Monday, 17 April 2023

tc 40

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
40-

इन बारह नक्षत्रों में धन-घान्य, घरोहर-धरती का लेन-देन करो तो लाभ होगा।”
उसी समय कुछ दूर पर बैठे केशव ने बटेश्वर से हँसकर कहा-“ये तुलसिया परसों अमावस्या को अर्धरात्रि के समय हरिश्चन्द्र घाट के मंदिर में शंखघोष करने जाएगा।”
सुनकर तुलसी और उसकी मण्डली के बालक चुप हो गए। बटेश्वर उपेक्षा भरी हँसी हँसा , किन्तु कहा कुछ भी नहीं। हरि ने बात आगे बढ़ाईं , बोला- “कहता था, राम शब्द से अधिक सिद्ध और कोई मंत्र ही नही है।”
कहकर वह जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ा।तुलसी आवेश में आ गया। वही से बोला “हाँ हाँ, अब भी कहता हूँ, कल जाकर रामकृपा से अवश्य ही शंकर जी के मंदिर मे शंखनाद करूँगा। देखूँगा कि भूत बड़े हैं या रामसेवक कपि केसरी किशोर।”
तुलसी का तैश देखकर हरि और केशव दोनों ही हो-हो करके हँस पड़े- “अरे वाह रे कपि केसरी किशोर के भक्त। जब शंखिनी-डंकिनी दहाड़ेंगी तब कहना।” हरि ने व्यंग्य कसा और फिर हँस पड़ा ।
तुलसी फिर तैश खा गया, झटके से उठकर खड़ा हो गया और हरि की ओर देखते हुए हाथ बढ़ाकर बोला- “भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावै। एक भी भूत-चुड़ैल मेरे सामनें नहीं ही आवैगी। देख लेना।”
वटेश्वर क्रोध में आँखें निकालकर गरजा-“अच्छा बक बक बंद कर।ससुरा भिखारी की औलाद टहल-मजूरी करके पढ़ता है और हम विद्वानों से उलझता है? बड़ा हौसला होय तो आना बेटा कल रात में। परसों सबेरे मंदिर के नीचे से डोम ही तेरा शव उठाएंगे और वहीं लोग फूंकेंगे।”
तुलसी भी ताव खा गया, बोला-“जाको राखे साइँया, मार सके नहिं कोय।
बाल न बाँका कर सके जो जग बरी होय- तुमसे जो बने सो कर लेना। मरना बदा होगा तो राम जी के नाम पर मर जाएँगें। कौन हमें रोने को बैठा है।”कहकर तुलसी दालान से बाहर चला आया। गंगा भी उसके पीछे ही पीछे आया। आवेश में भरे तुलसी के कंधे पर प्रेम से हाथ रखकर गंगा से कहा -“तुलसी, मेरे पिता मणिकणिका घाट के योगीजी को जानते हैं। मुझे भी उनके कारण योगीजी जानते हैं। चलो चलकर उनसे सारी बात कहें। वे निश्चय ही कोई सिद्ध जड़ी बूटी अथवा मंत्र तुम्हें दे देगें।”
“राम सिद्धमंत्र है। बंधु, मुझे अपने स्वर्गवासी गुरू बाबा की बात ही राजमार्ग जैसी सरल और सुखद लगती है। तुम जानते नहीं हो, हनुमान जी बचपन से ही मेरी बाँह गहे हुए हैं।अच्छा, अब चलूँ , गायों की सानी करना है, फिर माता जी के सायँ स्नान के हेतु दो गगरी गंगाजल लाना है।”

