पेड़ पर लटकती लाश की पीठ दिखलाई दी। युवती बिलखी -“रा..रा.....जा..”
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा बोले-“सुख से जावो बेटी, तुम्हारा पति अमर गति पा गया। राम-राम भजो।”
युवती की आँखें बाबा को एकटक निहारते हुए ही थम गईं।उनकी ज्योति बुझ गई। बाबा बोले-“कलिकाल में यह आए दिन का खेल हो गया है। वीर थी वह स्त्री जिसने आतताइयों द्वारा अपवित्र होने से पहले ही अपनी हत्या कर ली। वीर था उसका पति भी जिसने अकेले ही इतने आदमियों को समाप्त कर दिया।”
“तब इस व्यक्ति को फाँसीं किसने दी होगी?”
“कुछ और सिपाही भी रहे होगें जो बदला लेकर चले गए। लेकिन उनकी स्वामिभक्ति देखो, अपने सरदार तक का शव ठिकाने नहीं लगा गए। वस्त्र मूल्यवान हैं किन्तु रत्नालंकार एक भी नहीं दिखलाई दे रहे है। दुष्ट उन्हें लेकर आगे बढ़ गए। वाह रे स्वार्थी दुनिया, अब मैं इन शवों की सद्गति हुए बिना आगे नही जाँऊगा। वेनीमाधव ! रामू। तनिक गाँव में जाकर दो-चार व्यक्तियों को बुला लो, बेटे। इन यवनों को धरती तथा इस वीर दम्पति को अग्नि के सुपुर्द किया जाए।”
भगत जी बोले- “अच्छा अब तुम तो चलकर गाड़ी पर बैठो, भइया ई कैंकरन और गिद्धन तें हम पंच जूझि लेब।”
गाड़ीवान बोला- “आप सब महात्मा लोग बराजिये, हम हियाँ खड़े हैं।”
गाड़ी पर बैठे हुए बाबा गम्भीर भाव से कहीं अदृश्य में देख रहे थे। 
भगत जी बोले-“हमार तो जनम बीत गवा इहिं सब कलिकाल के अत्याचारन का देखत देखत। मनुष्य के प्राणन का मानों कौनो मूल्य नाहीं रहा।”
बाबा बोले- “अकबरशाह के समय में थोड़ा-बहुत सुशासन आया था, अब वह भी समाप्त हो गया। शासक दिल्‍ली में रहता है। उसे नित्य हीरें, मोती, जवाहिर और सोना चाहिए। स्त्री और धन की लूट का नाम ही कलिकाल है। सारे पाप यहीं से आरभ होते हैं। हम जब पहली बार गुरु परमदेव के साथ यहाँ आए थे तब तो ओर भी बुरी दशा थी।”

पद्रह-बीस व्यक्ति रामू के साथ आ पहुचें। लाशों पर उचकती दृष्टि डाल कर पहले वे गाड़ी की ओर ही भागते हुए आए। रामू ने उन्हे बतला दिया था कि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज नें उन्हें बुलाया है। सबने गाड़ी को छूकर सिर नवाया।दो बुड्ढे भी साथ आए थे, उन्होंने सबसे कहा-“जाव- जाव, इन वीर पती-पतनी की चिता तैयार करो और दुष्टन सारेन को पड़ा रहै देव। खाय गिद्ध-कौवा।”
बाबा ने तुरत ही हाथ उठाकर कहा-“ना-ना, मनुष्य मनुष्य हैं। काया को सदगति मिलनी ही चाहिए।” 
बुड़्ढ़ा बोला- “अरे महाराज, हम तौ इनकी सद्गति करें और जो अभी इनके साथी संगी लौट आवें तो सब मिलके हमारी ही गति बना डालेंगे।”
“राम हैं, भइया, राम हैं। कभी होम करते हाथ जल अवश्य जाता है पर राम जी सबकी दया विचारतें हैं।”
बुड्ढ़ा बोला- “यह दुष्ट किसी की दया नही बिचारते।”
उत्तर सुनकर बाबा हल्की सी हँसी हँस कर बोले-"दुष्ट यह हो या वह, वे किसी की दया नहीं विचारते” 

