Sunday, 16 April 2023

tc 38

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
38-

शीघ्र ही हम लोग ऐसे गहरे मित्र बन गए कि अपने मन की एक एक बात एक दूसरे के आगे कहने लगे। उन्हें गुरूजी महाराज के घर में छत पर बनी एक छोटी सी कोठरी रहने को मिली थी। उस कोठरी की दीवार पर एक विशाल पीपल की टहनियाँ हवा से डोलती हुई भड़ भड़ लग कर आवाज किया करतीं थीं और विचित्र विचित्र से छाया चित्र बनातीं थीं। तुलसी भृत्य शिष्य थे। गुरूजी के घर का सारा कामकाज भृत्य के रूप में करते, तीसरे पहर गुरूजी से शिक्षा ग्रहण करते और रात में पतली सीढ़ियाँ चढ़कर हथेली की ओट से दिए की लौ को सुरक्षित करके यह तिमंजिले की छत पर पहुंचतें।
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छत के द्वार पर बारह-तेरह वर्ष का एक गौरवर्ण बटुक दिया लिए हुए खड़ा है। अभी ही उसने सीढ़ियाँ चढ़कर द्वार पर पहला कदम रखा है। सामने पीपल की टहनियाँ उसकी कोठरी की छत से लेकर इस छत की मुँडेर तक दीवार तक हवा के झोंकों से ऐसे भिड़ जातीं हैं मानों किसी के बोझ से इतनी नीचे झुकती हों। बालक की भावना में एक विशालकाय मनुष्याकार झलकता है जो क्रमशः बड़ा होते हुए आकाश को छू लेता हैं और फिर तिरोहित हो जाता है। कलेजे के अन्दर धमाके की गूँज अब भी सनसनाहट भर रही है। बच्चे का चेहरा फीका पड़ गया, काया काठ हो गई,हाथ पैर भय की सनसनाहट से जल्दी जल्दी काँप उठते, जिससे हाथों का दिया हिल हिल जाता था।अपने भय जड़ित स्वर को क्रमशः खोलने के प्रयास मे ऊँचा उठाते हुए बालक के हाथ पैरों में गति आई। कदम आगे बढ़ा 'जै बजरंग....”दूसरा कदम बढ़ा 'बजरंग-बजरंग', दो सहमे डग और आगे बढ़ गए, बढ़ने से भय कुछ कुछ पीछे हटा किन्तु अभी तो भय का आगार, वह दीवार ठीक सामने थी जिसके सहारे दस-पाँच पल पहले बच्चे ने अति विशालकाय काया देखी थी। भय अपने आप में हाँफने लगा, साथ ही उसमें फिर से एक नई तेजी भी आई, “भूत-पिशाच निकट नहिं आवे, महावीर जब नाम सुनावे ” अपने शब्द अपने ही लिए नई आस्था बनकर वच्चे को आगे बढ़ाने लगे। वह डरता जाता है और डर को जीतते हुए बढ़ता भी जाता है। वह अपनी कोठरी के द्वार तक पहुँच ही गया। दिये को हवा से बचानेवाला दाहिना हाथ दरवाजे की कुण्डी तक लड़खड़ाता हुआ उठा। काँपते हाथों से कुण्डी खुली फिर झटके से द्वार खुला। बच्चा हवा की तरह भीतर घुस गया और द्वार उड़काकर उसपर अपनी पीठ टेककर अपनी हथेली के दिये को सँभालने शरीर अपने आप ही निरापद महसूस करने की स्वचालित प्रक्रिया में रम गया।
दूसरे दिन पाठशाला में रामबोला ने अपने मित्र गंगाराम से कहा -“गंगा, भूत-प्रेत सचमुच होते हैं। कल मैंने पीपलवाले ब्रह्मराक्षस को अपनी आँखो से देखा है।”
