महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
41-
कभी-कभी हवा शरीर का ऐसे स्पर्श करती है कि लगता है कोई हमारी देंह रगड़ता हुआ चला गया है। यह सब क्या होता है अईया जी ?”
“अपने गुरू जी से पूछता”
“साहस नही होता। गुरू जी कहेगें, तुम्हे अभी इन बातों से क्या प्रयोजन। फिर राम जी भी तो.....”
गुरूपत्नी हँसी, कहा- “तुमने राम जी को देखा है रामबोला?”
“नही, आईया जी।”
“तुमने भरत को नही देखा श्रौर राम जी को भी नही देखा। जिस पर चाहों विश्वास कर लो। मन माने की बात है।”
तुलसी बोला- “तब फिर मैं राम जी को क्यों न मानूँ | भूत मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है।”
तुलसी की गंभीर कितु भोली बातें गुरु-पत्नी को भली लगीं। स्निग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कहा- “तुम बडे़ अच्छे लड़के हो। भगवान तुम्हारा सदा मंगल करे।”
गुरु-पत्नी के आशिर्वाद ने तुलसी के मन को बड़ा बल दिया किंतु पाठशाला के बड़े विद्यार्थी विशेष रूप से उसे दिन-भर डराते और चिढ़ाते रहे। शुभचिंतक साथियों ने न जाने के लिए आग्रह किया। तुलसी के मन में उनके तर्को से भूत कभी वास्तविकता का आभास कराते थे और कभी अपने हठवश वह उसे नकारने लगता था। गुरू जी से पूछने की इच्छा बार-बार मन में जागी परतु उनके सम्मुख होने पर उसका सारा साहस मानों समाप्त हो जाता था। वे कहेंगे कि जब जाने की आज्ञा ले ही चुके हो तो स्वयं अनुभव करना।” उनका तेजस्वी, शांत और गंभीर मुखमंडल देखते ही उसे मानों अपने न पूछे हुए प्रश्न का उत्तर मिल जाता था किंतु ऊहापोह फिर भी शांत न हुआ और बालक मन हाँ और ना के झूले में झूलता ही रहा। यह होते हुए भी जितना ही उसे डराया या सझाभाया जाता था उतना ही उसका हठ और दृढ़ होता जाता था।
शाम आई, तुलसी ने गुरू जी के घर का सारा काम-काज पूरा किया, फिर गुरु-पत्नी से कहा- “आईया जी, हमें आज रात के लिए एक शंख दे दीजिए।”
“तो तुम जाओगे ही रामबोला? ”
“हां, आईया।”
"कोई भी बाधा आए पर डरना मत बेटा।”
“नहीं आईया, डरूँगा तो फिर मेरे बजरंगबली रूठ जाएंगे। मुझे उनके रूठने का भय है। रावण का मानमर्दन करनेवाले रामप्रभू मुझसे न रूठे, केवल इसी की चिंता है।” अपने इस उत्तर से उसे सहसा वह आस्था मिल गई जिसे वह इतने दिनों से पाने और संगठित करने के लिए सतत प्रयत्नशील था।शंख लेकर तुलसी अपनी कोठरी मे आया। आज उसके हाथ में दिया नही था। वह बाहर के अंधेरे से लड़ने के लिए अपने भीतर के प्रकाश का सहारा ले रहा था।
