महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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उस संन्यासिनी के पास सुना है कि एक हंडिया भरके सोने की अशफियाँ हैं। वह अधेड़ संन्यासिनी विलासिनी और महाकंजूस है। उसने इसके जैसे दो-तीन बटुक प्रेमी पाल रखे हैं। उनकी दक्षिणा की सारी राशि वही छीन लेती है और सबको ही लालच देती है कि जिसकी सेवा से मैं अधिक संतुष्ट होऊँगी उसीको अशफियाँ दे दूगी।”
तुलसीदास ठठाकर हँस पड़े, कहा-“माया महा ठगनि मैं जानी। कबीर साहब सत्य ही कह गए हैं। पर यह मेघा भगत कौन है गंगाराम? आजकल बड़ा माहात्म्य सुनाई पड़ता है इनका।” गंगाराम बोले- “भाई, मैंने स्वयं तो उन्हें देखा नहीं है, पर सुना अवश्य है कि बढ़े काव्य-मर्मज्ञ हैं और मेधावी छात्र थे। कहते है कुछ महीनों पहले अयोध्या में इन्हें चैतन्य महाप्रभु के समान ही अचानक आनंद का दौरा पड़ा। कहते हैं उस समय वाल्मीकीय रामायण का कोई प्रसंग पढ़ रहें थे । बस तब से राममय हो रहे हैं। सस्वर भजन सुनकर प्रसन्न होते है, उन्हीं के सबंध में प्रवचन करते हैं।आठों पहर रामदीवाने बने रहते हैं। कहते है कि उनकी वाणी पर माँ विराजती है। किसी को यदि वे वरदान दे देते हैं तो वह अवश्य पूरा होता है।”
सुनकर तुलसी के मन में मेघा भगत के प्रति कौतुहल जागा और स्पर्धा भी। मन कहने लगा, में भी ऐसा राम-राम जपूँ कि सारी दुनिया ऐसे ही मुझे भी देखे। होड़ लेने की इस इच्छा के साथ ही साथ नई उमर की बेताबी ने उनके भीतर डाह भी जगाई। सोचने लगे कि अब उसकी राम-भक्ति में कोई कमी तो है नही। वह अपने आस-पास की सारी दुनिया को दिन-रात देखा करते है, पर कोई भी उन्हें अपने समान राम-प्रेमी अब तक मिला नही है। मुँह से झूठ-मूठ 'राम-राम, शिव-शिव' कह लेने से कहीं भला भक्तिभाव जागता है? फिर अपने घमंड पर ध्यान गया, मन को डाँटा - “धत् तेरे की राममभगतवा झूठ-मूठ ही खिलवाड़ करता है। अभी देखेंगे कि मेघा जी का भक्तिभाव कितना गहरा है।”
सेठ जी की हवेली के एक बड़े कमरे में भीड़ भरी थी। तुलसी झाँकने लगे। कुछ हुआ है, सब लोग बीच ही में क्यों झुके हैं।पता लगा कि भक्तवर को मूर्च्छा आ गई। केवड़ाजल के छीटे दिए जा रहे थे। दो व्यक्ति अपने-अपने अगोछों से हवा कर रहे थे। तुलसी अपनी उत्सुकतावश उस छोटी भीड़ मे घुसकर मेघा भगत के पास तक तो अवश्य पहुँच गए परतु हवा डुलाने वाले अगौछों के कारण उन्हें युवा भगत जी का चेहरा दिखलाई नही पड़ रहा था। उनका मन अगौंछा झलनें वालों पर झुँझला उठा।गरदन कभी दाहिनी ओर झुकाई, कभी बाँई ओर। कभी एड़िया उचकाकर तथा आगे की ओर अधिक झुरकर देखा। हल्की ललाईं लिए गोरा वर्ण भर भूरे वालों वाले मुखमंडल की सुन्दरता कुछ-कुछ झलकी। तभी भगत का शरीर हिला। अगौछें का झला जाना बंद हुआ। भगत जो अब तक बाँई करवट से पड़े हुए थे अब चित हो गए। छोटी-सी दाढ़ी वाला लम्बा चेहरा अपनी सारी पीड़ा के बावजूद बड़ा तेजस्वी और शातं था। तुलसी उस चेहरे को अपलक दृष्टि से निहारते रहे, मन बार-बार भाषता रहा और अपने- आप से यह कहता भी रहा कि मूच्छित व्यक्ति सचमुच भक्त अवश्य है। मूर्छा टूटी। आँखें खुलीं।मेघा भगत उठने का उपक्रम करने लगे तो भक्तों ने उन्हें सहारा देकर बैठा दिया। तुलसी अपनी दृष्टि से उस चेहरे को पीने लगे। कैसी आत्मलीन दृष्टि हैं इनकी।देख सामने रहे हैं पर ऐसा लगता है कि मानों वे यहाँ नही बल्कि काले कोसों दूर-किसी ऐसी वस्तु को देख रहें हैं जो दूसरों को नहीं दिखलाई देती। क्या यह भगत की अभिनय मुद्रा है ? तभी तुलसी ने देखा कि मेघा भगत की आखें कील-सी भर आई है और उनके होंठ कुछ बुदबुदा रहे हैं। वे बड़ी छटपटाहट के साथ अपने दाँयें-बाँयें देखने लगते हैं मानों उन्हें किसी चीज की तलाश हो। एक बूढ़े से व्यक्ति ने पूछा-“क्या चाहिए राज?”