साँयकाल के समय तुलसी और गंगाराम दोनों ही पाठशाला के आगे का आँगन बुहार रहे हैं, दोनों सूखे पत्ते, गर्द आदि सारा कूड़ा एक जगह लाकर एकत्र कर रहे हैं , हथेलियों से कूड़ा एक जगह डाल रहे हैं और बाते कर रहे हैं। तुलसी कह रहे हैं- “हमारी कुठरिया, की छत पर पीपल की डाल पकडे़ हुए बैठा था न उसने जो हमको देखा तो ऐसी जोर से टहनी को झकझोर उठा कि मानों हमें देखकर उसे बड़ा क्रोध आ गया हो और वो बड़ा होने लगा। मैंने भी जोर जोर से राम-राम, बजरंग-बजरंग जपना आरंभ कर दिया। एक पंक्ति भी बन गई, 'भूत-पिशाच निकट नहीं आवें , महाबीर जब नाम सुनावै।” 
बालक गंगाराम बोले- “हमारी तो भैया ऐसे में सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो जाय। काशी में विश्व भर के भूत आते हैं।तुलसी बोला-“हमारे बाबा कहते थे कि राम मंत्र सिद्ध मंत्र है। हमको तो वही फलता है। जिसके हनुमान और अंगद जैसे महावीर सैनिक हैं,जो नाथों के नाथ विश्वनाथ के भी इष्टदेव हैं, उनके चरण भला क्यों न गहै ! अरे, हम तो कहते हैं गंग़ा, कि ऐसे बड़े मालिक को कष्ट देने की भी आवश्यकता नहीं, उनके परम सेवक बजरंगबली से ही हमें रक्षा मिल जाती है-
'भूत-पिशाच निकट नहीं आवै, महाबीर जब नाम सुनावे।
नासे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा। 
संकट से हनुमान छुड़ावै, मन-क्रम-वचन ध्यान जो लावै।” 
पास ही से दो विद्यार्थी साग-भाजी लेकर आँगन से प्रवेश कर रहे थे। उन्होंने सुना। एक ने मुस्कराकर कहा- “अरे वाह, कवि जी, बड़ी जोर से कविताई हो रही है।”
तुलसी झेंप गया, गंगा ने हंसकर कहा-“भूत-बाधा दूर करने का मंत्र बना रहे हैं।”
दूसरा लड़का हँस कर बोला-“हें -हैं-हैं, अभी नाक पोंछना तो आता नहीं, मंत्र बनावैगें। अभी पिछवाड़े का पीपलवाला जो इनके सामने आकर खड़ा हो जाय तो डर के मारे इनके वस्त्र बिगड़ जायें। ही.. ही.... ही मंत्र बनाने चले हैं।” 
तुलसी को ताव आ गया। उस लड़के की ओर देखकर कहा -“देखा है, देखा है उस पीपलवाले को भी। मेरी कोठरी की दीवार पर ही तो बैठता है। पर मैं जैसे ही जाकर हनुमान जी का नाम लेता हूँ, वैसे ही भाग जाता है।” 
लड़के आँगन में खड़े हो गए। एक ने कहा -”अरे जा रे लवार, झूठमूठ की न हाकँ ” 
“मैं गुरू जी के चरणकमलों की सौगंध खाकर कहता हूँ। मैंने पीपलवाले को कई बार कई रूपों में देखा है।”
इतनी बड़ी शपथ का प्रभाव उन विद्यार्थियों पर पड़े बिना न रह सका । एक बोला-“अपना बटेश्वर प्रत्येक अमावस्या की रात को श्मशान पर एक कापालिक से भूत विद्या सीखने के लिए जाता है। वह कहता था कि आधी रात को वहाँ शिव जी के मंदिर में सारे भूत एकत्र होते हैं और भूतनाथ की आरती उतारते हैं। वह कहता था कि उस समय जो कोई वहाँ जाकर शंख बजा दे तो सारे भूत उसके वश में हो जाएँ पर कोई बजा ही नही सकता। बड़े बडे़ सिद्ध भी यह साहस नही कर सकते।”
गंगा बोला- “हमारा तुलसी जा सकता है। यह बड़ा राम-भक्‍त है।”
“ ही ही, देखी-देखी इसकी भक्ति।”-एक ने कहा।
तुलसी की आँखें स्वाभिमान से चमक उठीं।
क्रमशः

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