रात का पहला पहर समाप्त हुआ।कसौटी पर चढ़ने का क्षण आ गया। तुलसी ने शंख उठाया, अंधेरे में शंख के स्पर्श मात्र से उसके मन मे एक विचित्र- सी सनसनाहट भर गई। हृदय धक-धक करने लगा, कितु उसे लगा कि यह धड़कन भयकारी नही वरन् उत्साहवर्धक है। हृदय “राम-राम' बोल रहा है, उठ उठ कह रहा है। तुलसी खड़ा हो गया। कोठरी से बाहर निकला, कुंडी चढ़ाई। आगे की छोटी-सी छत अंधकारमय थी। बाँई ओर का पीपल अंधेरे में भय की सघन छायामूर्ति बनकर खड़ा था। तुलसी स्तब्ध होकर उधर ही देखता रहा।मन तेजी से कल्पना करने लगा कि नीचे से बड़े -बड़े दांतों और सींगों वाला ब्रह्मराक्षसत अपना आकार बढ़ाता हुआ मानों अब उठने ही वाला है। वह आएगा और उसके हाथ से शंख लेकर चूर-चूर कर डालेगा। वह धक्का देगा ओर तुलसी छत से गिर के नीचे गली में जा पड़ेगा। उसकी एक एक हड्डी पसली चूर-चूर हो जाएगी। इस दुनिया से उसका नाम-निशान तक मिट जाएगा। लेकिन तुलसी की कल्पना शक्ति ने उसके भय का साथ न देकर एक नया रूप ही धारण कर लिया। ब्रह्माराक्षस के बजाय उसे हनुमान जी अपनी कल्पना में बढ़ते हुए दिखाई देने लगे।हनुमानजी के दाहिने कंधे पर राम और बाँये पर श्री लक्ष्मण जी विराजित हैं और अपने-अपने धनुषों पर बाण चढ़ाए मानों तैयार बैठे है।तुलसी कल्पना से प्रसन्न हो गया। “जहाँ राम है वहाँ भय कहाँ?चल रे रामबोला, चल आज यह दिखा दे कि तेरा भय अधिक शक्तिशाली और विशाल है कि जय बजरंगबली।वह संकरी घुमावदार सीढ़ियों पर वह उतरने लगा। उतरने की सतर्कता में एक बार भय फिर उमगा। अपने ही मन के धक्के से उसकी देह दीवार से जा टकराई। वह सहमा और फिर सँभल गया- “राम-राम जप रे मन, कहाँ लड़खड़ाता है?”
सीढ़ी का एक द्वार पीपलवाली गली की ओर पड़ता था। वह द्वार यों तो बन्द रहता था किन्तु गुरुपत्नी से आज्ञा लेकर उस द्वार का ताला तुलसी ने आज शाम ही को खुलवा लिया था।तुलसी उसी से होकर बाहर आया।द्वार बन्द किए, कुंडी चढ़ाई , ताला बन्द किया, कुंजी अंगौछे में बाँधी और अंगोछे को कमर पर कसकर बाँध लिया, 'जय गणेश, जय भूतेश्वर, बजरंग, रामभद्र जय जय जय-जय। तुलसी पीपल के नीचे से ही गली पार कर रहा है। शीत उसकी रुई की मिर्जई को भेदकर उसके भीतर कंपकंपी भर रहा है | ऐसा लगता है कि तुलसी की परीक्षा लेने को सरदी भी आज अपने चरम बिन्दुं तक पहुँच रही है। पर अब तो चाहे सर्दी सतावे या स्वयं भूत ही आकर उसका हाथ क्यों न पकड़े, तुलसी अपने निश्चय से डिग नही सकता। वह सदा आगे ही बढ़ेगा।
अँधेरी सूनी गलियाँ पीछे छूटती जाती हैं।शीत के मारे कुत्ते भी इघर उघर दुबके हुए बैठ हैं, केवल आहट पाकर जहाँ तहाँ भौं-भौं कर उठते हैं। गलियों में यत्र-तत्र बैठे हुए साँड भी तुलसी के चलने की आहट पाकर अथवा जीत की प्रतिक्रियावश अपनी सांसों की फुफकारें सी छोडते हुए मिल जाते हैं।संकरी गलियों मे बन्द घरों की दीवारें मानों सांय-सांय बोल रही हैं। एक जगह पर छत्ते के नीचे एक साँड पूरी गली घेरे हुए पड़ा था। घने अंधेरे मे वह तुलसी को दिखलाई न पड़ा।वह जैसे ही आगे बढ़ा तो ठोकर खाई। पैर लड़खड़ाया और वह बैल पर ही गिर पडा। शंख की नोक बैल के शरीर में चुभी और उसने फुंफकारते हुए अपने सींग इधर घुमाए। तुलसी घबरा गया। बैल भी घबराकर उठने का उपक्रम करने लगा।
क्रमशः
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