काशी नगरी की सीमा में प्रवेश करते देखकर दूर से ही कुछ लोधियों ने उन्हें 'इधर आवा हो जजमान' कह कर ललकारना आरम्भ किया। दो पण्डे दौड़ते पास भी आ गए।गाड़ी में बाबा को बैठा हुआ देख कर एक प्रौढ़ पहलवान नुमा पण्डे ने घृणा से मुहँ बिचकाकर कहा-“अरे ई तौ  गुसैंया सरवा।”
रामू, बेनीमाधव आदि के चेहरों पर तमक आ गई, किन्तु बाबा खिल खिलाकर हँस पड़े। कहा-“हाँ रे, अब तुम्हारे यजमान करवत लेने के बजाय राम-नाम लिया करेगें।” 
“अरे तुम्हें भवानी खायै, अधर्मी, तोरे रोम-रोम मा एराम रमे।” बाबा ने पण्डे की गाली को अपने भाव से सह लिया और कहा-“राम कहा कर बचवा। इस शंकर जी की नगरी में भला काली गुण्डई का क्या काम हैं?”
“रे जा सारे। सबेरे सबेरे तुम्हार राम मुख देखकर हमार तो बोहनी बिगड़ गई।”-कहते हुए वे लौट गए। दूसरा युवक पग दो पग उसके साथ जाकर फिर लौटा और हाथ जोड़कर बाबा से कहा- “ई मंगली के कारण आप हम सबको सराप न दीजिएगा। महाराजौ, आप ऐसे महात्मा से कुबचन बोलकर जाने कौन से नरक में ठिकाना मिलेगा इस नीच को। बाकी हमें आप क्षमा कर दीजिए।” 
वो करवत का वह कटुमापी पण्डा अपनी जगह से ही चिल्लाया-“अबेआता है कि नहीं। सारे, जिजमान न मिला तो तुझें ही ले जाके करवत दे दूँगा और तेरी बिटिया-मेहरुआ को बेचकर अपने दक्षिणा के पैसे वसूल कर लूगाँ।” 
दूसरा  पंडा उसकी ओर बढ़ते हुए चिल्लाकर बोला- अरे, जा-जा, तेरे बाप-दादे सात पीढ़ी तक के आयें तो भी हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।”
दोनों पण्डे आपस में गाली-गलौज करते हुए तेजी से दौड़ पड़े और बाबा की गाड़ी भी उन्हीं के पीछे पीछे धीरे धीरे बढ़ती गई। गंगा और अस्सी के संगम पर घाट के ऊपर एक पक्‍की इमारत बनी थी। उसके पहले एक अखाड़ा भी था जिसके ऊपर छप्पर छाया हुआ था।
क्रमशः

Tuesday, 11 April 2023

tc34

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
34-

शाम को दर्शन के लिए पधारी हुई रानियों, सेठानियों को भी उपदेश दिया। रात मे केवल तनिक सा दूध साबुदाना लेकर ही रह गए। 
अगली रात भी सूनी ही गई, शक्ति  न आई। बाबा अपने आप से बड़े दु:खी थे। मैंने पार्वती अम्मा का आग्रह क्‍यों किया? श्रीचरण भक्ति छोड़कर मैंने और कुछ क्यों चाहा ? सेवक को भला क्या अधिकार है कि वह अपने स्वामी से किसी वस्तु की माँग करे। स्वामी की जो मर्जी होगी वही मिलेगा। तुलसी जो बात स्वयं तूने अपने से तथा दूसरों से बारबार कही है, उसी जाने समझे सत्य को नकार कर तूने अपने प्रभु को क्यों अप्रसन्‍न किया। मन का अवसाद काव्य-तरंगो मे लहराने लगा-

“जानि पहिचानि मैं बिसारे हो कृपानिधान एती मान ढीठ हौं उलिटि देत खोरि हो। 
करत जतन जासों जोरिवें' को जोगी जन तासों क्यों जुरी, 
सो अभागो बैठो तोरि हो। 
मोसो दोस कोस को भुवन क़ोस दूसरो न आपनी,
समु किन सुक्ति आयो ठकटोरि हौ। गाड़ी के स्वान की नाई, माया मोह की बड़ाई 
छितहिं तजत छिन भजत्त बहोरि हो।

