महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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फिर भी मन का ग्लानि प्रवाह अभी पूरी तरह से थम नहीं पाया था। कहने लगे-“मुझे जाने दो, गंगा।”
“पर, पर कहाँ जाओगे? अच्छा चलो, कहीं एकान्त में चलें। यहाँ कोई देख लेगा तो क्या कहेगा? सभी तो पहचानते हैं ” - गंगाराम ने उनका हाथ पकड़ कर कहा- “आँसू पोंछों और सावधान होकर हमारे साथ चलो। आज तुम्हें हो क्या गया है ?”
मित्र के आग्रह से बंधे हुए तुलसी ऐसे चल पड़े जैसे किसी का नटखट पालतू बछड़ा रस्सी मे बंधा हुआ उसके साथ खिंचा चला जा रहा हो। गंगा-तट पर पहुँच कर दोनों मित्र नाव पर सवार हुए और उस पार पहुँच गए। निर्जन एकान्त में तुलसी ने मित्र के आगे अपना मन पूरी तरह से खोलकर रख दिया। बड़ी देर तक तुलसी अपना मन सुना-सुना कर हल्का करते रहे और गंगाराम गंभीर भाव से सुनते रहे। फिर अकस्मात उँगली से बालू पर कुछ अंक लिखे, हिसाब फैलाया और कहा- “विषय चिंतनीय नही है मित्र। अपने उस दिन के शुभ शकुनों को ध्यान करो जिस दिन तुम इस मिथ्या मोहपाश से नियति के द्वारा जकड़े गए थे | तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है।”
गंगाराम के मिथ्या मोह कहते ही तुलसी के मन को घक्का लगा। जिस पाप-पंक को वह अभी स्वयं ही अपने मुख से नकार रहे थे उसे ही उनका अहंकार जोर-जोर से सकारने लगा।हृदय की धड़कन में सहसा ध्वनि गूंजी -'राम राम राम’ -तुलसी एक क्षण के लिए निस्तब्ध हुए, हतप्रभ हुए, फिर आँखें भर आईं। उन्होंने देखा कि श्रीराम के संकेत पर हनुमान जी उनकी हृदयहारिणी को निर्मम भाव से झोंटे से पकड़कर बाहर निकाल रहे हैं और विवश विरही तुलसी प्रभु के आगे कुछ कहने का साहस न करके चुपचाप खड़े चौधार आँसू बहा रहे हैं। प्राण गूजतें हैं, 'क्या चाहते हो ? मोहिनी या राम ? मोहिनी या राम ?” तुलसी विकल होते हैं, “राम को कदापि नहीं छोड़ूँगा” अपने प्रवलतम मनोंद्वद्व को खोई हुई दृष्टि से निहारता हुआ रामबोला काठ के पुतले सा बैठा रहा।
कुछ दिनों तक तुलसी के मन, कर्म और वचन त्रिशंकु की तरह आठों याम अधर ही में लटके रहे।तन सूखकर काँटा होने लगा।आँखें ऐसे डोला करती जैसे उन्हें किसी खोई हुई वस्तु की तलाश हो। गुरू पत्नी पूछती -“तुझे क्या हो गया है रे रामबोला? दिनोंदिन सूखता चला जा रहा है।” उत्तर में- “कुछ नही, आईया।” कहकर वह आँसुओं को अपनी आँखों में आने से रोकने का प्रयत्न करने लगते। कुछ सहपाठी उनके मुख पर और पीठ पीछे भी- प्रमाण सहित यह कहते नहीं थकते थे कि वटेश्वर मिश्र ने तुलसी पर उच्चाटन मंत्र का प्रयोग किया है। कुछ ही दिनों में यह बावले होकर गली-गली डोलेंगे। मामाजी का यह विचार और भी दृढ़ हो गया था कि इसे मेघा भगत का छुतहा रोग लग गया है। उन्होंने अपनी बहन से कई बार कहा कि इसका विवाह हो जाना चाहिए मैंने लड़की ठीक कर ली है। इसे घर भी मिलेगा और धन-सम्पत्ति से भी हैसियत बढ़ेगी। जीजी, तुम जीजा जी से कहो कि इसे विवाह करने की आज्ञा दें। शेष गुरू जी की पत्नी ने अपने पति से इस संबंध में चर्चा भी चलाई। वे बोले- “खिलती कली को तोड़ कर हार में गूँथना बुद्धिमत्ता नहीं होती। अभी इसका अंत:सौंर्दय विकसित होने दो।”
