महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
39-
कूडें वाली डलिया उठाकर तुलसी ने कहा-“बटेश्वर अमावस्या की रात्रि में वहाँ जाते हैं तो उनसे कहना कि अबकी अमावस्या की रात्रि में मेरा शंखघोष वे राम जी की दया से सुन लेंगे।”
“अरे जा, जा, बड़ी राम जी की दया वाला बना है। हग भरेगा बच्चू, हग भरेगा।”
तुलसी के चेहरे पर निश्चय की स्फटिक शिला जम गई थी। उसने अपने सिर पर कूड़े की डलिया रखी और सधे पावँ बाहर की ओर चला। गंगा भी उसके साथ ही साथ चला। कुछ कुछ सहमे से स्वर में उसने पूछा--“'तुलसी, क्या तुम सचमुच अमावस्या की रात में वहाँ जावोगे। मैंने बड़ी गलती की जो आवेश में आकर कह गया। तुम्हे भी जल्दी आवेश मे नही आना चाहिए था। हम दोनों से चूक हुई।”
तुलसी चुप रहा। घूरे तक वे लोग चुपचाप आए।तुलसी ने कूड़ा घूरे पर डालकर डलिया को झाड़ा फिर संयत स्वर में कहा -“अब तो अमावस को जाऊँगा , गंगा। नहीं जाऊँगा तो मेरे राम जी, हनुमान जी झूठे सिद्ध होगे।”
गंगा बोला - “राम जी समर्थ हैं। अपनी निन्दा बढ़ाई को वह आप संभाल सकते हैं। तुम भूत-प्रेतों से मत खेलो तुलसी।”
"नहीं, अब तो बात दे चुका। मैं जाऊँगा।”
“भाई, मेरे मत से तुम्हें पहले आचायंपाद से आज्ञा ले लेनी चाहिए।”
“हाँ हाँ, निश्चिन्त रहो। गुरू जी से पूछकर ही जाऊँगा।मेरा विश्वास है कि वे आज्ञा दे देंगे।”
“अभी से यह भरोसा न बाँधो। गुरू जी ज्ञान नारायण को धारण करनेवाले साक्षात् शेष भगवान है।”
“तभी तो विश्वासपूर्वक यह कह रहा हूँ कि वे आज्ञा दे देंगे।”
नीम के पेड़ तले मिट्टी के चबूतरे पर कुश आसन बिछाए विराजमान, ज्ञानमूर्ति, तपोपुज आचायंपाद शेष सनातन जी महाराज अपने सामने बेंत की बुनी हुई चौकी पर रखी पोथी के कुछ पन्ने हाथ में उठाए हुए बाँच रहे थे। बालक तुलसी दबें पावँ वहाँ पहुँचा और चुपचाप हाथ बाँधें खड़ा हो गया। गुरू जी कुछ समय के अन्तराल में पोथी के पन्ने पढ़कर पलटते हैं और आगे पढ़ने में तल्लीन हो जातें हैं। तुलसीदास की ओर उनका ध्यान तक नही जाता। बालक सिर झुकाए हाथ बाँधे खड़ा रह जाता है। गुरू जी जब उन पृष्ठों को पढ़कर पोथी में मिलाते हुए आगे के पृष्ठ उठाते हैं तब उनका ध्यान एकाएक तुलसी की ओर जाता है।पूछा- “क्या है?”
हाथ जोड़कर तुलसी ने कहा-“एक आज्ञा लेने के लिए सेवा में आया हूँ गुरू जी।”
"कहो” -गुरू जी ने नये पृष्ठ हाथ में उठा लिए।
"दो दिन पहले हरि और केशव से मेरी बदाबदी हो गई थी। वे भूतों का भय दिखला रहे थे।मैने कहा कि भूत पिशाच बजरंगबली से बढ़कर शक्तिशाली नहीं हैं। जिसकी भक्ति राम के चरणों में अटल है वह भूतों से कदापि नहीं डर सकता। इस पर हरि ने कहा कि जो ऐसे भक्त हो तो हरिश्चन्द्र घाट पर शिव जी के मंदिर में अमावस्या को आधी रात के समय शंख बजा आओ तब हम जानें। बटेश्वर वहाँ किसी भूत-विशारद से भूत-विद्या सीखने के लिए जातें हैं। वे मेरे शंखवादन के साक्षी होंगे। यदि आप आज्ञा दें तो चला जाऊँ।”
गुरू जी मौन रहे, फिर पूछा- “अपनी कोठरी में कभी डरे हो कि नहीं?”