मन की ग्लानि उमड़ती ही गई - “हे प्रभु, मैं आपके सुनाम की करोड़ों कसमें खाकर अब तो यही कहूँगा, मुझ जैसे लवार, लालची और प्रपंची को अपने द्वार से दूर फेंकवा दीजिए, नहीं तो मैं कही इस सुधा सलिल के समान चमकते हुए आपके पवित्र द्वार पथ को सूकरी की भाति गन्दा कर दूगाँ। हे प्रभु, सत्य कहता हूँ , अब मुझें इस धरती से उठा लीजिए। अब जीने की लालसा नहीं और यदि आपने ढील दे दी, मैं जीवित रह गया तो आपके सुयश् को अपने पातकों से मैं निश्चय ही कही गहरे में डुबो दूगाँ।” 
अपने को प्रभु से दण्ड दिलाने की तीव्र चिढ़ भरी इच्छा करते करते बाबा की आँखों से गंगा-जमुना बह चली। उनके शब्दों को मन में दोहराते हुए अश्रु-विगलित स्वर के प्रभाव से रामू भी बिलख-बिलख कर रो पडा़। बाबा के दोनों जाँघों में कई दिनों से गिल्टियाँ निकल आई हैं। उनमें से दो अब पक भी चलीं हैं। पीड़ा भोगते हुए बाबा के मन में बार-बार आया कि जागी किंतु रूठी हुई शक्ति के कोप के कारण ही उनकी काया पर यह विकृत प्रभाव पड़ा है, किन्तु राजा भगत, संत वेनीमाधव जी तथा रोज आने जाने वालों में से कई अनुभवी लोगों का यह विचार था कि बलतोड़ के फोड़े हैं। कई लोग रामू को दोष देते थे कि उसने मालिश करने में असावधानी बरती।वह बेचारा सुन कर लज्जित हो जाता था। रामू पिछले दस-बारह वर्षों से बाबा की मालिश करता आया है। अपनी प्रबल श्रद्धा एवं सेवा-भाव के कारण उसने मालिश की विद्या को अब ऐसी बना लिया है कि बाबा परम प्रसन्न होते हैं। उसने श्रपनी जानकारी में ऐसी रगड़ नहीं की कि बाबा के बलतोड़ हो जाते, वह भी एक-दो नही चार पाँच, फिर भी जब बडे़ बुजुर्ग कहते है तो कदाचित्‌ उससे चूक हो गई हो। बाबा इन दिनों अधिक बातें नही किया करते थे। वे प्राय: उपदेश ही दिया करते थे, किन्तु अब कथा के समय को छोड़कर बाकी समय “राम कहो' अथवा 'रामराम जपो' से बड़ा वाक्य नहीं कहते थे।एक ओर वे अपने तन की पीड़ा तथा दूसरी ओर आशा और प्रार्थना को अनवरत सहते हुए अन्तर्लीन ही रहा करते थे। चित्रकूट में सभी लोग बाबा के इस परिवर्तन से चकित थे। भादों मास के शुक्लपक्ष की नवमी को रामचरित मानस का पाठ पूरा हुआ।अन्तिम दिन आरती में डेढ़ हजार रुपयों से कुछ अधिक ही रकम चढी़। बाबा ने चित्रकूट के आदिवासियों और भिखारियों की टूटी झोंपड़ियों को छवाने और उन्हें आगामी सर्दी के कपड़े दिलाने के लिए दान कर दी।
इसके बाद ही बाबा बोले -“अब हम काशी जी जायंगें। गंगामैया की याद आ रही है।बाबा विश्वनाथ बुलाते हैं।”

त्रयोदशी के दिन बाबा ने चित्रकूट से प्रस्थान किया। हजारों जन उन्हे सीमा तक छोड़ने के लिए आए।एक छोटी बैलगाड़ी पर उनकी यात्रा के लिए व्यवस्था की गई थी। विदा का दृश्य बड़ा मार्मिक था। चित्रकूट वाले बाबा को सब अपना ही समझते थे। सबको ऐसा लग रहा था मानों परिवार का बड़ा बूढ़ा अपने अन्तकाल में गृह त्यागकर काशी लाभ करने जा रहा हो।अधिकतर लोगों के मन से यह पुकार उठ रही थी कि बाबा का यह अन्तिम दर्शन हैं। भगवान अपने परम भक्‍त को भाव-भीनी विदाई दे रहे थे।क्षितिज पर काशी दिखलाई पड़ने लगी। गंगा दूर से रुपहली गोटे की पट्टी जैसी चमक रही थी। देखते ही बाबा आत्मविभोर हो गए। गंगा की ओर हाथ बढ़ाकर मस्ती में कविता फूट पड़ी -

“देवनदी कहें जो जन जान किए मनसा, कुल कोरि उधारे। 
देखि चले भंगरे सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सँवारें। 
पूजा को साजुँ विरंचि रचे तुलसी, जे महातम जाननिहारे।
श्लोक की नींव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे।”

गाड़ी ज्यों ही कुछ और आगे बढ़ी त्यों ही सबको सामने वाले पेड़ पर एक शव लटकता हुआ दिखलाई दिया।रामू बोला- “लगता है किसी को फाँसी दी गई है।”
और आगे बढ़ने पर सारा दृश्य स्पष्ट रूप से दिखलाई देने लगा। तीन सिपाही वेषधारी और एक मूल्यवान वेषधारी सरदार की लाशें पड़ी थीं। उनसे कुछ हटकर लहू के ताल में डूबी एक स्त्री की लाश थी। फाँसी पर लटका हुआ शव भी जगह जगह से रक्तरंजित था। कौवे वृक्ष पर काँव -कावँ मचा रहे थे और कुत्ते लाशों से जूझ रहे थे। आकाश पर कहीं से उड़कर आते हुए गिद्धों का छोटा सा झुण्ड भी दिखलाई दे रहा था। दृश्य देखकर हर एक का मन भारी हो गया था। गाड़ी लाशों से जरा सरकाकर निकाली जाने लगी। बाबा अत्यन्त करुण स्वर में निरन्तर राम-राम जपने लगे। गाड़ी स्त्री के शव से जरा आगे ही निकली थी कि बाबा तनिक हड़बड़ाकर बोले-“गाड़ी रोक दो। रामू, यह लड़की पानी माँग रही है। अभी मरी नहीं है।” कहने भर की देर थी कि रामू चट से गाड़ी पर से कूद पड़ा और उस स्त्री के सिरहाने के पास पहुँचा। सचमुच वह पानी माँग रह थी। तब बेनीमाधव लोटा लिए पास आ गए।
“पानी पानी है”-
कराहता हुआ धीमा स्वर दोनों के कानों में पड़ रहा था।
क्रमशः

158 last

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