Thursday, 20 April 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
43-

अन्त फजीहत होहिंगें गनिका के से पूत॥ 
सेये सीताराम नहिं, भजे न सकर गौरि।जनम गँवायो वादिही, परत पराई पौरि।”

फिर वाहवाही का भ्रँमर गुँजन हुआ। कवि कैलास की छोटी पुड़िया खुल चुकी थी। एक चुटकी तमाकू उठाकर अपने मुँह मे डालते हुए वे बोले- “जोतसी जी, अब तमाल पत्र छोड़ो, ये खाया करो तम्बाकू।”
प० गंगाराम मुस्कराए, बोले- “हम केवड़ा डालके ये सुरती खाते हैँ कविवर।फिरंगी अच्छी वस्तु लाए। सुना रहा कि पहले कोई एक फिरंगी आयके अकबर बादशाह को नजर किहिसि और अब तो हमारे देखते-देखते पिछले बीस बाईस वर्षों मे इस विश्वनाथपुरी में बस सुरती ही सुरती छाय गई है। बाकी तमालपत्र चूर्ण को स्वास्थ्य की दृष्टि से हम अव भी इससे श्रेष्ठ मानते हैं।” बातचीत हल्के लौकिक रंग पर उतर आई थी। एक गम्भीर प्रसँग के बाद दूसरा उठने के बीच मे विनोद की लहर पट-परिवर्तन के रूप मे सुसाहिबी कला का विशिष्ट गुण बनकर आ ही जाती है।

बाबा बड़ी देर से बाहरी प्रसँगों से अलग अपने मन की गुफा मे बैठे थे। प्रशँसा, प्रशँसा और प्रशँसा। लोगों के जाने के बाद सन्नाटा होने पर भी बाबा के मन से प्रशँसा का हिमालय न उतरा। वह बोझ उन्हें भारी लग रहा था। अपने दैनिक काम काज करते हुए भी वे प्रायः गुमसुम ही रहे। भोजनोपरान्त बेनीमावव जी ने पूछा- “आप उदास हैं गुरू जी। कोई बात मन को मथ रही है कदाचित?” बाबा हँसे - “हाँ , मन्मथ की बातें मथ रही हैं। दिन में जब तुम सब मेरी प्रशँसा के पुल बाँध रहे थे तब मेरे मनोलोक में आकर अहंत्ता मुझसे पूछ रही थी- “भूत से जीते पर क्या अपने गुरु से भी जीत सके?” 
मैनें सोचा, बेनीमाधव के मनोसंघर्ष को मेरे प्रथम नारी-आकर्षण का अनुभव कदाचित्‌ प्रेरणादायक सिद्ध हो सके। लो सुनाता हूँ।
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शेष सनातन महाराज की वही पाठ शाला, वही सारा वातावरण। अन्तर केवल इतना ही हो गया था कि अब रामबोला तुलसीदास शास्त्री हो गया था। उसकी आयु अब तेईस-चौबीस के लगभग पहुच चुकीं थी। छोटी सी दाढ़ी नोकीली नाक, रहस्यमय अगम में झाँकती हुई प्रश्न भरी आकर्षक पुतलियों और लहराते बालों वाला उसका उन्नत कपाल ऐसा चमक रहा है कि पूरी पाठशाला में केवल एक नन्ददास को छोड़कर और कोई भी इतना तेजवान स्वरूप नहीं दिखलाई देता। नन्ददास के चेहरे पर केवल कोमलता है, किन्तु नवयुवा तुलसी के चेहरे पर वज्र सी कठोरता और कुसुम की कोमलता एक साथ झलकती है और यही ,उसके चेहरे को सबसे अलग विशिष्ट बना देती है। तुलसी अब पाठशाला के नये विद्याथियों को पढ़ाते हैं। वाराहक्षेत्र में उनके भाग्य-विधाता गुरु का देहान्त हो चुका है। गुरुपाद शेष सनातन महाराज ही अब उनके अभिभावक हैं। उनका तथा उनकी धर्मपत्नी का तुलसी के प्रति पुत्रवत्‌ मोह है।तुलसीदास काशी के नये पंडितों में प्रशँसा पा रहा है, इससे गुरू जी अत्यधिक संतुष्ट हैं। गुरू जी के साले, घर और पाठशाला के व्यवस्थापक-भाँग, भोजन, और बातों के अनन्य प्रेमी थे। वे तुलसी के विवाह का डौल भी बैठाने लगे थे पर तुलसी का कहना था कि अभी उसका अध्ययन समाप्त नही  हुआ।मामा जी, इस कारण से आजकल कुछ रुष्ट हैं। तुलसी-विवाह हो तो मामा जी को समघी के घर ज्यौनार का सुख मिले।गुरू जी की पाठशाला में भी किसी का न्योता स्वीकार न करने का अधिकार मामा जी को ही था । मोटा थुलथुल शरीर, गौरवर्ण, बड़ी -बड़ी सफेद मूछें। छात्रों के मामा होने के कारण वे अब जगत मामा हो गए थे। उनका आसन ड्योढ़ी के पास आँगन में ही जमता था। वहीं से वे सारे दिन बैठे-बैठे हुकुम चलाया करते थे।