“कुछ नही, क्या चाहता हूँ, कैसे बतलाऊँ? राजमहलों में रहनेवाले सैकड़ों दास-दासियों से सेवित राजकुमार वन की कंकड़ काटों भरी राह पर चले जा रहे हैं, पर मैं कुछ भी नही कर सकता,नि:सहाय।जिनकी इच्छाओं का पालन पर सैकड़ों दास-दासियाँ सदा हाथ बाँघे खड़े रहते थे, बड़े बड़े
सेठ-साहुकार और राजे-सांमत जिनकी कृपादृष्टि के प्यासे बने सदा उत्सुक नेत्रों से उनकी ओर देखा करते थे।उनसे इस गहन वन में कोई यह भी पूछने वाला नहीं कि नाथ, आपको क्या चाहिए ?”
मेघा भगत रोने लगे। कुछ थमे तो फिर कहना शुरू किया। सीता जी के थके- काँपते लड़खड़ाते पैरों का करुण वर्णन, उनकी प्यास जनित व्याकुलता, उनका बार-बार पूछना कि है स्वामी अब वन कितनी दूर है, कुटी कहाँ छवाई जायगी, इत्यादि बातों की कल्पना कर करके मेघा भगत घारों धार रो पड़ते हैं। उनका कंठ भर आता है और वे दुख की सजीव मूर्ति बने ऐसे विवश हो जाते है कि उनसे बोलते भी नहीं बनता।इस कमरे में ऐसा कोई नहीं जिसकी आँखों से गंगा-जमुना न वह चली हो। सभी रो रहे हैं। उनके साथियों मे गंगाराम और नंददास भी आँसू बहा रहे हैं, लेकिन तुलसी की आँखों में पानी क्या सीलन तक नही है। मन की गुफा गूँजती है, देखा यह है राम-भक्ति, तुलसी अपराधी से फुँक जाते हैं। दृष्टि पालथी पर रखी हथेलियों पर सघकर अनर्तमुखी हो जाती है।मन मानों एक गुफा है जिसमे सिर भुकाए खड़े हुए तुलसी एक ओर जहाँ अपराध भावना से सिहरते है वहाँ दूसरी ओर इच्छा की तीव्रता से भी काँप - काँप उठते हैं- “हे राम जी, मेरे मन में भी आपके प्रति ऐसी ही चाहना है। भले ही मेरी आंखों से इस समय आँसू न बह रहे हों पर मेरा कलेजा आठों याम आपके लिए ऐसे ही तड़पता है।” यह कहते हुए मन यह भी अनुभव कर रहा था कि उसका स्थूल रूप अब भी उसी तरह भावशून्य पत्थर बना हुआ है जैसा कि अभी तक था। उसमें किसी भी प्रकार का करुण स्पंदन नहीं है।इस समय न सही, पर क्या मेरे हृदय में राम जी के प्रति ऐसा विरह भाव कभी नहीं जागता? जागता है.... जागता है।
क्रमशः
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