महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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उसकी पीठ पर गिरे हुए बालक की घबराहट इस कारण से और भी बढ़ी कि भूत भले न हो पर भूतनाथ के इस नन्दी ने यदि आक्रमण कर दिया तो तुलसी की जान की खैर नही। इस भय ने सुरक्षा की भावना तेज कर दी। बैल के पिछले पैरों के पूरी तरह उठने के पहले ही वह फुर्ती से फिसल पड़ा और फिर घुटनों तथा बाँयें हाथ के पंजे के बल पर उठकर वह तेजी से भागा। अपने भय के भाग जाने पर पशु वहीं का वहीं खड़ा रह गया। आगे थोड़ी ही दूर पर गली समाप्त हो गई, खुला मैदान आ गया, तुलसी की साँस में साँस आईं।कितना शीत है। सीलन भरी गलियों की बंदिनी शीत से यह मैदान की मुक्त ठिठुरन तुलसी को अपेक्षाकृत भली लगी। तीन साल पहले गुरू जी के एक यजमान के द्वारा विद्याथियों को दान में मिली हुई मिर्जइयाँ अब अपनी गर्मी प्रायः खो चुकी थीं। तुलसी को लग रहा था कि शीत महाबली योद्धा बन कर हवा के सनसनाते तीर छोड़ रहा है।मिर्जेई का कवच उसकी रक्षा नही कर पा रहा है। दौड़ने से गर्मी बढ़ती है और वही उसकी रक्षा भी कर सकती है।
शमशान तट पास आ गया। विशाल वट-वृक्ष की अनगिनत जटाएँ हवा में भूलती हुई ऐसी लग रही थीं मानो सैकड़ों फासी के फंदे लटक रहे हों । बरगद पर कोई पक्षी इस तरह रिरिया रहा था कि मानों कोई बच्चा पीड़ा से कराह रहा हो। तुलसी के पावँ भय से थम, गए पर यह भय अब उसके लिए चुनौती बन गया था। वह श्मशान में आ पहुँचा है। बटेश्वर निश्चय ही यहाँ उपस्थित होगा। वह अपने कापालिक गुरु से मंत्र-विद्या सीख रहा होगा। यहाँ तक पहुँच कर अब यदि तुलसी घबराया तो उसकी लोक हँसाई होगी। कल विद्यार्थियों के सामने बटेश्वर दम्भ-भरे ठहाके लगाएगा। नहीं , ऐसा कदापि नहीं होगा। तुलसी के पावँ अब पीछे नही लौट सकते। यह शमशान उसके शंखघोष से गूजँना ही चाहिए। तुलसी वट के नीचे से निर्भय होकर गुजरने लगा। लटकती जटाएँ उसके सिर और कंधों को छू जातीं है लेकिन अब वह उनसे तनिक भी भयभीत नहीं हो सकता। शमशान की जलती-बुभती चिंताएँ दिखलाई पड़ रहीं हैं। एक चिता की .. लपटों से उसे तरह तरह के आकार भी दिखाई देतें हैं लेकिन तुलसी अब भयभीत नही हो सकता। भूत चाहे उसका गला ही क्यों न दबोच दे पर जब तक वह शिव जी के मदिर में शंखघोष नहीं कर देता तब तक उसके प्राण कदापि नही निकलेगे। “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपींस तिहुँ लोक उजागर।”
तुलसी शिव मदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। सामने गंगा तट पर जलती हुई चिता के पास उसे दो आकृतियाँ बैठीं हुई दिखलाई दीं। निश्चय ही बटेश्वर और उसके गुरू कापालिक की आकृतियाँ होगीं। इस विचार ने तुलसी के भीतर मानों नये प्राण फूकँ दिए।पैर तेजी से ऊपर चढ़े। भूतनाथ अपने इष्टदेव के इस भक्त को कदापि हतोत्साहित नहीं कर सकते- “जय भूतेश्वर, जय बजरंग, जय-जय-जय सीताराम।”