सबेरे का समय था। एक ब्राह्मण युवक न्योता देने आया था- “मामा जी दण्डवत्‌ प्रणाम करता हूँ । विद्यार्थियों को न्योता देने आया हूँ ।”
सामने चौकी पर ढेर सारे ठाकुर जी फैलाए, उन पर चन्दन की बिंदिया लगाते हुए बात सुनकर मामा जी नें चन्दन की कटोरी चौकी पर रख दी। एक नजर उठाकर यजमान को देखा, फिर जनेऊ से पीठ खुजलाते हुए पूछा-“कितने विद्यार्थी चाहिए? ”
“कितने विद्यार्थी हैं महाराज?” ,
“तुम्हे किस मेल के चाहिए, पहिले यह बतलाओं | द्रविड़, महाराष्ट्र, पुष्करिया, गुर्जर, गौड़, मैथिल, उड़िया, कनौजिया, सारस्वत कौन से मेल का ब्राह्मण जिमावोगे?
“अरे मामा जी, हम सब मेल के ब्राह्मणों को निमंत्रण देंगे। पन्द्रह-बीस जितने विद्यार्थी आपके यहाँ हो सबको लेकर पधारिए। आज मेघा भगत का भंडारा है।”
ठाकुरों पर फिर से चन्दन की बिंदिया टपकाने की क्रिया आरम्भ करते हुए मामा जी बोले- “बड़ी तेजी से पुजने लगा है यह लड़का मेघा भी।अच्छा भला पण्डित था, अब भगताई सूझी है, राम राम। हमारे तुलसी को भी एक दिन यही पागलपन लगेगा। खैर, तो कौन भंडारा दे रहा है?”
“जुराम साब।”
“कहाँ होयगा भंडारा ? राजघाट में, त्रिलोचन में, कि दुर्गाधार,मगंलाघाट रामघाट, अग्नीश्वरघाट, नाग.....? ”
“बिन्दुमाधव घाट पर होयगा, मामा जी।” 
“हूँ, तो बिन्दुमाधव में कहाँ पर होयेगा? लक्ष्मीनसिह के पचंगंगेश्वर, आदि-विश्वेश्वर, दक्षेश्वर, कि दूधविनायक, कि काले......  कहाँ होगा यह भंडारा?” पूछकर मामा फिर से चंदनी सँभालकर एक-एक ठाकुर पर चंदन थोपते हुए महल्लों के नाम लेते चले।
“दूधविनायक के पास।” मामा नें बचे कुचे ठाकुरों को जल्दी से चंदन लेप- कर अब उनपर फूल चिपकाना आरंभ करते हुए कहा- “हाँ तो निमंत्रण देने आए हो? हमारी पाठशाला के विद्यार्थी कुछ ऐसे-वैसे नही हैँ, जो हर जगह चले जायें। क्या समझे ? कोई तंत्र में, कोई मंत्र में, कोई ज्योतिष, छांदस, व्याकरण में, कोई वेशेषिक तर्क, साँख्य, योग भीमासा, काव्य, नाटक,अलंकर आदि में.... “
न्योता देने के लिए आए हुए ब्राह्मण युवक ने हाथ जोड़कर मामा जी की बात काटते हुए उत्तर दिया- “मामा जी, मैं केवल आपके विद्याथियों को ही नहीं बल्कि उनके साथ आपको भी सादर निमंत्रण देने आया हूँ ।”
मामा जी का मन तरी से भर आया। मान भरें स्वर में बाले- “तो पहले क्यों नहीं बताया? क्‍या नाम है तुम्हारा” “महाराज, इस अकिंचन का नाम अलपियुध्मगजपुरदरगरुड्ध्वज बाजपेई है।” 
मामा नाम सुनते ही सकते से आ गए। मुँह और आँखे फाड़कर उसे देखते हुए कहा- “इतना बड़ा नाम ! दक्षिणा तो अच्छी मिलेगी न ? समझ लो, आचार्यों के आचार्य परमपडित शेप सनातन जी के शिष्य और क्या नाम है कि उनके माननीय साले अर्थात्‌ .......”
क्रमशः

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