उस रात तुलसी जब सब कामों से छुट्टी पाकर अपना दिया लिए हुए ऊपर चला तो सीढ़ियों में ही हवा का ऐसा गूँज भरा थपेड़ा आया कि दीप की लौं झोंका खाकर बुझी अब बुझी जैसी हो गई। मन सहम उठा, राम-राम का जप
स्वर में हल्की कंपकंपी के साथ तीव्र गतिशाली हुआ। बत्ती की लौ नन्‍ही बूँद जैसी बन गई पर बुझी नहीं, फिर क्रमश: उसमें उजाला बढ़ने लगा। उस उजाले से बालक के चेहरे पर आत्मविश्वास का उजाला बढ़ गया। सीढ़ी पर जमे डग फिर उठे। तुलसी छत के द्वार तक पहुँच गया। रात घनी काली थी कितु सर्दी की स्वच्छ रात में तारों की चमक लुभावनी लग रही थी। नीचे गली से लेकर कोठरी की छत को छूता हुआ पीपल रात की कालिमा में अँधेंरे की एक और गहरी पर्त बनकर खड़ा था लेकिन आज वह तुलसी के लिए रुकावट न बना। उसकी न कोठरी की छत पर आज उसे कोई दीर्घाकार बैठा दिखलाई दिया और न वह छत पर धम से कूदा।न कोई आवाज ही सुनाई दी। बालक उत्साह मे तनिक जोर से बड़बड़ा उठा-“जै बजरंगबली। हे बजरंगबली, आज हमनें तुम्हे सारे दिन-भर ध्याया है। भला कौन भूत अब मेरे सामने आने का साहस करेगा? ” बड़बड़ाते हुए कुंडी खोलकर जो कोठरी में कदम रखा तो ऐसा लगा कि उसकी चटाई पर कोई लेटा है। सारी आस्था, मन का चैन लड़खड़ा गया। एक बार उल्टे पैरों लौटा, फिर देखा तो लगा कि कहीं कुछ भी नही है। बालक के मन में नये सिरे से उत्साह आया। उसने अपनी कोठरी में पुन. भीतर तक प्रवेश किया। दिये के प्रकाश में कोठरी के चारों कोने और फर्श से लेकर छत तक, सतर्क नजरों से सब छान मारा, कही कुछ भी न था। मन का विश्वास फिर लौटा। दिया आड़ में रखा। द्वार खुले होने से ठंडी हवा भीतर आ रही थी। तुलसीदास ने दरवाजे अंदर से बंद कर लिए। छोटी सी कोठरी की अकेली दुनिया कुछ अजीब सी लगी। कुछ भय, कुछ अभय मिलकर तरुण मन को सनसनाहट से भरने लगा। भरी सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूँदें चुचुआ उठीं।फिर आप ही बड़बड़ा उठा- “धत्‌ तेरे की रामभगतवा। हनुमान जी का ध्यान कर”
वह अपनी चटाई पर बिछी हुई कथरी पर बैठ गया। मिट्टी की दवात और सरकंडे की कलम सामने रख ली। कागज उठा लिया और लिखना आरंभ किया-
“जे॑ हनुमान ज्ञान गुन सागर।जै कपीस तिहुँ लोक उजागर॥”

मध्य रात्रि तक हनुमान चालीसा पूरी की। तुलसी ने अपने अब तक के
जीवन में यह पहला लंबा काव्य रचा था। मन बड़ा ही मगन था। जोश में आकर उसने दो तीन बार अपने चालीसा काव्य को पढ़ा।दो-एक जगह संशोधन
भी किए, फिर ऐसे सुख से टांगें पसारकर सोया मानों उसने कोई बड़ी भारी दिग्विजय कर ली हो।
दूसरे दिन युवक जब वह गंगाजल की गगरियों को घर के भीतर पहचाने के लिए गया तो गुरु-पत्नी ने पुछा- “रामबोला, हमने सुना है, तुम आज शमसान जाने वाले हो?”
तुलसी झेंप गया, फिर कहा-“हम राम जी की शक्ति को भूतही की शक्ति से बड़ी मानते हैं, आईया जी क्‍या हम गलती करते है?”
“नही बेटा, भूत तो बनते-बिगड़ते रहते हैं, वह तुम्हारे मन के विकारों की तरंगें मात्र ही हैं। उनकी चिंता कभी न करना।
गुरु पत्नि की बात अच्छी तो लगी पर मन को जैसे विश्वास न हुआ, पूछा-“अइया जी, रात में पीपल तले कभी-कभी ऐसा उजाला दिखलाई देता है कि हम आपसे क्‍या बतलाएँ। आकार भले भय के हों, पर यह उजाला कौन करता है?
क्रमशः

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