तुलसी ने विशाल शिवलिंग के समक्ष खड़े होकर पूरी शक्ति के साथ अपना शंख बजाया, एक बार नही, पूरे तीन बार बजाया । बाहर दूर से एक कड़कड़ाती हुई आवाज आई- “कौन है रे ”
“राम जी का खास सेवक तुलसीदास।” शिव जी के चबूतरे से ही आात्म- विश्वास से जगमगाए हुए बालक ने कड़क कर जवाब दिया।
“ठहर तो सही, रे भण्ड।” दूर की आवाज फिर गरजी, लेकिन तुलसी उस चुनौती का सामना करने के लिए फिर खड़ा न रहा। जल्दी से शिवलिंग की परिक्रमाँ करके सीढ़ियों से उतरकर वह भागा। इस समय भूतों से अधिक किसी जीवित मनुष्य की मार खाने का भय ही उसे अधिक सता रहा था। शमशान से बाहर निकलकर वह थमा और दम भर खड़े होकर हाँफते हुए वह श्मशान की ओर देखने लगा- “आव बच्चू, बटेश्वर होवे, चाहे उनके गुरू होवें, चाहे गुरू के भूत होवें, हमार कोऊ का बिगराड़ि सकत है? अरे हम तौ राम जी का जय- घोष करि आयेन।”
तुलसी श्मशान से यों घर लौट रहा था मानो त्रिलोकविजय करके आ रहा हो। इस समय न तो उसे जाड़ा ही सता रहा था और न किसी प्रकार का भय । आस्था प्रबल होकर उसे राममय बना रही थी।
भूत भय विजय का यह वृत्तान्त सुनाकर पंडित गंगाराम बोले- “ऐसे विकट
साहसी है हमारे यह परममित्र।इनके कारण हम लोगों का भय भी निर्मूल हो
गया। उस समय मेरी जान में हम लोग पंद्रह -सोलह वर्ष के बालक रहे होगें किन्तु हमसे बड़ी आयुवाले विद्यार्थी भी उसके बाद से इनका विशेष आदर करने लगे और गुरू जी का मन तो इन्होंने फिर ऐसा जीत लिया कि वे इन्हें पुत्रवत् प्यार करने लगे। उसके बाद आईया अर्थात् हमारे गुरू जी की पूजनीया पत्नी ने इनसे भृत्य का काम लेना प्रायः बन्द ही कर दिया। वे इन्हें अधिकाधिक अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहन देने लगीं।”
पण्डित गंगाराम के द्वारा कथा-प्रसँग जब पूरा हुआ तो कवि कैलास मगन मन अपनी पालथी बदलकर पास ही धरती पर रखे अपने अगौछें की गाँठ खोलते हुए बोले- “आस्था में तो यह आरम्भ ही से अंगद का पावँ रहे हैं। तभी तो इनकी भावना और काव्य-प्रतिभा मिलकर इन्हें महाकवियों मे बजरंगबली के समान उडानें भरने की शक्ति देती है।”
वृद्ध कविवर की प्रशंसा का औरों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। जब तक बात की सराहना में वाह-वाह हुई तब तक कैलास जी के अगौछें की गाँठ से पान का दोना निकल आया। गोस्वामी जी के सामने बैठकर पान खानेवाला कवि कैलास जी को छोड़कर इस नगर में और कोई व्यक्ति नहीं था। दो बीड़े पान जमाए और फिर दूसरी छोटी सी पुड़िया हाथ में उठाकर बोले- “हमारा हृदय तो इस समय यह कह रहा था कि पवनसुत केसरी किशोर की जब कवि बनने की इच्छा हुई तो वे हमारे इन मित्र के रूप में अवतार धारण करके हमारे बीच में आ गए।”
श्रोतामण्डली यह सुनकर भाव-विभोर हो गई। सामने मूर्तिवत् बैठे हुए महापुरुष की स्तुति के खिले अधखिले शब्द फूल कई, मुखों से झरने लगे। रामू बोला- “अंध भूतविश्वास के प्रति प्रभु जी का एक दोहा भी तो है--
“तुलसी परिहरि हरि रहे, पाँवर पुजजहिं भूत।
क्रमशः
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