तुलसी के अनन्य साथी गंगाराम ने ज्योतिष से विचार करके एक दिन तुलसी से कहा- “मित्र, तुम्हारे जीवन में एक विराट परिवर्तन आनेवाला है। तुम निश्चय ही अपनी इष्ट वस्तु को प्राप्त करोगे।”
“इष्ट वस्तु ! क्या सचमुच ही मुझे मोहिनी मिल जाएगी?” - रे पगले झूठा मोह क्यों करता है? वह हाकिम की प्राणवल्लभा, सुख से सोने की सेज पर सोती है। हीरे-जवाहरातों से मढ़ी है। वह तेरे जैसे दीन-हीन भिक्षुक के पास भला क्यों आने लगी? नहीं -नहीं , वह मेरी प्राणवल्लभा है। असुर कोतवाल, अनाचार करके उसे अपने बंधन में बाँधे हुए है। वह मुझे मिलेगी। जिसका जिस पर सत्य स्नेह होता है वह उसे अवश्य मिलता है, इसमे तनिक भी संदेह नही।”तुलसी दिन-रात ऐसी बातें सोचा करते। कभी अंतश्चेतना भड़कती सदमार्ग प्रदान करती, “क्या यही है तेरी इष्ट वस्तु ? छि तू रहा भिखारी का भिखारी ही। जनम-भर जूठन खाता रहा और अब जबकि सोने के थाल में छप्पन भोग तेरे सामने आए हैं तब भी तू अभागा जूठी पत्तल की ओर ही ताक रहा है। घिक् तेरा जीवन, घिक् तेरे संस्कार ! तू डूबकर मर क्यों नही जाता रामबोला?
आत्महत्या का विचार उनके मन में रह-रहकर बादलों का घटा टोप बन- कर छाने लगा। मोहिनी को देखे दस दिन बीत चुके थे। वह मेघा भगत के यहाँ जानबूझ कर नही गए थे।उन्हें पूरा विश्वास था कि भगत जी उनके मन की बात जान गए हैं।
दो-तीन दिनों के बाद मामा जी के आदेशानुसार इच्छा न होते हुए भी तुलसी को एक निमंत्रण में जाना पड़ा। मार्ग में कैलास से भेंट हो गई।उनसे पता चला कि मेघा भगत इस नगर को छोड़ कर अचानक अयोध्या चले गए हैं। तुलसी को इस सूचना से अपार शांति मिली, यद्यपि इस शांति की तह दर तह में मोहिनी की याद का भूत अब तक लिपटा हुआ था।एक महीने से ऊपर दिन बीत गए।तुलसी के मन की हलचल अब प्रायः थम चुकी थी। मन अभी बहला नही था पर चुप अवश्य हो गया था।
गुरू जी के घर के पास ही रहनेवाले सोमेशवर उपाध्याय नामक एक घनाढ्य और प्रतिष्ठित ब्राह्मण के घर पर पौत्र-जन्म की खुशी में एक प्रीतिभोज और गायन का प्रबंध हुआ। पीपलवाली गली में मंडप सजाया गया। तोशक-तकिये लगे, चहचहाते पंछियो के पिंजरे टाँगे गए, बड़ी सजावट हुई। शाम से ही सुनने में आ रहा था कि कोतवाल साहब स्वयं पधारेंगे और उनकी रखैल मोहिनी बाई का गाना होगा। खबर सुनकर तुलसी घक् से रह गए। महीने भर के सारे ब्रत नियम बालू की दीवार से ढह गए। मेघा भगत उन्हें धिक्कारेगें। गुरू जी महाराज सुनेगें तो उन्हें कितना कष्ट होगा।आईया जी को कितना कप्ट होगा। बजरंगबली धिक्कारेंगे, राम जी सदा के लिए विमुख हो जाएगें आदि बातों से चेताकर साधा गया मन इस सूचना से क्षण-मात्र में फुर हो गया।
क्रमशः