“कुछ कुछ तो अवश्य डरता हूँ गुरू जी, परन्तु श्री केसरीकिशोर के ध्यान से मेरे भय के भूत भाग जाते हैं। आपके उपदेश भी मेरे मत को बल देते रहते है।”
पक्की परख भरी दृष्टि से अपने शिष्य का मुख निहारकर फिर पोथी की ओर देखते हुए गुरू जी गंभीर स्वर मे बोले-“पीपलवाला तो बड़ा सभ्य भूत है,केवल दुष्टों को ही सताता है, परन्तु सब भूत-प्रेत ऐसे नही होते। कुटिल और क्रूर भूतों की कमी नही है। हरिश्चन्द्र घाट भूतों की अति भयावनी लीलास्थली है।”
“बालक की वाचालता क्षमा हो गुरू जी, बटेश्वर भी तो वहाँ जाते है।”
“बटेश्वर मंत्र-कवच-मंडित है। तुमको तो भूत फाड़ खाएंगे।”
तुलसी एक क्षण तक स्तंभित खडा रहा, फिर सिर में कुछ तनाव आया झटके से स्वर उठा, कहा- “राम जी के रहते मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। आपके चरणों का ध्यान ही मेरा रक्षा कवच बनेगा।”
“यह तुम्हारा अटल विश्वास है?”
गुरू के चरणों मे शीश नवाकर तुलसी ने कहा- “हां, गुरू जी, मेरी परीक्षा ले ले।”
“तुम्हें स्वयं अपनी ही परीक्षा लेती है तुलसी। यदि तुम्हारी भवित अटल है तो भव भूतताथ तुम्हारी रक्षा करेगें। जाओ, मेरा आशीर्वाद है।”
बाबा ध्यानमग्न बैठे अपने पूर्वानुभव के मनोदृश्य देख रहे थे। पंडित गंगाराम की स्वर उन दृश्यों को गति दे रहा था। पण्डित जी कह रहे थे- “पाठ्याला में सभी छात्रों को घीरे-घीरे यह बात विदित हो गई। पाठशाला में केवल हम चार पांच छात्र ही छोटी आयु के थे। उनमे भी केवल तीन बालक गुरू जी के घर में रहकर सेवा-वृत्ति से शिक्षा ग्रहण करते थे, बाकी सब स्थानीय निवासी थे और दक्षिणा देकर पढ़ा करते थे। उनकी सँख्या आठ थी, उसमें भी छ: विद्यार्थी सत्तरह- अठारह से बीस-पचीस की आयु वाले थे। बटेश्वर मिश्र की आयु २३-२४ वर्ष के लगभग थी।वह श्याम वर्ण का दुबला पतला क्रोधी और अहंकारी युवक था। गुस्सा सदा उसकी नाक पर ही धरा रहता था। धनी पिता का पुत्र था इसलिए अपने आगे किसी को कुछ समझता नही था। जरी काम का दुशाला और लाल मखमल की मिर्जई पहनकर वह पढ़ने के लिए आया करता था। हरि केशव दोनों ही सदा उसकी चाटुकारी में रहा करते थे। चतुर्दशी के दिन गूरूजी महाराज किसी नरेश के यहाँ बुलावे पर गए थे। हम सब लोग उस दिन प्रायः अनुशासन-मुक्त थ, तभी हरि ने छेड़ -छाड़ की।हरि, केशव, बटेश्वर तथा उनके समवयस्क दो और छात्र दालान में गुरू जी की सूनी चौकी के पास बैठे हुए थे।तीन बड़े छात्र एक अलग कोने में बैठे हुए आपस में साहित्य विवेचना कर रहे थे ।
तुलसी, गंगाराम और उनके समवयस्क दो छात्र बैठे हुए आपस में ज्योतिष संबंधी चर्चा कर रहे हैं। एक ने पूछा -“अच्छा तुलसी, बताओ व्यापार के लिए कितने नक्षत्र अच्छे होते हैं?”
तुलसी बोला-“बारह। श्रवण के तीन, हस्ति के तीन, फिर पुष्प और पुनर्वंसु, इसके बाद मृगशिरा, अश्वनी, रैवती तथा अनुराधा।
क्रमशः
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