महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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“मामा, सारी बातें अपने इस भानजे के ही ऊपर छोड़ दीजिए। मैं आपके लिए विजया का गोला भी पीसकर ले आया हूँ। यह लीजिए, यह भागँ, यह बादाम और यह रही केसर की पुड़िया और दूध के पैसे .....”
“रहने दे, रहने दे, दूध तो घर में बहुत है।अच्छा तो हम सबको लेकर समय से पहुँच जायेगें।”
निमंत्रण के दिन छात्र वर्ग में एक विशेष आनद की लहर दौड़ जाया करती थी। कुछ बातूनी विद्याथियों के लिए तो न्यौता पाकर जीमने से पहले तक का समय निमंत्रणकर्ता की हैसियत का अनुमान लगाकर उस हिसाब से मिठाई, पकवानों और तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यजनों की कल्पना करने में बीतता था। न्यौता के पहले मुहँ से लार टपकाना और उसके बाद संतोष से डकारे ले-लेकर भोजन का रसालाचन करने में ही वे अपने ज्ञान की चरम सिद्धि मानते थे।
इनकी भीड़ से अलग बड़े आँगन के एक दूर कोने में तुलसी और गंगाराम एक गम्भीर विचार में लीन थे। तुलसीदास कह रहे थे- “गंगाराम, आज बड़े भोरहरे ही मैंने पहले नीलकठ के दर्शन किए और फिर संयोग से एक चकवे को भी देखा।यों तो इस घर में न्योले प्राय: ही देखने को मिल जाया करते है, फिर भी संयोग की बात है कि आज मैनें उसे भी बार बार देखा। बोलो, इन सबका अर्थ क्या हुआ?”
गंगाराम अपने पालथी पे दोनों पैरों के तलवों को अपने दोनों हाथों से मस्ती में मींजते हुए मुस्कराकर बोले- “फिर क्या है, आनंद ही आंनद है।”
तुलसी को उत्तर से अधिक संतोष नहीं हुआ। वह स्वयं हो विचार करते हुए बोले- “शुभ शकुन तो है ही, किंतु जब अलग-अलग विचार करके तीनों को एक चित्र मे बाँधता हूँ तो अर्थ निकलता है कि नीलकंठ विष को पचाने वाला है, चकवा विरही है नकुल सर्प संहारक हैं। सब मिलाकर अर्थ यह हुआ कि आज का दिन मेरे लिए संघर्ष करने, विष पीने ओर पचाने तथा विरह ज्वाला में दहकने का दिन है। फिर शुभ कहाँ हुआ?”
गंगाराम मस्ती में थे। मित्र को झिड़कते हुए कहा- “तुम कवि लोग अपनी कल्पनाशीलता में अति पर पहुँच जाते हो। यह शकुन शुभ न होते तो पुराने ज्योतिषाचार्य लोग क्या यों ही इन्हें गिना जाते।”
उस समय घोड़ू फाटक नाम का एक छात्र आया और बड़े उत्साह से बोला--“अहो तुलसी जी, शुभ सूचना सुनी काय?”
“कौन सी ?”
“दूधविनायक पर मेघा भगत का भंडारा। म्हणजे किसी धनी ने अनेक प्रकार थे मिष्ठान आदि नाना प्रकार के बररस व्यँजन जिमाने का उत्साह दिखलाया है। हाँ , जरा हमारा प्रश्न विचारों तो सही गंगाराम भैया, कि मिठाइयों में कौन कौन सी वस्तुएँ हो सकती हैं?”
गंगाराम मुस्कराए, बोले- “घोड्या फाटक, अभी ज्योतिष ज्ञानरूपी किले के मिठाई वाले फाटक में मेरा प्रवेश नही हुआ है। रामबोला से पूछो इनकी जिभ्या से राम बोलते हैं।”
“खबर आई है। तब भी विसरलोच हो तो। तुलसी भैया, हमारा प्रश्न तो तुम्हीं विचारो। छात्र मंडल में तुम्हारे विचारन से चाँगला प्रभाव पड़ेगा। विचारो, झटपट। हमको चौक जाना है।”
तुलसी उस समय अपने ही जुताड़ में थे, बोले- “घोडू फाटक और चाहे जो व्यँजन हों, पर तुम्हारे महाराष्ट्र के वह लक्कड़तोड़ दतं-भंजक लड्डू कदापि नही होगें, इतना में तुम्ह विश्वास दिलाता हूं। अच्छा अब स्वाद चर्चा यहीं समाप्त करो”
फाटक चिढ़ गया, बोला-“तुम रसहीनों को, सच पूछा जाए तो भोजन कराना ही पाप है।”
“अरे हमारो रोटी-दाल को तो पुण्य बना रहने दो भैया।” गंगाराम ने विनोद में गिड़ागड़ाने का स्वाग किया।
“तको । तुम्हो ज्ञानाचों रोटी आणि ज्ञानाची डाल खाओ। अरे स्वाद-चर्चा ब्रह्म-चर्चा से तोल में कदापि कम नहीं बैठती महाराज, समझते क्या हो? और एक तरह से देखिए तो स्वाद-सुख रति-सुख और ब्रह्म-सुख, इन तीनों प्रकार के सुखों में स्वाद-सुख ही मानव के साथ जन्मता और मरता है। बाकी दोनों सुख तो यहीं के यहीं पड़े रह जाते हैं।”
“हूँ”- गंगाराम ने गम्भीरता का ढोंग करते हुए कहा- “यथार्थ हैं कितु सतमार्ग पर निकल भागने वाले मनुष्य के मगज में यह गूढ़ सत्य कभी समा ही नही पाता। मैं भी तुलसी को समझा समझाकर हार चुका हूँ।”
“अच्छा चलूँ , पाचक ले आँऊ। मैं सदा थोड़ा अधिक ही ले आता हूँ। गंगाराम भैया, जिस किसी कों आवश्यकता हो वह दस कौड़ी पर हमसे पाचक खरीद सकता है।”
गंगाराम बोले- “तब तो तुलसी के कारण तुम्हे अवश्य घाटा होगा, फाटक। इन्होंने हाल ही में ढे़र सारा लवणभास्कर चूर्ण बनाकर रखा है।”
“बेचने के लिए ”
“नहीं, भोजन भट्टों को दान करके पुण्य कमाएगे।”
घोड़ू फाटक तुलसी को गंभीर रहस्यभेदी दृष्टि से घूरने लगा। फिर एकाएक गिड़गिड़ाहट वाली मुद्रा में आ गया और कहने लगा- “अरे भैया, हमारी द्रव्यहानि काहे कराते हो? थोड़ा-बहुत यही सब करके मैं अपना खर्चा पानी निकाल लेता हूँ।”
तुलसी बोले- “खर्चें-पानी के लिए तुम्हें विशेष द्रव्य आवश्यकता ही क्यों होती है घोड़ू?”
अर्थ-भरी दृष्टि से फाटक को देखकर गंगाराम बड़ी जोर से खिलखिला कर हँस पड़े, कहा- “तुम समझते नही तुलसी, दशाश्वमेव पर एक घोबिन से यह अपनी धुलाई कराने लगे हैं। धुलाई के पैसे भी देनें पड़ते हैं न। तुलसी ने घृणा से नाक-भौ सिकोड़ी और कहा- “विद्यार्थी जीवन में यह सब।”
फाटक ताव खा गया, बोला-- “बस बस, ज्यादा ज्ञान मेंरे आगे न बधारना। तुलसी भैया, काशी मधे दोनों पंडित, मी आणि माझा भाऊ। शास्त्रार्थ में सबको हरा सकता हूँ।”
“हमारे सामने सिंह की तरह दहाड़ने का स्वागँ मत करो फाटक। अभी परसों-नरसों जब तुम्हारी संन्यासिनी प्रिया तुम्हारे कान उमेठ रही थी .....”
“भैया गंगाराम जी, मैं तुम्हें और तुलसी भैया को, यह लो साष्टांग दडवत् किए लेता हूँ , यह लो नाक भी रगड़ता हूँ। यह बात किसी से मत कहना। पिता जी आजकल मेरे विवाह की बात चला रहे हैं।व्यर्थ में मेरी बदनामी फैल जायगी। अच्छा तो चलूँ , पाचक ले आँऊ। मोहन भोग, श्रीखंड और देखो क्या-क्या उत्तम सामग्री मिलती है। विश्वनाथ बाबा मेघा भगत की भक्ति, उसके यजमान के धन में बढ़ोत्तरी करें। नित्य ब्रह्मभोज हो।”
फाटक के जाने के बाद तुलसी बोले-“यों तो भोजन भट्ट है, पर है बड़ा
निष्कपट।”
गंगाराम बोले- “घाघ है घाघ। बस देखने में ही भोला-भाला लगता है।
क्रमशः
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